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Uttarakhand Suffering From Disaster - दैवीय आपदाओं से जूझता उत्तराखण्ड

Started by पंकज सिंह महर, August 06, 2010, 11:46:48 AM

Devbhoomi,Uttarakhand


पहले से नहीं मिला पानी अब आपदा बनी बहाना
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सरकारी विभागों की एक काम बनाते हुए दूसरा बिगाड़ने की आदत पुरानी है। यमकेश्वर के तिमली ग्राम सभा में सड़क निर्माण का मलबा विभाग ने पेयजल लाइन पर गिरा दिया, जिससे गांव को पेयजल आपूर्ति बंद हो गई है। हालात यह है कि बच्चे स्कूल जाने के बजाए तीन किलोमीटर दूर से पीने का पानी लेने जा रहे हैं।

आपदा का सबसे अधिक असर पहाड़ों की सड़कों पर हुआ है। कई जगहों पर सड़क मार्ग बाधित हो गए। यमकेश्वर की ग्राम सभा तिमली में भी बरसात के दौरान तुंगखाल, बुकंडी एवं विध्यवासिनी मोटर मार्ग क्षतिग्रस्त हो गया था। जिम्मेदार विभाग मलबा हटाने तो आया मगर उसने मलबा सड़क से हटाकर पेयजल लाइन पर डाल दिया। इस कारण लाइन क्षतिग्रस्त हो गई और गांव में पेयजल आपूर्ति ठप हो गई, जिससे गांव में पानी के लिए हाहाकार मच हुआ है। हालत यह है कि गांव के बच्चे स्कूल जाने के बजाए पूरे दिन तीन किलोमीटर दूर से पानी ढो रहे हैं। गांव में पेयजल की कमी होने के कारण मवेशियों के लिए भी दिक्कतें हो गई है। इसके अलावा गांवों में होने वाले सामाजिक समारोह शादी ब्याह आदि कार्यो को कराने के लिए भी गांव में पानी नहीं है। परेशान होकर ग्राम प्रधान विशंभरी देवी ने मुख्यमंत्री के दरबार में गुहार लगाई है। मुख्यमंत्री को प्रेषित ज्ञापन में उन्होंने क्षेत्र की समस्या रखते हुए कहा कि यदि जल्द ही गांव में पेयजल समस्या का निदान नहीं किया गया तो ग्रामीण पलायन को मजबूर हो जाएंगे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6826130.html

पंकज सिंह महर

      Author: चण्डी प्रसाद भट्ट   
सितम्बर के तीसरे सप्ताह की अखण्ड बारिश ने पूरे उत्तराखण्ड को तहस-नहस करके रख दिया था। अनुमान है कि इस दौरान दो सौ लोग तथा एकाध हजार पशु मारे गए। एक हजार मकान और फसल से भरे खेत भी नष्ट हो गए थे और अनेक सड़कें भी बह गई। वर्ष 1956, 1970 एवं 1978 में भी इस प्रकार की बारिश हुई थी। लेकिन तब इस प्रकार की तबाही नहीं हुई थी। मेरे बचपन में जहां गोपेश्वर गांव की आबादी 500 थी वह आज 15000 हो गई है। नए फैले हुए गोपेश्वर में बरसात के दिनों में टूट-फूट एवं जल-भराव की घटना कभी कभार होती रहती हैं लेकिन जो पुराना गांव है उसमें अभी तक इस प्रकार की गड़बड़ी नहीं के बराबर है। गोपेश्वर मन्दिर के नजदीक भूमिगत नाली पानी के निकास के लिए बनी थी जिसमें जलभराव की नौबत ही नहीं आती थी।

पहाड़ी क्षेत्र में गांव की रचना के साथ-साथ मकानों के निर्माण स्थल के बारे में भी बहुत सावधानी बरती जाती थी। स्थल की मिट्टी को आधार मानकर निर्माण किया जाता था। नींव डालते समय श्रावण महीने के सात दिन की बरसात के बाद जब जमीन बैठ जाती तो उससे फिर आगे कार्य किया जाता है। अधिकांश भवन सामग्री स्थानीय होती थी। मकानों के निर्माण में भूमि-धंसाव एवं भूकम्प को सहने का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था। दरवाजों के ऊपर लकड़ी या पत्थर को बीचों-बीच कस कर रखा जाता था। मकान के तीनों ओर से गैड़ा {पानी के प्रवाह की नाली} निकाला जाता था और उसकी सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता था। बद्रीनाथ मंदिर इसका उदाहरण है जिसके दोनों ओर ऐवलांच (बर्फीले तूफान) आदि से नुकसान होता रहा, किन्तु मन्दिर पूर्णतया सुरक्षित है। इसकी सुरक्षा में निर्माण स्थल चयन की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यही बात केदारनाथ मन्दिर के स्थापत्य के बारे में भी कही गई है।

गांवों में खेतों का नुकसान कम हो इसलिए खेत से नीचे के भाग में स्थित खेतों के बीचों-बीच सेरा गूल निकाली जाती थी जिससे बरसात का पानी खेतों में नहीं फैले। खेतों एवं गुलों की मेढ़ों पर कौणी और झंगौरा बोया जाता था बीच में धान, तिल आदि। कौणी-झंगौरा आदि की जड़ कुछ मजबूत एव ऊंची बढ़त वाली फसल थी इसलिए इससे खेत के पगार-दीवाल कम टूटती थी।

नदियों के किनारे बसाहट नहीं होती थी। नदी से हमेशा दूरी का रिश्ता रखा जाता था। नदियों के किनारे की बसाहट एवं खेती नितान्त अस्थाई रहती थी एवं बरसात के मौसम में वहां रहना वर्जित जैसा था। यही कारण था कि गंगा की मुख्य धारा अलकनन्दा एवं उसकी सहायक धाराओं में सन् 1970 से पूर्व कई बार प्रलयंकारी भूस्खलन हुए इनसे नदियों में अस्थाई झीलें बनी जिनके टूटने से भयंकर बाढ़ आई पर ऊपरी क्षेत्रों में इन बाढ़ों से जन-धन की हानि ना के बराबर हुई। इतिहास को टटोलें तो सन 1868 में अलकनन्दा की सहायक धारा-बिरही से आयी बाढ़ से लालसांगा {चमोली} में 73 यात्रियों के मारे जाने की जानकारी है। सन् 1894 की अलकनन्दा की प्रलयंकारी बाढ़ में भी केवल एक साधु की मौत की जानकारी है। अलकनन्दा के उद्गम से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर श्रीनगर गढ़वाल में ही ज्यादा नुकसान होना बताया गया।

सन् 1950 के बाद उत्तराखण्ड में स्थित तीर्थ स्थानों, पर्यटक केन्द्रों एवं सीमा सुरक्षा की दृष्टि से मोटर सड़कों का जाल बिछना शुरू हुआ। अधिकांश सड़कें यहां की प्रमुख नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों से ले जाई गई। इसी आधार पर पुरानी चट्टियों का अस्तित्व समाप्त हो गया और नदियों से सटकर नए-नए बाजार रातों-रात खड़े हो गए। सड़कें भी कई अस्थिर क्षेत्रों में खोदी गई तथा बारूद के धमाकों से ये और भी अस्थिर हो गये। सड़कों के आसपास के जंगलों का भी बेतहाशा कटाव और विनाश शुरू हुआ।

इसके अलावा यहां छोटी-बड़ी सैकड़ों जलविद्युत योजनाओं का जाल बुना जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले अलकनन्दा एवं उसकी सहायक जलधाराओं में छः दर्जन से अधिक परियोजनायें या तो निमार्णाधीन हैं या निर्माण के लिए प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं के लिए खोदी गई मिट्टी, कंकड के पहाड़ नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

इसी प्रकार जिन-जिन गांवों के नीचे से सुरंगों का निर्माण हो रहा है वहां बारूद के धमाकों के कम्पन से गांवों की अस्थिरता भी बढ़ती जा रही है। विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना के विद्युतगृह के ऊपरी भाग में स्थित चाई गांव की उजड़ी हुई बस्ती इसकी गवाह है। इसी प्रकार मनेरी विद्युत परियोजना के लिए बनी सुरंग के ऊपर जामक गांव स्थित है, जहां पर 1991 के भूकम्प में सबसे अधिक लोग मारे गए थे।

पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन और बाढ़ का प्रभाव अब मैदानी इलाकों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यमुना, भागीरथी, अलकनन्दा, रामगंगा व कोसी के मैदानी क्षेत्र भी अब डूब एवं जलभराव की परिधि में आ गए हैं। नदियों का तल उठने से उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली की नदी किनारे की बस्तियां अब अधिक तेजी के साथ जलभराव एवं बाढ़ की चपेट में आ रही हैं। इससे पहाड़ों समेत मैदानों में भी लाखों लोग तबाही का शिकार हो रहे हैं और विकास परियोजनायें भी नष्ट हो रही हैं। बारिश का क्रम कम-ज्यादा होता रहेगा। आवश्यकता है कि आज बारिश की मारक क्षमता को कम किया जाए।

इसके लिए योजनाकारों एवं प्रशासकों व राजनेताओं को पहली बार तो यह समझना होगी कि देश के नियोजन का केन्द्र बिन्दु हिमालय का संरक्षण होना चाहिए। इसके लिए नए मानकों से हटकर निर्माण कार्यों के टिकाऊ बने रहने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी ज्ञान उदारतापूर्वक दिया जाना चाहिए। इसके लिए जिम्मदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नदियों, नालों एवं गदेरों में बहने वाली गाद की मात्रा इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि यदि इसे अति प्राथमिकता के आधार पर नहीं रोका गया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम आगे भी आते रहेंगे। इसके लिए बिगड़े हुए पणढ़ालों में छोटी एवं बड़ी वनस्पति से आच्छादित करने का लोक कार्यक्रम खड़ा किया जाना चाहिए। अस्थिर क्षेत्रों व दरारों एवं भूस्खलन से प्रभावित इलाकों को चिन्हित किया जाना चाहिए। ऐसे इलाकों की पहचान कर छेड़छाड़ न करते हुए, इन्हें विश्राम दिया जाना चाहिए।

छोटे-बड़े बाजारों व नगरों के पानी की समुचित निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा छोड़े गए मलबे के ढेरों के समुचित निस्तारण हेतु सख्ती से कदम उठाये जाने चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी स्थिति में वह नदियों में न बहे। गांवों के नीचे से परियोजनाओं के लिए सुरंग न खोदी जाएं।

निर्मित बांधों के द्वारा होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदारियां सुनिश्चित की जानी चाहिए। भविष्य में संवेदनशील क्षेत्रों में बड़ी परियोजनाओं का निर्माण बन्द किया जाना चाहिए।

हिमालय पर्वत जो देश की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है, आज भी विकासमान स्थिति में है। अतएव यहां भूकंप की आशंका बनी रहती है। यदि मानवीय गड़बड़ियों को नहीं रोका गया तो हमारे भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।(सप्रेस)

परिचय - चंडी प्रसाद भट्ट वरिष्ठ पर्यावरणविद हैं। मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त श्री भट्ट पहाड़ों में पर्यावरण संरक्षण का अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं। गोपेश्वर (चमोली) स्थित सर्वोदय केंद्र के संचालक हैं।

साभार- इंडिया वाटर पोर्टल

Devbhoomi,Uttarakhand


भुखमरी के कगार पर चुकम के ग्रामीण
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अल्मोड़ा: आपदा प्रभावित गांव चुकम के लोग दयनीय दशा से गुजर रहे हैं। अतिवृष्टि में अपना सबकुछ गंवा चुके लोग अपनी जान बचाने में तो सफल रहे, लेकिन अब उनके सामने भुखमरी के हालात बने हुए हैं। चुकम विस्थापन संघर्ष समिति ने जिलाधिकारी से अपना दर्द बयां करते हुए विस्थापन की गुहार लगायी है।

उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र का अधिकांश भाग रामनगर तहसील नैनीताल जिले में पड़ता है। अल्मोड़ा में पड़ने वाले इलाके को लेकर दिए गए ज्ञापन में कहा गया कि इस क्षेत्र के ग्रामवासियों का आजीविका का साधन मात्र कृषि है। गांव हमेशा ही पहाड़ी जंगलों से आने वाले बरसाती नालों व कोसी नदी के कटाव से जूझ रहा है। शासन-प्रशासन ने समय-समय पर चेकडैम व तटबंध लगाकर भूमि कटाव रोकने की कोशिश की, जो सफल नहीं हुई। परिणामत: काश्तकारों की फसल व कृषि भूमि लगातार बर्बाद हो रही है। 1993 में कोसी नदी में आयी भयंकर बाढ़ से 13 परिवारों की पूरी कृषि भूमि व आवास बह गए। तब से ग्रामवासी लगातार विस्थापन की मांग कर रहे हैं। 93 की त्रासदी को झेल चुके क्षेत्रवासियों के लिए 18 सितंबर 2010 को कोसी नदी में आयी विनाशकारी बाढ़ ने 15 परिवारों की कृषि भूमि, आवास बहा दिए। 20 परिवारों के घरों में पानी व मलबा घुसने से खाद्य सामग्री, कपड़े, बर्तन आदि नष्ट हो गए। ग्रामीणों ने किसी तरह जंगलों में जाकर अपनी जान तो बचा ली, लेकिन अब वह दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए हैं। ऐसे में शीघ्र ही उनका विस्थापन किया जाना चाहिए। संघर्ष समिति के संरक्षक आशीष मनराल ने कहा है कि यदि एक माह में विस्थापन की कोई सार्थक पहल नहीं की गई तो क्षेत्रवासी आंदोलन को बाध्य होंगे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6827562.html

Devbhoomi,Uttarakhand


उजड़े बसेरे को सवेरे का इंतजार
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उजड़े बसेरों को सवेरे का इंतजार है। अब इसी उम्मीद में दिन कट रहे हैं कि ये काली रात कब खत्म होगी। भगवान ने छत छीनी और अपने भी रहम नहीं दिखा रहे हैं। मानसून गुजरने के बाद मन भारी है। उघड़े जख्मों पर मरहम लगाने की सरकारी कवायद ऐसी है मानो जख्मों पर नमक छिड़का जा रहा हो। डुण्डा ब्लाक के गुनाल गांव के विनोद कुमार को ही ले लीजिए आशियाना मटियामेट होने के बाद से वह परिवार समेत जंगलात की चौकी में दिन बिता रहा है। तात्कालिक सहायता के रूप में मिले दो हजार रुपये कब के खत्म हो गए। अब छह बच्चों के भरे पूरे परिवार का पालन पोषण कैसे करे, उसे सुझायी नहीं दे रहा। भविष्य मुंह बाये खड़ा है। पटवारी जी नाम नोट कर चुके हैं, लेकिन मदद कब तक मिलेगी पता नहीं। अकेला विनोद ही नहीं, जिले के 700 बेघर यूं ही दिन काट रहे हैं।

आसमान से बरसे कहर के निशान उत्तरकाशी जिले में जहां-तहां बिखरे हैं। बेशक रास्तों की मरम्मत कर उन्हें यातायात के लिए खोल दिया गया हो, पर जिंदगी की गाड़ी अभी भी पटरी से उतरी हुई है। इमदाद की बाट जोह रहे परिवार 'सरकारी सुस्ती ' से आहत हैं। मदद पाने के लिए औपचारिकता पूरी करने में खासा समय जाया हो रहा है। पीड़ितों के मन को एक ही सवाल साल रहा है कि जिंदगी कब तक व्यवस्थित हो पाएगी। पुनर्वास के लिए एड़ियां रगड़ते-रगड़ते हफ्तों बीत चुके हैं। बावजूद इसके हाथ रीते ही हैं।

गुनाल गांव के हर्षमणी, भटवाड़ी के भूषण लाल, हबीब बट समेत आपदा से प्रभावित हजारों लोगों की यही दास्तां है। सरकार की ओर से बेघर हुए लोगों को घर बनाने के लिये पचास हजार रुपए की धनराशि अभी कुछ ही जगह पर मिल सकी है। अस्थायी व्यवस्था पर नजर डालें तो जंगलात चौकियां, पटवारी चौकियां व खाली पड़े अन्य सरकारी भवन प्रभावितों की शरणगाह बने हुए हैं।

कुल आपदा प्रभावित- 194494

बेघर परिवार - 700

जर्जर घर- 790

मृतक- 22

घायल- 21

पशु हानि- 112

डेढ़ करोड़ की राहत राशि बंटी

प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिये अब तक विभिन्न क्षेत्रों में कुल डेढ़ करोड़ की राहत राशि बांटी गई है। जबकि जिला प्रशासन द्वारा निजी संपत्तियों के नुकसान का कुल आंकलन 77 करोड़ रुपए से अधिक किया गया है। पटवारियों की रिपोर्ट के आधार पर किये जा रहे आंकलन में अनेक गांवों से शिकायतें भी सामने आ रही हैं।

'अभी राहत कार्य चल रहे हैं। सरकार की ओर से क्षतिग्रस्त भवनों के लिये राहत राशि कुछ बढ़ाई है। जहां तक पुनर्वास का सवाल है तो इसकी प्रक्रिया लंबी हो सकती है। शासन से इस संबंध में निर्देश मिलने पर ही स्थल चिह्नीकरण, अधिग्रहण या भूमि क्रय जैसे कार्य किये जा सकते हैं'

- डा.हेमलता ढौंडियाल, जिलाधिकारी, उत्तरकाशी।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6835650.html

विनोद सिंह गढ़िया

बागेश्वर में २३ गांवों के ३८० लोग आज भी नाते-रिश्तेदारों॒ के यहाँ 
Story Update : Thursday, October 28, 2010    12:01 AM


अल्मोड़ा/बागेश्वर/रानीखेत। पहाड़ों के धुर, डांण-कांणों॒में इस बार टिमटिमाते हुए॒ दिए॒ नहीं दिखाई देंगे। कुछ क्षेत्रों में भले ही दीपावली की तैयारी जोरों पर हों लेकिन अल्मोड़ा, बागेश्वर, रानीखेत॒ और गरुड़ में सैकड़ों लोगों का दिवाली तक घर पहुंचना मुश्किल है। करीब ११६ गांवों के सैकड़ों आपदा पीड़ित आज भी सरकारी शिविरों, पंचायत घरों, स्कूलों, पटवारी चौकियों, बारात घरों और नाते-रिश्तेदारों॒ के यहां टिके हुए॒ हैं। इनके घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। दिवाली के लिए॒ रंग-रोगन॒ और सजावट तो दूर की बात इन घरों को फिर से खड़ा करने में करीब तीन महीने लग सकते हैं। अकेले अल्मोड़ा में ही करीब २१८ परिवार ऐसे हैं जो दिवाली पर भी अपने घर से बाहर होंगे।
पहाड़ के कई गांव ऐसे हैं जहां इस बार दिवाली का उत्साह गुम है। सरकारी आंकड़ों की ही अगर सच मानें तो करीब दो हजार लोग दिवाली पर भी अपने आशियाने॒ से बाहर होंगे। अल्मोड़ा में १२० परिवारों के ५६९ लोग आज भी नाते-रिश्तेदारों॒ के भरोसे जिंदगी काट रहे हैं। ५६ परिवारों के ३३० लोगों को आज भी सरकारी शिविरों का ही सहारा है। ३१ परिवारों के १५५ लोग पंचायत घरों में टिके हुए॒ है। सात परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें स्कूल की छत का ही आश्रा॒ है। कुछ परिवार बारात घर और पटवारी चौकियों में भी रुके हैं। बागेश्वर में भी पीड़ा कमोबेश यही है। करीब १०४ परिवारों आज भी घर से बाहर हैं। इन परिवारों के करीब ३०३ सदस्यों के सामने दिवाली से पहले घर को रहने लायक बनाने का सवाल है। रानीखेत॒में १९ मकान पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हुए॒ थे। इन मकानों में रहने वाले करीब सौ लोग आज भी रिश्तेदारों के यहां ही रुके हुए॒ हैं। रानीखेत॒ में करीब ३०० से अधिक ऐसे मकान भी जो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए॒ थे। इनमें रहना अब भी खतरे से खाली नहीं है। द्वाराहाट, चौखुटिया, भिकियासैंण॒ तथा सल्ट॒ तहसील में भी कई परिवारों तक इस बार दीपावली की रोशनी पहुंचना मुश्किल है। सरकारी इमदाद तो मिली है लेकिन पहाड़ों पर घरों का नस सिरे से निर्माण असंभव है।


http://www.amarujala.com/city/Bagrswar/Bagrswar-5858-114.html




Devbhoomi,Uttarakhand

नहीं मिलेगी दैवीय आपदा से रक
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हल्द्वानी: गौलापुल के लिए बजट मिलने में अभी कुछ और देर लग सकती है। दैवीय आपदा मद में भेजे प्रस्ताव में तकनीकि दिक्कत का अड़ंगा लग गया है। हालांकि विभाग ने आनन-फानन में दोबारा प्रस्ताव बनाकर भेज दिया है। लेकिन उसमें जल्द धनराशि मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही है।

वर्ष 2008 में गिरे पांच पिलरों के प्रस्ताव दैवीय आपदा में भेजे गये थे। साढ़े चार करोड़ रुपये स्वीकृत होने के बाद क्षतिग्रस्त पिलरों का निर्माण शुरू किया गया। इसके बाद रुड़की आईआईटी टीम ने पुल का निरीक्षण किया। टीम ने पूरे पुल को डैमेज कर नए सिरे से निर्माण की सिफारिश की। 13 अगस्त 2009 में सचिव पीडब्ल्यूडी ने 1025.79 लाख का प्रस्ताव दैवीय आपदा में अपर सचिव आपदा को भेजा था। इस बीच तीन आपदा अपर सचिव सुभाष कुमार, एसके मंट्टू और डा. राकेश कुमार ने कार्यभार संभाला। आपदा सचिवों के बदलने से प्रस्ताव की फाइल कागजों में दबी रह गयी। जिस कारण उक्त फाइल वित्त विभाग को स्थानांतरित करने की कार्रवाई नहीं हो सकी। लेकिन इतना जरूर रहा कि दैवीय आपदा से बजट देने से स्पष्ट मना कर दिया गया। फिलहाल अब नये सिरे से प्रस्ताव वित्त सचिव को भेजा गया है। इस लापरवाही की वजह जो भी रही हो बहरहाल बजट मिलने की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। इधर, कुमाऊं मुख्य अभियंता केसी उप्रेती ने बताया कि बजट स्वीकृति का शासनादेश अभी विभाग को उपलब्ध नहीं हुआ है।

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बैरंग लौटी विभागीय टीम गौलापुल के बजट शासनादेश की तलाश करने को देहरादून गयी टीम बैरंग लौट आई है। बस इतना ही पता लग सका कि फाइल शासन में दौड़ रही है। अधिशासी अभियंता एलडी मथेला ने बताया कि फाइल शासन में ही है, अधिकारी भी लगे हुए हैं। फाइल मिलते ही बजट मिल जायेगा।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6881655.html

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दोहरी आपदा से जूझ रहा प्रतापनगर क्षेत्र
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प्रतापनगर क्षेत्र इस समय दोहरी मार झेल रहा है। टिहरी बांध की झील बनने के बाद पहले ही प्रतापनगरवासियों को समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, लेकिन सितम्बर में आई दैवीय आपदा सेक्षेत्र की स्थिति विकट हो गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेश्वरी पैन्यूली ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व सांसदों को पत्र भेजकर ठोस पहल करने की मांग की है।

श्री पैन्यूली ने कहा कि सितम्बर में आई आपदा से लंबगांव बाजार में पूरी सड़क धंस गई, जिससे बाजार की गई दुकानें भी खतरे की जद में हैं। सड़कों के बंद होने से क्षेत्र में खाद्यान्न संकट गहरा गया है। इसके अलावा ग्रामीणों की कृषि भूमि, मकान व खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्र का तानाबाना छिन्न-भिन्न हो गया है। यही नहीं टिहरी बांध की झील से प्रतापनगर विधानसभा चौंधर, नकोट, मोटना, चांटी, कंगसाली, भैंगा, जनगी आदि में भूस्खलन होने से खतरा बना हुआ है। श्री पैन्यूली ने कहा कि इस आपदा से ग्रामीणों को घर से बेघर ही नहीं किया है बल्कि उनके खेत, खलिहान भी छीन लिए जिससे कई परिवारों के सम्मुख आजीविका का संकट भी पैदा हो गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व सांसदों को पत्र लिखकर दैवीय आपदा से हुए नुकसान से निपटने के लिए ठोस पहल की मांग की है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6877250.html

विनोद सिंह गढ़िया

आपदा की मार पड़ी पिंडारी, सुंदरढुंगा॒ और कफनी ग्लेशियरों पर
Story Update : Monday, November 08, 2010    12:01 AM


बागेश्वर। आपदा की मार पिंडारी, सुंदरढुंगा॒और कफनी ग्लेश्यिरों को जाने वाले साहसिक अभियानों पर भी पड़ी है। गत वर्ष यहां अब तक करीब ४५० पर्यटक आए थे। इस बार यह संख्या ३५० पहुंची है। आज तक कुमंविनि॒ को करीब दो लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। ग्लेशियरों तक जाने वाले पैदल रास्तों तथा पिंडारी मोटर मार्ग की हालत भी खराब है।
भारी बारिश से पिंडारी, सुंदरढुंगा, तथा कफनी ग्लेशियरों को जाने वाले मोटर पिंडारी मोटर मार्ग सौंग॒ तक जगह-जगह बुरी तरह ध्वस्त हो गया था। सौंग॒ से ग्लेशियरों तक पहुंचने वाला पैदल मार्ग भी अनेकों जगह ध्वस्त हो गए॒ जबकि गधेरों॒ में बनी पैदल पुलिया भी कई जगह ध्वस्त है। मालूम हो कि ३२४२ मीटर की ऊंचाई पर स्थित पिंडारी॒ ग्लेशियर, ३८८० मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुंदरढुंगा॒ जबकि ३२४० मीटर की ऊंचाई पर कफनी ग्लेशियर है। इन मनोहारी ग्लेशियरों को देखने गत वर्ष केएमवीएन॒के तत्वावधान में ४५० पर्यटक आए थे। इसमें से ३० विदेशी पर्यटक थे। इस बार यह संख्या ३५० के करीब रह गई है। इसमें से विदेशी पर्यटकों की संख्या १९ है। केएमवीएन॒ के पर्यटक आवास गृह के मैनेजर उत्तम सिंह बिष्ट ने बताया कि पिछले साल १३ लाख॒ की आय हुई थी दैवीय आपदा के चलते अभी तक ११ लाख रुपये की आय हुई है। मार्च २०११ तक बढ़ने की संभावना है। पिंडारी ट्रेक॒ प्रभारी इंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि पर्यटकों की आमद बढ़ाने को लोहारखेत में आठ कमरों का एक भवन जबकि धाकुड़ी,फुरकिया॒तथा द्वाली॒ में दो-दो काटेज, सुंदरढुंगा॒ ग्लेशियर मार्ग के जातोली॒ तथा कठेलिया॒ में एक-एक डारमेट्री॒ तथा कफनी ग्लेशियर में दो फाइवर॒हटों का निर्माण चल रहा है।

http://www.amarujala.com/city/Bagrswar/Bagrswar-6392-114.html


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साक्षी ने बांटी मदद, जीता लोगों का दिल
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उत्तारकाशी, जागरण कार्यालय : भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की पत्नी साक्षी ने सोमवार को जिले के दूरस्थ बनचौरा क्षेत्र में आपदा से प्रभावित लोगों को कंबल वितरित किए। साथ ही, जिला मुख्यालय में उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के भी दर्शन किए।

एमएस धोनी चैरिटेबल फाउंडेशन की ओर से आपदा प्रभावितों को कंबल बांटने का सिलसिला दूसरे दिन सोमवार को भी जारी रहा। साक्षी ने जिले के दूरस्थ आपदा प्रभावित क्षेत्र बनचौरा पहुंचकर लोगों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन की ओर से आगे भी प्रभावितों की मदद की जाएगी। बनचौरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में मदद पाने वालों की काफी भीड़ रही। इसके बाद उन्होंने च्येष्टवाड़ी व मोरगी में भी लोगों को मदद दी।

आपदा प्रभावितों के साथ ही उन्होंने वृद्ध, विकलांग व असहाय लोगों को भी कंबल वितरित किए। बनचौरा से लौटते हुए जगह-जगह उन्होंने कार रोककर ग्रामीणों से बातचीत की और उन्हें कंबल वितरित किए। इस दौरान उन्हें देखने के लिए स्कूली बच्चों की भीड़ उमड़ी। इसके बाद उन्होंने उत्तारकाशी पहुंचकर विश्वनाथ मंदिर, शक्तिमंदिर व हनुमान मंदिर के दर्शन किए। उनके साथ मौजूद फाउंडेशन के सदस्य अंकुश ढोलिया भी थे। अंकुश ने कहा कि फाउंडेशन का प्रयास होगा कि अगले बार माही को भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में लाया जाएगा।

ग्रामीण युवती की भेंट स्वीकारी
बनचौरा से लौटते हुए साक्षी की कार के आगे एक युवती आ गई और उसने रूकने का इशारा किया। साक्षी कार से उतरीं तो उस महिला ने साक्षी को नींबू भेंट किए। इस भेंट को स्वीकार करते हुए साक्षी ने भी इस युवती को बिस्कुट के पैकेट दिए।
टीवी पर क्रिकेट मैच खेलदु

क्रिकेट की लोकप्रियता दूर दराज के गांवों तक पहुंच गई है। खास तौर पर छोटे बच्चों में धोनी काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन अब गांव की महिलाएं भी इस खेल से वाकिफ हैं। बनचौरा में राहत वितरण के दौरान एक बुजुर्ग महिला कौंरा देवी से जब धोनी के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि 'वु त टीवी पर क्रिकेट मैच खेलदु'।
राह चलते ग्रामीणों की भी मदद चिन्यालीसौड़-बनचौरा मार्ग में सड़क के किनारे घास काटती युवतियों और पुरुषों को भी साक्षी ने कंबल बांटे।
   

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6931956.html