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Uttarakhand Suffering From Disaster - दैवीय आपदाओं से जूझता उत्तराखण्ड

Started by पंकज सिंह महर, August 06, 2010, 11:46:48 AM

पंकज सिंह महर

साथियो,
उत्तराखण्ड राज्य प्रकृति की गोद में बसा हुआ है, जिसका भरपूर लाभ और प्यार उत्तराखण्ड की जनता को सदियों से मिलता रहा है। शुद्ध हवा, पानी, जंगल, जड़ी-बूटी आदि के रुप में प्रकृति हम पर अपना प्यार लुटाती रही है।

लेकिन इसी के साथ उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थिति मध्य हिमालय में अवस्थित होने के कारण कई बार हमें दैवीय आपदाओं से भी दो-चार होना पड़ता है। मध्य हिमालय का क्षेत्र अभी ठोस चट्टान का रुप नहीं ले पाया है। भूगर्भीय हलचलों, भूकम्प जोन में अवस्थित होना, ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव, जंगलों और नदियों के अनियोजित और अनियमित दोहन और प्रकृति के मूल स्वरुप के साथ छेड़छाड़ के कारण कई बार ऐसी दुर्घटनायें होती हैं, जिसमें हमें जान और माल दोनों का नुकसान होता है।

इसके लिये आपदा प्रबन्धन विभाग भी है, लेकिन उसका विस्तार पूरी तरह हो पाया है या हो पायेगा, कहना कठिन है। क्योंकि हमारे राज्य में भूस्खलन, बादल फटना, नदियों के बहाव परिवर्तन और भूकम्प की ही घटनायें ज्यादा होती हैं और इन सब घटनाओं का पूर्वानुमान करना भी कठिन है। लेकिन इस विभाग के माध्यम से प्रभावित क्षेत्र में फौरी मदद दी जा सकती है।

इस टापिक के अन्तर्गत इस आपदाओं के विभिन्न पहलुओं पर शोध कर अपने-अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित ऐसी घटनाओं को भी संकलित करेंगे।

पंकज सिंह महर

यह सही है कि दैवीय आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनसे बचा जा सकता है। भूकम्प जोन में फाल्ट के ऊपर जो गांव बसे हैं, उन्हें शिफ्ट किया जा सकता है। जहां पर बादल फटने की घटनायें ज्यादा होती हैं, इसके लिये कोई वैज्ञानिक पैमाना भी होगा ही, तो उसके आधार पर इनका आकलन किया जाये और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया जाये।

इसके साथ ही लोगों में जागरुकता लाना और इससे बचने के उपाय करना बहुत जरुरी है। पुराने लोग पक्षियों और जानवरों की आवाजों से इन घटनाओं का पूर्वानुमान लगाते थे, आज भी लोगों को इसका पालन करना चाहिये और अगर हो सके तो इसमें भी टेक्नोलाजी का कुछ बेहतर उपयोग करना चाहिये। साथ ही मकान और बसावटों को कहीं भी कैसे भी बसाने के बजाय सुरक्षित स्थान पर बनाने पर जोर देना चाहिये। जैसे किसी बड़ी चट्टान, जिससे पहले भूस्खलन होता रहा हो या हो सकता हो, ठीक उसकी तलहटी में मकान नहीं बनाने चाहिये। मकान के चारों ओर कम से कम ६ फीट की जगह खाली रखनी चाहिये। ताकि कोई दुर्घटना होने पर इसमें मलबा समा जाये या पानी निकल सके। मकान के चारों ओर पानी की निकासी के साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा यह देखना कि निकासी का पानी जा कहां रहा है। निकासी का पानी ऐसी जगह पर जाना चाहिये जिससे अपने मकान और खेतों का नुकसान न हो। पहाड़ों में बसावट ऊंची और सैंण जगह पर बनानी चाहिये, जिससे ऊपर से बहकर आने वाला पानी आसानी से निकल सके।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


पंकज दा ने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है!

उत्तराखंड राज्य का दुर्गम भौगालिक परस्थिति होने के कारण हर साल यहाँ पर लोगो को कई प्रकार के देवीय एव प्राकर्तिक आपदावो का सामना करना पड़ता है! कई बार आपदा प्रवर्धन ना होने के कारण के कारण लोगो को जान माल का ज्यादे नुक्सान उठाना पड़ता है जैसे भूस्खलन, भूकंप आदि !

तो सरकार को इस विषय पर काम करना चाहिए

हेम पन्त

उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में सैकड़ों ऐसे गांव हैं जो भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं... इनमें रह रहे हजारों लोगों की जान भगवान भरोसे है. सरकार ने इन्हें विस्थापित करने के लिये चिन्हित भी कर लिया है लेकिन इन्हें दूसरी जगह बसाने के लिये सरकार के पास जमीन है ही नहीं...

आपदा प्रबन्धन की बात तो बहुत दूर रही.. सूचना के आदान-प्रदान में भी हम लोग बहुत पीछे हैं. अपना ही अनुभव बताउंगा. पिछले साल बारिश के मौके पर पिथौरागढ से हल्द्वानी पहुंचने में मुझे लगभग 30 घंटे लग गये (रास्ता 7 घंटे का है). बारिश से पिथौरागढ-टनकपुर और पिथौरागढ-हल्द्वानी मार्ग कई दिनों तक भी बन्द रहता है लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ऐसी सुविधा नहीं है कि स्टेशन में ही सवारियों को सड़क की स्थिति (बन्द या चालू) की सूचना मिल जाये. आप लोग यकीन करें या नहीं लेकिन ये बात सच है कि पिथौरागढ में सड़क की चालू हालत का अन्दाजा इस बात से लगाया जाता है कि समाचार पत्र पहुंचे या नहीं. मतलब अगर न्यूजपेपर पिथौरागढ पहुंच गये तो रोड खुली है, वरना रोडब्लाक है....
     

हेम पन्त

बारिश के मौसम में सड़क यातायात की दुर्दशा और Road Blocks पहाड़ी इलाकों में आम बात है. सड़कों की ऐसी दुर्दशा है कि थोड़ी सी बारिश में मलवा आकर मार्ग अवरुद्ध कर देता है.. फिर गाड़ियों की लम्बी लाइन लगती है, यात्री पैदल चल कर रास्ता तय करते हैं...

 

पंकज सिंह महर

सूचना का समय से मिलना बहुत जरुरी है, तभी राहत दी जा सकती है। हमारा प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां पर आपदा राहत का पृथक से एक विभाग बनाया गया है। इस विभाग के अन्तर्गत प्रत्येक जनपद में आपदा राहत केन्द्र खोले गये हैं। लेकिन पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थिति और भू-फैलाव को देखते हुये यह पर्याप्त नहीं है। इसका विस्तार हमें ग्राम सभा के स्तर तक करना चाहिये। आपदा राहत केन्द्र प्रत्येक विकास खण्ड के मुख्यालय में होने चाहिये और ग्राम सभाओं में भी इस विभाग द्वारा प्रतिवर्ष खासतौर पर बरसात के शुरु होने से पहले प्रशिक्षण और जागरुकता कार्यक्रम चलाये जाने चाहिये। साथ ही ग्राम सभाओं में इस काम के लिये एक-दो वालिंटियर की नियुक्ति भी की जानी चाहिये। प्रत्येक ग्राम सभा में सभापतियों को प्राथमिक उपचार के लिये किट, कुछ स्ट्रेचर आदि फौरी राहत देने वाली चीजें और जीवन रक्षक उपकरण जैसे छोटे कटर आदि उपलब्ध कराये जाने चाहिये।

हेम पन्त

पिछले साल बादल फटने से पिथौरागढ जिले की मुन्स्यारी तहसील में भीषण भूस्खलन हुआ जिसमें एक गांव के तीन तोक नेस्तनाबूत हो गये और लगभग 50 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.. इस मलबे के नीचे एक खेलता कूदता मौहल्ला दफन हो गया..

   

सत्यदेव सिंह नेगी

सच बात कहीं पंकज भाई हम सब इस आपदा के शिकार किसी न किसी रूप में हो रहें हैं कोई भी अपनी कुंडली दिखवा ले उसे पता चल जायेगा

हेम पन्त

उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों में दैवीय आपदा कई रुपों में आती है... इसमें मुख्यत: भारी बारिश से भूस्खलन (Landslide) प्रमुख है. जगह-जगह रास्ते बन्द हो जाने से राज्य की कई अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पर्यटक स्थलों का सम्पर्क भी शेष दुनिया से कट जाता है. यह औली जाने वाले मार्ग का एक फोटो है-


पहाड़ जितना मन लुभावना होता है उतना ही जानलेवा भी
इसी लिए उसका नाम पहाड़ है हम पहाड़ से नाता तो जोड सकते है उससे प्यार भी कर सकते है.
मगर हम पहाड़ से समझौता नही कर सकते क्योकी पहाड़ अपने आप मे अटल होता है. कठोर होता है.
लेकिन हम पहाड़ को अपने प्यार से पिघलाना चाहते है अपना पुरा स्नेह उसे देना चाहते है.
लेकिन पहाड़,प्यार स्नेह को नही कठोरता को पहचानता है
क्योकी पहाड़ का स्वभाव ही कठोर होता है इसलिए पहाड़ का जीवन बहुत कठोर होता है.
पहाड़ पर दैवीय निवास सदियो पुराना माना जाता है इसलिए दैवीय घटनाओ का होना भी पहाड़ पर लाजमी है.

सुन्दर सिंह नेगी 06/08/2010.