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Uttarakhand Suffering From Disaster - दैवीय आपदाओं से जूझता उत्तराखण्ड

Started by पंकज सिंह महर, August 06, 2010, 11:46:48 AM

Pawan Pahari/पवन पहाडी

मेरा उत्तराखंड ,     
क्या था और क्या हो गया.   
   कैसे हुआ किसने किया ,   
  ये सोचता हूँ मैं तो दिल रो उठता है, 
     कि कही मैं ही तो इसके लिए जिम्मेदार नहीं हूँ, 
    क्या ये पहाड़ मेरा खोदा हुआ है,
     क्या इमे मैंने ही सुरंग बनाई है,
     या ये प्रकृति का एक खेल है,   
  जो ये खेल रही है हमें रुलाने के लिए,   
   इस दिल को दुखाने के लिए,
     या फिर ये सरकार खेल रही है ,   
   हमे उत्तराखंड से भगाने के लिए, 
    पर ये जान ले सभी, 
     कि ये मेरा उत्तराखंड है, 
    इसके लिए हम अपनी जान छोड़ देंगे,   
   पर ये उत्तराखंड नहीं छोड़ेंगे, 
    क्योकि यही मेरी माँ है और यही मेरी मात्रभूमि.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बागेश्वर की घटना से एक और काला अध्याय जुड़ गया है उत्तराखंड के में प्राकृतिक आपदाओ की श्रेणी में !

हर घटना कोई ना कोई सबक छोड़ जाती है !

उत्तराखंड सरकार को इस घटना के बाद सबक लेते हुयी तमाम उन गावो का चिन्दिकरण करके सुरुक्षित सथानो पर बसाना चाहिए जो प्राकर्तिक आपदाओ की दृष्टि अति संवेदनशील है! 

Pawan Pahari/पवन पहाडी

बड़ा अच्चा  लगा मेहता जी आपको पड़कर, पर गाँवों को चिन्हित कर दुबारा बसाना    जरुरी है क्या, क्या इसका उपाय ये नहीं कि इन बंधो को बनने से रोका जाय.   इन पहाड़ों मैं बनने वाली सुरंगों को रोका जाय. क्योकि इतने बाँध बनने के   बाद, इतनी सुरंगे बनने के बाद क्या विस्थापन के लिए जगह रह जाएगी. सरकार ये   क्यों नहीं सोचती.  फिर कोई घटना होगी तो उसके बाद ही सरकार जागेगी क्या?   क्या अभी सरकार कि आँखें नहीं खुली.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड में आपदाओं की आशंकाओं से विशेषज्ञ चिंतित   देहरादून, एजेंसी   

   उत्तराखंड में मानसून जिस हिसाब से बरस रहा है, उसी हिसाब में भूस्खलन से पहाडियां भी दरक रही हैं। इसको लेकर विशेषज्ञ काफी चिंतित हैं। वैसे तो भूस्खलन प्राकृतिक आपदा है, लेकिन विकास के नाम पर सड़क और सड़क के नाम पर कटान भी इन आपदाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं है।
जाने-माने मौसम विज्ञानी एवं राज्य मौसम विभाग के निदेशक आंनद कुमार शर्मा का कहना है कि विकास कार्य से पहले समुचित योजना बनानी चाहिए और विशेषकर पहाड़ के कटान एवं ढलान पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन के नियमों की भी विकास कार्यों के समय कड़ाई से पालन होना चाहिए। पानी निकासी की समुचित व्यवस्था के साथ-साथ मजबूत पुस्तों पर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि पानी के बहाव को सुरक्षित दिशा में मोड़ा जा सके।
शर्मा ने कहा कि आज मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग को मिलकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन के लोग स्थानीय एवं जागरूक लोगों को उचित प्रशिक्षण दें। उनका कहना है कि आपदा प्रबंधन के नियमों का पालन करते हुए स्कूल, कालेज व अस्पताल सहित सामुदायिक भवनों का निमार्ण मजबूत होना चाहिए, ताकि आपदा होने पर लोग यहां शरण ले सकें।
वहीं देहरादून स्थित डीबीएस कालेज के भूगोल विभाग के अध्यक्ष डा. डी.सी. पाण्डे का कहना है कि समस्या के निवारण के लिए विकास और प्राकृति के मध्य संतुलन जरूरी है। उन्होंने कहा कि वैसे तो भूस्खलन जैसी आपदाओं के पीछे प्राकृतिक कारण है, लेकिन सुविधाओं के लिए इसमें मानव का दखल भी कम जिम्मेदार नहीं है।
गौरतलब है कि गढ़वाल क्षेत्र के पहाड़ काफी कच्चे माने जाते हैं और इनमें वनस्पतिओं का भी अभाव है जो मिट्टी को जकड़ कर रख सकें। यहां पक्के और मजबूत मकानों की भी कमी है। देखा जा रहा है कि हादसे का शिकार हो रहे अधिकतर मकान नए हैं।
वहीं हर गांव तक विकास के नाम पर सड़कें बन रही हैं, जिनके कारण मिट्टी का कटाव बढ़ता है। यदि किसी जगह सड़क चौड़ीकरण के लिए 10 फुट तक कटाव होता है तो इस कारण 20 फुट तक जमीन दरक जाती है। साथ ही पेड़ों की भी कटाई जोरों पर है और दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में नाली एवं पानी निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है।

http://www.livehindustan.com/news/desh/deshlocalnews/39-0-134032.html

lpsemwal

बहुत बारिश हो रही है रास्ते ब्लाक हैं क्या किया जय बड़ा सवाल है पैर यही सवाल यदि सब लोग अपने आप से तब पूछें जब निर्माण कार्य होते हैं तो सायद तस्बीर बदल जाएगी.
उम्मीद है ki भाई बहिन स्वयं से प्रशसं करना और उनका जबाब दूंदना शुरू करेंगे.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


If the proposal is approved by the Central Govt, it must be properly used.

आपदा: पांच हजार करोड़ का प्रस्ताव

देहरादून। अतिवृष्टि से आई आपदा से निपटने के लिए उत्तराखंड ने केंद्र सरकार के नेचुरल क्लाइमिटी कंटिंजेंसी फंड (एनसीसीएफ) से पांच हजार करोड़ रुपये मांगे हैं। इस संबंध में प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा रहा है।

सूत्रों ने बताया कि प्रस्ताव में साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये आपदा से हुई क्षतिपूर्ति के लिए मांगे गए हैं। जबकि डेढ़ हजार करोड़ रुपये खतरनाक हालात में रह रहे ग्रामीणों को विस्थापित करने के लिए मांगे गए हैं। अपर मुख्य सचिव (आपदा प्रबंधन) एसके मट्टू ने बताया कि जिलों से क्षति के बारे में मिली रिपोर्ट के आधार पर यह आंकलन किया गया है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन के लिए राज्यों को मिलने वाली राशि फाइनेंस कमीशन पहले ही तय कर देता है। इसे क्लेमिटी रिहेब्लिटेशन फंड (सीआरएफ) में रखा जाता है। सीआरएफ में 75 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान और 25 प्रतिशत राज्य का अंश होता है। श्री मट्टू ने कहा कि अचानक आने वाली आपदा के लिए एनसीसीएफ से धनराशि मांगी जाती है। अतिवृष्टि से जूझ रहे उत्तराखंड ने इसी मद में धनराशि मांगी है। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आंकलनों के अनुसार उत्तराखंड के सौ गांवों को विस्थापन योग्य माना गया है। हालात देखकर लग रहा है कि ऐसे गांवों की संख्या पांच सौ भी हो सकती है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6677396.html

पंकज सिंह महर

एक और दुःखद समाचार

धारचूला में भूस्खलन से बालिका समेत दो मरेजागरण कार्यालय, धारचूला: तहसील मुख्यालय से पैंतीस किमी दूर सोबला क्षेत्र में न्यू मेलाधुरा चट्टान टूटकर गिरने से न्यू मेला में पांच मकान ध्वस्त हो गये। पहाड़ का मलबा तीन किमी नीचे स्थित कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह पर भी गिरा, जिससे वहां रहने वाली आपदा प्रभावित झिम्मर गांव की एक बालिका सहित दो लोगों की मौत हो गयी, जबकि छह लोग घायल हो गये। दो दर्जन मवेशी मलबे में जिंदा दफन हो गये। 33 केवी विद्युत लाइन क्षतिग्रस्त हो गई। सेना का एक रसोईघर भी टूट गया है। ग्रामीणों ने किसी तरह भागकर जान बचायी। सूचना मिलते ही सेना, एसएसबी और आईटीबीपी के जवान राहत कार्य में जुट गए। सोमवार की रात्रि करीब सवा बजे तहसील के न्यू सोबला और न्यू मेला में प्रकृति ने अपना तांडव दिखाया। यूं तो शनिवार की सायं साढ़े छह बजे से ही न्यू मेलाधुरा में भूस्खलन शुरू हो गया था।की तरफ से विशाल पत्थरों के लुढ़कने के कारण न्यू मेलाधुरा के बौनाल खेड़ा बस्ती में अफरा-तफरी मच गयी। आठ परिवारों ने जान बचाने के लिए तत्काल मकान छोड़कर सुरक्षित स्थान पर शरण ले ली। साथ ही इसकी सूचना तहसील प्रशासन को दे दी गई। सायं से ही इस क्षेत्र में भारी वर्षा शुरू हो गयी। रातभर मूसलधार वर्षा होती रही। ठीक एक बजकर पन्द्रह मिनट पर भारी गर्जना के साथ न्यू मेलाधुरा पहाड़ी पर जोरदार भूस्खलन हुआ, जिसकी चपेट में आकर न्यू मेला में शोभाराम पुत्र रामीराम, कृष्ण राम पुत्र शोभाराम, रामीराम पुत्र शोभाराम, रामीराम पुत्र जगत राम और राजू राम पुत्र लालू राम के मकान ध्वस्त हो गए। इसके बाद मलबा तीन किमी नीचे न्यू सोबला स्थित कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह पर गिरा। आवास गृह की ऊपरी मंजिल पर रहने वाले झिम्मर गांव निवासी रुकुम सिंह (55) पुत्र नर सिंह उर्फ जलेबी लाला और पूजा बिष्ट (6) पुत्री देवेन्द्र सिंह की पत्थरों से दब कर मौत हो गयी, जबकि पूजा की नानी बसंती देवी घायल हो गयी। पूजा अपनी नानी के साथ रहती थी। वहीं न्यू मेला में ध्वस्त मकानों में रहने वाले परिवारों ने शाम को भूस्खलन शुरू होते ही मकान छोड़ दिये थे, जिससे उनकी जान बच गयी और बड़ा हादसा टल गया। हालांकि गौशालाओं में बंधे दो दर्जन मवेशी मलबे में दफन हो गए। इनमें रामी राम पुत्र जगत राम के 13 जानवर और राजू राम के चार जानवर शामिल हैं। भूस्खलन की चपेट में आने से टूटू तिब्बती फौज आर्चर का एक रसोईघर भी ध्वस्त हो गया। विशाल पत्थरों के गिरने से न्यू मेला और न्यू सोबला में मलबे का ढेर लग गया। सूचना मिलते ही ग्रामीणों सहित जीआर प्रथम आर्चर के सूबेदार हरिश्रेष्ठ के नेतृत्व में चालीस जवान, कुमाऊं स्काउट के सूबेदार चामू सिंह के नेतृत्व में 6 जवान, एसएसबी तवाघाट चौकी के हवलदार जिमी डोक्पा के नेतृत्व में आठ जवान और आईटीबीपी के कई जवान राहत कार्य में जुट गये। दोनों शवों को मलबे से निकाला गया। इस हादसे में बसंती देवी, गोविन्दी देवी, उमा देवी, सुरेन्द्र सिंह और गंगोत्री घायल हो गयी। इधर सूचना मिलते ही तहसील मुख्यालय से उपजिलाधिकारी नवनीत पांडेय, तहसीलदार भवान सिंह गुंज्याल, खंड विकास अधिकारी एलएस बोरा, पट्टी पटवारी, थाना प्रभारी आरपी पैंतोला पुलिस जवानों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। इसके अलावा जनप्रतिनिधियों में केशर सिंह धामी, देवकृष्ण फकलियाल, नेत्र सिंह चलाल, आन सिंह रोकाया, राम सिंह जेठा सहित कई लोग घटनास्थल पर पहुंचे। पहाड़ की तरफ से अभी भी पत्थरों के लुढ़कने की आशंका को देखते हुए गांव में दहशत का माहौल है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


कुदरत का कहर जारी है उत्तराखंड में!

भारी बारिश से जगह -२ पर तबाही.

हेम पन्त

18 अगस्त को सुमगढ, कपकोट (जिला बागेश्वर) में हुए हादसे में 18 मासूम बच्चे मौत का ग्रास बन गये. अतिवृष्टि के कारण गांव का यह हाल हो गया था.


हेम पन्त

दैवीय आपदाओं पर जहांगीर राजू (प्रभारी हिन्दुस्तान समाचार पत्र, रुद्रपुर) का एल लेख यहां पढें-

dewalthalpost.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html