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Footage Of Disappearing Culture - उत्तराखंड के गायब होती संस्कृति के चिहन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 17, 2007, 03:35:52 PM



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ के महिलाओ का पहले समय मे घाघरा एक आम पहनावा होता था. ! जो कि आब विलुप्त हो चुका है. !



shailesh

जौयां मुरली एक लुप्त होती विरासत

जौयां मुरली अलगोजा को कुमाऊंनी भाषा में जौयां मुरली कहा जाता है। जौयां मतलब जुड़वां। इसमें दो सामान्य मुरलियां आपस में जुड़ी होती हैं और इसे बजाना अपेक्षाकृत कठिन होता है, क्योंकि वादन के समय एक स्वर निरंतर बजता रहता है। यह दो नलियों से जोड़कर बनायी जाती है। इसके बनाने का तरीका भी अत्यंत अनोखा है। पानी में भंवर वाली जगह में दो नलियों को छोड़ दिया जाता है। तेज लहरों में 40 से 45 मिनट मथने के बाद ये आपस में जुड़ जाती हैं। फिर इन्हें बाहर निकाल लेते हैं। सात हजार फीट की ऊंचाई पर होने वाले वृक्ष रिंगाल के तने से बनती है ये मुरली। यह मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और उत्तराखण्ड का वाद्य यंत्र है। इसमें सात सुरों के बजाय सिर्फ पांच सुर होते हैं, इसलिये इसमें गीत नहीं बजते हैं। केवल धुनों का वाद्य है यह और इसमें केवल धुनें निकाली जा सकती हैं। प्रचलित मान्यता यह है कि यह जीव व ब्रह्म के संयोग का रूप है। बांयी ओर का तना प्रकृति का प्रतीक माना जाता है, जिसमें तीन छेद किये जाते हैं जो कि सत, रज, तम के प्रतीक माने गये हैं। दाहिनी ओर का तना पुरुष का प्रतीक है। इसमें पांच छेद होते हैं। ये पंचतत्व के मिश्रण से बनी नश्वर देह के प्रतीक हैं। अत: यह मात्र साधारण सा लोक वाद्य न होकर जीव ब्रह्म के प्रतीक के साथ-साथ प्रकृति एवं पुरुष के संयोग का प्रतीक है। इसकी विशेषता है कि इसमें लोकगीत अथवा अन्य गीतों की धुनें नहीं बजतीं है।
complete article is available here
http://www.creativeuttarakhand.com/culture/judva_murlie.html


पंकज सिंह महर

पहले लोग चाय नहीं पीते थे, तम्बाकू पीते थे और उनका सिर कभी भी खुला नहीं रहता था, सभी लोग गोल टोपी पहनते थे, .......आज भी पूजा के समय टोपी पहननी अनिवार्य होता है...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Right. Mahar JI.

This is also disappearing now-a-days.

Quote from: पंकज सिंह महर on November 22, 2007, 07:00:27 PM
पहले लोग चाय नहीं पीते थे, तम्बाकू पीते थे और उनका सिर कभी भी खुला नहीं रहता था, सभी लोग गोल टोपी पहनते थे, .......आज भी पूजा के समय टोपी पहननी अनिवार्य होता है...