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Datta Triyey Jyanti of Uttarakhand - उत्तराखंड की दत्तात्रेय जयंती (चमोली)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 18, 2010, 03:51:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
Dosto,

We are sharing here information about Datta Triyey Jyanti which is celebrated in Chamoli District of Uttarakhand in Anusuya Temple.

The detailed informaiton here

Regards,

M S Mehta
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    उत्तराखंड की दत्तात्रेय जयंती            ND
उत्तराखंड के चमोली जिले में मंडल से करीब छह किलोमीटर ऊपर ऊँचे पहाड़ों पर स्थित प्रसिद्ध अनुसूया मंदिर है  जहाँ पर दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है!इस जयंती में पूरे राज्य से हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं।

जयंती समारोह से जुडे सूत्रों ने बताया कि इस जयंती समारोह के अवसर पर नौदी मेले का भी आयोजन किया जाता है जिसमें भारी संख्या में लोग अपने-अपने गाँवों से देव डोलियों को लेकर पहुँचते हैं।

सूत्रों के अनुसार देव डोलियाँ माता अनुसूया और अत्रि मुनि के आश्रम का भ्रमण करती हैं और माता अनुसूया के प्राचीन मंदिर में संतान प्राप्ति के लिए एक बड़ा यज्ञ भी कराया जाता है। सूत्रों ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में जप और यज्ञ करने वालों को संतान की प्राप्ति होती है।

    ND आयोजन समिति के सूत्रों ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान पर माता अनुसूया ने अपने तप के बल पर त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को शिशु रूप में परिवर्तित कर पालने में खेलने पर मजबूर कर दिया था।

सूत्रों के अनुसार बाद में काफी तपस्या के बाद त्रिदेवों को पुन: उनका रूप प्रदान किया और फिर यहीं तीन मुख वाले दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। इसी के बाद से यहाँ संतान की कामना को लेकर लोग आते रहे हैं। यहाँ दत्तात्रेय मंदिर की स्थापना की गई है। यहाँ लगने वाले मेले में पूरे राज्य से हजारों की संख्या में लोग आते हैं।

चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर से करीब 17 किलोमीटर दूर यह स्थान अनुसूया संरक्षित वन प्रभाग के घने जंगलों में स्थित है। इस स्थान पर लोगों को कम से कम पाँच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। भगवान दत्तात्रेय से जुडे़ होने के कारण इस मेले में महाराष्ट्र और कर्नाटक से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं।    Source : webdunia.com   

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उत्तराखण्ड       सती अनसूइया मन्दिर। सती अनसूइया मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले में स्थित है। नगरीय कोलाहल से दूर प्रकृति के बीच हिमालय के उत्तुंग शिखरों पर स्थित इन स्थानों तक पहुँचने में आस्था की वास्तविक परीक्षा तो होती ही है साथ ही आम पर्यटकों के लिए भी ये यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं होती। यह मन्दिर हिमालय की ऊँची दुर्गम पहडियो पर स्थित है इसलिये यहाँ तक पहुँचने के लिये पैदल चढाई करनी पड़ती है।
मन्दिर तक पहुँचने के लिए चमोली के मण्डल नामक स्थान तक मोटर मार्ग है। ऋषिकेश तक आप रेल या बस से पहुँच सकते हैं। उसके बाद श्रीनगर और गोपेश्वर होते हुए मण्डल पहुँचा जा सकता है। मण्डल से माता के मन्दिर तक पांच किलोमीटर की खडी चढाई है जिसपर श्रद्धालुओं को पैदल ही जाना होता है। मन्दिर तक जाने वाले रास्ते के आरंभ में पडने वाला मण्डल गांव फलदार पेडों से भरा हुआ है। यहां पर पहाडी फल माल्टा बहुतायत में होता है। गाँव के पास बहती कलकल छल छल करती नदी पदयात्री को पर्वत शिखर तक पहुँचने को उत्साहित करती रहती है। अनसूइया मन्दिर तक पहुँचने के रास्ते में बांज, बुरांस और देवदार के वन मुग्ध कर देते हैं। मार्ग में उचित दूरियों पर विश्राम स्थल और पीने के पानी की पर्याप्त उपलब्धता है जो यात्री की थकान मिटाने के लिए काफी हैं।

(Source : Wikipedia)

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यात्री जब मन्दिर के करीब पहुँचता है तो सबसे पहले उसे गणेश की भव्य मूर्ति के दर्शन होते हैं, जो एक शिला पर बनी है। कहा जाता है कि यह शिला यहां पर प्राकृतिक रूप से है। इसे देखकर लगता है जैसे गणेश जी यहां पर आराम की मुद्रा में दायीं ओर झुककर बैठे हों। यहां पर अनसूइया नामक एक छोटा सा गांव है जहां पर भव्य मन्दिर है। मन्दिर नागर शैली में बना है। ऐसा कहा जाता है जब अत्रि मुनि यहां से कुछ ही दूरी पर तपस्या कर रहे थे तो उनकी पत्नी अनसूइया ने पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए इस स्थान पर अपना निवास बनाया था। कविंदती है कि देवी अनसूइया की महिमा जब तीनों लोकों में गाए जाने लगी तो अनसूइया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को विवश कर दिया। पौराणिक कथा के अनुसार तब ये त्रिदेव देवी अनसूइया की परीक्षा लेने साधुवेश में उनके आश्रम पहुँचें और उन्होंने भोजन की इच्छा प्रकट की। लेकिन उन्होंने अनुसूइया के सामने पण (शर्त) रखा कि वह उन्हें गोद में बैठाकर ऊपर से निर्वस्त्र होकर आलिंगन के साथ भोजन कराएंगी। इस पर अनसूइया संशय में पड गई। उन्होंने आंखें बंद अपने पति का स्मरण किया तो सामने खडे साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खडे दिखलाई दिए। अनुसूइया ने मन ही मन अपने पति का स्मरण किया और ये त्रिदेव छह महीने के शिशु बन गए। तब माता अनसूइया ने त्रिदेवों को उनके पण के अनुरूप ही भोजन कराया। इस प्रकार त्रिदेव बाल्यरूप का आनंद लेने लगे। उधर तीनों देवियां पतियों के वियोग में दुखी हो गई। तब नारद मुनि के कहने पर वे अनसूइया के समक्ष अपने पतियों को मूल रूप में लाने की प्रार्थना करने लगीं। अपने सतीत्व के बल पर अनसूइया ने तीनों देवों को फिर से पूर्व में ला दिया। तभी से वह मां सती अनसूइया के नाम से प्रसिद्ध हुई।

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मन्दिर के गर्भ गृह में अनसूइया की भव्य पाषाण मूर्ति विराजमान है, जिसके ऊपर चाँदी का छत्र रखा है। मन्दिर परिसर में शिव, पार्वती, भैरव, गणेश और वनदेवताओं की मूर्तियां विराजमान हैं। मन्दिर से कुछ ही दूरी पर अनसूइया पुत्र भगवान दत्तात्रेय की त्रिमुखी पाषाण मू्र्ति स्थापित है। अब यहां पर एक छोटा सा मन्दिर बनाया गया है।
    अत्रि धारा एवं उसके मध्य में महर्षि अत्रि की गुफा।   मन्दिर से कुछ ही दूरी पर महर्षि अत्रि की गुफा और अत्रि धारा नामक जल प्रपात का विहंगम दृश्य श्रदलुओं और साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए आकर्षण का केंद्र है क्योंकि गुफा तक पहुँचने के लिए सांकल पकडकर रॉक क्लाइम्बिंग भी करनी पडती है। गुफा में महर्षि अत्रि की पाषाण मूर्ति है। गुफा के बाहर अमृत गंगा और जल प्रपात का दृश्य मन मोह लेता है। यहां का जलप्रपात शायद देश का अकेला ऐसा जल प्रपात है जिसकी परिक्रमा की जाती है। साथ ही अमृतगंगा को बिना लांघे ही उसकी परिक्रमा की जाती है।
ठहरने के लिए यहां पर एक छोटा लॉज उपलब्ध है। आधुनिक पर्यटन की चकाचौंध से दूर यह इलाका इको-फ्रैंडली पर्यटन का द्वितिय उदाहरण भी है। यहां भवन पारंपरिक पत्थर और लकडियों के बने हैं। हर वर्ष दिसंबर के महीने में अनसूइया पुत्र दत्तात्रेय जयंती के अवसर पर यहां एक मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में आसपास के गांव के लोग अपनी-अपनी डोली लेकर पहुँचते हैं। वैसे पूरे वर्षभर यहां की यात्रा की जाती है। इसी स्थान से पंच केदारों में से एक केदार रुद्रनाथ के लिए भी रास्ता जाता है। यहां से रूद्रनाथ की दूरी लगभग ७-८ किलोमीटर है। प्रकृति के बीच शांत और भक्तिमय माहौल में श्रद्धालु और पर्यटक अपनी सुधबुध खो बैठता है।
http://hi.wikipedia.org/wiki

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कैसे पहुँचें यहां पहुँचने के लिए आपको सबसे पहले देश के किसी भी कोने से ऋषिकेश पहुँचना होगा। ऋषिकेश तक आप बस या ट्रेन से पहुँच सकते हैं। निकट ही जौलीग्रांट हवाई अड्डा भी है जहां पर आप हवाई मार्ग से पहुँच सकते है। ऋषिकेश से लगभग २१७ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद गोपेश्वर पहुँचा जाता है। गोपेश्वर में रहने-खाने के लिए सस्ते और साफ-सुथरे होटल बहुतायत में उपलब्ध हो जाते हैं।
गोपेश्वर से १३ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मण्डल नामक स्थान आता है। बस या टैक्सी से आप सुगमता से मण्डल पहुँच सकते हैं और मण्डल से लगभग ५-६ किलोमीटर की खडी चढाई चढने के बाद आप अनसूइया देवी मन्दिर मे पहुँच सकते हैं। पहाड़ का मौसम है इसलिए सदैव गर्म कपड़े साथ होने चाहिएं। साथ ही हल्की-फुल्की दवाइयाँ भी अपने साथ होनी आवश्यक है।


http://hi.wikipedia.org/wiki/

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मार्गशीर्ष(अगहन) मास की पूर्णिमा को दत्त जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इसी तिथि को भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। दत्तात्रेय भगवान विष्णु के ही अवतार माने गए हैं। इस बार दत्त जयंती का पर्व 10 दिसंबर, शनिवार को है।

भगवान दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था। ऐसी मान्यता है कि भक्त के स्मरण करते ही भगवान दत्तात्रेय उसकी हर समस्या का निदान कर देते हैं इसलिए इन्हें स्मृतिगामी व स्मृतिमात्रानुगन्ता कहा जाता है। श्रीमद्भगावत आदि ग्रंथों के अनुसार इन्होंने चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी। भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ।

गिरनारक्षेत्र श्रीदत्तात्रेय भगवान की सिद्धपीठ है। इनकी गुरुचरणपादुकाएं वाराणसी तथा आबू पर्वत आदि कई स्थानों पर हैं। दक्षिण भारत में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने एवं उनके मंदिर में जाकर दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

(Source http://religion.bhaskar.com