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Dung gas plant in Uttarakhand, उत्तराखंड के गांवों में गोबर गैस प्लांट

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, February 12, 2011, 10:51:00 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

दोस्तों जैसा की हम सब जानते हैं एक समय था जब उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में गोबर गैस प्लांट का क्रेज था लेकिन आज ऐसा समय आ गया  है की सब भूल गए हैं की गोबर गैस से भी चुल्ल्हे जलाए जाते हैं! उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों में गोअब्र गैस को फिर से शुरू करने की जरूरत है ! इस टोपिक के अंतर्गत हम सब अपने सुजाव और इस प्लांट को कैसे बढ़ावा दिया जाय इस पर वार्ता करेगें !


यम यस जाखी

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                    गोबर गैस: नो लाइन, नो टेंशन
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यह कहानी सिर्फ टीकाराम की नहीं, बल्कि उन जैसे कई ऐसे पशुपालकों की है, जिन्हें रसोई गैस सिलेंडरों की बढ़ती हुई कीमतों से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। यही नहीं उन्हें गैस के सिलेंडर के लिए न तो लाइन लगानी पड़ती है और न ही सिलेंडर में गैस  खत्म होने की समस्या से जूझना पड़ता है।

फर्क पड़े भी तो क्यों, आखिर उनके घर में गैस चूल्हा गोबर गैस प्लांट से जो जलता है। आपको शायद यकीं न हो, लेकिन यह सच है कि रसोई गैस सिलेंडरों की लगातार बढ़ती कीमतों ने पर्वतीय क्षेत्र में गोबर गैस प्लांटों में नई जान डाल दी है।
एक समय था जब पर्वतीय क्षेत्रों में गोबर गैस प्लांट को लेकर ग्रामीणों में काफी क्रेज था, लेकिन जैसे-जैसे रसोई गैस सिलेंडर पहाड़ों में चढ़ते गए, गोबर गैस प्लांट बंद होते चले गए।
गोबर गैस प्लांट बंद होने के साथ ही ग्रामीण पशुपालन से भी विमुख होते चले गए व एक स्थिति ऐसी भी आ गई कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग दूध-दही खरीदने लगे। लेकिन, रसोई गैस की लगातार बढ़ती कीमतों के चलते अब गांव की पगडंडियों पर मवेशियों की तादाद बढ़ने लगी है। ग्रामीण रसोई गैस सिलेंडरों की निर्भरता छोड़ अपने गोबर गैस प्लांटों को पुनर्जीवित करने लगे हैं।

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 पिछले 23 वर्षो से निजी गोबर गैस प्लांट चला रहे यहां शिवपुर निवासी टीकाराम केष्टवाल की मानें तो यदि सरकार की ओर से पूर्व में ही ध्यान दिया जाता तो आज सरकार की ओर से लगाए गए गोबर गैस प्लांट बंद नहीं पड़े होते।
उन्होंने बताया कि उनकी ओर से वर्ष 1987 में  करीब 20 हजार की लागत से गोबर गैस प्लांट स्थापित किया गया, जिसकी गहराई, लंबाई व चौड़ाई करीब 12 फुट थी। उन्होंने बताया कि जिस वक्त उन्होंने प्लांट लगाया, उस दौरान इस प्लांट पर कोई सरकारी योजना नहीं थी। उस वक्त भले ही यह खर्चा काफी अधिक लगा हो, लेकिन आज घर में न तो रसोई गैस सिलेंडर की जरूरत है और न ही अन्य किसी ईधन की। कोई भी मौसम हो, प्लांट से

क्या थी सरकारी प्लांट की खामियां
टीकाराम केष्टवाल के घर के समीप ही एक अन्य गोबर गैस प्लांट लगा है, जो बंद पड़ा है। दोनों प्लांटों में अंतर महज यही है कि श्री केष्टवाल ने अपनी लागत से प्लांट लगाया, जबकि उनके पड़ोसी नरेंद्र चौहान व गायत्री देवी ने सरकारी योजना से प्लांट लगाया।
श्री चौहान व गायत्री देवी ने बताया कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद 'उरेडा' ने उनकी भूमि पर गोबर गैस प्लांट लगाया, लेकिन अगले दो-तीन वर्षो बाद ही प्लांट बंद हो गया। उनका कहना था कि उनके पास आज भी पर्याप्त पशु हैं, लेकिन सरकारी प्लांटों का आकार काफी छोटा है, जिसमें पर्याप्त गैस नहीं बन पाती थी। उनका कहना है कि आज भी यदि उरेडा उनके प्लांटों का आकार बढ़ा दे तो वे भी उनकी भी रसोई गैस सिलेंडरों पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal

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गोबर गैस का उपयोग एक छोटे विद्युत जनित्र को चलाने के लिए होता है। गांव वालों को सुबह और शाम दो-तीन घंटे के लिए बिजली प्राप्त होती है।

बिजली के आने से गांव वालों को बहुत लाभ हुआ है। पहले महिलाओं को दूर-दूर से पानी लाना पड़ता था। अब बिजली की सहायता से पानी पंप करके एक टंकी में भरा जाता है। इस टंकी के साथ आठ नल जुड़े हैं जिनसे लोगों और मवेशियों को पानी उपलब्ध होता है।

घरों में बिजली आ जाने से बच्चे देर रात तक पढ़ सकते हैं। समय-समय पर गर्तों से खाद निकाल लिया जाता है। इसकी उर्वरक क्षमता गोबर से कहीं अधिक होती है। इसे खेतों में मिलाकर पुरा के गांववालों की जमीन अच्छी और उपजाऊ हो गई है।

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                     हवा की उपस्थिति में खाद और गैस उत्पादन

भारतीय किर्षी अनुसन्धान केंद्र
द्वारा विकसित की गई इस विधि में एक साधारण यंत्र का उपयोग होता है, जिसमें गोबर का पाचन हवा की अनुपस्थिति में होता। इस विधि से एक प्रकार की गैस निकलती है, जो प्रकाश करने, यंत्र चलाने तथा भोजन पकाने के लिये ईंधन के रूप में काम आती है। गोबर पानी का मिश्रण कर पाचक-यंत्र में प्रति दिन डालते जाते हैं और निकलने वाली गैस से उपरोक्त काम लेते हैं।
इस विधि की विशेषता यह है कि गोबर सड़कर गंधहीन खाद के रूप में प्राप्त हो जाता है और इसके नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश आदि ऐसे उपयोगी तत्व बिना नष्ट हुए इसी में सुरक्षित रह जाते हैं। साथ साथ इससे उपयोगी गैस भी मिल जाती है। अनुमान है कि एक ग्राम परिवार, जिसमें 4-5 पशु हैं, लगभग 70-75 घन फुट जलने वाली गैस प्रति दिन तैयार कर सकता है।

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 हमारे ग्रामीण इलाकों में गोबर गैस संयंत्रों से गैस का उत्पादन किया जा रहा है और कई ग्रामों का अंधेरा भी इन संयंत्रों ने दूर किया है। ऐसे में यदि गोबर गैस संयंत्रों के माध्यम से डेटा सेंटर चलाने का सिलसिला भारत में भी शुरू होता है तो किसान व ग्रामीणों को अतिरिक्त आमदनी का स्रोत मिलेगा। सहकारिता के रूप में इस व्यवसाय को मूर्त रूप दिया जा सकता है। इससे पालतू पशुओं की विविधता संरक्षित होगी और पशुओं को मांस के लिए पालने की प्रवृत्ति भी कम होगी।

यद्यपि ऊर्जा के लिए पशुपालन उद्योग के रूप में बड़े पैमाने पर सामने आ जाता है तो यह कई प्रकार के संकट भी पैदा कर सकता है। वर्तमान में जिन बड़ी डेयरियों का औद्योगिक रूप में इस्तेमाल हो रहा है, उनका उद्देश्य अधिकाधिक दूध, घी, अंडा व मांस उत्पादन है। पशुओं से दूध व मांस ज्यादा से ज्यादा उत्पादित किया जा सके इसके लिए उन पर घातक इंजेक्शन व रसायनों का प्रयोग तो किया ही जाता है

उत्तराखंड में तो इतने पशु हैं हर गांवं में गोबर गैस प्लांट लगाया जा सकता है,आजकल की महंगाई और गैस की बदती किल्तों से छुटकारा मिल सकता है !

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गोबर गैस प्लांट की उपयोगिता

      किसानों की दो मुख्य समस्याँए हैं - पहली उर्वरक तथा दूसरी ईंधन की कमी, जो तरह-तरह की कठिनाईयाँ पैदा कर रही है। किसानों को गोबर तथा लकड़ी के अलावा अन्य कोई पदार्थ सुगमतापूर्वक उपलब्ध नहीं है। अगर किसान गोबर का उपयोग खाद के रूप में करता है तो उसके पास खाना पकाने के लिए ईंधन की समस्या बन जाती है।


जैसा कि हमें विदित है मृदा की उर्वरक शक्ति ज्यादा फसल पैदा करने से काफी कमजोर हो गई है तथा संतुलित पोषक पदार्थ उपलब्ध नहीं करवा पा रही है। दूसरी ओर रासायनिक खादों के उपयोग से पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। इनके प्रयोग में लागत भी ज्यादा आती है तथा इनके मिलने में भी कई बार कठिनाई आती है।


      इन समस्याओं का समाधान गोबर का दोहरा प्रयोग करके किया जा सकता है। गोबर में ऊर्जा बहुत बड़ी मात्रा में होती है जिसको गोबर गैस प्लांट में किण्वन (फर्मंटेशन) करके निकाला जा सकता है।
इस ऊर्जा का उपयोग र्इंधन, प्रकाश व कम हॉर्स पावर के डीजल ईंजन चलाने के लिए किया जा सकता है। प्लांट से निकलने वाले गोबर का खाद के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं। अत: गोबर गैस प्लांट लगाने से किसानों को र्इंधन व खाद दोनों की बचत होती है।


      गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए निम्नलिखित आवश्यकताओं का होना जरूरी है :


1-  गोबर गैस से छोटे से छोटा प्लांट लगाने के लिए कम से कम दो या तीन पशु हमेशा होने चाहिएं।


2- गैस प्लांट का आकार गोबर की दैनिक प्राप्त होने वाली मात्रा को ध्यान में रखकर करना चाहिए।


3-   गोबर गैस प्लांट गैस प्रयोग करने की जगह के नजदीक स्थापित करना चाहिए ताकि गैस अच्छे दबाव पर मिलता रहे।


4- गोबर गैस प्लांट लगवाने के लिए उत्ताम किस्म का सीमेंट तथा ईंटें प्रयोग करनी चाहिएं। छत से किसी प्रकार की लीकेज नहीं होनी चाहिए।


5- गोबर गैस प्लांट किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में बनवाना चाहिए।


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गोबर गैस प्लांट से उत्तराखंड के गांवों में गैस की किल्त्तों से बचा जा सकता है और इस प्लांट पर तो कुछ खर्चा भी ज्यादा नहीं एक प्लांट लग गया बस वही है लोगों का समय बचेगा और आज भी पहाड़ों में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो की गैस का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं,आज उनका चूल्हा लकड़ी से ही जलता है,गोबर गैस गाँवों में हर किसी परिवार केलिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है !

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गोबर गैस प्लांट भारत कितने राज्यों में लगाने का प्रयास किया गया  था और इस प्लांट से आज भी कई राज्य गोबर गैस प्लांट योजना का लाभ उठा रहे हैं
बिहार, झारखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तारांचल, राजस्थान आदि प्रांतों की सरकारों ने सालासर गैस प्लांट को सरकारी योजनाओं में शामिल कर लिया। गुजरात में इस दिशा में विशेष पहल हुई।

गुजरात के राजकोट में प्रस्तावित गौ ग्राम में अत्याधुनिक सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। इसकी शुरुआत की गुजरात के प्रख्यात उद्यमी धीरजलाल एल रामानी ने। वह तीन साल पहले भौती गौशाला से प्रभावित हुए।

उन्होंने भौती की तर्ज पर आवासीय क्षेत्र विकसित करने की योजना बनाई, फिर अपनी 12.5 लाख में नीलामी में ली गई स्वाति गाय के नाम से स्वाति विश्वमंगल गौ ग्राम की 51 एकड़ भूमि पर आधारशिला रख दी। धीरजलाल बताते हैं कि स्वाति विश्वमंगल गौ ग्राम में 1111 आवास बनाने की योजना है। गऊ पालन आवास आवंटन की अनिवार्य शर्त होगी। परिसर में पंचगव्य से तैयार औषधियाँ व दैनिक उपयोग के सामान होंगे।