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Budhakedar Tehri Garhwal Uttarakhand,बूढ़ाकेदार टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, September 17, 2011, 11:23:05 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


नई टिहरी। उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। बदरी, केदार, गंगोत्री और यमुनोत्री चार धामों के यहां स्थित होने से यह देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी है, लेकिन राज्य में ऐतिहासिक, पौराणिक मंदिरों की परंपरा इन्हीं चार धामों पर खत्म नहीं होती, बल्कि यहां कई ऐसे मंदिर स्थित हैं, जिनका धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है टिहरी जनपद स्थित बूढ़ाकेदार।


उत्तराखण्ड में बूढ़ाकेदार का एक ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ पर बूढ़ा केदार बाबा का पौराणिक मंदिर है, जिसके दर्शन करने आज भी सैकड़ों पैदल तीर्थ यात्री हर साल आते हैं। जब तक उत्तराखण्ड में सड़कों का विकास नहीं हुआ था, तीर्थयात्रियों के लिये बूढ़ाकेदार का एक महत्वपूर्ण स्थान रहता था।


सड़कों के विकास के साथ तीर्थयात्री भी सुविधाभोगी बने और उनका बूढ़ाकेदार आना कम हुआ। ऐसा एक स्थानीय बुजुर्ग बता रहे थे। पहले यमुनोत्री, गंगोत्री के बाद तीसरा धाम केदारनाथ माना जाता था। बूढ़ाकेदार के बारे में कहते हैं कि बाबा केदार यहाँ कुछ समय तक रुके थे। किसी बंगाली रचनाकार ने बूढ़ाकेदार को 'सागरमाथा' नाम देकर अलंकृत किया है।




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 Budha-Kedar used to be an important halting place during the days when the pilgrimage used to be done on foot and pilgrims returning from Gangotri enroute to Kedarnath used to stay here.

There is a very old temple dedicated to Lord Shiva. Buses are available from Tehri. There is a P.W.D. Inspection House, a Dharamshala and private lodges providing accommodation.

The famous Masatral, 3225mts. above sea level, is 16 km from here. The trek is enjoyable but one has to make own arrangements for camping.

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बूढ़ाकेदार तक पहुँचने के रास्ते एक से अधिक हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश निर्माणाधीन हैं और जो बचे हैं वे खतरों से भरे हैं। इन सड़कों पर स्थानीय जुगाड़बाज व जोखिमबाज ड्राइवर ही गाड़ी चला पाते हैं। घनसाली से बूढ़ाकेदार तक सड़क पर कई मोड़ तो ऐसे हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि ये गाड़ियों को टकराने के लिये ही बने हों। यात्रियों को ठहराने की व्यवस्था घनसाली में कुछ बेहतर है, परन्तु बूढ़ाकेदार में लोक जीवन विकास भारती आश्रम के अलावा कोई दूसरा उचित स्थान नहीं है।


समझ में नहीं आता कि देवभूमि के रूप में उत्तराखण्ड की देश-दुनिया में जो पहचान है, उसे संजोने का न तो हमारे समाज के पास कोई जज्बा दिखता है और न ही सरकार का इस ओर ध्यान जाता है।

एक ओर जहाँ सरकार के बनाये गये पर्यटन निगम 'रिडिस्कवर गढ़वाल' व 'रिडिस्कवर कुमाऊँ' की बात कर रहे हैं, वहीं करोड़ों लोगों की आस्था के ये केन्द्र धूल खा रहे हैं। राज्य बनने के बाद बूढ़ाकेदार के दर्शन करने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या क्यों नहीं बढ़ पा रही है
, हिन्दू सभ्यता की पैरवी करने वाली उत्तराखण्ड की मौजूदा सरकार के लिये भी यह महत्वपूर्ण विषय नहीं बना। अन्यथा तो यह काम सभी प्रतिनिधियों व सरकार के लिये मुख्य होना चाहिये।

स्थानीय लोगों के लिये यह महत्वपूर्ण मुद्दा है कि बूढ़ाकेदार पहुँचना सुगम हो, अधिक से अधिक इसका प्रचार-प्रसार हो। कैसे स्थानीय समाज की आर्थिकी को इससे जोड़ा जाये। इन सवालों पर यहाँ के लोगों को गम्भीरता से सोचना होगा।

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आज का तीर्थयात्री बदल गया है। वह ईश्वर दर्शन के साथ स्थानीय समाज, प्रकृति व सुविधाओं को भी बारीकी से देखता है। आस्था के साथ-साथ ये भी उसके जरूरत के मुद्दे हैं। यह बात भी कुछ हद तक सही है कि पहाड़ों को जोड़ने का हमारे पास अभी तक सबसे बेहतर माध्यम सड़के हैं। लेकिन जिस ढंग, समझ व तरीकों से ये सड़कें बनाई जा रही हैं वह चिंतनीय है।

कब सड़क का पुस्ता गिर जाये तथा कब सिर पर किसी दूसरी सड़क का पत्थर गिर जाय, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। पहाड़ के सौन्दर्य पर ये सड़कें दाग जैसी दिखती हैं। पिछले कुछ महीनों में गंगोत्री, यमनोत्री व बदरीनाथ रोड पर कई तीर्थ यात्रियों से मिलना हुआ। ज्यादातर से बातचीत के बाद लगा कि वे आये खुशी के साथ थे, परन्तु जाते समय कटु अनुभवों के साथ जा रहे हैं। गंदगी, अव्यवस्था, सड़कों के खतरे आदि मुद्दे पर लोग सुधार की बातें करते हैं।

खैर बात करें बूढ़ाकेदार की। बूढ़ाकेदार बाबा अपने भक्तों से मिलने को बेताब हैं। भिलंगना घाटी के सैकड़ों परिवारों के लिए यह रोजगार की सम्भावना से भरा है। ऐसा लगता है कि बूढ़े बाबा केदार अपने भक्तों को पुकार रहे हों। कैसे यह पुकार सार्थक हो ? इसके लिये बूढ़ाकेदार तक तीर्थयात्रियों के लिये बुनियादी व्यवस्थाओं (सड़क, आवास, प्राकृतिक सौन्दर्य संरक्षण आदि) काम करना होगा।


यह बात स्थानीय प्रतिनिधियों को भी समझनी चाहिये और जोर-शोर से उठानी चाहिये। हमारे जनप्रतिनिधियों के मनों में इन ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति गौरव का भाव तथा इनके संरक्षण करने की इच्छाशक्ति हो तो बूढ़ाकेदार जैसे ऐतिहासक स्थान स्थानीय आजीविका को बढ़ाने व पलायन को रोकने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी बन सकता है।

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भिलंगना ब्लाक में कई ऐसे पर्यटक स्थल है जो नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण होने के साथ ही धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। बूढ़ाकेदार के निकट महासरताल बुग्यालों और तालों का अनोखा संगम है, जो बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में यह पर्यटक स्थल आज भी उपेक्षित है।

   बूढ़ाकेदार से 9 किमी पैदल उत्तर दिशा में 33 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित महासरताल पर्यटक स्थल के साथ-साथ बालगंगा घाटी के 27 गांवों का पौराणिक धार्मिक स्थल भी है।

'महासरताल' की लम्बाई 80 मीटर व चौड़ाई 35 मीटर से भी अधिक है। इस ताल के दक्षिण में एक और ताल है जो माहेश्वरी ताल के नाम से विख्यात है। भाद्र मास व गंगा दशहरे के दिन स्थानीय लोग अपने देवी-देवताओं की डोलियां यहां स्नान के लिए लाते है। गंगा दशहरा पर यहां मेला भी आयोजित किया जाता है।


यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि यहां से पांडव सहस्त्रताल होते हुए स्वर्गारोहण गए थे। महासरताल के समीप ही पांडव डोखरी नामक स्थान है, यहां से धर्म गंगा निकलती है। पुराणों से ज्ञात होता है कि यह नदी धर्मराज की देन है। स्थानीय लोग पांच महीने के लिए अपने मवेशियों के साथ यहां पर छान बनाकर रहते है।

सभी खूबियां समेटे यह स्थल प्रचार-प्रसार व सुविधाओं के अभाव में आज भी उपेक्षित है। यदि इस पर्यटक स्थल को विकसित किया जाए तो यहां पर पर्यटन की अपार संभावनाएं है।

 

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