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Nar Singh Devta, God known for Justice-नार सिंह देवता, न्याय के देवता

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, September 26, 2011, 02:19:41 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto

Nar Singh Devta is worshiped almost in every home at Devbhoomi Uttarakhand. Nar Singh Devta known for instant justice. People who lose hope of justice from law & its long proceeding, go to the shelter of Nar Singh Devta.

We will be posting about Nar Singh Devta's temple at various places in Uttarakhand in this Topic.


उत्तराखंड के इतिहास में नाथ- सिद्ध प्रभाव प्रमुख भूमिका निभाता है क्यूंकि कत्युरी वंश के राजा  बसंत देव (संस्थापक राजा )  क़ी नाथ गुरु  मत्स्येन्द्र नाथ (गुरु गोरख नाथ के गुरु ) मे आस्था थी | १० वी शताब्दी में इन् नाथ सिद्धों ने कत्युर वंश में अपना प्रभाव देखते हुए नाथ  सिद्ध नरसिंह देव (८४ सिद्धों मे से एक )  ने कत्युर वंश के राजा से  जोशीमठ राजगद्दी  को दान स्वरुप प्राप्त कर उस पर गोरखनाथ क़ी पादुका रखकर ५२ गढ़ूं के भवन नारसिंघों क़ी नियुक्ति क़ी जिनका उल्लेख नरसिंह वार्ता में निम्नरूप से मिलता है   :

- वीर बावन  नारसिंह
- दुध्याधारी नारसिंह
- ओचाली  नरसिंह

-  कच्चापुरा
[/font][/glow][/size]नारसिंह
- नो तीस 
नारसिंह -
- सर्प नो वीर नारसिंह
-घाटे  कच्यापुरी  नरसिंह -
-चौडिया नरसिंह
- पोडया नारसिंह
- जूसी  नारसिंह
-चौन्डिया  नारसिंह कवरा नारसिंह
-बांदू  बीर  नारसिंह
- ब्रजवीर नारसिंह खदेर वीर नारसिंह
- कप्पोवीर नारसिंह
-वर का वीर नारसिंह
-वैभी नारसिंह घोडा नारसिंह तोड्या नारसिंह
-मणतोडा नारसिंह चलदो नार सिंह
- चच्लौन्दो   नारसिंह
- मोरो  नारसिंह
- लोहाचुसी नारसिंह
- मास भरवा नारसिंह
- माली  पाटन नारसिंह
- पौन घाटी नारसिंह केदारी नारसिंह
- खैरानार सिंह सागरी नरसिंह
-  ड़ोंडिया नारसिंह बद्री का पाठ थाई -आदबद्री छाई-हरी हरी द्वारी नारसिंह
-  बारह हज़ार कंधापुरी को आदेश-बेताल घट  वेल्मुयु भौसिया -जल
मध्ये नारसिंह
-वायु मध्ये  नार सिंह वर्ण
मध्ये  नार सिंह कृष्ण अवतारी नारसिंह
-  घरवीरकर नारसिंह रूपों नार सिंह पौन धारी नारसिंह जी सवा गज फवला  जाणे-सवा मन सून की सिंगी जाणो तामा पत्री जाणो-नेत पात की झोली जाणी-जूसी मठ के वांसो  नि पाई  शिलानगरी को
वासु  नि पाई (साभार सन्दर्भ डॉ. रणबीर  सिंह चौहान कृत " चौरस   की धुन्याल से " , पन्ना १५-१७)   

M S Mehta
   


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


नर सिंह देवता

पौराणिक एंवम लौकिक तत्वों के मिश्रित रूप में नर सिंह की पूजा गढ़वाल क्षेत्र में की जाती है! इसकी पौराणिकता जनपद चमोली के अंतर्गत श्री ज्योतिमठ (जोशीमठ) के प्राप्य है! इस स्वमभू स्वयंभू  मूर्ती  का सम्बन्ध पुराण प्रसिद्ध भगवान् विष्णु के नर सिंह अवतार से जोड़ा जाता है! पौराणिक नर सिंह के अतिरिक्त गढ़वाल में नर सिंह का रूप नागपंथी साधुओ की भांति चिंता व जटाधारी साधू का भी उनकी के समान इनके पास झोली, चिंता, टेमरू (तेजबल) का सोटा रहता है! नागा साधुओ की भांति लम्बी इनकी जटाए और शरीर पर अखंड बभूत लगी रहती है! गढ़वाल में यह चौरासी सिद्धो की पंकित में अआते है! इनके चार रूप सुनने में आते है!

-    दुध्या नर सिंह
-    डौडया नर सिंह
-    कच्या नर सिंह
-    खरंडा नर सिंह


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नरसिंह मंदिर (Joshi Math)

राजतरंगिणी के अनुसार 8वीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान प्राचीन नरसिंह मंदिर का निर्माण उग्र नरसिंह की पूजा के लिये हुआ जो विष्णु का नरसिंहावतार है। जिनका परंतु इसकी स्थापना से संबद्ध अन्य मत भी हैं। कुछ कहते हैं कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी, जब वे स्वर्गरोहिणी की अंतिम यात्रा पर थे। दूसरे मत के अनुसार इसकी स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य ने की क्योंकि वे नरसिंह को अपना ईष्ट मानते थे।

इस मंदिर की वास्तुकला में वह नागर शैली या कत्यूरी शैली का इस्तेमाल नहीं दिखता है जो गढ़वाल एवं कुमाऊं में आम बात है। यह एक आवासीय परिसर की तरह ही दिखता है जहां पत्थरों के दो-मंजिले भवन हैं, जिनके ऊपर परंपरागत गढ़वाली शैली में एक आंगन के चारों ओर स्लेटों की छतें हैं। यहां के पुजारी मदन मोहन डिमरी के अनुसार संभवत: इसी जगह शंकराचार्य के शिष्य रहा करते थे तथा भवन का निर्माण ट्रोटकाचार्य ने किया जो ज्योतिर्मठ के प्रथम शंकराचार्य थे। परिसर का प्रवेश द्वार यद्यपि थोड़ा नीचे है, पर लकड़ी के दरवाजों पर प्रभावी नक्काशी है जिसे चमकीले लाल एवं पीले रंगों से रंगा गया है।

परिसर के भीतर एक भवन में एक कलात्मक स्वरूप प्राचीन नरसिंह रूपी शालीग्राम को रखा गया है। ईटी. एटकिंस वर्ष 1882 के दी हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का उज्ज्वल वर्णन किया है। एक अत्युत्तम कारीगरी के नमूने की तरह विष्णु की प्रस्तर प्रतिमा गढ़ित है। यह लगभग 7 फीट ऊंची है जो चार महिला आकृतियों द्वारा उठाया हुआ है। पंख सहित एक पीतल की एक अन्य प्रतिमा भी है जो ब्राह्मणों का जनेऊ धारण किये हुए है, जिसे कुछ लोग बैक्ट्रीयाई ग्रीक कारगरी होना मानते हैं। 2 फीट ऊंची गणेश की प्रतिमा अच्छी तरह गढ़ी एवं चमकीली है। मंदिर में लक्ष्मी, भगवान राम, लक्ष्मण, जानकी, कुबेर, गरूड़ और श्री बद्रीनाथ की मूर्तियां भी हैं।

नरसिंह मूर्त्ति के लिए आम विश्वास है कि प्रत्येक दिन इसकी एक कलाई पतली होती जाती है और जिस दिन पूरी गायब होगी, वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा। नर एवं नारायण पर्वत जो बद्रीनाथ के प्रहरी हैं, कभी एक-दूसरे से टकराकर बद्रीनाथ मंदिर का मार्ग हमेशा के लिये अवरूद्ध कर देंगे।


इसके बाद इनकी पूजा भविष्य बद्री में सुभाय गांव में होगी जो तपोवन से 5 किलोमीटर दूर होगा और तपोवन जोशीमठ से 18 किलोमीटर दूर है। यहां एक विष्णु मंदिर है। कहा जाता है कि अगस्त मुनि ने यहां तप किया था और तब से ही भगवान बद्री यहां रहते हैं। वास्तव में प्रतिमा की कलाई को देख पाना संभव नहीं होता, क्योंकि नरसिंह की मूर्ति सुंदर परिधानों से सजी होती है जो भक्तों द्वारा चढ़ाये जाते हैं, परंतु पुजारी के अनुसार यह एक बाल की चौड़ाई के समान पतली है।

वह भवन जहां आदि गुरू शंकराचार्य की धार्मिक गद्दी स्थित है, वह भी नरसिंह मंदिर परिसर का एक भाग है। प्राचीन भवन वह स्थान है जहां जाड़ों में मंदिर का कपाट बंद हो जाने पर, बद्री विशाल के प्रतीक रावल की गद्दी को बड़े धूम-धाम एवं समारोह पूर्वक यहां रखा जाता है, जब तक कि गर्मी में कपाट फिर से नहीं खुल जाता। यहां इसे भगवान विष्णु का प्रतिनिधि मानकर श्रद्धापूर्वक इसकी देखभाल की जाती है।

बीते दिनों, टिहरी के राजा द्वारा प्रदत्त नाम, बद्रीनाथ का रावल बड़ा शक्तिशाली होता था। उसे कर संग्रह करने, न्याय करने तथा अपराधियों को सजा देने तक का अधिकार होता था। यह अधिकार उसे एक स्वर्ण कंगन पहनने तथा उसकी गद्दी के कारण मिला था। किसी समय टिहरी के राजा एवं रावल में झगड़ा हो गया तथा कंगन को नदी में फेंक दिया गया। राजा ने उसका अभिषेक भी नहीं किया और गद्दी पर बैठने का उसका अधिकार एवं अन्य शक्तियां भी चली गयीं तथा आज गद्दी को भगवान विष्णु का प्रतीक मानकर रावल उसकी रक्षा करता है।

यह भवन ही जाड़े में बद्रीनाथ के रावल का निवास भी होता है। परंतु वह यहां कभी-कभी ही ठहरता है तथा इन दिनों दक्षिण की यात्रा पर होता है।

नरसिंह मंदिर पर भक्तों द्वारा विशेष पूजा भी की जा सकती है। इनमें विशेष पूजा (351 रूपये), अभिषेक पूजा (251 रूपये), सहस्त्रकमल (75 रूपये) तथा नित्य भोग (351 रूपये) शामिल हैं। मंदिर परिसर में फोटो खींचने की सख्त मनाही है एवं मंदिर की देखभाल बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का प्रशासन संभालती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Narsingh: In Uttarakhand-Garhwal, Narsingh is not incarnation of lord Vishnu but Narsingh is the disciple of Guru Gorakhnath. There are fifty two brave and Sidh purush which are described in Narsingh's jagar as

Ijag jagnarsingh beer baba,rupa ko tero sotta jag, fatingo ko tera mudra jag

Dimari rasoya jag, kedari raut jag, nepali tero chimta jag, kharua ko teri jholi jag

There two main forms of Narsingh deity—1-Dondya and 2-Dudho Narsingh


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


नर सिह देवता

जनपद टेहरी से देवप्रयाग से १८ किलोमीटर की दूरी पर मंगल डांडा के समीप पत्थलडा डांडा स्थान पर प्रसिद्ध दूदाधारी श्री नर सिंह देवता का मंदिर स्थित है! इस स्थान पर नर सिह देवता को न्याय देवता, भूमयाल या पत पल्थलडा का नर सिंह भी कहते है! मंदिर के ऊपर छोटी पर पत्थर का मंडला बना हुवा है! मंडले से ५०० मीटर की डोर पर नीचे की ओर एक कुवा है!

मान्यता है इस नर सिह देवता, मंडले से इस कुए में स्नान के लिए आते थे! कुए से मंडले तक लगभग ३५१ सीडियां है ! जो अब अवशेष के रूप में है ! यहाँ दो बड़े खम्बो का एक झूला है!

प्रति वर्ष अप्रैल १८ को इस मंदिर में एक मेला लगता है जो धार्मिक महत्व है!



Devbhoomi,Uttarakhand

दूधाधारी नृसिंह की पूजा के साथ जागर शुरू





  थराली, निज प्रतिनिधि : दूधाधारी नृसिंह की पूजा के साथ सिद्धपीठ नृसिंह मंदिर में देव जागर शुरू हो गए। आठ साल बाद आयोजित हो रही बधाण के वीरों की पूजा में पूरा क्षेत्र उमड़ पड़ा। विशेषकर ध्याणियों ने अपने ईष्ट देवता के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।


दक्षिणकाली सिद्धपीठ और दूधाधारी नृसिंह मंदिर सिमलसैंण में देव आह्वान के साथ जागर की शुरूआत हुई। गुरु किशन सिंह गुसांई ने सिद्धपीठ के 52 वीर, 78 भैरव, 64 काली और 54 चेड़े (शिव के गण) का आह्वान किया।


आठ साल बाद आयोजित की जा रही पूजा में भाग लेने के लिए क्षेत्र ही नहीं दूर दराज के क्षेत्रों से भी भारी संख्या में लोग पहुंचे। मान्यता है कि दूधाधारी नृसिंह का पूरे विश्व में जोशीमठ के अलावा यह दूसरा मंदिर है। पुजारी दिगम्बर प्रसाद ने बताया कि इस सिद्धपीठ की दर्शन करने से भगवान बदरीनाथ के यात्रा के बराबर पुण्य मिलता है। इस मंदिर में रुद्रकाल महाकाल वीरभद्र का रुद्रावतार भी स्थापित है।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध वीर नृत्य बधाण के इन्हीं वीरों से सम्बन्धित है। कार्यक्रम के आयोजन में हेमवती नंदन चंदोला, प्रयाग चंदोला, मोहन दत्त, द्वारिका प्रसाद, मनोज चंदोला, बालादत्त चंदोला, विसम्बर चंदोला ने सहयोग दिया


Source Dainik Jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नर सिंह देवता के बारे बहुत से लोगो की धरना हो होगी कि ये भगवान् विष्णु के अवतार है! लेकिन नर सिंह देवता गुरु गोरख नाथ के शिष्य है !