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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ

सरसों सरसों फूलाली
पाड़े की धरती सजैली
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा

हेर हेर का फेर देख्दी जा
जग्वाल कंन हुन्दी
वीं आंखी थे सेकदी जा
प्रीत माया जोगोदी जा
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

रूटलू को तू घेर घेर देख्दी जा
लाटलूँ उल्झ्युं वो फेर देख्दी जा
चुल्हा बैठी रुटू सेकदी
हाथों ड्म्या दागा देख्दी जा
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

कूल्हण खींचा रेघ रेघ देख्दी जा 
आंसूं ल सीचा खेत देख्दी जा
जमी लगुली हाथ फेरदी
बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

सरसों सरसों फूलाली
पाड़े की धरती सजैली
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित — with Rajendra Negi and 49 others. Photo: बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ सरसों सरसों फूलाली पाड़े की धरती सजैली नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२ बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा हेर हेर का फेर देख्दी जा जग्वाल कंन हुन्दी वीं आंखी थे सेकदी जा प्रीत माया जोगोदी जा नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२ बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा रूटलू को तू घेर घेर देख्दी जा लाटलूँ उल्झ्युं वो फेर देख्दी जा चुल्हा बैठी रुटू सेकदी हाथों ड्म्या दागा देख्दी जा नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२ बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा कूल्हण खींचा रेघ रेघ देख्दी जा आंसूं ल सीचा खेत देख्दी जा जमी लगुली हाथ फेरदी बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२ बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा सरसों सरसों फूलाली पाड़े की धरती सजैली नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२ बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी ना रुशे मैसे

मिल भी जाली मिल भी जाली
भग्या की रेघा तेरी मेरी मिल भी जाली

ना रूसो दी छुची ईन ना हटो दी
बैठी डालो का छाला ईन मुखडी ना फिरोंदी

जीयु लगी मेरु तैसे मी दगडी ब्चोदी
जिकोड़ी की जीयु थै ना ईं झोरोंदी

सुप्नीया मा माया से लगे मैंन माया
मन मेरु मैसे ही हरचाया छुची तिल कया पैई

अब त बोल दे ऐ गीचो खोल दे
ना तरसो ना तरसो ऐ सरीर ना ईन दुख्दू दे

ताप छयूँ  मुंडेर मा हाथ दगडी म्सल्दे
ऐ भानू बाट का तू खोल दे दुःख छोडी तू ह्सेदे   

मिल भी जाली मिल भी जाली
भग्या की रेघा तेरी मेरी मिल भी जाली

ना रूसो दी छुची ईन ना हटो दी
बैठी डालो का छाला ईन मुखडी ना फिरोंदी

  एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी मै खुश हुआ
 
देख खड़ा हूँ चोटी पर
निहार रहा हूँ उस स्वर्ग को
पूंछ ले तू अपने आप को
क्या मैंने अपने आप से सत्य कहा

मै मानता हूँ अपने को
अपने आप मै यूँ ही ढलता हूँ
ले प्रकृती की की छटा मै
हर रंग के सपने मै बुनता हूँ

कितनी कथा जन्मी होगी
कितनी व्यथा दबी पड़ी होगी
पीड़ा की कहनी में सुख की कमी होगी
आँखों की हंसी में आंसूं की नमी होगी

शांत दीख रहा है आज वो
हरियाली को लेके साथ वो
उजाड़ा पड़ा था कभी वो भी
अपनो को दूर जाते देखा उस राह को

कंही आवाज का शोर गूँजा
विचलित हो कर मन मेरा मोड़ा
पगडंडी से बनी रहा देख कर
पहले भी कोई आया यंहा ,मै खुश हुआ
 
एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ कवी दिल होता ही ऐसा

माँ सरस्वती की देन है
दूसरों के दर्द देख वो खुद रो लेता है
हंसी में उनके वो हंस लेता है
ऐसे ही वो कुछ छंद कविता लिख लेता है
कवी दिल होता ही ऐसा

अन्याय के खिलाफ
वो लड़ लेता है हौंसलों पुल वो बुन लेता है
कलम को अपनी तज देता है
क्रांती की राहों में वो अब दिखता है
कवी दिल होता ही ऐसा

भूखे की रोटी बन जाता है
आँखों से गिरे मोती बन जाता है
सर्दी में ठिठुर गर्मी में उमस
बरसात के संग वो बरस जाता है
कवी दिल होता ही ऐसा

खेल में खुद खेल बन जात है
बच्चों के संग बच्चा हो जाता है
आपनो संग कभी अकेला वो
गैरों दुःख मै वो खो जाता है
कवी दिल होता ही ऐसा

पेज और कलम का मेल है
चलती उसकी कल्पनाओं की रेल है
अच्छा लगे या बुरा कविता आप को
आपकी टिपण्णी से भरता उसका पेट है
कवी दिल होता ही ऐसा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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कवी दिल होता ही ऐसा माँ सरस्वती की देन है दूसरों के दर्द देख वो खुद रो लेता है हंसी में उनके वो हंस लेता है ऐसे ही वो कुछ छंद कविता लिख लेता है कवी दिल होता ही ऐसा अन्याय के खिलाफ वो लड़ लेता है हौंसलों पुल वो बुन लेता है कलम को अपनी तज देता है क्रांती की राहों में वो अब दिखता है कवी दिल होता ही ऐसा भूखे की रोटी बन जाता है आँखों से गिरे मोती बन जाता है सर्दी में ठिठुर गर्मी में उमस बरसात के संग वो बरस जाता है कवी दिल होता ही ऐसा खेल में खुद खेल बन जात है बच्चों के संग बच्चा हो जाता है आपनो संग कभी अकेला वो गैरों दुःख मै वो खो जाता है कवी दिल होता ही ऐसा पेज और कलम का मेल है चलती उसकी कल्पनाओं की रेल है अच्छा लगे या बुरा कविता आप को आपकी टिपण्णी से भरता उसका पेट है कवी दिल होता ही ऐसा एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फिर पुकार है तुझे

बस उस पुकार को
अनसुनी कर चला गया था तू
देख फिर वो सुबह होई है
फिर पुकार है तुझे

दूर जाते देखा था तुझे यूँ ही
बस ये आंखें बोल रही थी
वो तब भी बोल रही थी
वो अब भी देख रही है
फिर पुकार है तुझे

ये दिल चुपचाप चिला रहा था
अपना जख्म बता रहा था
वो तब भी चिला रहा था
वो अब भी बता रहा है
फिर पुकार है तुझे

गिरते अस्कों ने कोशिश की रोकने की
मगर तू एक बार भी ना पीछे मोड़ा था
वो अब भी कोशिश कर रही है
उस राह को अब भी मोड़ रही है
फिर पुकार है तुझे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ

सरसों सरसों फूलाली
पाड़े की धरती सजैली
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा

हेर हेर का फेर देख्दी जा
जग्वाल कंन हुन्दी
वीं आंखी थे सेकदी जा
प्रीत माया जोगोदी जा
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

रूटलू को तू घेर घेर देख्दी जा
लाटलूँ उल्झ्युं वो फेर देख्दी जा
चुल्हा बैठी रुटू सेकदी
हाथों ड्म्या दागा देख्दी जा
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

कूल्हण खींचा रेघ रेघ देख्दी जा 
आंसूं ल सीचा खेत देख्दी जा
जमी लगुली हाथ फेरदी
बाबा ऊ बोलाली तू घार परती आ
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी सारी मा

सरसों सरसों फूलाली
पाड़े की धरती सजैली
नटी व्हाली वा पिंगली साड़ी मा ..२
बैठी व्हाली वा अप्डी  सारी मा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी पंछी उड़ने को बेकरार

आज खोजों मै बाहर
वो कब से बसा भीतर मेरे

अंजान मै अहम धारी हूँ मै   
मै फिर रहा हूँ दर दर तेरे

मन सुख से भटका ऐसे
तन सुख से जा अटका ऐसे

रही ना खबर मुझको मेरी
जिंदगी छोटी बरसों पहले

जब एक चाह ने जन्म लिया था
पूर्ण होते ही दूजे ने घेर लिया था

अक्कल दंता आयी जब
उम्र यूँ ही गुजर जाने के बाद

अब टटोलों मै खुद को 
पंछी जब पिंजड़े से उड़ने को बेकरार


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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पंछी उड़ने को बेकरार आज खोजों मै बाहर वो कब से बसा भीतर मेरे अंजान मै अहम धारी हूँ मै मै फिर रहा हूँ दर दर तेरे मन सुख से भटका ऐसे तन सुख से जा अटका ऐसे रही ना खबर मुझको मेरी जिंदगी छोटी बरसों पहले जब एक चाह ने जन्म लिया था पूर्ण होते ही दूजे ने घेर लिया था अक्कल दंता आयी जब उम्र यूँ ही गुजर जाने के बाद अब टटोलों मै खुद को पंछी जब पिंजड़े से उड़ने को बेकरार एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी दो बूंद शराब का

दो बूंद शराब का ,खिलने लगा चेहरा जनाब  का ..२
दो बूंद शराब का ......

पैमानों ने सुना,भरने लगा जाम अब गम आप का .२
दो बूंद शराब का ......

महकेगी शाम जलेंगे दिये( पीते पीते )...२
छलकेगी शराब हुस्न पे यों आज
राज खोलेंगे दिल के अब धीरे धीरे ......

दो बूंद शराब का ,खिलने लगा चेहरा जनाब  का ..२
दो बूंद शराब का ......

पैमानों ने सुना,भरने लगा जाम अब गम आप का .२
दो बूंद शराब का ......

दो बूंद गयी ह्ल्क तरनुम सी बजी
बजने लगे सितार सात सरगम को ले साथ
मै भी नाचूँगा जनाब अब शराब ( पीते पीते )...२

दो बूंद शराब का ,खिलने लगा चेहरा जनाब  का ..२
दो बूंद शराब का ......

पैमानों ने सुना,भरने लगा जाम अब गम आप का .२
दो बूंद शराब का ......

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानीकवी दिल होता ही ऐसा

माँ सरस्वती की देन है
दूसरों के दर्द देख वो खुद रो लेता है
हंसी में उनके वो हंस लेता है
ऐसे ही वो कुछ छंद कविता लिख लेता है
कवी दिल होता ही ऐसा

अन्याय के खिलाफ
वो लड़ लेता है हौंसलों पुल वो बुन लेता है
कलम को अपनी तज देता है
क्रांती की राहों में वो अब दिखता है
कवी दिल होता ही ऐसा

भूखे की रोटी बन जाता है
आँखों से गिरे मोती बन जाता है
सर्दी में ठिठुर गर्मी में उमस
बरसात के संग वो बरस जाता है
कवी दिल होता ही ऐसा

खेल में खुद खेल बन जात है
बच्चों के संग बच्चा हो जाता है
आपनो संग कभी अकेला वो
गैरों दुःख मै वो खो जाता है
कवी दिल होता ही ऐसा

पेज और कलम का मेल है
चलती उसकी कल्पनाओं की रेल है
अच्छा लगे या बुरा कविता आप को
आपकी टिपण्णी से भरता उसका पेट है
कवी दिल होता ही ऐसा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
बस कलम तू साथ रहे

सांस जब तक तू साथ रहे
जान तू जब तक मेर पास रहे
हे ... कलम बस तू इस हाथ रहे
मै राहों या ना रहूँ

कोई साथ रहे ना रहे
कलम तू हरदम साथ रहे
खाली पन्नो पर तेरा उपकार रहे
मै राहों या ना रहूँ

कल्पनाओं की सागर को
तू यूँ ही हरपल साकार करे
दिल में तू सदा वास करे
मै राहों या ना रहूँ

जन्मों फिर इस धरा पर गर मै
तेरा मुझ पर तब भी अधिकार रहे
लिख दूंगा जो अब तक ना लिख सका
मै राहों या ना रहूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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