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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी Tuesdayज्ञान सूरज   

घर में ही ......
हिंदी और इंग्लिश की तकरार में 
मेरी खो गई पहचान जी
कल तक मै बोलता था महान जी 
बेटा बोलने लगा... डैड देट इस कूल जी 

रस्ते में चला..... 
ना देखा ऐसा भी कोई स्थान जी 
ना ही कोई ऐसा कोई स्टेट जी 
लड़ते ना वो एक दुसरे को 
जैसे सास बहु की हो भेंट जी 

रहा में बैठे होये..... 
फकीर की कटोरी में मैंने 
जब डाला १० रुपये का नोट जी 
तब लगी ठेस  उस के उस हार्ट को 
उस ने कहा डॉलर नहीं पास जी

जब दूर निकल गया ......
टहलते टहलते जब मै दूर निकल गया
एक  ट्रीरी के नीचे बैठ कर रेस्ट किया
सुस्ता सुस्ता के सीलीप कीया 
ड्रीम में उन दोनों को फिर साथ किया

समझ जब आया ......
जब समझ आया तो मै हो गया लेट जी 
लेट लेटकर सारा जीवन चला गया वेस्ट जी 
ईस्ट और वेस्ट बस इतना ही फर्क 
ज्ञान सूरज उगता यंहा ढलता उस देश जी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी July 21प्रयास

ऐसे ना हालत
बस एक वो प्रयास
श्रम की
उस उद्यम की

कोशिश
की थी वो बात
सुझाव
हमेशा अपने साथ

चेष्टा की उसने
और परिहास
तजवीज़ ना दे
ना बैठ उदास

प्रयत्न ही
अब सफल बनायेगा
नाकामी अब
जीना सिखायेगी

प्रस्ताव है
अब मेरे पास
कब होगी
अब तेरी शुरवात

बस एक प्रयास !!!!!!

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी July 21जगदीश बकरोला जी 

बकरोला जी 
क्ख्क बगणा ये रौंला 
अच्कल  क्वी नीच ये घोरा 
बकरोला जी 
क्ख्क कंन बगणा ये रौंला  ...........

बकरोला जी 
खोल्या रैग्या म्यारू मुल्का
बिस्याँ रैग्याई म्यारा मुल्की 
बकरोला जी 
क्ख्क कंन  बिस्याँ रै म्यार मुल्की   ...........

बकरोला जी 
छोड़ छाडी की ये देश 
ये परदेश कंन खिलणी ये बुरंस 
बकरोला जी 
क्ख्क कंन खिलणी ये बुरंस   ...........

बकरोला जी 
कैल गढ़देश मा खेंचा 
मेट माटी की ई रेघा   
बकरोला जी 
कैल कंन खींची ये रेघा    ...........

बकरोला जी 
खुद बड़ी वों की खुंदाद
याद  ई पल्या सड़की दौड़ी की जंद
बकरोला जी 
क्ख्क किलै वोंकी खुद खुंदाद

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी 11 hours agoये कैसा कांग्रेस

अपने मियां मीठू
बोल रहे सब विठो विठो
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

कोई खिलाये भर पेट अन्न
पांच या बारा रूपये साथ में
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

रशीद मसूद से राजबब्बर तक
कैसे झूठ बोलते हैं किस तर्क पर
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

कभी ३२ कभी ३३ रूपये में ये पेट
एक रुपये में भर सकते हैं
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

क्या बतलाना चाहते हैं
क्या जुठलाना चाहते हैं
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

गरीबी का मजाक
इन उड़ाते बयानों की भेंट
कंहा का ये जन और
ये कैसा कांग्रेस ...........

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी  हम और तुम 

कुछ मेरी सुनो 
कुछ  तुम अपनी करो 
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  l

मै कांटे चुनों
तुम गुल सी मिलती रहो 
अपना मधुबन खिल जायेगा
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  l

नदी के छोर है हम 
एक दूजे की ओर हैं हम 
कल कल संग संग यूँ बहते चलो 
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  l

मै बादल हूँ 
तुम मेरा आकाश हो   
संग तुम्हरे मै उड़ता फिरूं
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  l

रित हो तुम 
मेरी प्रीत हो तुम 
इस जीवन का संगीत हो तुम
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  l

कुछ मेरी सुनो 
कुछ  तुम अपनी करो 
ये जीवन 
यूँ ही चला जायेगा  ल

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी Thursdayआँखों से

आँखों से
गिरे है
गिरे दो आंसूं
राह तुम्हरी जौ रहे
गिरे अब
गिरे तब
वो चौमासा
बहे जा रहे हैं
रुकते नही
ना थमते है
बैरंग से वो
लुढक जाते हैं
आँखों से
गिरे है
गिरे दो आंसूं

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी Thursdayटक्कों थे

ना उड़ा ना उड़ा दीदा
यों टक्कों थे ,इन वों अप्ड़ों थे
वोंका सुप्नियों थे
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

जमा राला काम त आला
इन फूंके की
ते थै क्या मिळाल
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

ध्याड़ी कैकी
और्री खैरी खाकी
बोउ णी ईं टक्कों थे कमै
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

भूका तेरा नौना नौनी
भूकी तेरी कुटुम दरी
बोउ क्ख्क भाते लाली कंन भूक मिटा ली
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

तास खेल की
जुआ मा हारी की
तुंड होकी बोउ थे मारीकी
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

ना उड़ा ना उड़ा दीदा
यों टक्कों थे ,इन वों अप्ड़ों थे
वोंका सुप्नियों थे
ना उड़ा ना उड़ा दीदा .............

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी Thursdayएक श्रद्धांजली
शहीद श्रीदेव सुमन बडोनी

फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ
जों देश ,गढ़ का खातिर
अपरी आहुति दै दीनी
फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ .....

आज कू वो दिन थे
आज कू बार
हम थै छोड़ गैनी
सुमन जी कै घार
फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ .........

२९ बरसा की उमरी
कै कै यत्ना सै
राजशाही विरोध मा
अल्पआयु  ही गै
फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ ..........

आंखी डबडबानी चा
जिकोडी रूणी जाणी चा
ते जनी अब मात भगत
फिर कब ये भूमी जमै
फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ ............

श्रद्धांजली देणा व्हाला
अच हाथ भुत उठाला
वोंका बाटा मा हिटना वाला
आच तू क्ख्क लूके
फिर खुद ऐ वोंकी
फिर खुद ऐ .....

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी Thursday५४ प्रकार भोज

आलू टमाटर
अदरक लहसुन
प्याज की वो गाने लगे धुन
सुन सुनकर मेरी धुनें
श्रीमती,बाजार जाओ
ज़रा आओं तुम घुम 

कुछ और नही तुम्हे है लाना
रोजमरा की चीजे बस तीन
मिर्ची हरा पुदीना चुन
धनीया लाना थोड़ा बुन
लेखन से ले  कर छुटी
छुटू को लेकर स्कूटी

पहुंचा गये बाजार हम जी
देख कर वंहा का हाल
टमाटर के जैसे हो गये गाल
कीमतों ने पसीना निकला
बटवे ने सीना निकला

दुबके पिचके बटवे का हाल
छुटू को ले हाथों में थम
स्कूटी भूल वंहा बाजार
बिन खरीदरी घर लौटे हम 
रहा गयी सारी हेकड़ी गुम

गुमनाम मै बाजार घूम
सपने को नही अपने को चुन
लेखनी ही मुझे आती है
असली घर तुम ही चलाती हो

दल नही रोटी नही
कभी तो तुम भूखे ही सो जाती हो
कभी कभी पानी से ही
तुम अपनी भूख मिटाती हो
नमक को जीव्हा पर लगाकर
५४ प्रकार भोज सुख पाती हो
 
एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी Wednesdayपत्तों को हिलना था

पत्तों को हिलना था
हिलकर उन्हें गिरना था
पत्तों को हिलना था ...................

किस्मत की  रेखा दबी 
मिलकर ,बिछड़ना था
पत्तों को हिलना था ...................

तन्हा सफर  तन्हा मंजील
अगंतुक, चलते चलना था
पत्तों को हिलना था ...................

निशान छूटे कंही पहचान छूटी
तकदीर, कदम कदम पर टूटी-फूटी
पत्तों को हिलना था ...................

रूठी रही वो उड़ते रहे
रूखे सूखे पत्ते उन्हें उड़ना था
पत्तों को हिलना था ...................

पत्तों को हिलना था
हिलकर उन्हें गिरना था
पत्तों को हिलना था ...................

एक उत्तराखंडी

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