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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बालकृष्ण डी ध्यानी
February 1 at 9:51pm ·
अब थोड़ी देर में
अब थोड़ी देर में ये रात तो सर जायेगी
उजाला करने मन को वो सूरज आयेगा
अब थोड़ी देर में -------------
वक्त लगेगा मन को पर वो संभल जायेगा
एक किरण ऐसी तो होगी जो उसे छू जायेगी
अब थोड़ी देर में -------------
वो कसीस वो जादू पल भर में छा जायेगा
जिंदगी का मतलब जब खुद में पा जायेगा
अब थोड़ी देर में -------------
बस तेरी और थोड़ी कोशिश खुद को पाने की
अब ना होगी देर तुझको खुद को आजमाने की
अब थोड़ी देर में -------------
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जब मन ही सोया रहा
जब मन ही सोया रहा
अब हम जगकर क्या करेंगे
जब मन ही सोया रहा
ना बातें की कभी खुद से
ना सवाल उठाये कभी खुद पर
रंग रोपण हमने हम पर खूब किया
जब जाना है हमे उसे तजकर
आत्मा ही परमात्मा है
हम सब ये खूब जानते हैं
फिर भी मोह माया में पड़कर
कब उसे हम प्रेम से पुकारते हैं
जो कुछ किया तू ने यंहा
वो आयेगा तेरे पास खुद चलकर
जाना ना पडेगा तब दूर तुझको
जब वो पूछेगा सवाल तुझ से
जब मन ही सोया रहा ..................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अपने हात में क्या रह जाता है
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
सुख की खोज में ये अब जीवन
अचानक समाप्त हो जाता है
नश्वर आत्म से प्रेम ना करने के बदले
नाश होने वाली चीजों से वो अब प्रेम करता है
असीम सुख शांति जंहा मिलने वाली होती है
इस जीवन में आते ही उस द्वार को बंद कर देता है
भागता रहता है उसका वो मन दिन रात
एक पल भी ना सुख चैन तब उसको मिलता है
असीम भौतिक दौलत कमा कर वो प्राणी
बता दो एक दिन भी सुख की नींद सो पाता है
अपनी आत्म से प्रेम करो वो तेर अस्तित्व है
वो ही रहा दिखायेगी तुझको उसको प्रकाशमान करो
सही अर्थ तुझे जीवन का वो तब तुझे दिखायेगी
भौतिक सुखों त्यागना वो परम आनंद दिलाएगी
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
बालकृष्ण डी ध्यानी
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पीछे छूटे कदम
पीछे छूटे कदम
अब भी बातें करते हैं मुझ से
रोजना यूँ ही अब भी
मुलाकातें करते हैं मुझ से
इन आँखों को
वो भीगा जाते हैं
किसी की याद
मुझे दिला जाते हैं
दो पल में स्तब्ध
अपने में रह जाता हूँ मैं
अपनी परछाई से
तब क्या पाता हूँ मैं
वो अकेला पन
वो मायूसी मेरी
वो मुसफ़िर का मन
वो ही चोला तन-बदन
वो मेरे
पीछे छूटे कदम
ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रात की ये रौशनी
रात की ये रौशनी
मध्यम मंजुल है ये रागिनी
बज रही है छम छम
हिर्दय की ये मेरी गामिनी
आँखें बंद कर पकड़ ले
धुँधली सी जो फैली रौशनी
ये कह कर कल हमें छोड़ गयी
आऊँगी फिर आज मोड़ कर
दिख नहीं रहा अगर तुझे
आँखों को आँखों से हम बदल दें
हाँ थोड़े अब साये उभर रहे
रौशनी की धार अपनी तेज़ कर
ये रौशनी हक़ीक़त है
या बस एक सुंदर सा छलावा
कैसे मै इस पे ऐतबार करूँ
कैसे उसे मै अपने पास करूँ
रात की ये रौशनी ...............
बालकृष्ण डी ध्यानी
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देख बटवे की धार
देख बटवे की धार
सुन क्रेडिट कार्डों ,नोटों की झंकार
बस इस से ही मुझे प्यार
बस इस से ही सबको प्यार
ना जात है ना पात है
बस इसमें ही वो बात है
यही दिन यही धर्म है
जब तक वो मेरे साथ है
जब तक ये साथ चले
सब कुछ मेरे आस पास है
क्या आपने हैं क्या पराये हैं
सब के लिये ये ख़ास है
जिस दिन इसने साथ छोड़ा
कोई ना तब मेरे आस पास है
हूँ अकेला आज कल मैं
पर अब भी सब उसके साथ हैं
बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 5 at 2:17pm ·
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
मुझे सताती हैं रुलाती हैं हंसाती हैं
अभी भी मुझे अपने साथ वो ले जाती हैं
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
कुछ गम के अल्फाज़ हैं
कुछ छूटे कुछ अब भी साथ हैं
कुछ रूठे से जज़्बात थे
कुछ भूले कुछ अब भी याद थे
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
वो दिन जो बीत गये
जिंदगी से वो बहुत दूर गये
फिर क्यों यादों में छाये रहते हैं
क्यों मेरी अनुभूतियाँ में जगे रहते हैं
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
माना यादों की उम्र नहीं होती
अब भी वहीँ है वो आगे नहीं बढ़ती
एक ठहराव सी खड़ी रहती वो उम्रभर
बीते लम्हों में ही वो गुजरती है
अभी भी मेरी बीती यादें
अभी भी मेरी बीती यादें
बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 5 at 11:25am ·
टूटकर बिखरना आता है
टूटकर बिखरना आता है
हमको तो बस अब ऐसे ही जीना आता है
बूदें बरसातों की गिरती है धरा पे जैसे
चूमती है इस जमीं को अपने अधरों में वो जैसे
आलिंगन लेती है वो लहक तब आ के मचल जाती है
हमको भी वैसे ही देखो अब मचलना आता है
टूटकर बिखरना आता है
हमको तो बस अब ऐसे ही जीना आता है
खामोश जब रहता है समा मदहोश हवा कर जाती है
मन के किसी कोने को वो चुपचाप सी छेड़ जाती है
पैरों की आहट किये बिना इस दिल में वो बस जाती है
रोक कर रखे थे जो आँखों में मोती वो एक एक कर टूट जाते हैं
टूटकर बिखरना आता है
हमको तो बस अब ऐसे ही जीना आता है
बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 5 at 9:58am ·
खो गये हैं सब कहीं
खो गये हैं सब कहीं
अपने अपने राग में
है वही है ये जमीं है वही ये आसमान
खो गये हैं सब कहीं .....
खोजते हैं क्या वो अब
अपने इस आस पास में
मिल जायेगा उसको वो इस झूठे एतबार में
खो गये हैं सब कहीं .....
खोज ना सका खुद को वो
भ्रम से भरे इस झूठे कारोबार में
खो गया ऐसा वो उबरना वो दूजी बार में
खो गये हैं सब कहीं .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता प्रेम की
कविता प्रेम की
निश्छल स्नेह की
वो कविता प्रेम की
वो मेरे प्रेम की
बहती जाती है अविरल
वो कल कल हर पल
कविता प्रेम की
वो मेरे प्रेम की
ना संकोच है
ना संदेह है ना कोई भेद है
कविता प्रेम की
वो मेरे प्रेम की
है संगम ना विछेद कोई
अनंत है वो अविनाशी है
कविता प्रेम की
वो मेरे प्रेम की
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