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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देख तू अपनी आदत बदल दे
देख तू अपनी आदत बदल दे
शाम होते ही तू अपने घर को चल दे
बस इतने में मुझे तेरा सहार मिल जायेगा
इस तूफान में मुझे अपना किनारा मिल जायेगा
देख तू अपनी आदत बदल दे
ना लड़खड़ा के यूँ आ देख बात मेरी मान जा
इस शराब ने अब तक कितनो को है पिया
रोक जा तो अब तू ऐसी गलती ना दोहरा
देख अपनों का चेहरा अब तू लौट आ
देख तू अपनी आदत बदल दे
क्या रखा है इसमें जो हमारे प्रेम में नहीं है
मदहोश रहता है अक्सर तू क्यों होश तुझे नहीं है
क्या परवाह नहीं है तुझे तेरे धर्म और कर्म की
क्यों उसको बिगाड़ रहा है क्यों इसको अपना रहा है
देख तू अपनी आदत बदल दे
बस दो पल के इस मजा में जिंदगी भर की सजा है
गिरते पड़ते इन सड़कों पर क्यों बसा तेरा जहां है
राख तू हो जायेगा जरूर तेरे परिवार का तब क्या है
क्यों दे रहा है उन्हें सजा बता क्या उनकी है खता
देख तू अपनी आदत बदल दे
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 27 at 10:21am ·
बेटे को माँ की तरह सोचना चाहिये
बेटी को बाप की तरह बनना चाहिये
तब परिवर्तन निश्चित है समाज में
आप क्या सोचते हैं
ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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बालकृष्ण डी ध्यानी
39 mins ·
कैसे एक हात आशीर्वाद को दूँ और कैसे एक हात लकड़ी को दे दूँ
मुश्किल बड़ी है
ध्यानी
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Jogasingh Kaira
Jogasingh Kaira बिषम परिस्थिति में धैर्य से काम लें
बस । होनहार हमारे हाथ नही।
Like · Reply · 19 mins
Mahi Singh Mehta

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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday at 8:52am ·
अपने हात में क्या रह जाता है
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
सुख की खोज में ये अब जीवन
अचानक समाप्त हो जाता है
नश्वर आत्म से प्रेम ना करने के बदले
नाश होने वाली चीजों से वो अब प्रेम करता है
असीम सुख शांति जंहा मिलने वाली होती है
इस जीवन में आते ही उस द्वार को बंद कर देता है
भागता रहता है उसका वो मन दिन रात
एक पल भी ना सुख चैन तब उसको मिलता है
असीम भौतिक दौलत कमा कर वो प्राणी
बता दो एक दिन भी सुख की नींद सो पाता है
अपनी आत्म से प्रेम करो वो तेर अस्तित्व है
वो ही रहा दिखायेगी तुझको उसको प्रकाशमान करो
सही अर्थ तुझे जीवन का वो तब तुझे दिखायेगी
भौतिक सुखों त्यागना वो परम आनंद दिलाएगी
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
बालकृष्ण डी ध्यानी ॐ हरी ॐ प्यारी भतीजी आप कहीं भी रहो आप को वंहा पर आप को प्रभु द्वारा रचित परमा आनद की प्राप्ति हो ॐ हरी ॐ
Like · Reply · Yesterday at 11:27am
Diwakar Bhatt
Diwakar Bhatt Aapki.baat.sy.ekdam.sahmat.hu.aapko.dukah.ki.ghadi.mai.malik.rahat.dy.yesi.kamna.karta.hu.
Like · Reply · Yesterday at 11:33am

बालकृष्ण डी ध्यानी replied · 1 Reply
रावत अरविन्द
रावत अरविन्द ॐ हरी ॐ
Like · Reply · 21 hrs
Yogambar Rawat
Yogambar Rawat ॐ शांति .
Like · Reply · 15 hrs
Mahi Singh Mehta

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 27 at 4:04pm ·
जबै ये टक्का बी किसा भ्तेक उड़ जांदी
अपरा बी तबैर घुटी पैकी तब सैई जांदी
ध्यानी
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अनूप सिंह रावत and 12 others like this.
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Mahi Singh Mehta

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 27 at 1:54pm ·
बस लाइक किया और आगे की और चल दिये
इसे तो कोई रिश्ता अब मकाम पर पहुँचता नहीं
बाहर बरसात गिर रही अब उमड़ धुमड़ के देखो
घर में बैठे बैठे उन बूंदो में ऐसे कोई भीगता नहीं
ध्यानी
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Mahesh Chandra Joshi and 17 others like this.
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Lakshmi Sharma
Lakshmi Sharma jee apna rasta khud banana parata h to manjil bhi mil h jati h tab good noon
Like · Reply · 1 · January 27 at 6:55pm

बालकृष्ण डी ध्यानी replied · 1 Reply
Madan Mohan
Madan Mohan क्यों कि वर्तमान समय like का है, केवल बूँदों को देख कर ही भीगने का ऑन्नद ले लिया करते हैं । इसी लिये tv. और Pictures आज असरदार हैं ।
Like · Reply · 1 · January 27 at 11:08pm

बालकृष्ण डी ध्यानी replied · 3 Replies
Mahesh Chandra Joshi
Mahesh Chandra Joshi Nice
Like · Reply · 1 · January 28 at 6:28am

बालकृष्ण डी ध्यानी replied · 1 Reply
Jogasingh Kaira
Jogasingh Kaira बहुत सुन्दर बात । बात में दम है । अपनापन अपनापन है सबकुछ
काफी है समझने के लिए ।
Like · Reply · 1 · January 28 at 11:48am

बालकृष्ण डी ध्यानी replied · 1 Reply
Mahi Singh Mehta

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 27 at 10:21am ·
बेटे को माँ की तरह सोचना चाहिये
बेटी को बाप की तरह बनना चाहिये
तब परिवर्तन निश्चित है समाज में
आप क्या सोचते हैं
ध्यानी
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अनूप सिंह रावत and 15 others like this.
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Mahi Singh Mehta

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 27 at 9:54am ·
बस वो ख़याल मेरा था
बस वो ख़याल मेरा था
पर उसका जवाब मगर तुमने दिया
एक पत्थर का एक टुकड़ा था मैं
पर उसको आकार तुमने दिया
बस वो ख़याल मेरा था ....
अकेले में लिखी थी जो मैंने
वो रचना तुम्हारे ही भीड़ ने दी थी
कागज पर जो उतारी थी मैंने
पर उसे साकार तुमने किया
बस वो ख़याल मेरा था ....
मै तू एक पहाड़ों की बहती नदी हूँ
आकर बाँध तुमने मुझ पर लगा दिया
सोच भी ना थोड़ ना समझा आपने
यूँ मुझ पर आपने अपना अधिकार जमा लिया
बस वो ख़याल मेरा था ....
.
बस वो ख़याल मेरा था ...............
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे चाह मैंने
तु ही जमीन मेरी तू ही मेरा आसमान
तू ही दिल मेर तू ही मेरी जां
हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे बस चाह मैंने
लहराते रहे सदा आँचल तेरा
बलखाते रहे सदा ये बादल तेरा
उमड़े मन पे मेरे रहे अधिकार तेरा
मेरे जीवन का राग तू सार मेरा
हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे बस चाह मैंने
तू ही मेर भाग्य तू ही विधाता
तू जन गण मन तू ही अधिनायक मेरा
तू ही राष्ट्र मेरा तू ही राष्ट्र-गीत मेरा
अशोक की लाट पर तू तिरंगा मेरा
हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे बस चाह मैंने
तू ही अहिंसा तू ही शांति मार्ग
तू ही गागर है तू ही मेरा सागर
तू है मेरे शीश पर तो मैं हूँ
तू ही तो मेरा सदा सर्वदा
हर पल तुझे देखा करों
हर पल तुझे बस चाह मैंने
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बेफिक्री सी है ये जिंदगी
बेफिक्री सी है ये जिंदगी
सच में पता नहीं मुझे
.. क्या अपना है क्या है पराया
समझ नहीं आता मुझे
किस हिस्से में क्या हमने पाया
बाँट कर रखा है इसे
यंहा पर कई सदियों से
बचपन जवानी और बुढ़ापे की कड़ियों से
अब तू ही बता दे मुझे समझा दे
क्या हिस्सा है तेरा क्या है मेरा
एक कमरा है उसकी चार दिवारी
एक खिड़की एक रोशनदान
एक लाईट है वो आती जाती सी
कुछ साये वहां घूमते मिलेंगे
खुद से वो बुदबुदाते मिलेंगे
समय चलता चला जायेगा
बस उसी चार दिवारी में
बेफिक्री सी है ये जिंदगी
सच में पता नहीं मुझे
.. क्या अपना है क्या है पराया
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जब मन ही सोया रहा
जब मन ही सोया रहा
अब हम जगकर क्या करेंगे
जब मन ही सोया रहा
ना बातें की कभी खुद से
ना सवाल उठाये कभी खुद पर
रंग रोपण हमने हम पर खूब किया
जब जाना है हमे उसे तजकर
आत्मा ही परमात्मा है
हम सब ये खूब जानते हैं
फिर भी मोह माया में पड़कर
कब उसे हम प्रेम से पुकारते हैं
जो कुछ किया तू ने यंहा
वो आयेगा तेरे पास खुद चलकर
जाना ना पडेगा तब दूर तुझको
जब वो पूछेगा सवाल तुझ से
जब मन ही सोया रहा ..................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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अपने हात में क्या रह जाता है
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
सुख की खोज में ये अब जीवन
अचानक समाप्त हो जाता है
नश्वर आत्म से प्रेम ना करने के बदले
नाश होने वाली चीजों से वो अब प्रेम करता है
असीम सुख शांति जंहा मिलने वाली होती है
इस जीवन में आते ही उस द्वार को बंद कर देता है
भागता रहता है उसका वो मन दिन रात
एक पल भी ना सुख चैन तब उसको मिलता है
असीम भौतिक दौलत कमा कर वो प्राणी
बता दो एक दिन भी सुख की नींद सो पाता है
अपनी आत्म से प्रेम करो वो तेर अस्तित्व है
वो ही रहा दिखायेगी तुझको उसको प्रकाशमान करो
सही अर्थ तुझे जीवन का वो तब तुझे दिखायेगी
भौतिक सुखों त्यागना वो परम आनंद दिलाएगी
अपने हात में क्या रह जाता है
बस वो तो खाली रह जाता है
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देख तू अपनी आदत बदल दे
देख तू अपनी आदत बदल दे
शाम होते ही तू अपने घर को चल दे
बस इतने में मुझे तेरा सहार मिल जायेगा
इस तूफान में मुझे अपना किनारा मिल जायेगा
देख तू अपनी आदत बदल दे
ना लड़खड़ा के यूँ आ देख बात मेरी मान जा
इस शराब ने अब तक कितनो को है पिया
रोक जा तो अब तू ऐसी गलती ना दोहरा
देख अपनों का चेहरा अब तू लौट आ
देख तू अपनी आदत बदल दे
क्या रखा है इसमें जो हमारे प्रेम में नहीं है
मदहोश रहता है अक्सर तू क्यों होश तुझे नहीं है
क्या परवाह नहीं है तुझे तेरे धर्म और कर्म की
क्यों उसको बिगाड़ रहा है क्यों इसको अपना रहा है
देख तू अपनी आदत बदल दे
बस दो पल के इस मजा में जिंदगी भर की सजा है
गिरते पड़ते इन सड़कों पर क्यों बसा तेरा जहां है
राख तू हो जायेगा जरूर तेरे परिवार का तब क्या है
क्यों दे रहा है उन्हें सजा बता क्या उनकी है खता
देख तू अपनी आदत बदल दे
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पीछे छूटे कदम
पीछे छूटे कदम
अब भी बातें करते हैं मुझ से
रोजना यूँ ही अब भी
मुलाकातें करते हैं मुझ से
इन आँखों को
वो भीगा जाते हैं
किसी की याद
मुझे दिला जाते हैं
दो पल में स्तब्ध
अपने में रह जाता हूँ मैं
अपनी परछाई से
तब क्या पाता हूँ मैं
वो अकेला पन
वो मायूसी मेरी
वो मुसफ़िर का मन
वो ही चोला तन-बदन
वो मेरे
पीछे छूटे कदम
ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
13 hrs ·
मेरे रोने पे किसी को भी देखो रोना ना आया
मेरे रोने पे किसी को भी देखो रोना ना आया
आंसू निकले मगर उसे मुझे रोकना ना आया
बढ़ती गयी वो मुश्किलें उसे ऐसे मेरे ढोने से
उस कोने को मुझे देखो साफ़ करना ना आया
बहती रही वो वेदना की नदी यूँ ही मेरे जीवनभर
आखिर तक मुझे वो समंदर का किनार ना मिला
एक चीज थी वो खोयी रही मुझसे उम्रभर
बदलना था सोच को मगर मुझे बदलना ना आया
मेरे रोने पे किसी को भी देखो रोना ना आया .......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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