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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Tota Ram Dhaundiyal
August 26 ·

हरि ॐ ! सरस्वत्यै नमः !
जन्मदिन
दान इन छै' नी कमयां म्यारा, लोग मनै' मेरो जन्मदिन
किद्वलो बि कनू गुरौ की सैर, अपणु मुंड अफ्वी मुण्डण मिन !

गवया, बजया, नचया अफ्वी, या बी क्या पुलमैं चा ?
हौरि मनैं जनम, मरण, वा ही भलि अदिमैं चा !

जनम दिन वी सार्थक चा, सुसमाज स्वीकरणू हो !
मिल्दि सुप्रेरणा जैसे हो, सुबाटु जैसे मिलणू' हो !

जनम दिन मा ल्यखण चैन्दन, नखा, भला लेखा जोखा !
कतनूं पर मिन लगै उकेर, कतनूं थैं दे धोखा ?

क्य ख्वा ? क्य पा ? मिन आजतक ? अगनैं भलो कै सक्दु अबा
समाज स्वीकारलो कै रूपम् ? छाळ छाँ ट होलो जबा !

हिसाब-किताब ज्वड़ण चैन्द, कतनूं दे मिन लत्ता, गफ्फा ?
आत्मचिंतन करण करण चैन्द, कतनूं थैं दे ट्वट्टा, नफ्फा ?

कतनूं दे मिन लाड-प्यार ? कतनूं कै अपमान ?
कतनूं ख़ै च्छुचगार अर कतनूं दे सम्मान ?

लोकहित मा उपलब्धि क्या ? या जानबर सी जियूं मीं ?
संकल्प सुधरणूं अब्बि लीण, कतनां साला$ ह्वैग्युं मीं ?

सुप्रेरक रौं या सुप्रेरणा बणूं ? संकल्प सुमरणा आजा$ दिन !
उपदेशक रौं या उदाहरण बणूं ? समीक्षा तिथि चा जन्मदिन !

"द्यू" अखण्ड दिवळी सी बाळी, प्राणदाता की पूजा कन्नी !
कृति अमर क्वी मीं से हुँयां, दुर्बा मांगण "ॐ" से कन्नी !

समाज हितौ आदर्श काम, एक त; आज कन्नी चैन्दा !
चराचरार्थ समळोण्याँ क्वी, पौध एक ता; रव् पणी चैन्दा !

मङ्गळेर:- तोताराम ढौंडियाल 'जिज्ञासु'
बुवार, 12 अगस्त, 2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उत्तराखंड मेरा

उत्तराखंड मेरा उत्तराखंड मेरा
अभिमान मेरा स्वाभिमान मेरा

कुमाऊंनी-गढ़वाली भाषा मेरी
मस्तक पर देश के प्रेम की वो रेखा

हिमालय पहाड़ों की ये श्रेणीयाँ
पहाड़ी सीने में बजती है वो वीणा

पराक्रम की ये भूमि मेरी
शूरवीर की नहीं है यंहा कमी

माधव भंड़री का इतिहास बोलता है
चन्द्रसिंह गढ़वाली चंदा बन डोलता है

सुनते हैं रमी बहूरानी की हम गाथा
कितने सर झुकते हैं बद्री-केदार के द्वार

जाती धर्म यंहा पर अनेक हैं
रहते हैं बन के सदा हम एक यंहा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरु शरील नखरू हो,
त कवी बात निछ,
मोबाइल मेरु राजि ख़ुशी चैंदु,
यु मेरु ज्यु पराण छ,
येका बिना नि रयेंदु अब मैसि,
चौक मा नि रखि भैंसी____

-तुमारू भैजि कवि जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
17.१०.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चिफळि ढुंगी मा.....

जिंदगी यनि लगणि,
बैठ्युं छौं जन मैं,
कब रड़ि जौ,
जन चिफळि ढुंगी मा.....हिंट आप सब्‍यौं का खातिर।

मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा अपणा मन की बात बतावा कुछ लैन कविता की बणैक। गढ़वाळि भाषा का प्रति आपकु प्रेम भी झलकलु अनुभूति का माध्‍यम सी।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 7.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नि बिसरलो नि बिसरलो

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कन बिसरलो कन बिसरलो
मातृ जननी को लाज मेरु खंड

कैल बिसरण देन कैल बिसरण देन
निर्दोष मनखी पर ये अत्त्याचार

ऐग्याई ऐग्याई फिर कलो दिन
जिकडो च सबकु खिन -भिन

नई चेनु हम थे तुमरी शोक सभा
मुलायम मायवती थे तू दिला सजा

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कविता: बालकृष्ण डी ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आँखी नी बोली
कनुडी नी सुणी
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

माया संभाली
धेरी बस तै थै ही
ऐ मेरा गेल्या
तू ना जा मै छोडी...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

बिंदी दमकैली
चूड़ी खनकैली
खुठी की पैजनी
जब तू छमकैली...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

बैठ्युंच यख
हेरादा बाटों का फेरा
ऐ मेरा गेल्या
तू ऐजा दोउड़ी....२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

साभार: अज्ञात

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वेगे
गों खोलों की मेलों की दीदों
याद छक्वै यैगे
चौंड भौन गैणाडांड
खुब रौनक अयीं होली
दुर दुर बिटी अयीं दीदी भूली
आपस मा भिट्याणा होली
नन तिना भी आज
खुश हुयां ह्वाल
कुई पुयीं वालु गुब्बारा
कुई डमरु बजांणा ह्वाल
सरा मणिकुट आज
स्वर्ग बण्यूं ह्वाल
देबी दयवता म्यार जख
परगट हुयां ह्वाल
यैथर यैथर चलणी होली
मां चौंडेस्वरी की डोली
म्याला मा अयीं होली दीदी भूली
अर नयी नयी ब्योंली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों याद छक्वै यैगे
गरमा गरम जलेबीयुं की
रस्यांण अयीं होली
चुडी कांडी अर चुंट्यूं की
दुकान सजीं होली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों छक्वै.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लिख्वार सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मै भी चान्दू ( बाल कविता)

मै भी चान्दू वीर चन्द्रसिंह,
गढ़वाली जन वीर बणों मी |
मैं भी चान्दू भड़ माधोसिंह ,
भण्डारी जन धीर बणों मी |
बीर गबरसिंह का जन बणिकी ,
सैरि दुन्या मा धाक जमौं मी |
जसवन्तसिंह गोर्ला सी बणिकी ,
बैर्यूं की मुण्डळी छनकौं मी ||

कालू मेहरा जन बणिकी सब्बि ,
मनख्यों तैं एकमुट्ठ कैद्यों मी |
श्रीदेव सुमन सी बणिकी ,
हक का बाना मरि मिटि जौं मी |
वीर केशरीचन्द जन बणिकी ,
जल्मभूमि कु प्राण देद्यों मी |
जयानन्द भारती जन बणिकी ,
सैरि कुप्रथाओं तैं मिटौं मी ||

तीलू रौतेली सी बणिकी ,
बैर्यों कू निर्बिजु कैद्यों मी ||
राणी कर्णावती सि बणिकी,
बैर्यों क नकप्वड़ा कन्दूड़ कटूँ मी |
पतिवर्ता रामी जन बणिकी ,
अपणूँ मनखी धर्म निभौं मी |
गौरी देबी जन बणिकी यों,
डाळी बोट्यों पर चिपकू मी ||

हे प्रभो तुमसे छ या अर्ज ,
मैतैं इतगा शक्ति देद्यो ||
मातृभूमि पर का काम ऐजौं मी ,
सुफल यु म्यारू जीवन कैद्यो ||

सर्वाधिकार सुरक्षित -:

धर्मेन्द्र नेगी
ग्राम चुरानी, रिखनीखाळ,
पौड़ी गढ़वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नये बसंत बुरांश सि
May 16, 2012 at 10:18pm

तुम

का लेज

  मे आइ हो

                        नये   बसंत बुरांश  सि

तुम हो फ्रासेर  स्टुडेंट  फर्स्ट इयरकी

तुम  पे लियर  चड़ी है नय जवानी की

अरे नये नौजवान तो अजमाना चाते है  अपनी किस्मत

तुम से इश्क लड़ाने के ली ये नये नये  फोरुमुले  खोज राय है

अरे बुढे अदैर   प्रोफसिर लाक्चेरार 

   अपनी  किस्मत को रो  रय है

बीमार कर ने के लिये अशिकको को जब हुसून की ये बीमारी पैदा हुई

अरे उस दउओर   काल  मे ये एक्स्पीरे  डेट हुवे

क्या जूनियर क्या  सीनियर सब

धयेक  रय है  इस  हुसून की जवानी की फिगर   .

                                                                कविता  शैलेन्द्र जोशी