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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
October 20 at 8:09am ·

तेरी छुयाल बतु मा
अल्झी ग्यु मी भि छोरी
तोडू तक त धागु छुयु कु अब कनु
तेरी छुयी खट्टी मीठी
तेरी चिफ्ली माया छुयों स्वाद यनु
रडदी ग्यो तेरी छुयो ..................................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Sudesh Bhatt 

रावण तु आज बल
जग जगा फूंक्यांणा होली
परबात फिर कखी न कखी
टुपली पैरीक पैदा ह्वे जैली
कु मारी सकदु दीदा त्वै
बाहुबली मनखी तै
परबात भ्रष्टाचार बणी की
तु फिर पैदा ह्वै जैली
पैली त्यार खुंटा पन रैन
चांद सुरज अर काल
आज त भ्रष्टाचारयुं की कुटुमदारी
तीन तंदयल पर सी बांधी याल
तीन त लंका ही बण्या सुन की
यख त स्वीस बैंक भरै गेन
तेरी जन दस दस लंका
भग्यानु जगजगा बणै देन
शरेल ही मरी त्यारु हे रावण
आत्मा त भटकणा ही च
महंगाई अर भ्रष्टाचार बणीक
मार मार कैकी द्वास लगीं च
कलयुग मा तु हे दशानन
एक ही मुंड लेकी यैयी
कखी मंहगाई भ्रष्टाचारी
कखी घोटाला कैरी ग्यैयी
हाहाहाहा कैकी दादा
तु आज खुब हैंसणा होली
नयी नयी घोटालों की
भीतरी भीतर प्लान बणांणा होली
अरे कु मारी सकदु त्वै
अजर अमर अभिमानी तै
गबन घोटालों की फाईलों मा
जगजगा समयुं छै
अरे झुगली टुपली जाली तेरी
हपार कांड की डाल्यूं मा
कैन ब्वाल तु मरी गे
परगट हुयुं छै भ्रष्टाचार्युं मा
त्वै भ्रष्टाचारी तै मरन कुन
यख कती राम पैदा ह्वैन
जौंन हम मनख्यूं तै ठगे की
अपण निजि स्वार्थ सधेन
तु त जब तक ज्युंदी रै
रावण ही बणी क रैयी
हमर छंटयां राम भी तीन
रावण बणै देन
त्वै तै चिंता छै फिकर छै
अपणी पुरी लंका की
यख त भ्रष्टाचार्युं न देश कु
जमा लुट्या डुबई याली
त्वै कुन हाथ जोडी
बिनती करदु
दीवु धुपंण अर
उठंण गडदु
बोल क्या चयांणा त्वैतै
मी बीजा त्यार बणवे द्यांदु
जर्मन जपान चीन फ्रांस क त्वैै
पैकेज दिलै द्यांदु
त्यार जांण से देश फिर
सुन की चकुली बणी जाली
रोट भेंट की पुजा त्वै
बराबर दियांणा राली
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिस माटी मे जन्मे मेरे
बीर चंद्र गढवाली
जिस माटी मे जन्मी हो
बेटी तीलु रौतेली
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जिस माटी मै खेल कुद कर
जन्मे जहां बीर कप्पु चौहान
दुश्मनों के छक्के छुडाने जहां
पैदा हुये यशवंत और गब्बर जवान
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जिस माटी की हरेक शिला मे
देवों के दर्शन होते हैं
निर्मल अविरल धारा के रुप मे
जहां मां गंगा के दर्शन होते हैं
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जहां पंख्या दादा की गौरव गाथा
पुरे पहाड का मान बढाती है
पतिब्रतता पालन करती
जहां जंन्मी रामी बौराणी है
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
ईस माटी का फूल होने पर
खुद भी गौरव करता हुं
उस माटी को कोटी कोटी
नित रोज नमन मैं करता हुं

सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वेगे
गों खोलों की मेलों की दीदों
याद छक्वै यैगे
चौंड भौन गैणाडांड
खुब रौनक अयीं होली
दुर दुर बिटी अयीं दीदी भूली
आपस मा भिट्याणा होली
नन तिना भी आज
खुश हुयां ह्वाल
कुई पुयीं वालु गुब्बारा
कुई डमरु बजांणा ह्वाल
सरा मणिकुट आज
स्वर्ग बण्यूं ह्वाल
देबी दयवता म्यार जख
परगट हुयां ह्वाल
यैथर यैथर चलणी होली
मां चौंडेस्वरी की डोली
म्याला मा अयीं होली दीदी भूली
अर नयी नयी ब्योंली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों याद छक्वै यैगे
गरमा गरम जलेबीयुं की
रस्यांण अयीं होली
चुडी कांडी अर चुंट्यूं की
दुकान सजीं होली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों छक्वै.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लिख्वार सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



आज बग्‍त यनु ऐगि,
हमारु पहाड़ भारी ऊदास,
घौ हमारा हि दिन्‍यां छन,
तौ भी वेका मन मा आस......

हमारा पित्रुन प्‍यारा पहाड़ कू,
हातु सी श्रृंगार करि,
स्‍वर्ग मा छन आज ऊ,
हम्‍न कुछ भि नि करि......

सोचा मन मा अपणा दगड़यौं,
पहाड़ प्‍यारु घैल छ,
हम निपल्‍टदा परदेशु मा,
मन मा हमारा मैल छ.....

जल्‍मभूमि त्‍यागि दगड़यौं,
घर कूड़ी बांजा डाळिक,
नौट कमै नौट्याळ बणिक,
क्‍या पाई मन मारिक.....

देब्‍ता दोष लगला जब,
तब्‍त अपणा मुल्‍क जैल्‍या,
रखा रिस्‍ता गौं मुल्‍क सी,
तख की सब्‍बि धाणि पैल्‍या....

बिंगणा नि छौं आज हम,
मन सी भौत पछतौला,
अक्‍ल आलि हम्‍तैं तब,
जब घर घाट का नि रौला....

जल्‍मभूमि मां हमारी,
चला हे दगड़्यौं पहाड़ जौला,
तख सब्‍बि धाणि ह्वै सकदु,
जिंदगी सुख सी बितौला......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु, सर्वाधिकार सुरक्षित, दिनांक 24.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 उत्‍तराखण्‍ड....


भारी रौंत्‍याळु हमारु,
उत्‍तराखण्‍ड छ,
ऊंचा डांडौं मा,
बांज बुरांस का बण मा,
बथौं अर ठण्‍ड छ.....

ज्‍यु पराण सी प्‍यारु,
हमारु उत्‍तराखण्‍ड छ,
जैकी सुंदरता फर हम्‍तैं,
भारी घमण्‍ड छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 17.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 पांच भै कठैत......
श्रीनगर मा जबरि,
जियाजीकनकदेई कू,
राणी राज थौ,
सादर सिंग कठैत का,
पांच बलशाली नौना,
भगोत सिंग, राम सिंग,
उदोत सिंह, सब्‍बल सिंग,
सुजान सिंग सब्‍बि अपणि,
कठैत गर्दी चलौन्‍दा था,
जौन प्रजा फर मुंडकरा लगाई,
जब राज परिवार मा क्‍वी,
स्‍वर्गवासी होन्‍दु थौ,
जू वेकु मुंड नि मुडौन्‍दु थौ,
तब मुंडकरा देन्‍दु थौ,
कठैतुन मुंडकरा उगाई,
राजकोष मा जमा न करैक,
अफु हि हत्‍याई......

कठैतुन पुरिया नैथाणी कू जवैं,
शंकर डोभाळ हाथी मू मराई,
भगोत सिंग न डोभाळ की लाश,
सैडा श्रीनगर मा घुमाई,
सोचि थौ पुरिया तैं गुस्‍सा आलु,
पर पुरिया नैथाणी जिन,
वे हाथी का महावत तैं,
इक्‍यावान कळ्दार दीक,
वे पिठैं लगाइ्र,
अर अति खुशी जताई,
बोलि भाण्‍जा भगोत सिंग न,
शंकर डोभाळ जी तैं मरैक,
भौत भलु काम करि.......

वेका बाद वजीर भगोत सिंग न,
पुरिया नैथाणी बुलाई,
पुरियाजिन पांच रुप्‍या मुछ्याळि,
एक सौ एक रुप्‍या नजर भेंट करि,
तब भगोत सिंग भारी खुश ह्वै,
अपणु जरवफ्त निकाळिक,
पुरिया का गौळा मा डाळी,
शौल भी प्‍यार सी ओढाई,
पुरिया आज बिटि तू मेरु मामा,
वे फर भारी भरोंसु जताई,
कुछ समय बाद,
भगोत सिंग न पुरिया तैं बताई,
तू चांद पुर बधाण का,
खस्‍यौं, बड़ घुत्‍या अर,
ऊंका नेता भागू सौंटियाळ,
भागू झंगोरया तै पकड़िक,
झंजीर फर बांधिक ल्‍हौ,
त्‍वैकु मैं कई सौ ज्‍यूला,
अर जागीर त्‍वैकु द्यौलु,
तब पुरियान बताई,
मी बड़ी जगा कू नि छौं,
पुरिया मेरु नौं,
अर झंगोरया छ मेरु गौं......

पुरिया नैथाणी तैं भगोत सिंग न,
पगड़ी पैराई शौल ओढाई,
एक हजार कळ्दार नकद दिनि,
पुरिया न श्रीनगर बिटि प्रस्‍थान करि,
तीन दिन बाद ऊ चांदपुर बधाण पौंछी,
वख जैक सयाणा भकलैन,
तुम मैं दगड़ि श्रीनगर चला,
तुमतैं खूब जागीर द्यौला,
जब कठैतु कू अंत करि देला,
कमला, त्‍यूंखी, घोत्‍या लोग,
लैंजा लगैक पुरिया का पैथर ऐन,
सब्‍बि श्रीनगर का सुकता सैण मा,
ब्‍याखुनि बग्‍त कठ्ठा ह्वैन,
पुरिया न बोल्‍िा अब आप,
मेरा लत्‍ता कपड़ा फाड़ा,
तब बौळ्या सी बणिक पुरिया,
भाण्‍जा भगोत सिंह का पास,
रात मा आई,
देख भाण्‍जा ऊंन मेरी,
क्‍या दुर्गति करयालि,
मैं ऊं तैं भकलैक ल्‍हेग्‍यौं,
अब तू ऊंक गर्दन उड़ैदि,
भगोत सिंग न बोलि,
मामा तू अबरि चलि जा,
भोळ सुबेर ऊंकी खबर ल्‍यौला.....

पुरिया वापस लौटी,
श्रीनगर पौलिटेक्‍निक का धोरा,
रात मा खोदेगि खाई,
सुबेर सब्‍बि लोग ऐन,
अर कठैतु मा कोठा घेरी,
कठैत बिंगिग्‍यन हम दगड़ि,
भारी धोखा ह्वैगि,
कोठों का द्वार बंद करिक,
कठैतुन अपणा परिजन,
बेरहम ह्वैक कत्‍न करयन,
जैकु बोल्‍दन शाका,
बाद मा ऊंन भागू सौंटयाळ,
बेरहमी सी कत्‍ल करि,
दुश्‍मनुन ऊंका कोठों फर,
आग लगाई,
पांच भै कठैत मारे गेन,
भगोत सिंह की धर्मपत्‍नी,
जू गर्भवती थै,
वींन छेमी मा झाड़ नीस,
लुकिक जान बचाई,
वींकु नौनु छेम सिंह कठैत ह्वै,
वेका द्वी नौना मंगल सिंग,
अर होशियार सिंग ह्वैन,
बतौन्‍दन ऊंका वंशज,
बढियारगढ़, धारकोट धण्‍जी मा छन,
पांच भै कठैतु का मुंड,
पांच भै कठैतु की चौंरी मा,
खांकरा, रुद्रप्रयाग का पास,
पांच भैया खाळ मा रखेग्‍यन........

-जगमोहन सिह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक10.8.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 देव्‍तौं का धाम मा......

देव्‍तौं का धाम मा देखा आज,
प्रकृति की मार छ,
मनखि जू भी सोचणा होला,
प्रभु की लीला अपार छ......

सबक लिन्‍युं चैन्‍दु सब्‍यौं तैं,
धरती कू श्रृंगार करा,
धौळ्यौं का धोरा घर बणैक,
सुख की आस ना करा.....

सब कुछ अपणा हात छ,
मन मा, जरा विचार करा,
आफत तैं, न्‍यूतु न देवा,
धरती का जख्‍म भरा......

केदार धाम की आफतन,
जौंकु ज्‍यु पराण हरि,
कवि नजर सी याद करदु,
प्रभु तौंकु कल्‍याण करि.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 3.7.2015
या कविता मैंन दिनांक 4.7.2015 सांय चार बजि
गांधी शांति प्रतिष्‍ठान, नई दिल्‍ली मा होण वाळी केदार आपदा श्रद्धाजंलि कार्यक्रम का खातिर रचि।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 दर्द भरी दिल्‍ली.....

बदलिगी दिल्‍ली देखणा छौं हम,
मैट्रो रेल चलिगी,
धक्‍कम धक्‍का तख भी होणी,
कखि भि ठैस नि रैगि......

डी.टी.सी. मा हाल बुरा छन,
मोबाईल चोरी होणा,
जेब कतरौं कू ढंग बदलिगी,
देखा मौज मनौणा......

कुर्चम कुर्चा होण लगिं छ,
दिल्‍ली तौ भि प्‍यारी,
जाण भि कख छ दिल्‍ली छोड़ी,
होयिं छ भारी लाचारी.....

सब्‍यौं का मन मा बसिं छ दिल्‍ली,
नकली माल खयेणु,
बिजली पाणी नखरा दिखौणि,
दर्द यनु छ सहेणु........

सड़क्‍यौं मा देखा हाल बुरा छन,
गच्‍च होयिं छन गाड़ी,
मार पीट तक ह्वै जान्‍दि छ,
मनखि देखा अनाड़ी......

भैर जवा त हाल बुरा छन,
सस्‍ती होयिं छ जान,
ब्‍याख्‍ना घौर बौड़िक ऐग्‍या,
धन्‍य हो तेरु भगवान.......

दिल्‍ली मा दर्द भौत छन,
कुछ निछ अपणा हात,
जिंदगी जैकि यख कटिगी,
बड़ा भाग की बात........

- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित अर प्रकाशित
दिनांक 22.6. 2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 धन बे दिल्‍ली.....


धन बे दिल्‍ली त्‍वै दिल्‍ली मा,
कथ्‍गा मनखि समौणा,
गढ़वाळि दिल्‍ली मा दनकिक ऐग्‍यन,
अपणु दर्द दबौणा.....

जैं भी कलोनी मा दिल्‍ली मा जावा,
नजर औन्‍दा गढ़वाळि,
घर घर जख्‍या कू तड़का लग्‍दु,
बणौन्‍दा पकोड़ी स्‍वाळि......

वे गढ़वाळ की रौनक हर्चिगी,
दिल्‍ली मा सदानि बग्‍वाळि,
कैका मन मा दर्द बस्‍युं छ,
खुश छन कुछ गढ़वाळि......

कूड़ी बंजेगि कंडाळि जमिगि,
पुंगड़ि पड़िग्‍यन बांजा,
कुछ का मन मा दर्द कतै नि,
बणिग्‍यन दिल्‍ली मा राजा.....

संस्‍कृति कू त्‍याग करिक,
होण लग्‍युं मोळ माटु,
अपणा गढ़वाळ तैं याद नि करदा,
खोज्‍दा नि गौं कू बाटु......

घडयाळा लगणा भूत पुजेणा,
पित्र भी यखि थर्पेणा,
दिल्‍ली भारी स्‍वाणि लगणि,
देब्‍ता भि यखि नचेणा......

दिल्‍ली देब्‍ता समान लगणि,
धन बे दिल्‍ली त्‍वैकु,
दिल वाळौं दिल्‍ली छैं तू,
क्‍या कसूर छ कैकु.......

- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित अर प्रकाशित
दिनांक 21.6. 2015