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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ ऊं तैं,
मुसीबत का पहाड़,
लगणा छन,
अपणु मन बिळ्मौणा छन,
पहाड़ ऊंकी जग्‍वाळ मा छन,
हे अब त अवा,
धरती छोडण सी पैलि,
उत्‍तराखण्‍ड की धरती कू,
श्रृंगार त करा,
कूड़ी तुमारी खंड्वार,
पुंगड़ि बांजा पड़ीं छन,
किलै मरी तुमारु मन,
घौर ऐ जवा...
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
का कविमन कू कबलाट
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 29.1.2015 11.20 पूर्वाह्न

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "संकल्प नयाँ साल फर"

भुला, भुल्यौं, दिदा, दिद्यौं,
मंगलमय हो आपतैं,
बल नयुं साल-2013,
बद्रीविशाल जी की कृपा सी,
जुगराजि रयन,
हमारू कुमाऊँ- गढ़वाळ,
दनकदु रयन आप,
प्रगति पथ फर,
चढ़दु रयन ऊकाळ....

कामना छ मँहगाई कम हो,
नेतौं तैं सदबुध्धि आऊ,
जनु ऐंसु का साल ह्वै,
यनु अनर्थ कब्बि न हो,
काल चक्र कैका बस मा,
नि होंदु बल,
प्रकृति कू नियम छ,
होंणी हो खाणी हो,
कामना कवि "जिज्ञासु" की.....

गढ़वाळी मा लिखणु छौं,
तुम भी लिख्यन बोल्यन,
अपणा नौना नौनी,
जरूर सिखैन लिखणु बोन्नु,
गढ़वाळी, कुमाऊनी, जौनसारी,
कृपा होलि तुमारी,
आप एक उत्तराखंडी छन,
बोली भाषा कू,
सम्मान अर सृंगार,
संकल्प नयाँ साल फर.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
नव वर्ष फर शुभकामनाओं सहित उत्तराखंडी समाज तैं समर्पित मेरी या गढ़वाळी कविता
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित 31.12.12
11.30 ( रात्रि)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "हे कलम"


मेरे मन के भावों को,
कागज पर उतारकर,
कहती है तू,
भाषा का सम्मान करो,
माता पिता,
गंगा और हिमालय,
उत्तराखंड आलय,
इनका आदर करो...


भाषा और संस्कृति,
जब तक आपकी,
जिन्दा रहेगी,
हे कवि "जिज्ञासु",
मैं आपकी प्रिय कलम,
सदा यही कहूँगी....


आपकी और मेरी,
मित्रता कायम रहे,
पहुंचे संदेश जन जन तक,
भाषा और संस्कृति के,
सम्मान और सृंगार का,
आपकी प्रिय मित्र,
कलम यही कहे
अनुभूतिकर्ता: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "प्यारी ब्वै"

जख भी होलि स्वर्ग मा,

स्वर्गवासी ब्वै,

जै दिन स्वर्ग सिधारि,

छक्किक रोयौं मन मा,

मन भौत उदास ह्वै

बचपन मा,

घुडौंन गोया लगैक,

कुजाणि कब हिटण लग्यौं,

तेरी ममता की छाया मा,

कुजाणि कब बड़ु होयौं,

नखरि भलि सदानि,

बार त्यौहार कौथिग फर,

अपणा हातुन खलाई ,

मन मारी अपणु,

खौरी भि भौत खाई

जब तक "प्यारी ब्वै",

यीं धरती मा,

डाळी कू सी छैल बणिक,

मेरा दगड़ी रै,

हँसी ख़ुशी जिंदगी बिति,

मन उदास नि ह्वै

अनुभूतिकर्ता-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित

19.12.12

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "तू पैल त कर"

मेरी प्यारी ब्वे,
मैं तेरी अजन्मी नौनी छौं,
मैकु जन्म लेण दी,
यीं दुनिया मा,

मेरु क्या कसूर छ,
तू पैलि पैल त कर,
यीं दुनिया सी न डर,
मैं तेरु खून छौं,
भ्रूण हत्या पाप कू,
दगडु न कर
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित 22.11.12

श्री देविंदर नेगी उपदरी जी के सुझाव पर मैंने ये कविता लिखी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "उत्तराखंड मा ऊताणदंड"
ऊँचि धार ऐंच,
एक स्कूल मा,
कुछ नौना नौनी,
बैठ्याँ क्लास मा,
एक नौना सी,
मास्टरजिन पूछि,
बेटा बिशन सिंह बताओ,
ऊताणदंड का मतलब,
क्या होता है?
बिशन सिंहन बोलि,
गुरूजी उत्तराखंड,
गुरुजिन पूछि,
बल कैसे,
देखा गुरूजी,
जब बिटि राज्य बणि,
हमारा स्कूल मा,
विद्यार्थी घटिग्यन,
होन्दा खान्दा लोग,
पहाड़ छोड़िक चलिग्यन,
तुमारु नौनु भी,
देखा देरादूण पढ़णु छ,
मनखी कम ह्वैगिन,
बाँदर सुंगर बढिग्यन,
ऊ टरकौण लग्यां छन,
उत्तराखंड तैं जन,
भेळ फरकौण लग्यां छन,
उत्तराखंड की राजधानी,
पहाड़ नि बणि सकि,
ह्वै न उत्तराखंड कू मतलब,
ऊताणदंड
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित  20.11.12


मित्र श्री जयप्रकाश पंवार जी की बात .... इन्टरनेट के ज़माने मे, सचिवालय के बगल मे बैठने की जरूरत नहीं है. इन उल्लुओ को कोई तो समझाओ भाई....गैरसैण को अब पक्का राजधानी बनाओ भाई ......"गैरसैण" पुस्तक से आगे.....पर रचित मेरी कविता "उत्तराखंड मा ऊताणदंड"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "हे लठ्याळि"
मैकु दी दी तू,
एक दबाल दिल सी,
माया की मुट्ट बटिक,
मन तैं खुश करिक,
माया अपणि,
हौर कुछ नि चैंदु,
मैकु त्वैसी,
जिंदगी भर कू,
सदा तेरु साथ रौ,
जब तक या जिंदगी,
चल्दि रलि धरी मा,
प्यारा उत्तराखण्ड की,
"हे लठ्याळि".....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "लंगोट्या यार थौ मेरु"
जब मैं अर ऊ,
स्कूल मा पड़दा था,
एक गौळा पाणी थौ,
एक पल नि रन्दा था,
एक हैक्का का बिगर,
पढाई पूरी ह्वै जब,
एक हैक्का सी बिछड़ग्यौं,
जवानी बिति बुढापु आई,
भौत दिनु का बाद,
मैकु मिली ऊ अचाणक्क,
पूछण लगि मैकु,
बल भाई साब,
तुमारु नाम क्या छ?
बिछड़दि बग्त जैन,
मैकु बोलि थौ,
मैं त्वैकु कब्बि,
नि भूली सकदु दिदा,
तू मेरा मन मा बस्युं रैल्यु....
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "हे गितांग"
तू यना गीत गा,
जौन कुतग्याळि सी लगु,
पर ध्यान रखि,
कैका मन मा तू,
हे! ठेस न लगा....
ह्वै सकु त,
यना गीत लगौ,
मनख्यौं का मन मा,
संस्कृति प्रेम की,
जोत सी जगौ,
पर भलि बात निछ,
क्वी भी खुश निछ,
कैका बोल्यांन,
कैका सोच्यांन,
क्वी फ़र्क नि पड़दु,
पर भलु नि लगदु,
कैकु मान करा,
सम्मान मिल्दु छ.....
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित १५.११.१२
कविमित्र शैलेंदर जोशी की इच्छा के अनुसार गजेन्द्र राणा जी द्वारा नरेंदर सिंह नेगी पर गए गीत पर मैंने ये रचना लिखी.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 "काफळ"
काफळ खैल्या,
स्वर्ग मा जैल्या,
यी काफळ छन,
हमारा मुल्क का.....
देवतौं का रोप्याँ,
ऊँचा-ऊँचा डाँडौं मा,
बाँज बुराँश का,
बण का बीच,
देवतौं का हे!
मुल्क हमारा.....
पहाड़ की पछाण छन,
लाल रंग का,
भारी रसीला,
छकि छकिक खूब खाला,
जू अपणा मुल्क आला,
जू नि खाला,
मन मा पछ्ताला,
यी काफळ छन,
भारी रसीला.......

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित , 15.11.12