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Religious Chants & Facts -धार्मिक तथ्य एव मंत्र आदि

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 03, 2012, 02:08:05 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शास्त्रों के मुताबिक देवाधिदेव महादेव सारे दु:खों के नाश करने वाली शक्तियों के स्वामी होने से 'शर्व' नाम से भी पूजनीय हैं। भगवान शिव के इस शक्ति स्वरूप की उपासना सारी भौतिक सुख-सुविधाएं पाने की कामनाओं को भी पूरा करने वाली मानी गई है।

जीवन को इन सुख-सुविधाओं से ही खुशहाल बनाने के लिए धन की भूमिका भी अहम होती है। धन सुख, शांति, शक्ति व प्रेम बनाए रखने में भी अहम होता है। इसलिए शास्त्रों में भी खासतौर पर शिव उपासना की विशेष तिथि, वार या घडिय़ों में विशेष मंत्र से शिव पूजा धनकामना पूरी करने में बड़ी शुभ मानी गई है।

शिव आराधना के ऐसे ही दिनों में शिव चतुर्दशी व सोमवार भी खास हैं। आज व कल ऐसा ही शुभ संयोग बना है। आप भी दायित्वों या खास कामों को पूरा करने में पैसों की जरूरत महसूस कर रहें हैं या आर्थिक परेशानियों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आज शाम व कल शिव पूजा सरल विधि व विशेष मंत्र से करें- 

- स्नान के बाद किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव की पूजा के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें।

- गंगा या पवित्र जल से जलधारा अर्पित करें। किसी विद्वान ब्राह्मण से दूध, जल, शहद, घी और शक्कर से शिव अभिषेक कराया जाना भी श्रेष्ठ उपाय है।

- शिव के साथ शिव परिवार की चंदन, फूल, गुड, जनेऊ, चंदन, रोली, कर्पूर से यथोपचार पूजा और अभिषेक पूजन करें।

- भगवान शिव को सफेद फूल, बिल्वपत्र, धतूरा या आंकडे के फूल, कच्चे चावल भी चढ़ाएं। तब नीचे लिखा विशेष मंत्र बोलें व शिव की आरती धूप, दीप व कर्पूर से करें

नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे।

नम: सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने।।

नम: प्रणववाच्याय नम: प्रणवलिङ्गिने।

नम: सृष्टयादिकर्त्रे च नम:पञ्चमुखाय ते।।

- शिव स्त्रोतों और स्तुति का पाठ करें।

- शिव उपासना में संभव हो तो रात्रि जागरण भी करें।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Maha Lakshmi Mantra.

"भवानि त्वं महालक्ष्मी: सर्वकामप्रदायिनी।
सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोस्तुते।।
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा में भूयात् त्वदर्चनात्।।

" ध्यान व पूजा के बाद लाल आसन पर पूर्व दिशा में मुख कर बैठ मां लक्ष्मी के इस सरल मंत्र का यथाशक्ति जप करें। बाद आरती करें - "पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बुराई का किसी भी रूप में संग मन में बुरे भाव ही पैदा करता है। ये भाव काम या इच्छाओं के रूप में सामने आते हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों में बताए गए चार युगों में से कलियुग में भी पाप व बुरे कर्मों के बढऩे व उनसे कर्म, विचार और जीवन पर बुरा असर होने के बारे में लिखा गया है।
आज के दौर में भी उठते-बैठते इंसानी कर्म व विचारों में स्वार्थ, ईर्ष्या, कामनाएं, क्रोध जैसे अनेक स्वाभाविक दोष हावी दिखाई देते हैं। इससे जाने-अनजाने अनेक तरह के पाप होते हैं, जो आखिरकार दु:ख व कलह पैदा करते हैं।
मन, वचन, कर्मों से हुए पाप कर्मों से बचने या प्रायश्चित के लिये हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में एक मंत्र विशेष बताया गया है, जो कलियुग के बुरे प्रभाव से बचाकर बुद्धि को पवित्र करने वाला माना गया है। खासतौर पर सुबह या जब भी मन में कोई बुरे विचार आए तो सचेत होकर इस मंत्र का स्मरण कर गलत काम या नुकसान की ओर बढऩे वाले कदमों को रोका जा सकता है। अगली तस्वीर पर क्लिक कर जानिए यह चमत्कारी मंत्र -

लिखा गया है कि कर्कोटक नाग, नल-दमयन्ती और ऋतुपर्ण का नाम लेने से कलियुग का प्रभाव नहीं होता। इसलिए श्रद्धा-भाव से पाठ-पूजा के वक्त इस मंत्र द्वारा इनका नाम स्मरण करें -
कर्कोटस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च।
ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तनं कलिनाशनम्।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान शिव की इस सरल उपाय व मंत्र से पूजा करें -

शिवलिंग का जल स्नान कराने के बाद पंचोपचार पूजा यानी सफेद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, आंकडे के फूल व मिठाई का भोग लगाकर इस आसान शिव मंत्र का ध्यान जीवन में शुभ-लाभ की कामना से करें -
यह शिव मंत्र मृत्युभय, दरिद्रता व हानि से रक्षा करने वाला भी माना गया है- 

पञ्चवक्त्र: कराग्रै: स्वैर्दशभिश्चैव धारयन्।
अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वर:।।
दक्षै: करैर्वामकैश्च भुजंग चाक्षसूत्रकम्।
डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुक्तमम्।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शास्त्रों में शरद पूर्णिमा की शाम व रात आदिशक्ति व जगतजननी दुर्गा महालक्ष्मी स्वरूप का स्मरण मात्र भी न केवल श्री, वैभव व ऐश्वर्य देने वाला होता है, बल्कि  ज्ञान व विद्या से सुख-शांति व सफलता भी देने वाला माना गया है।


माना जाता है इस तिथि पर चंद्रमा की पूर्ण कलाओं से प्रकाशित शीतल रात में देवी लक्ष्मी जगत का भ्रमण कर स्वयं तन, मन व विचारों की दरिद्रता दूर करने का वर प्रदान करती है।
इसी कामना से शास्त्रों में श्री विद्या के तहत बताई शिव की महाशक्ति त्रिपुरसुंदरि के मंत्र विशेष का शरद पूर्णिमा की रात्रि में स्मरण जीवन में लक्ष्मी कृपा देने वाला माना गया है।
शरद पूर्णिमा की रात्रि यथासंभव महालक्ष्मी की प्रतिमा की लाल सामग्रियों जैसे लाल चंदन, लाल पुष्प, लाल वस्त्र, अनार के फल का भोग, धूप व गो घृत दीप प्रज्जवलित कर पंचोपचार पूजा के बाद इस देवी मंत्र का स्मरण करें व महालक्ष्मी की आरती करे-

शरदज्योत्सना शुद्धां शशियुत जटासूटमकुटाम्
वरत्रासत्राणस्फटिक घटिका पुस्तककराम्।
सकृत त्वां नत्वा कथमिव सतां संमधिते
मधुक्षीर द्राक्षामधुरिणा: फणितय:।।

अर्थ के मुताबिक शारदीय पूर्णिमा के चंद्रमा के प्रकाश की तरह श्वेत व तेजस्वी मुखमण्डल, दूज के चांद की तरह जटाजूट मुकुट, स्फटिक माला पहनने वाली, वरमुद्रा,  अभयमुद्राधारी व पुस्तक लिए भुजाओं वाली देवी के ऐसे अद्भुत स्वरूप का ध्यान मात्र इंसान के समस्त विकार, दोष, दरिद्रता का अंत कर सुख-समृद्ध व वैभव संपन्न कर देता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

श्रीहनुमान को गुड़-चने, अनार या गेंहू के आटे-गुड़ से बने पकवानों का भोग लगाएं। (7) दक्षिणमुखी या पंचमुखी हनुमान के दर्शन कर चरणों में नारियल चढ़ाएं व चरणों का सिंदूर मस्तक पर लगाएं। (8) 5, 11, 21 या 51 हनुमान मंदिर में श्रीहनुमान के अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन करें। (9)लाल आसन पर बैठें और इन हनुमान मंत्रो का जप संकटमोचन की कामना से करें व अंत में आरती करें - ऊँ रक्षोविध्वंसकाराय नम:। ऊँ वज्रकायाय नम:। ऊँ सर्वरोगहराय नम:। ऊँ बलसिद्धिकराय नम:। ऊँ महावीराय नम:।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"दैणा हुयां खोली का गणेशा हे......!
दैणा हुयां मोरी का नारैणा हे......!
दैणा हुयां भूमि का भुम्याला हे...!
दैणा हुयां पंच नाम देवा हे.........!
दैणा हुयां नौखोली का नाग हे.....!
दैणा हुयां नौखंडी नरसिंघा हे......!!!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




आदित्य हृदयस्तोत्रम्‌
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् l
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ll
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्l l
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ll
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् l
येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ll
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् l
जयावहं जपेन्नित्यं अक्ष्य्यं परमं शिवम् ll
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् l
चिंताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ll
रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् l
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ll
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः l
एष देवासुरगणाँल्लोकां पाति गभस्तिभिः ll
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः l
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमोह्यपां पतिः ll
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः l
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ll
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् l
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ll
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् l
तिमिरोन्मथनः शंभुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ll
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः l
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ll
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः l
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ll
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः l
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ll
नक्ष्त्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः l
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ll
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः l
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ll
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः l
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ll
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः l
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ll
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे l
भास्वते सर्वभक्षय रौद्राय वपुषे नमः ll
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने l
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ll
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे l
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ll
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः l
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ll
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः l
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ll
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च l
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ll
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च l
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ll
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् l
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ll
अस्मिन्क्शणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि l
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ll
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा l
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ll
आदित्यं प्रेक्श्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवां l
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ll
रावणं प्रेक्श्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् l
सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ll
अथ रविरवदन्निरीक्श्य रामं l
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ll
निशिचरपतिसंक्शयं विदित्वा l
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति l

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरुपम |
निजं  निर्गुण निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम ||१||
निराकारओमकारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम |
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम ||२ ||
तुषाराद्रीसंकाशगौरं गभीरं
मनोभूतकोटिप्रभा श्री शरीरम |
स्फुरन्मौलीकल्लोलिनी चारूगंगा
लसदभालबालेन्दु कंठे भुजंगा ||३||
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नानन् नीलकंठं दयालम|
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||
प्रचण्डं प्रकृषटं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशम |
त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणी
भजेहम भवानीपति भावगम्यम ||५||
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी
सदा सज्जानानंददाता पुरारि:|
चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी:||६ ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम |
न तावत्सुखं शान्तिसंतापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||७||
न जानामि योगं जपं नैव पूजा
नतोहम सदा सर्वदा शंभु तुभ्यम |
जराजन्म दुखौघतातप्यमान
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभु: प्रसीदति ||९||

Thul Nantin

What's amazing about this Rudrashtak is that it is written by great Goswami Tulsidas in Ramcharitmanas., though the epic  tells the story of lord Ram yet  these verses are dedicated to Mahadev. Shows prowess of Goswamiji. If you go through word by word meaning of the stanzas with full dedication and recite them, you automatically will reach in different plane.
Simply Marvelous 
Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on November 12, 2012, 10:40:51 AM
नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरुपम |
निजं  निर्गुण निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम ||१||
निराकारओमकारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम |
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम ||२ ||
तुषाराद्रीसंकाशगौरं गभीरं
मनोभूतकोटिप्रभा श्री शरीरम |
स्फुरन्मौलीकल्लोलिनी चारूगंगा
लसदभालबालेन्दु कंठे भुजंगा ||३||
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नानन् नीलकंठं दयालम|
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||
प्रचण्डं प्रकृषटं प्रगल्भं परेशं
अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशम |
त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणी
भजेहम भवानीपति भावगम्यम ||५||
कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी
सदा सज्जानानंददाता पुरारि:|
चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी:||६ ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम |
न तावत्सुखं शान्तिसंतापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||७||
न जानामि योगं जपं नैव पूजा
नतोहम सदा सर्वदा शंभु तुभ्यम |
जराजन्म दुखौघतातप्यमान
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभु: प्रसीदति ||९||