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Mansar- मंसार पौड़ी गढ़वाल (सितोनस्यूं पट्टी)जहाँ सीता माता धरती में समाई थी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, April 03, 2012, 02:39:32 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are sharing a very exclusive information about Sita Mata associated with Dev Bhoomi Uttarakhand. In fact, this was one of most tragic incident of Ramayana.  Please go through the article below.

रामायण में लंका विजय उपरांत भगवान राम के वापस लौटने पर जब एक धोबी ने माता सीता की पवित्रता पर संदेह किया, तो उन्होंने सीताजी का त्याग करने का मन बनाया और लक्ष्मण जी को सीताजी को वन में छोड़ आने को कहा। तब लक्ष्मण जी सीता जी को उत्तराखण्ड देवभूमि के ऋर्षिकेश से आगे तपोवन में छोड़कर चले गये। जिस स्थान पर लक्ष्मण जी ने सीता को विदा किया था वह स्थान देव प्रयाग के निकट ही ४ किलोमीटर आगे पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। तब से इस गांव का नाम सीता विदा पड़ गया और निकट ही सीताजी ने अपने आवास हेतु कुटिया बनायी थी, जिसे अब सीता कुटी या सीता सैंण भी कहा जाता है। यहां के लोग कालान्तर में इस स्थान को छोड़कर यहां से काफी ऊपर जाकर बस गये और यहां के बावुलकर लोग सीता जी की मूर्ति को अपने गांव मुछियाली ले गये। वहां पर सीता जी का मंदिर बनाकर आज भी पूजा पाठ होता है। बास में सीता जी यहाम से बाल्मीकि ऋर्षि के आश्रम आधुनिक कोट महादेव चली गईं। त्रेता युग में रावण भ्राताओं का वध करने के पश्चात कुछ वर्ष अयोध्या में राज्य करके राम ब्रह्म हत्या के दोष निवारणार्थ सीता जी, लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग में अलकनन्दा भागीरथी के संगम पर तपस्या करने आये थे। इसका उल्लेख केदारखण्ड में आता है। उसके अनुसार जहां गंगा जी का अलकनन्दा से संगम हुआ है और सीता-लक्ष्मण सहित श्री रामचन्द्र जी निवास करते हैं। देवप्रयाग के उस तीर्थ के समान न तो कोई तीर्थ हुआ और न होगा।[ख] इसमें दशरथात्मज रामचन्द्र जी का लक्ष्मण सहित देवप्रयाग आने का उल्लेख भी मिलता है[३] तथा रामचन्द्र जी के देवप्रयाग आने और विश्वेश्वर लिंग की स्थापना करने का उल्लेख है।[४][ग]

देवप्रयाग से आगे श्रीनगर में रामचन्द्र जी द्वारा प्रतिदिन सहस्त्र कमल पुष्पों से कमलेश्वर महादेव जी की पूजा करने का वर्णन आता है। रामायण में सीता जी के दूसरे वनवास के समय में रामचन्द्र जी के आदेशानुसार लक्ष्मण द्वारा सीता जी को ऋषियों के तपोवन में छोड़ आने का वर्णन मिलता है। गढ़वाल में आज भी दो स्थानों का नाम तपोवन है एक जोशीमठ से सात मील उत्तर में नीति मार्ग पर तथा दूसरा ऋषिकेश के निकट तपोवन है। केदारखण्ड में रामचन्द्र जी का सीता और लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग पधारने का वर्णन मिलता!


M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




पौड़ी गढ़वाल। पौड़ी से करीब बीस किमी दूर सितोनस्यूं पट्टी के फलस्वाड़ी गांव में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद द्वादशी को लगने वाला सीता माता का पौराणिक मेला आज भी हजारों लोगों की आस्था व विश्वास का प्रतीक है!

इस मेले का मुख्य आकर्षण सीता माता का प्रतीक मानी जाने वाली वह शिला (लोड़ी) है जो विधिवत पूजा-अर्चना के बाद खुदाई के उपरांत दिखाई पड़ती है। किवदंती है कि भगवान राम ने लोक लच्चा से परेशान होकर लक्ष्मण को माता सीता को वन में छोड़ने के निर्देश दिए थे। लक्ष्मण सीता को लेकर जैसे ही सितोनस्यूं घाटी के फलस्वाड़ी गांव में पहुंचे सीता ने कुपित होकर धरती माता से निवेदन किया कि वह उन्हे अपने अंदर समां लें। लक्ष्मण ने जब यह दृश्य देखा तो वह भी चकित रह गए।

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मंसार मेला
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फलस्वाड़ी गांव से एक दिन पहले गांव वाले निशाण (ध्वज) लेकर देवल गांव स्थित लक्ष्मण जी के मंदिर में पहुंचते है! जहां से दूसरे दिन कुछ अन्य निशाणों के साथ ढोल-दमाऊ व गाजे-बाजे के साथ ग्रामीण मेले में फलस्वाड़ी पहुंचते है। गांव वाले ही उस स्थल का चयन करते है जहां पर सीता माता का प्रतीक मानी जाने वाली शिला जमीन में समाई होती है। इसके बाद बिना किसी हथियार के लकड़ी व हिरन के सींगों की सहायता से मिट्टी को खोदकर इस शक्ति शिला को खोजा जाता है। शिला नजर आते ही देवल मंदिर के पुजारी शिला की पूजा-अर्जना करते है। उसके बाद श्रद्धालु शिला के दर्शन करते है। इसके साथ ही सीता माता की चोटी का प्रतीक मानी जाने वाली बाबल घास से बनाई गई चोटी को श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है, जिसे क्षेत्रवासीे घर लाकर उसे अपने अन्न-धन के भण्डार में रखते है। इस शिला की तीन दिनों तक फलस्वाड़ी गांव के ब्राह्मण विधिवत पूजा-अर्चना करते है, जिससे यह शिला पुन: जमीन में समा जाती है। इस पूरे मेले में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिन खेतों में यह मेला लगता है वहां पर इन दिनों उग चुकी गेहूं की फसल श्रद्धालुओं के खेलने-कूदने से पूरी तरह खराब हो जाती है लेकिन गांव वालों का कहना है कि कुछ ही महीनों बाद इन्हीं खेतों में गेहूं की सबसे अच्छी फसल लहलहाती नजर आती है जिसे क्षेत्रवासी सीता माता की ही शक्ति मानते है।

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जब राम जी की आज्ञा से लक्ष्मण माता सीता को वन में छोड़ने गए तो वहां रथ से उतार के वे माता सीता के पास जाके बोले " हे माता सीता ! मेरे लिए और कोई आज्ञा है ? " तो जनक दुलारी ने कहा "प्रीतस्मिते  सौम्य  चिरायु  जीवः"  अर्थात  हे पुत्र , हे सौम्य , मेरे पुत्र जैसे देवर मै तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ तुम युगों तक जियो ।  लक्ष्मण रथ पे लौट के जाने लगे तो जाते हुए पुनः पूछा की माता क्या भैया के लिए कोई आज्ञा है ? वो माता सीता जिनका संस्कार जनक जैसे योगऋषि से जुड़ा था  .......उन्होंने  पूरे  जीवन  में  ७ (सात) तरह के संबोधन दिए थे श्री राम को 'नाथ' , 'स्वामी' 'प्रिय' ,  'प्राण'  , 'रघुवंशमणि'  , 'रघुवर'  , 'राम'  । एक  संबोधन  पहली  बार  बोली  माता  सीता  उस  समय  जिसमे  उनका  क्रोध  दिखा  । माता  ने  कहा  " वाचास्त्वाया  मम  वचनात  सः  राजाः   " हे  लक्ष्मण   " उस  रजा  " से  मेरी  ये  बात  कह  देना  ..........कितना  अधिक  क्रुद्ध  फूटा  होगा  माता  सीता  में  । उन्होंने  कहा  " वाचास्त्वाया  मम  वचनात  सः  राजाः  , वन्नोविशुद्धाःमपिअत्समक्षम  मामलोकवाद  श्रवानाधहासी श्रुतस्य  किम  सतसदृशम कुलस्यम  "  अर्थात   हे  लक्ष्मण  जाके  उस  महान  रजा  से  मेरी  ये  बात  कह  देना  की  मुझे  अग्नि  में  प्रज्वल्लित  कराने  के  बाद  भी  मेरी  पवित्रता  पे  संदेह  किया  मुझे  उनके  महान  कुल  की  सब  परम्पराएँ  पता  थीं  , बस  ये  परंपरा  मै  जानना  भूल  गयी  थी  इसका  मुझे  दुःख  है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

राम ने त्यागा तो सीता ने यहां बनाया था ठिकाना

राम के राजा बनने के बाद जो घटना हुई थी उसमें सबसे प्रमुख है धोबी के कहने पर राम द्वारा सीता का त्याग करना। भगवान राम ने जिस सीता को पाने के लिए समुद्र पर पुल का निर्माण करवाया और रावण का वध किया उस सीता को राम भला किस प्रकार असुरक्षित छोड़ सकते थे। इसलिए सीता का त्याग करने के बाद भी राम ने उनकी सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा।

मान्यता है कि भगवान राम ने लक्ष्मण जी से सीता को उत्तराखंड की देवभूमि में छोड़कर आने के लिए कहा था। राम की आज्ञा का पालन करते हुए लक्ष्मण जी ने सीता को देव प्रयाग से चार किलोमीटर आगे छोड़ा था। यह स्थान पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान को 'सीता विदा' गांव के नाम से जाना जाता है।

इस स्थान पर सीता को छोड़ने का कारण यह था कि जब धरती पर गंगा उतरी तब सबसे पहले यहीं प्रकट हुई थी। गंगा के साथ उस समय 33 करोड़ देवता भी यहां एकत्रित हुए थे। यह तपस्वियों की भूमि थी जिससे इस स्थान पर पाप का प्रभाव नहीं था। सीता जी ने यहां पर अपनी कुटिया बनायी थी जिसे सीता कुटि और सीता सैंण के नाम से जाना जाता है।

यहां से सीता बाल्मिकी आश्रम चली गयी जो वर्तमान में कोट महादेव मंदिर के पास है। केदारखंड नामक ग्रंथ में उल्लेख आया है कि कुछ समय तक राज-काज देखेने के बाद भगवान राम और लक्ष्मण देवप्रयाग आये थे।

यहां पर राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ रावण वध के कारण लगे ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए तपस्या और विश्वेश्वर लिंग की स्थापना की। भगवान राम प्रतिदिन देवप्रयाग से आगे श्रीनगर नामक स्थान में सहस्र कमल फूल से कमलेश्वर महादेव की पूजा किया करते थे।http://www.amarujala.com/news/

gouri

With so much to offer, why is it that the rest of India is so alienated with this State.

We need to talk more about Uttarakhand on a larger platform.

Rgds,

Gouri