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Sea Churning Religious Practice, Karanprayag-समुद्र मंथन की परंपरा

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 24, 2012, 02:01:37 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are sharing an exclusive information here about Sea Churning (Samura Manthan) practice which is celebrated in Karanprayag Uttarakhand.
From : Deepak Benjwal\
समुद्र मंथन देखने उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

कर्णप्रयाग।

शुक्रवार को सिवाई (वानातोली) के ठीक नीचे अलकनंदा नदी के तट पर मां चंडिका की वन्याथ के तहत समुद्र मंथन की परंपरा के निर्वहन में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का सैलाब उमड़ पड़ा। इस मौके पर समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में प्रमुख अमृत (पंचामृत) को श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया गया।
शुक्रवार को आराध्य देवी मां चंडिका के प्रति आस्था, श्रद्धा का सैलाब उमड़ा। देवी मां के जयकारों के साथ मंदिर परिसर से लेकर अलकनंदा नदी के तट तक श्रद्धा, भक्ति और आस्था के ही दर्शन हो रहे था। 19 साल के उपरांत हो रही मां चंडिका की वन्याथ के तहत समुद्र मंथन की परंपरा को पूरा करने के लिए जैसे ही देवी मां अपने एरवाल और ब्रह्मपुंज के साथ सिवाई मंदिर परिसर से बाहर निकली तो संपूर्ण क्षेत्र चंडिकामयी हो गया।

अलकनंदा नदी के तट पर समुद्र मंथन की परंपरा के निर्वहन से पूर्व वन्याथ के पंडिताें ने वैदिक मंत्रोच्चार, हवन एवं तंत्रमंत्र के तहत मां चंडिका की विशेष पूजा क ी। इस मौके पर नदी में ताबें के बड़े कलश (गेडू) में देवी भक्तों द्वारा अर्पित दूध, दही, शहद, घी, मिसरी के मिश्रण को एकत्रकर स्थापित किया गया। स्वयं ब्रह्मपुंज जब मंदरांचल पर्वत के रूप में मथनी बनकर कलश में प्रवाहित हुआ तो आस्था का सैलाब चरम पर पहुंच गया। वहीं प्रतीकात्मक वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया, जिसके पूंछ की तरफ देवता एवं मुंह की ओर राक्षसों ने एकत्र होकर समुद्र मंथन की परंपरा का निर्वहन किया। इस दौरान समुद्र मंथन में 14 रत्न निकले। इन रत्नों में सबसे पहले निकले हलाहल बिष को देवताओं ने भगवान शंकर को अर्पित किया। समुद्र मंथन की परंपरा के निर्वहन पर वन्याथ समिति के पदाधिकारियों सहित पंडित एवं क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इसके बाद मां चंडिका ने रात्रि प्रवास के लिए कुंजपाणी के लिए प्रस्थान किया।

युवाओं में दिखी श्रद्धा
भौतिकवाद के इस युग में धार्मिक आस्था के प्रति युवा पीढ़ी का बढ़ता झुकाव शुभ संकेत है। शुक्रवार को सिवाई में मां चंडिका की वन्याथ के तहत समुद्र मंथन की परंपरा के निर्वहन को देखने के लिए उमड़ी युवा पीढ़ी यही संदेश दे रही थी। इस मौके पर अलकनंदा नदी तट पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में भी युवाओं ने उत्साह के साथ शिरकत की





M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अलकनंदा तट पर हुआ समुद्रमंथन
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  कर्णप्रयाग। देवी मां चंडिका के बन्याथ यात्रा के दौरान शुक्त्रवार को सिवाई गांव के समीप अलकनंदा नदी तट पर पौराणिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए समुद्रमंथन का कार्यक्त्रम वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ। इस मौके पर समीपवर्ती गांवों से सैकडों की संख्या में देवी भक्तों ने पूजा-अर्चना कर मनौतियां मांगी, समुद्रमंथन के दौरान देवी के जयघोष व भजन कीर्तन से माहौल भक्तिमय बना रहा।
शुक्त्रवार को अपराह्न बाद देवी का निशान सिवाई गांव से अलकनंदा नदी तट पर समुद्रमंथन की परंपरा का निर्वहन करने पहुंचा तो ढोल-नगाडे व शंख ध्वनि के बीच सभी भक्त पीछे-पीछे हो लिये। अलकनंदा नदी तट पर देवी के पुजारियों ने विशेष घडे में दूध-दही, शहद व पंचामृत तैयार कर मंथन की प्रक्त्रिया शुरू की जिसमें एक ओर असुर व दूसरी ओर देवगणों ने समुद्रमंथन शुरू किया। इस दौरान निकले 14 रत्नों कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, उच्चश्रवा घोडा, कौस्तुक मणि, पारिजात वृक्ष, रंभा अप्सरा, लक्ष्मी, वरूण, अमृत कलश, विष, शंख, वीणा व धनुष का देवगणों व दैत्यों में प्रतीक स्वरूप बंटवारा हुआ, बाद में प्रसाद भक्तों में भी वितरित किया गया। मान्यता है कि देवी अपने मूल मंदिर जिलासू में प्रवेश से पूर्व अमृत रत्न प्राप्त कर यात्रा में साथ रहे पश्वाओं, ध्याणियों व भक्तों को आरोग्यता व कष्टों से मुक्ति करती है। समुद्रमंथन के बाद देवी 19 मई को अपने मायका गांव सरमोला पहुंचेगी जहां ध्याणियों से मिलन के बाद 20 मई को खाल में विशेष पूजा संपन्न होगी।


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