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Articles & Poem on Uttarakhand By Brijendra Negi-ब्रिजेन्द्र नेगी की कविताये

Started by Brijendra Negi, August 17, 2012, 01:27:49 AM

Brijendra Negi

(दीपावली के हार्दिक शुभकामनाएं)   

(दीपावली पर विशेष)

बतुला जगा दीं

दिवली दिन वेल
दिवलि उजाड़ दीं। 
रूज़गार गारंटी खुण
रस्ता बणा दीं।
द्वी-चार मवस्यूँ का
बतुला जगा दीं।
द्वी-चार बोतल
दारू पिला दीं।
ट्वटका मुंड कैकि
लोग सिवाल दीं।
अफु विकास योजनों का
दिवला निकाल दीं।। 
  ....

Brijendra Negi

अंतस्थल   को  शुद्ध   बनाना

दीपावली पर अनेक दीप जलाना
मन मंदिर में सिर्फ एक जलाना
उससे तम की कालिमा मिटाना
अंतस्थल   को  शुद्ध   बनाना।

जलाई ज्योति जो अंतस्थल में
आजीवन ज्योतिर्मय रखना
फिर न तिमिर अधिकार जमाये
जगमग-जगमग-जगमग रखना।
     ...

Brijendra Negi

(दीपावली के हार्दिक शुभकामनाएं)
    (दीपावली पर विशेष)
         
           
          (१)

जगमग-जगमग दीप जलाओ

जगमग-जगमग दीप जलाओ
तृण-तृण से तिमिर भगाओ
मन मंदिर को शुद्ध बनाओ
कुछ ऐसी तस्वीर सजाओ
घर-घर में दीप जलाओ
पग-पग पर फूल बिछाओ
भेद-भाव को दूर भगाओ
नफरत की दीवार ढहाओ
जगमग-जगमग दीप जलाओ।
            ...

                 (२)

इस दीवाली पर हर कोई तंग है।

इस दीवाली पर हर कोई तंग है
मंहगाई की मार से आम आदमी दंग है
बाजार मेँ मिलावट की बहुत बड़ी जंग है
दीपावली के सामान में भी कहाँ कोई रंग है
इस दीवाली पर हर कोई तंग है।
मंहगाई की मार से आम आदमी दंग है

पंजा छाप राकेट मेँ बारूद कम है
फूल छाप राकेट मेँ बारूद नम है
रामदेव पटाखों की  बत्ती  गुम है
मन-मोहन बम मेँ भी कहाँ कोई दम है
कितना भी तपाओ फिर भी आवाज कम है
इस दीवाली पर हर कोई तंग है।
मंहगाई की मार से आम आदमी दंग है

राहुल पटाखे पहले से फुस्स हैं
लालू छुर-छुरी पर मौसम की मार है
सुष फुलझड़ी कि चिंगारियाँ लुप्त है
सोनि हंटर की अग्नि भी सुप्त  है
केजरीवाल अनार रुक-रुक कर झरता है
उसी से दिवाली पर थोड़ा मन भरता है
इस दीवाली पर हर कोई तंग है।
मंहगाई की मार से आम आदमी दंग है
           ....


:) (एक ज्योति अंतर्मन में जलाना, उसे सदैव  ज्योतिर्मय रखना) :)

Brijendra Negi

(दीपावली के हार्दिक शुभकामनाएं)
    (दीपावली पर विशेष)


खुशियों के दीप जलाओ

नवल ज्योति, नव प्रकाश से
नवल सोच,  नव कल्पना से
नवल सृजन, नव सरंचना से
नवल जोश, नव जागरण से
धरती से अज्ञान उठाओ
स्वार्थ मोह के बंधन तोड़ो
जन-जन पर स्नेह लुटाओ
फिर खुशियों के दीप जलाओ।
    ...


पैटाओ दिवों कि बारात

ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात
पैटाओ दिवों कि बारात हो...हो...ओ...
ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात।

मन पवित्र कैरि ल्ह्याओ, गंगा जल नवाओ
सजाओ प्यार से बाती
न्यूति-पूजिकि, पिठै लगाकि
पैटाओ लंग्यात लगाकि
ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात...

देलिम सजाओ, मोरिम सजाओ
सजाओ कूणा-कूणा जाकि
एक दिवा दिल म जगैकी
पैटाओ दिवों कि बारात
ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात...

अंध्यरी रात मा भी उज्यली हवेलि
भैरा-भितर आज राति
रीस-हीस छ्वड़ला आज बैर भुलाकि
पैटाओ दिवों कि बारात
ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात...

मन की ग्यड़िकि ख्वल्ला, सौ-सल्ला कैकि
मिल कै सब भैलों ख्यलला
आज ड्यर-ड्यर जाकि
पैटाओ दिवों कि बारात
ऐगे बग्वाल आज औंसी की रात...
      ...

:) :)एक ज्योति अंतर्मन में जगाना, उसे सदैव ज्योतिर्मय रखना :) :)

Brijendra Negi

(बाल दिवस पर विशेष)        

  :) पूछूं उनसे कैसे...?  :)

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
बस्ते की जगह कबाड़ उठाते, फिरते रस्ते-रस्ते।

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
होटल-ढाबों में गालियां खाते, जूठन उठाते-उठाते।

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
कल-खरखानों में मरते हैं, दिन-रात खपते-खपते।

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
नगें पाँव गुजरते हैं, जूते पॉलिश करते-करते।

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
घर-आँगन में कान उमठते, बर्तन मँजते-मँजते।

बाल दिवस क्या होता है, पूछूं उनसे कैसे...?
स्वयं जीवन में रिक्त रह जाते, जग को देते-देते।

       :) :)

Brijendra Negi

(बाल दिवस पर विशेष)

:) :) हवा और सूरज  :) :)

एक बार छिड़ गई बहस,   हवा और सूरज  में,
कौन अधिक बलवान, शक्तिशाली है हममे-तुममे।
उस समय सूरज जीता  था,   हवा गई थी हार,
पराजय का यह दंश, उसे कतोटता था बारम्बार।

किस तरह से लूँ बदला, चिंतन में  रहती खोई,
एक अनोखी युक्ति एक दिन, उसके मन में आई,
उसी पथिक की ढूंढ करेंगें,     पुनः परीक्षा होगी,
सूरज से फिर होगा मुक़ाबला, फिर से हार-जीत होगी।

हवा को आता देख सूरज, लगा घमण्ड में झूल,
विजयश्री के दम्भ में,    बड़े     गर्व से फूल।
प्रतिशोध अग्नि से तपी हूँ सूरज, और न शोले भड़काओ,
है सच्चा पुरुषार्थ तो, फिर से मैदान में उतर आओ।

पुनः परीक्षा के लिए, उसी पथिक की ढूंढ करो,
बारी-बारी से छुपके, उस पथिक को त्रासित करो,
प्राण रक्षा हेतु जिसे, पथिक   तुरन्तु ढूढ़ेंगा,
वही हममे-तुममे बलवान,   शक्तिशाली होगा।

छुप गया सूरज क्योंकि, पहले थी उसकी बारी,
अकस्मात अंधकार छा गया,  दुनिया में सारी
अचक-अचानक अंधकार से, पथिक थोड़ा घबरा गया,
अस्त हो गया सूर्य समझकर,  फिर आगे को बढ़ गया।

हारा सूरज इस तरह,  अंत में हवा चुप गई,
बिना हवा के सांस लेना, पलभर में मुसकिल हो गई।
चलता पथिक बिना सांस के, गिरता-पड़ता-उठता,
और चिल्लाकर हवा-हवा, इधर-उधर तड़फता।

जीत हुई इस तरह हवा की, सूरज गया हार,
दंभ मिट गया, घमंड टूट गया, स्वीकारी अपनी हार,
फिर बोला प्रिय बहन हवा, क्यों न हम यह जाने,
हर वस्तु अपनी जगह, बलवान शक्तिशाली माने

       :) :) :) :)

Brijendra Negi

(भाई दूज पर विशेष)

भाई दूज

एक बहन ने भाई दूज पर
भाई को पूज
दीर्घायू दी है।
एक बहन को भाई ने
दहेज की बलि चढ़ा
अल्पायु दी है।
   ---



बहना की पुकार

भाई दूज पर बहना की पुकार है
आज हर बहना जुल्म की शिकार है
बहना के कई रूप और आकर हैं
शृस्टि की रचना में कई प्रकार हैं
प्रेम है, प्रेयसी है, पत्नी है
सजनी है, सृजक है, जननी है
चंदा है, तारा है, चाँदनी है
चम्पा है, चमेली है, रजनी है
खुशबू है, महक है, रोशनी है
हवा है, सांस है, जीवनी है
यम से प्राण लाये ऐसी संजीवनी है
सीता है, सावित्री है, अहिल्या बाई है
तारा है, मंदोदरी है, लक्ष्मी बाई है
पुरातन से परीक्षा देती आई है
हर युग मेँ कुरूतियों से लड़ती रही है
इस भाई दूज पर मेरी बिनती है भाई
बहनों की इज्जत हो, दूर हो सब बुराई
न कोख में मरे, न सड़कों पर बिखरे
न हवस की शिकार, न दहेज की बली जाये चढ़ाई
सुरक्षित हो जितनी आज तक न हो पाई
बस इतनी ही मेरी विनती है भाई।
         ....


Brijendra Negi

मायूसी

मैंने देखा है
प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण
परन्तु
साधनों से बंचित
एक बूड़े व्यक्ति को 
पहाड़ो की चोटियों से
डंडी के सहारे रोज उतरते और चढ़ते
आज के दौर में भी
पोस्ट ऑफिस के चक्कर लगाते
देखी है उसके चेहरे पर थकान और उदासी
हर माह की तरह
समय पर मनिआर्डर न पहुँचने की मायूसी 

Brijendra Negi

बूंद-बूंद में अमृत जिसकी

अविरल बहती, निर्झर झरती पतित-पावन धाम से,
वंदनीय, अभिनन्दनीय, पूज्यनीय है गंगा युग-युग से।

पापमुक्त होता शरणागत,
गौरवमय   है  भारती।
उत्पन्न ऐसा  सम्मोहन
जग खड़ा उतारने आरती।

बूंद-बूंद में अमृत जिसकी, गोमुख हो या गंगा-सागर,
वंदनीय, अभिनन्दनीय, पूज्यनीय  है गंगा युग-युग से।

पवित्र जल के स्पर्श मात्र से,
हर तम  का  अन्त हो गया।
था  जो     कटु-खल-कामी,
शरणागत हो शान्त हो गया।

सागर में मिलते ही जो,   गंगा-सागर   हो   गयी,
वंदनीय, अभिनन्दनीय, पूज्यनीय है गंगा युग-युग से।

   

Brijendra Negi

 :oमै निशब्द हूँ :o


व्यक्ति की अभिव्यक्ति में
नित उपजते आक्रोश  से
                   स्तब्ध हूँ .
               मै निशब्द हूँ .

व्यंग की अभिव्यक्ति में
नित   पनपते विद्वेष  से
                  स्तब्ध हूँ .
             मै निशब्द हूँ. 
                  ...