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Juda Dance Jaunsar Babar Uttarakhand-जूडा नृत्य जौनसार बावर

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 02, 2014, 10:33:46 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are posting here exclusive article about Juda Dance of Jansar Babar area of Uttarakhand. The information has been provided by Manoj Istwal Ji.

चक्रब्यूह संरचना और वीर गाथाओं का प्रतीक है जूडा नृत्य...!
जौनसार बावर के मेले और त्यौहारों का मुख्य आकर्षण जूडा नृत्य यों तो वीरगाथा काल का सजीव वर्णन दिखाई देता है लेकिन अपने को पांडवों के वंशज मानने वाले इस क्षेत्र के निवासी इस नृत्य को चक्रब्यूह संरचना से भी जोड़कर देखते हैं.
विशेषत: बिस्सू मेले या फिर पुरानी दीवाली के अवसर पर इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सफ़ेद पोशाकों में तलवार खुन्खरी फरसे हाथ में लहराते ग्रामीण रण-बांकुरों के भेष में अपने करतबों का सामूहिक प्रदर्शन करते नजर आते हैं. दरअसल इस पोशाक को वीरता और वीरों का प्रतीक मानते हुए यहाँ के बुद्धिजीवी इस पर अलग अलग राय प्रस्तुत करते हैं. साहित्यकार रतन सिंह जौनसारी अपने को पांडवों का वंशज मानने के स्थान पर उन्हें ही खुद जौनसार बावर क्षेत्र के अनुशरणकर्त्ता मानते हैं वहीँ ठाणा गॉव के वयोवृद्ध साहित्यकार समाजसेवी कृपा राम जोशी इस युद्ध कला को पांडवों के काल से जोड़ते हुए कहते हैं कि यह युद्ध कला कालान्तर से अब तक ज्यों की त्यों जीवित है.वहीँ कांडोई भरम के ठाकुर जवाहर सिंह चौहान व चिल्हाड गॉव के माधो राम बिजल्वाण (अब जीवित नहीं हैं) अपने को पांडवों के वंशज से सम्बन्ध करते हुए कहते है कि जूडा नृत्य चक्रब्यूह संरचना से जुडी वह युद्ध कला है जो सिर्फ ढोल के बोल और सीटियों की आवाज क़दमों की चपलता पर किया जाने वाला बेहद लोकप्रिय नृत्य है.

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From Manoj Istwal

वहीँ संस्कृतिकर्मी अर्जुनदेव बिजल्वाण इसी नृत्य का एक पहलु थोउडा नृत्य भी मानते हैं जिसमें वे आखेट कला को जोड़कर देखते हैं और थोउडा को पांडव धनुर्धर अर्जुन की आखेट कला से जोड़कर देखते हैं.
बहरहाल इसके कितने प्रारूप हैं उन पर चर्चा करने का मतलब लेख को विस्तृत करना हुआ इसलिए संक्षेप में मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि मेरे द्वारा अभी तक इन 18 सालों में जौनसार बावर क्षेत्र के कई गॉवों के तीज त्यौहार में जाकर शोध करने की कोशिश की गई है. जहाँ तक जूडा नृत्य का प्रश्न हैं तो इसका आनंद सर्वप्रथम सन 1995 में मैंने कांडोई भरम के बिस्सू में लिया उसके बाद ठाणा गॉव की दीवाली, खन्नाड गॉव की दीवाली, सहित जाने जौनसार भावर के कितने अन्य गॉव की दीवाली में यह नृत्य कला सजीव होती देखी लेकिन मेरा आंकलन है कि जितना अच्छा प्रदर्शन इसका लोहारी गॉव में होता है वह अन्य कहीं नहीं है. इस बार की दीवाली में लोहारी गॉव के ग्रामीण बिशेश्कर नवयुवकों ने मुझे हतप्रभ कर दिया. ये सिर्फ ढोल के बोल और सीटियों की गूँज में अक्भी गोलघेरा बनाते कभी अर्द्ध-वृत्त तो कभी कई घेरे एक साथ आप अन्दर घुसे और कब घोले में कैद हो गए पता भी नहीं लगता ..आप कैसे बाहर निकले यह कह पाना समभा नहीं है सचमुच यह किसी चक्रब्यूह संरचना से कम नहीं था