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UKD: Regional Party - उत्तराखंड क्रांति दल: उत्तराखंड की क्षेत्रीय पार्टी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 04, 2008, 10:01:12 AM

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Thanks Deepak for your analysis.

Quote from: deepak pant on January 27, 2009, 08:17:39 PM
No doubt UKD is the alone party which bothers for the local issues. The info about UKD is interesting and should be brought to the notice of every uttarakhandi.  In this era of regional parties UKD must revitalise itself and make it's presence felt prominently by raising the issues of our local folks.

पंकज सिंह महर

टूटना तो रहा है उक्रांद का इतिहास

देहरादून। सरकार से समर्थन वापसी का सवाल उक्रांद के गले की हड्डी सा बन गया है। पहले भी दो बार टूट चुके उक्रांद के अंदर इस मुद्दे पर दिख रहा विभाजन एक और टूट की आशंका खड़ी करता है। करीब दो माह पहले संपन्न उक्रांद के महाधिवेशन में आम कार्यकर्ता समर्थन वापसी की मांग करते दिखाई दिए। बड़े नेताओं पर सवाल दागने से भी कार्यकर्ता नहीं चूके। इस पर भाजपा को 10 फरवरी तक का अल्टीमेटम देकर नेताओं ने अपनी जान छुड़ाई। बाद में भाजपा ने उक्रांद के अल्टीमेटम पर ध्यान दिए बिना ही प्रत्याशी घोषित कर दिए। गठबंधन धर्म निभाते हुए उक्रंाद को यह कड़वा घूंट पीना पड़ा पर समर्थन वापसी का सवाल अपनी जगह बना रहा। निर्दलीय विधायक यशपाल बेनाम के साथ बातचीत के बाद समर्थन वापसी का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर निकल आया। दरअसल, बेनाम के बहाने समर्थन वापसी का मुद्दा ऐन चुनाव के वक्त सामने लाने में उक्रांद के कई नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इस तरह दल में इस मामले में मत विभाजन साफ तौर पर दिखाई देता है। अब तक बड़ी संख्या में कार्यकर्ता समर्थन वापसी की बात कर रहे थे, अब बड़े नेता भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं। दो मतों में विभाजित दल में एक बार फिर टूट की हद तक पहुंचने की संभावनाएं देखी जाने लगी हैं। दो बार पहले भी उक्रांद इस दौर से गुजर चुका है। उक्रांद के शीर्ष नेता काशी ंिसह ऐरी कहते हैं कि विभाजन जैसी कोई बात नहीं है। दल के मुद्दों पर चर्चा होती रहेगी पर दल कमजोर करने वाले कदम किसी भी हालत में नहीं उठाए जा सकते। कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट कहते हैं कि उक्रांद ने बहुत थपेड़े खाए हैं, अब टूट-फूट के बारे में कोई नहीं सोचता। उक्रांद राज्य के लिए लड़ता रहा है और राज्य को बचाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें सत्ता का कोई मोह नहीं है। यदि समर्थन वापसी समेत संगठन का कोई निर्णय होता है तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।


निःसंदेह उत्तराखण्ड क्रान्ति दल उत्तराखण्ड का स्थानीय और जनवादी दल है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखा जाय तो भाजपा सरकार से समर्थन वापसी उन्हें कर लेनी चाहिये, इस हेतु सिर्फ पार्टी कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम जनता का दबाव पार्टी पर है। लेकिन इस पार्टी का दुर्भाग्य यह है कि इसमें सभी लोग आन्दोलनकारी, जुझारु और जनवादी ही हैं, राजनैतिक नहीं हैं। उक्रांद की राजनैतिक अपरिपक्वता ने इसे पहले भी कई बार झटके दिये हैं, मौजूदा दौर में भी पार्टी अपने को राजनैतिक दृष्टिकोण से बदल नहीं पाई, जिस कारण इसे नुकसान उठाना पडता है। पार्टी को आन्दोलनकारी, जनवादी और जुझारु होने के साथ-साथ राजनैतिक भी होना पडेगा।

हेम पन्त

बिना भाजपा सरकार से समर्थन वापस लिये चुनाव में उतरना उक्रांद के लिये अपने पैरों में कुल्हाङी मारने के बराबर होगा. उक्रांद के लिये यही मौका है सरकार से बाहर निकल कर उत्तराखण्ड की जनता के प्रति अपनी भावनाएं प्रदर्शित करने का और चुनावों में मिलने वाले जनसमर्थन का आंकलन करने का.

umeshbani

देखना ये है की   लाल बती का मोह क्या त्याग पांएगे   UKD के मंत्री ( नेता ) ?

हुक्का बू

नान्तिनों,
    इस लोक सभा चुनाव में सभी दलों के घोषणा पत्र देखने को मिले, लेकिन उन सभी में उत्तराखण्ड के मुद्दे गौण रहे, केवल उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने यहां के जमीनी मुद्दे उठाये हैं, जो आप लोगों के सामने पेश हैं।