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Phool Deyi: Folk Festival Of Uttarakhand - फूल देई: एक लोक त्यौहार

Started by sanjupahari, March 14, 2008, 09:38:20 AM

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फूल देई फूल देई संगरांद को गीत

फूल देई फूल देई संगरांद
सुफल करो नयो साल तुमकु श्रीभगवान
रंगीला सजीला फूल ऐगीं , डाळा बोटाला ह्र्याँ व्हेगीं
पौन पंछे दौड़ी गैन, डाळयूँ फूल हंसदा ऐन,
तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न धन्न कि बरकत ह्वेन
औंद रओ ऋतु मॉस . होंद रओ सबकू संगरांद .
बच्यां रौला तुम हम त , फिर होली फूल संगरांद
फूल देई फूल देई संगरांद


स्रोत्र : डा शिवा नन्द नौटियाल

mohankanti

हमारे गावं  में फूल देई को 'फूल फूल माई' कहते हैं.

उस दिन गावं के सभी बच्चे बाल्टी या बर्तन लेकर और फूल लेकर घर घर में जाते हैं और

'फूल फूल माई, फुल फुल चाव (चावल)
दे दे बूडली, सपे (सभी) चाव (चावल)

और फिर उन चावलों से खीर बनाकर, पूजा करके  खायी जाती है

पंकज सिंह महर

फूलदेई-फूलदेई,
छम्मा देई, छम्मा देई,
देणि द्वार, भर भकार,
ते देलि स बारम्बार नमस्कार।

लोकपर्व फूलदेई के पावन अवसर पर सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाये।

CA. Saroj A. Joshi


विनोद सिंह गढ़िया

आप सभी को सपरिवार उत्तराखण्ड का लोक पर्व 'फूल-देई' की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज फुल देई है ! आप सभी मित्रो को फूलदेई की शुभकामनाये

फूलों का पर्व फूलदेई-हर रंग में एक आस है, विश्वास और अहसास है। हर पर्व में संस्कृति है, सुरूचि और सौंदर्य है। ये पर्व न सिर्फ कलात्मक अभिव्यक्ति के परिचायक हैं, अपितु इनमें गुंथी हैं, सांस्कृतिक परंपराएं, महानतम संदेश और उच्चतम आदर्शों की भव्य स्मृतियां। इन सबके केंद्र में सुव्यक्त होती है - शक्ति। उस दिव्य शक्ति के बिना किसी त्योहार, किसी पर्व, किसी रंग और किसी उमंग की कल्पना संभव नहीं है। एक मौसम विदा होता है और सुंदर सुकोमल फूलों की वादियों के बीच खुल जाती है श्रृंखला त्योहारों की। श्रृंखला जो बिखेरती है चारों तरफ खुशियों के खूब सारे खिलते-खिलखिलाते रंग। हमारी यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। स्नेह, सरलता और पवित्रता की दृष्टि से कुँवारी कन्याएँ साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं। अन्य पूजन और अनुष्ठानों में ब्रम्हभोज की प्रधानता बताई गई है, लेकिन नवरात्रि में शक्ति की उपासना के दौरान अनुष्ठानों की पूर्णता के लिए कन्या पूजन की प्राथमिता बताई गई है। मां कल्याणी है, वहीं पत्नी गृहलक्ष्मी है। बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सभी को फूलदेई की शुभकामनायें।

फूल देई-छम्मा देई, दैंणि द्वार- भर भकार,
यौ देली कैं बार-बार नमस्कार।
एक लोक गीत
फूलदेई -फूलदेई -फूल संग्रान्द
सुफल करी नयो साल तुमको श्रीभगवान
रंगीला सजीला फूल फूल ऐगी , डाल़ा बोटाल़ा हर्या ह्व़ेगीं
पौन पन्छ , दौड़ी गेन, डाल्युं फूल हंसदा ऐन ,
तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न धन बरकत ह्वेन
औंद राउ ऋतू मॉस , होंद राउ सबकू संगरांद
बच्यां रौला तुम हम त फिर होली फूल संगरांद
फूलदेई -फूलदेई -फूल संग्रान्द
फूल संगरांद का यह दिन आज उत्तराखंड में कन्याओं द्वारा प्रसन्नता के साथ मनाया जाता है कन्याएं बैसाखी तक रोज सुबह सुबह देहरी में फूल डालती हैं
आभार स्व श्री शिवा नन्द नौटियाल (लोकगीत )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
बसंत की बयार को घर-घर बांटने की परंपरा है फूलदेई

बसंती उल्लास के पर्व फूलदेई सक्रांति से एक माह तक अनवरत घर की दहलीज को रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू से महकाने वाला चैत्र मास आ गया है। गढ़वाल क्षेत्र में निभाई जाने वाली यह अनूठी रवायत तीर्थनगरी के समीपवर्ती क्षेत्रों में आज भी शिद्दत के साथ निभाई जा रही है।

तीर्थनगरी का स्वरूप लगातार आधुनिक शहर की शक्ल में ढलता जा रहा है। शहर की नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्र भी शहरीकरण की छाया से अछूता नहीं है। मगर, बावजूद इसके आज भी गांवों में कुछ परंपराएं बड़ी शिद्दत के साथ निभाई जा रही हैं। फूलदेई सक्रांत और पूरे चैत्र मास में घर की देहरी पर फूल डालने की परंपरा भी इन्हीं में से एक है। ऋतुराज बसंत प्राणी मात्र के जीवन में नई उमंग लेकर आता है। पेड़ों पर नई कोपलें और डालियों पर तरह-तरह के फूल भी इसी मौसम में खिलती हैं। बसंत के इसी उल्लास को घर-घर बांटने की एक अनूठी परंपरा गढ़वाल क्षेत्र में पूरे चैत्र मास निभाई जाती है जो फूलदेई सक्रांति से शुरू होकर बैशाखी तक अनवरत जारी रहेगी। इस दौरान प्रत्येक परिवार से नन्हीं कन्याएं आसपास क्षेत्र स बांस की बनी कंडियों में ताजे फूल इकट्ठे कर लाती हैं और सुबह-सबेरे अपने व आस-पड़ोस के घरों की दहलीज पर इन्हें बिखेर जाती हैं। रंग-बिरंगे फूलों की यह महक लोगों को बसंत की खूबसूरती का अहसास तो कराती ही है, सुबह-सुबह नन्हीं फुल्यारियों का कलरव भी शुभ संकेत माना जाता है। तीर्थनगरी के आसपास के गांव ढालवाला, चौदहबीघा, तापोवन, गुमानीवाला, श्यामपुर, खदरी, भट्टोवाला, रायवाला, हरिपुरकलां तथा छिद्दरवाला आदि गांवों में यह परंपरा आज भी जीवित है। नई पीढ़ी परंपरा के रूप में ही सही मगर, उल्लास के साथ बसंत की बयार को घर-घर बांटने की परंपरा को निभा रही है। इन नन्हें बच्चों की जुबां से 'चल फुल्यारी फूल क..' और 'डेली मा बैठो राजा, ल्यौ माता मेरा बांठ का खाजा..' जैसा पारंपरिक गीत भी खूब गुनगुनाए जाते हैं।

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गढ़वाल क्षेत्र में फूलदेई की यह पुरानी परंपरा है। आमतौर पर इस परंपरा को बसंत के आगमन से जोड़कर देखा जाता है। फूल और बच्चे दोनों खुशहाली का प्रतीक हैं इसलिए बच्चों के हाथों ही इस परंपरा का निर्वाहन किया जाता है। यह बड़ी बात है कि जहां हम अपने संस्कार व परंपराओं को भूल रहे हैं वहीं ऋषिकेश जैसा शहर फूलदेई संस्कृति को जिंदा रखे हुए है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



सभी मित्रो को फूल देई की हार्दिक शुभकामनाये।  बचपन के वो दिन याद है जब  सुबह-२ हम बुराश और अन्य फूलो की टोकरी लेकर घर घर जाते थे और अपने पड़ोसियो के दरवाजो पर फूल बिखेरते थे।  पदम् श्री डॉक्टर यशोधर मठपाल जी का यह पेंटिंग इस त्यौहार का सही चित्रण व्यक्त करता है।   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फ़ूल धेयी, छम्मा धेयी, देणी द्वार, भर भाकर|
यौ धेयी सौ बार, बारम्बार नमस्कार|