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Bhitauli Tradition - भिटौली: उत्तराखण्ड की एक विशिष्ट परंपरा

Started by हेम पन्त, April 03, 2008, 10:56:07 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


गोस्वामी जी के इस गाने मे भिटोला महीना के बारे मे वर्णन है.

बाटी लागी बारात चेली
बैठ  डोली मे, बाबु की लाडली चेली बैठ डोली मे..

तेरो बाजू भिटोयी आला बैठ डोली मे.....  

एक भिटोला .. बारात के दिन भी दिया जाता है. जैसे ही बारात बिदा होती है.. शाम को लड़की की तरफ़ से लोग भिटोला जाते है.

हेम पन्त

Maine bhi yeh gana suna hai...

Quote from: M S Mehta on April 04, 2008, 03:49:01 PM

गोस्वामी जी के इस गाने मे भिटोला महीना के बारे मे वर्णन है.

बाटी लागी बारात चेली
बैठ  डोली मे, बाबु की लाडली चेली बैठ डोली मे..

तेरो बाजू भिटोयी आला बैठ डोली मे.....  

एक भिटोला .. बारात के दिन भी दिया जाता है. जैसे ही बारात बिदा होती है.. शाम को लड़की की तरफ़ से लोग भिटोला जाते है.


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भिटोली की  कहानी पर आधारित एक नाटक पचास के दशक में अल्मोड़ा के रीगल सिनेमा हॉल में ब्रजेन्द्र लाल शाह जी के निर्देशन में 'बाल्कनजी बाड़ी' के सदस्यों द्वारा खेला गया था.
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अल्मोड़ा में लोग अपनी कुंवारी कन्याओं को भी भिटोली देते हैं जिसमें वे लोग पूरी, सै (चावल का व्यंजन), मिठाई, कपडे और रुपये आदि अपनी लड़कियों को देते हैं तथा मोहल्ले की लड़कियों को पूरी, सै ,मिठाई और रुपये देते हैं.इस प्रकार यह भिटोली पूरे मोहल्ले में बांटी जाती है, लेकिन जिन घरों में लड़कियाँ नहीं होती हैं,वहाँ रुपये को छोड़ कर केवल पकवान दिए जाते हैं.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भिटोला के अलावा कई जगह यह भी प्रथा है की जब किसी लड़की की शादी होते है शादी के पहले साल, लड़के वाले लड़की के घर ओरग देने आते है. यह भी एक प्रकार से भिटोला की तरह है लेकिन फर्क यह है की लड़की वाले अगस्त (सौन) के महीना जिसे काला महीना भी माना जाता है और लड़की आपने माता-पिता के घर मे ही रहती है.

पंकज सिंह महर


सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। रिकार्ड तोड़ महंगाई से आम का जीना दूभर हो गया है। हालत यह है कि चैत्र मास में उत्तराखण्ड में बहन को दी जाने वाली भिटौली भी इससे प्रभावित हो गयी है।

उत्तराखण्ड की यह प्राचीन परम्परा है कि चैत्र मास में भाई अपनी बहिन को भिटौली देना नहीं भूलता। इसकी मान्यता व महत्ता का अंदाजा इस बात से लगता है कि लोकगीत भी इसके बिना पूरे नहीं हो पाते। पारंपरिक गीतों में इस परंपरा का बहुतायत उल्लेख मिलता है। भिटौली देने के लिए पूड़ी, हलवा, खजूरे, गुड़ तथा मिष्ठान के साथ ही वस्त्र भी भेंट किए जाते है। इस परम्परा को निभाने में महंगाई आड़े आ गयी है। महंगाई की पीड़ा हर उस चेहरे में दिखाई दे रही है, जो अपनी बहन को हर वर्ष देने वाले उपहार उतने नहीं दे पाया जितना मन था।

खाद्य पदार्थो, तेल, घी, आटा, चावल, गुड़ की आसमान छूती कीमतों ने उन लोगों का बजट संतुलन काफी खराब किया है। बयाला-खालसा के कै.उम्मेद सिंह कैड़ा महंगाई पर चिंता व्यक्त करते हुए बताते हैं कि सामान्य व्यक्ति को भी आज की कीमतों से भिटौली की व्यवस्था करना बड़ा मुश्किल हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में भिटौली देना इसलिए भी महंगा हो गया है, क्योंकि गांवों में आज भी पूरे गांव में भिटौली की पूड़ी, हलुवा तथा गुड़ देने की परंपरा है।

सामान्य वर्ग के लिए महंगाई की मार का यह असर है तो जो लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते है व अधिक बेटियां भी इन्ही क्षेत्रों में होती है तो उनके आंसू कौन पोंछेगा।

पंकज सिंह महर

भिटौली लोकगीतों में-

ओहो, रितु ऎगे हेरिफेरि रितु रणमणी, हेरि ऎछ फेरि रितु पलटी ऎछ।
ऊंचा डाना-कानान में कफुवा बासलो, गैला-मैला पातलों मे नेवलि बासलि॥
ओ, तु बासै कफुवा, म्यार मैति का देसा, इजु की नराई लागिया चेली, वासा।
छाजा बैठि धना आंसु वे ढबकाली, नालि-नालि नेतर ढावि आंचल भिजाली।
इजू, दयोराणि-जेठानी का भै आला भिटोई, मैं निरोलि को इजू को आलो भिटोई॥

हेम पन्त

पिथौरागढ में भिटौली से संबन्धित एक और त्यौहार मनाया जाता है.. चैंतोल

चैत के अन्तिम सप्ताह में मनाये जाने वाले इस त्यौहार में एक डोला निकलता है. मुख्य डोला पिथौरागढ के समीपवर्ती गांव चहर/चैसर से निकलता है. यह डोला 22 गांवों में घूमता है.

चैंतोल का यह डोला भगवान शिव के देवलसमेत अवतार का प्रतीक है जो 22 गांवों में स्थित भगवती देवी के थानों में भिटौली के अवसर पर पहुंचता है. हर मन्दिर पर पैदल पहुंच कर देवलसमेत देवता 'धामी' शरीर में अवतार होकर के अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं.

पंकज सिंह महर

हेम दा, पिथौरागढ़ में इसी पर्व में एक और प्रथा है जिसमें घंटाकर्ण जी अपनी बहन (शायद) भगवती को भिटौली देने जाते हैं, इस बारे में यदि आपको पता हो तो कृपया हमें भी अवगत कराने की कृपा करें।

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भिटौली के सम्बन्ध में एक दंत कथा (लोक कथा) प्रचलित है :

एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे | उनमें बहुत प्यार था | १५ वर्ष की उम्र में देबुली की शादी हुई ( जो उस समय के अनुसार बहुत  बड़ी उम्र थी ) |शादी के बाद भी दोनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा | दोनों ही भिटौली के त्यार की  प्रतीक्षा करने लगे | अंततः समय आने पर नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर  खुशी - खुशी बहन से मिलने चला | बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी | पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया | देबुली तब गहरी नींद में सोई थी | थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया | सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी | देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी | अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा | शनिवार को देबुली के घर जाने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था | नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस  अपने गाँव चला गया |
देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी |  नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं |वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी | लेकिन भाई नहीं मिला | वह पूरी बात समझ गयी |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये | कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' बन गयी और चैत के महीने में आज भी गाती है :


                       भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती