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Bhitauli Tradition - भिटौली: उत्तराखण्ड की एक विशिष्ट परंपरा

Started by हेम पन्त, April 03, 2008, 10:56:07 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे " भिटौली " के लिए भाई की प्रतीक्षा में  बहिन

मित्रो ! बसंत  का सुआगमन हो गया है | बुरांश फुल गया है और सरसों  फूलने लगी है । " कपुवा "के साथ ही  अन्य पंछियों के सुमधुर स्वर सुनाई देने लगे हैं | हरेक प्राणी उल्लास से भर गया है | " भिटौली " का महीना  आ गया है । " भिटौली " के लिए  ब्याहता बहिने ससुराल में अपने भाइयों की प्रतीक्षा करने लगी  हैं कि उनके भाई " भिटौली " लेकर आते ही होंगे । " भिटौली " के इस महीने में  आज आपको कुमांऊँ का बहुत पुराना ऋतु लोक गीत से रूबरू करा देते है |

रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
डाली में कफुवा वासो , खेत फुली दैणा |
कावा जो कणाण , आजि रते वयांण |
खुट को तल मेरी आज जो खजांण |
इजु मेरी भाई भेजली भिटौली दीणा |
रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
वीको बाटो मैं चैंरुलो |
दिन भरी देली मे भै रुंलो |
वैली रात देखछ मै लै स्वीणा |
आगन बटी कुनै ऊँनौछीयो -
कां हुनेली हो मेरी वैणा ?
रितु रैणा , ऐ गे रितु रैणा |
रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा ||

भावार्थ :-

रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
डाल पर "कफुवा " पक्षी कुजने लगा | खेतों मे सरसों फूलने लगी |
आज तडके ही जब कौआ घर के आगे बोलने लगा |
जब मेरे तलवे खुजलाने लगे , तो मैं समझ गई कि -
माँ अब भाई को मेरे पास भिटौली देने के लिए भेजेगी |
रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
मैं अपने भाई की राह देखती रहूंगी |
दिन भर दरवाजे मे बैठी उसकी प्रतीक्षा करुँगी |
कल रात मैंने स्वप्न देखा था |
मेरा भाई आंगन से ही यह कहता आ रहा था -
कहाँ होगी मेरी बहिन ?|
रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती ||

( कुमांऊँ का लोक साहित्य )