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Story Of Gweljyu/Golu Devta - ग्वेल्ज्यु या गोलू देवता की कथा

Started by Anubhav / अनुभव उपाध्याय, April 06, 2008, 10:31:36 AM

Devbhoomi,Uttarakhand


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नवीन जोशी



[/size]ग्वल देव के दरबार में न्यायालयों से थके हारे लोग लगाते हैं न्याय की गुहार
ग्वेल, ग्वल, गोलज्यू कुछ भी कह लीजिऐ, यह कुमाऊं के सर्वमान्य न्याय देवता के नाम हैं, जो आज भी न्यायालयों में पूरी उम्र न्याय की आश में ऐड़िया रगड़ने को मजबूर लोगों को चुटकियों में न्याय दिलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इस हेतु उनके दरबार में न्याय की आस में लोग बकायदा सादे कागजों के साथ ही स्टांप पेपरों पर भी अर्जियां लगाते हैं। यह भी मान्यता है कि यहां अर्जियां लगाने से श्रद्धालुओं को नौकरी, विवाह, संपत्ति आदि की रुकावटें भी दूर होती हैं।[/color]
ग्वल देव कुमाऊं के राजकुमार थे। उनका राजमहल आज भी चंपावत में बताया जाता है। अपने जन्म से ही सौतेली माताओं के षडयन्त्र के कारण कई विषम परिस्थितियों में घिरे राजकुमार अपने न्याय कौशल से ही राजभवन लौट पाऐ थे। इसी कारण उन्हें न्याय देव के रूप में कुमाऊं के जन जन द्वारा ईष्ट देव के रूप में अटूट आस्था के साथ पूजा जाता है। चंपावत, द्वाराहाट, चितई व नैनीताल के निकट घोड़ाखाल नामक स्थान पर उनके मन्दिर स्थित हैं, जहां प्रवासी कुमाउंनियों के साथ ही अन्य प्रदेशों के लोग भी लगातार आते रहते हैं, और खास पर्वों पर मन्दिरों में भक्तों का मेला लगता है। उनके मन्दिरों को कमोबेश देश, राज्य में चल रही राजस्व व्यवस्था की तरह ही न्यायिक अधिकार बताऐ जाते हैं। श्रद्धालुओं को इसका लाभ भी मिलता है। घोड़ाखाल एवं चितई आदि मन्दिरों में बंधी असंख्य घंटियां बताती हैं कि कितने लोगों को यहां से न्याय मिला और मनमांगी मुराद पूरी हुई।[/color]
युगलों के विवाह का पंजीकरण भी होता है यहां [/color]

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[/size]जिस प्रकार युगल वैवाहिक बंधन में बंधने के लिए परगना मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विवाह पंजीकृत कराते हैं, उसी तर्ज पर ग्वल देव के मन्दिरों में भी विवाह का पंजीकरण किया जाता है। इस हेतु बकायदा स्टांप पेपर पर वर एवं वधु पक्ष के गिने चुने और कभी कभार प्रेमी युगल भी मन्दिर पहुंचते हैं, और स्टांप पेपर पर विवाह बंधन में बंधने का शपथ पत्र देते हैं। जिसके बाद ही यहां सादे विवाह आयोजन की इजाजत होती है।
[/size]लेकिन घंटों का गला पकड़ लिया गया...[/size]
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मन्दिरों के घंटे घड़ियालों की मधुर ध्वनि किसे अच्छी नहीं लगती। इसे पर्यावरण के शुद्धीकरण में भी उपयोगी माना जाता है। लेकिन लगता है कि घोड़ाखाल मन्दिर प्रबंधन इसका अपवाद है। मनमांगी मुरादें पूरी होने पर श्रद्धालु ग्वल देव के मन्दिरों में घंटियां चढ़ाते हैं। छोटी घंटियों की असंख्य संख्या को देखते हुऐ पूर्व में घोड़ाखाल मन्दिर प्रबंधन ने छोटी घंटियों को गलाकर बड़ी घंटियों में बदल दिया था। मन्दिर में सवा टन भारी घंटियां तक मौजूद हैं। लेकिन इधर मन्दिर प्रबंधन लगता है घंटियों की मधुर ध्वनि से परेशान है। शायद इसी लिए घंटियों को इस तरह बांध दिया गया है कि श्रद्धालु चाहकर भी इसे नहीं बजा पाते। मन्दिर के पुजारी भी नि:संकोच स्वीकार करते हैं कि घंटियों की अधिक ध्वनि के कारण उन्हें बांध दिया गया है।

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पंकज सिंह महर


Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड के अल्मोडा जिले से लगभग दस किलोमीटर दूर चितई के पास गोल्यूजी न्याय देवता का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां भारी संख्या में पीतल की छोटी बड़ी घंटियों को बंधा देखा जा सकता है।

मंदिर की देखरेख के कार्य में लगे शंकर सिंह गैरोला ने विशेष बातचीत के दौरान बताया कि जिन लोगों के पक्ष या विपक्ष में भी गोल्यूजी ने न्याय किया है उन लोगों ने कोर्ट फीस के रूप में ये घंटियां बांधी हैं। उन्होंने बताया कि उनको खुद यह याद नहीं है कि कब से यह प्रथा चली आ रही है लेकिन इनमें से काफी घंटियों का पचास से लेकर साठ साल पुराना होना तो मामूली बात है।

गैरोला ने बताया कि मंदिर की खासियत यह है कि लोग यहां अन्य मंदिरों की तरह आमतौर पर अपनी मन्नतें नहीं मांगते हैं बल्कि वे लोग न्याय की अपील करते हैं। न्याय की अपील के लिए मंदिर परिसर में लाखों की संख्या में कागजों पर लिखे पत्र देखे जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को सामान्य न्यायालयों से न्याय नहीं मिलता, वे लोग गोल्यूजी के मंदिर में आकर बाकायदा 10 रुपए से लेकर 100 रुपए तक के गैर न्यायिक स्टांप पेपर पर लिखित में अपनी-अपनी अपील करते हैं और जब उनकी अपील पर सुनवाई हो जाती है तो वे कोर्ट फीस के रूप में यहां आकर अपनी-अपनी सुविधानुसार घंटियां तथा घंटे बांधते हैं।

उन्होंने बताया कि यहां लगी इन घंटियों को न तो बेचा जाता है और न ही उसे गलाया जाता है। घंटियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर के पास बडे़-बडे़ हॉल बनाए गए हैं जहां इन घंटियों को रखा गया है।

चितई के 45 वर्षीय निवासी रूपचंद चौहान ने बताया कि उनके दादा ने भी इस मंदिर में घंटी बंधवाई थी और उन्हें न्याय मिला था। हालांकि उन्हें यह नहीं मालूम है कि किस समस्या को लेकर गोल्यूजी न्याय देवता ने न्याय किया था। उन्होंने बताया कि पूरे उत्तराखंड के लोगों को आज भी अन्य प्रशासनिक न्यायालयों की तुलना में गोल्यूजी न्यायालय पर अधिक विश्वास है। लोग अपनी जमीन की समस्या से लेकर आपसी तकरार तक का फैसला गोल्यूजी से कराने के लिए अपील लिखते हुए देखे जा सकते हैं।

संवाददाता ने मंदिर परिसर का भ्रमण कर देखा कि लाखों की संख्या में लोगों ने गैर न्यायिक स्टांप पेपर पर अपनी-अपनी समस्याओं को खुलेआम लिख रखा है। किसी की समस्या आर्थिक है तो किसी की जमीन से संबधित है। किसी को व्यापार में साझीदार द्वारा धोखा मिला है तो उसने न्याय की गुहार लगा रखी है।