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How To Save Forests? - कैसे बचाई जा सकती है वनसम्पदा?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 03, 2008, 10:15:21 AM

पंकज सिंह महर

देहरादून, जागरण संवाददाता: ग्रीष्मकाल के दौरान सूबे के जंगलों का आग की चपेट में आ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। यह हमेशा की चिंता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पहले आग बुझाने में जनसहभागिता रहती थी, जो आज कहीं नजर नहीं आती। आजादी के कुछ समय बाद तक जनता आग को बुझाना अपना नैतिक दायित्व समझती थी, लेकिन जबसे वनों पर जनता के अधिकार छिने, उसका वनों के प्रति मोह भंग-सा हो गया। यही वजह है कि आज जंगलों की आग पर काबू पाने में वन महकमा असमर्थ-सा नजर आता है। वर्ष 1850 से 1920 तक का समय उत्तराखंड (टिहरी रियासत को छोड़कर) के जंगलों से जनता के निर्बाध अधिकार समाप्त कर उन पर सरकारी स्वामित्व काबिज करने का दौर रहा है। अपने अधिकार छिनते देख और व्यावसायिक क्षेत्र के लिए जंगलों के असीमित दोहन से जनता रुष्ट हो उठी। आखिरकार उसके इस गुस्सैल रवैये के आगे तत्कालीन ब्रिटिश हुक्मरानों को झुकना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि हुकूमत ने बाकायदा ग्रीवेंसेज कमेटी गठित कर न सिर्फ कमेटी के जंगलों में जनता के अधिकार सुरक्षित रखने के सुझावों को स्वीकारा, बल्कि जनता के अधिकार क्षेत्र के वनों को स्वीकृति देते हुए पंचायती वन प्रणाली लागू करने का अहम् फैसला भी लिया। ग्रीवेंसेज कमेटी की सिफारिशें मान लेने के बाद जनता ने पुन: जंगलों का आलिंगन कर लिया। यही कारण था कि 1960 तक जनता जंगलों में आग लगने पर अपना कर्तव्य मानते हुए उसे बुझाने को दौड़ पड़ती थी। लेकिन, बाद के वर्षो में यह परंपरा खत्म होती चली गई और इसकी मुख्य वजह रही जंगलों से जनता के अधिकार निरंतर कम होते जाना। चिपको आंदोलन से जुड़े रहे राधेश्याम हटवाल बताते हैं कि वर्ष 1963-64 में सरकार ने वनों की व्यवस्था में कई परिवर्तन किए, जिनमें जनता के अधिकारों पर प्रहार करने वाला प्रमुख परिवर्तन प्रथम श्रेणी वनों पर पूर्ण रूप से वन विभाग का हस्तक्षेप काबिज किया जाना था। जल-जंगल-जमीन आंदोलन से जुड़ी सावित्री बिष्ट कहती हैं कि जंगलों को आग और तस्करी से बचाने का एकमात्र मार्ग जनआधारित वन व्यवस्था है। यह तभी संभव है जब जनता को जंगलों में छीने गए अधिकार लौटाए जाएं। साथ ही वन पंचायतों को आरक्षित, प्रथम व द्वितीय श्रेणी वनों के संचालन के लिए प्रोत्साहित किया जाए। जब जनता को लगेगा कि जंगलों में उसका स्वामित्व बरकरार है तो आग बुझाने के लिए वह स्वत: ही आगे आ जाएगी। उसे ऐसा करने के लिए न तो प्रशिक्षण देने की जरूरत है और न बजट, वाहन या हेलीकॉप्टर की व्यवस्था ही करनी पड़ती है।


हेम पन्त

डीडीहाट(पिथौरागढ़): तहसील क्षेत्र के चरमा स्थित जंगल में लगी आग की चपेट में आने से सेना का एक आवास जल कर राख हो गया। चरमा से लेकर ओगला तक दो किमी क्षेत्र में फैले वन में लगी आग पर वन कर्मियों, फायर ब्रिगेड और स्थानीय जनों के प्रयास से काबू पा लिये जाने से सेना के अन्य क्वार्टर बचा लिये गये है।

बुधवार की दोपहर को चरमा स्थित चीड़ के जंगलों में अचानक आग लग गयी। विगत लम्बे समय से वर्षा नहीं होने के कारण वृक्षों से गिरी पत्तियों के सूखे होने के कारण आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया। यहां पर वृक्षों के बीच सेना के क्वार्टर बने हुए है। सेना के क्वार्टरों के लकड़ी के बने होने तथा लम्बे समय से सेना के यहां पर नहीं रहने से उनकी उचित देखभाल नहीं होने के कारण सीओ आवास आग की चपेट में आ गया। स्थानीय जनता द्वारा इसकी सूचना वन विभाग को दी गयी।सूचना मिलते ही ओगला और डीडीहाट से वन कर्मी चरमा पहुंचे। इस बीच फायर ब्रिगेड पिथौरागढ़ को भी फोन से सूचना दी गयी। चालीस किमी दूर जिला मुख्यालय से फायर ब्रिगेड भी पहुंच गयी।

वन विभाग, फायर ब्रिगेड और स्थानीय जनता के प्रयास से आग पर काबू पाने का प्रयास किया गया। समय पर आग पर काबू पाने के प्रयास होने से यहां पर बने लगभग सेना के एक दर्जन क्वार्टर जलने से बच गये। वन कर्मियों के मौके पर होने के कारण बड़े वृक्षों को जलने से बचा लिया गया। जबकि चरमा से ओगला के बीच दो किमी क्षेत्र के जंगल में लगी इस आग से भारी संख्या में छोटे वृक्ष नष्ट हो चुके है।



हेम पन्त

नाचनी (पिथौरागढ़): मार्च माह में भी सूरज की तपिश बढ़ जाने से नाचनी और बिर्थी के जंगलों में आग लगनी शुरू हो चुकी है। नाचनी से लेकर बिर्थी तक जंगलों में लगी आग से जहां महत्वपूर्ण वृक्षों सहित यहां आसरा बनाये वन्य जीवों को खतरा बढ़ता जा रहा है।

इस वर्ष शीतकाल में पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण भूमि में नमी समाप्त होने से जंगलों में मार्च माह के प्रथम पखवाड़े ही आग लगनी शुरू हो चुकी है। इस समय तहसील मुनस्यारी के नाचनी से बिर्थी तक के जंगल आग से धधक रहे है। नाचनी के घाटी में होने के कारण यहां पर चीड़ के जंगलों में आग लगी है लेकिन ऊंचाई पर स्थित बिर्थी के चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों से घिरे जंगल भी आग से अछूते नहीं रह चुके है। बिर्थी के जंगलों में अधिकांशत: बांज, फल्यांट, सुरई ,काफल, बुरांश आदि के वृक्ष है। यह जंगल बिर्थी से खलियाटाप तक फैला है। इन दिनों उच्च हिमायली वन्य जन्तुओं द्वारा इन जंगलों को अपना प्रवास स्थल बनाया गया है।

बिर्थी के जंगलों में लगी आग से वन्य जीवों को खतरा बना हुआ है। जंगल में लगी आग शीघ्र नहीं बुझने पर स्थिति खराब होने के आसार बने हुए है। विदित हो कि इस समय दिन में तापमान बढ़ने और सुबह और सायं तेज हवाएं बहने से आग तेज होती जा रही है।

पंकज सिंह महर

देहरादून। जंगलों को दावाग्नि से बचाने के लिए वन महकमे के दावों की हवा निकलने लगी है। इस वर्ष जैसा मौसम का मिजाज है, उससे तो आने वाले दिनों में वन महकमे की मुश्किलें कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे। आलम यह है कि गर्मी की दस्तक के साथ ही पहाड़ में जंगल सुलगने लगे हैं और अगर इंद्रदेव रूठे रहे तो वनाग्नि की रोकथाम के लिए विभाग को नाकों चने चबाने पड़ेंगे।

उत्तराखंड में 34650.444 वर्ग किमी क्षेत्र में जंगल हैं, जिन्हें सुरक्षा के मद्देनजर 13 वृत्त, 44 प्रभाग, 284 रेंज व 1503 बीटों में बांटा गया है। भारी-भरकम विभागीय अमले के बावजूद हर वर्ष फायर सीजन शुरू होते ही सूबे के जंगलों में आग भड़कना आम बात है और इस बार तो हालात ज्यादा चिंताजनक हैं। पूरी सर्दी बिन बरसात गुजर गई और गर्मियों में मौसम साथ देगा, इसकी भी संभावना कम ही है। विभाग भी यह मानता है कि मौसम के साथ न देने से इस मर्तबा चुनौतियां अधिक होंगी। इससे निबटने को विभाग की ओर से पूरी तैयारी का दावा किया गया था। इसके लिए फायर लाइनों का निर्माण व सफाई, फॉरेस्ट फायर ड्रिल, प्रभाग, जिला, ब्लाक व ग्राम स्तर पर समितियों का पुनर्गठन, क्रू-स्टेशनों की स्थापना, आग बुझाने में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पर्याप्त उपलब्धता, दैनिक श्रमिकों की नियुक्ति के साथ ही संचार तंत्र को दुरुस्त किए जाने के दावे भी किए थे। इन दावों की गर्मी की दस्तक के साथ ही हवा निकलने लगी है। गढ़वाल मंडल के चमोली, जोशीमठ, पौड़ी, लैंसडौन आदि वन प्रभागों के साथ ही कुमाऊं मंडल के कई हिस्सों में तो अभी से जंगलों में दावाग्नि भड़क उठी है। इससे बड़ी तादाद में बहुमूल्य वन संपदा और कितने ही वन्य जीव-जंतु भेंट चढ़ गए होंगे, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। हालांकि, वन महकमा इसे सामान्य क्रम का हिस्सा मान रहा है। इस परिदृश्य के बीच इतना तय है आने वाले दिनों में भी मौसम की बेरुखी जारी रही तो दावाग्नि पर अंकुश लगा पाना टेढ़ी खीर होगी। हालांकि, विभाग हमेशा ही यह लकीर पीटता है कि जंगलों को आग से बचाना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। लेकिन, यह समझने की कोशिश शायद ही हुई हो कि लोगों पर जिम्मेदारी आयद कर लेने भर से दायित्वों का निर्वहन नहीं होता। इसके लिए विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना ही होगा।



यह बात सही है कि जंगल को आग से बचाने का काम हर आम आदमी का है, पहले ग्रामीण इस काम को पूरी तन्मयता से और अपनीए जिम्मेदारी समझ कर करते भी थे। लेकिन अब लोग ऎसा क्यों नहीं करते? इसकी तह में सरकार को जाना चाहिये, पहले जंगल पर उस आम आदमी का अधिकार था, तो उसे वह अपना लगता था और उसकी देख-रेख करना वह अपना दायित्व समझता था, मानता था। लेकिन सरकारी तंत्र ने उसे इस जंगल से दूर कर दिया, जंगल और पर्यावरण बचाने के लिये सरकारों ने, नियम-कानूनों ने लोगों को जंगल से बाहर कर दिया, उसका जंगल में जाना, घास लाना, लकड़ी लाना बैन कर दिया, तो लोग भी जंगल से विमुख हो गये.........मैने कई बार लोगों से सुना कि सरकार का जंगल है, वह बुझाये आग, ज्ब हम इसके अन्दर भी नहीं जा सकते, सूखी-गिरी लकड़ी नहीं ला सकते तो हमें क्या, जले-बचे। उस बेचारे की सोच यहां तक डेवलप नहीं हुई है कि जंगल से ईको-सिस्टम को राहत होगी, पर्यावरण, ग्रीन-हाउस गैस....आदि-आदि। उसकी सोच व्यवहारिक हो गई है कि "तू मेरा नहीं तो मैं तेरा क्यो?" सरकार को इस बात को पहले तो खुद समझना होगा और लोगों को भी समझाना होगा कि जंगल की महत्ता घास-चारे-लकड़ी के अलावा भी है और सरकार को जंगलों को आम आदमी के हवाले करना चाहिये, उसे उसका अधिकार देना चाहिये, वन नीति विलेजर्स फ्रेंडली होनी चाहिये
बिना जन सहभागिता के उत्तराखण्ड जैसे विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य में वनों को नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि यहां आग चाहे ऊपरी सिरे से लगे या निचले सिरे से लगेगी पुरे पहाड़ में और इसमें बीच में पानी के खाल भी पहाड़ों पर नहीं होते जो मैदानी क्षेत्रों के वनों में हो सकते है और आग यहां पर आकर रुक जायेगी। एक पतरौल इस जंगल की आग को बुझाने के लिये पर्याप्त नहीं है।

पंकज सिंह महर

डीडीहाट(पिथौरागढ़): क्षेत्र के जंगलों में लगी आग और भड़क गयी है। कई चीड़ और बांज के जंगल धूं धूं कर जल रहे है। आग पर काबू नहीं पाने से अब तक करोड़ों की वन संपदा नष्ट होने की आशंका है। उड़मा व तल्ला उड़मा के जंगलों में वनों की आग के कारण हजारों रुपये मूल्य की घास और लकड़ी राख हो गयी है। जंगलों की आग से घास को बचाने के लिये ग्रामीणों को रात-रात भर पहरा देना पड़ रहा है।

तापमान बढ़ने के साथ ही जंगलों में आग लगने का सिलसिला तेज हो गया है। वन विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद आग पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। मंगलवार की रात्रि चर्मागाड़ के ऊपर तीमूलेख व डनईजर के जंगल आग की चपेट में आ गये। गुड़ौली ग्राम सभा का अधिकांश वन्य क्षेत्र जलकर नष्ट हो चुका है। उधर उड़मा के जंगलों में फैली आग के कारण ग्रामीणों की हजारों रुपये मूल्य की सूखी घास राख हो गयी। आग के भय से ग्रामीणों को रात भर जागकर पहरा देना पड़ रहा है।

पंकज सिंह महर

यह बात सही है कि जंगल को आग से बचाने का काम हर आम आदमी का है, पहले ग्रामीण इस काम को पूरी तन्मयता से और अपनीए जिम्मेदारी समझ कर करते भी थे। लेकिन अब लोग ऎसा क्यों नहीं करते? इसकी तह में सरकार को जाना चाहिये, पहले जंगल पर उस आम आदमी का अधिकार था, तो उसे वह अपना लगता था और उसकी देख-रेख करना वह अपना दायित्व समझता था, मानता था। लेकिन सरकारी तंत्र ने उसे इस जंगल से दूर कर दिया, जंगल और पर्यावरण बचाने के लिये सरकारों ने, नियम-कानूनों ने लोगों को जंगल से बाहर कर दिया, उसका जंगल में जाना, घास लाना, लकड़ी लाना बैन कर दिया, तो लोग भी जंगल से विमुख हो गये.........मैने कई बार लोगों से सुना कि सरकार का जंगल है, वह बुझाये आग, ज्ब हम इसके अन्दर भी नहीं जा सकते, सूखी-गिरी लकड़ी नहीं ला सकते तो हमें क्या, जले-बचे। उस बेचारे की सोच यहां तक डेवलप नहीं हुई है कि जंगल से ईको-सिस्टम को राहत होगी, पर्यावरण, ग्रीन-हाउस गैस....आदि-आदि। उसकी सोच व्यवहारिक हो गई है कि "तू मेरा नहीं तो मैं तेरा क्यो?" सरकार को इस बात को पहले तो खुद समझना होगा और लोगों को भी समझाना होगा कि जंगल की महत्ता घास-चारे-लकड़ी के अलावा भी है और सरकार को जंगलों को आम आदमी के हवाले करना चाहिये, उसे उसका अधिकार देना चाहिये, वन नीति विलेजर्स फ्रेंडली होनी चाहिये।
बिना जन सहभागिता के उत्तराखण्ड जैसे विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य में वनों को नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि यहां आग चाहे ऊपरी सिरे से लगे या निचले सिरे से लगेगी पुरे पहाड़ में और इसमें बीच में पानी के खाल भी पहाड़ों पर नहीं होते जो मैदानी क्षेत्रों के वनों में हो सकते है और आग यहां पर आकर रुक जायेगी। एक पतरौल इस जंगल की आग को बुझाने के लिये पर्याप्त नहीं है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

As the summer is approaching near, there is always of fire in forest to pipe leaves.

Every year, heavy loss incur their uttarakhand in terms of forest.. Govt and some civil bodies must do something towards this.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Every year heavy loss incur to the forest of Uttarakhand due to wild fire. As the summer is approaching fast, news of fire has satrted coming.


जंगलों में लगी आग से लाखों की वन संपदा स्वाहाApr 01, 01:19 am

गोपेश्वर (चमोली)। मुख्यालय के सामने केदारनाथ वन प्रभाग के त्रिशूला रेंज के जंगलों में पिछले दो दिन से लगी आग से लाखों की वन संपदा जलकर राख हो गई। आग क्षेत्र में इस कदर फैल रही है कि वन विभाग के आग बुझाने के प्रयास बौने साबित हो रहे हैं।

बीते सोमवार से केदारनाथ वन प्रभाग के त्रिशूला रेंज के जंगलों में आग लग गई। धीरे-धीरे आग पूरे क्षेत्र में फैल गई, जिससे अब तक लाखों रुपये की वन संपदा जलकर खाक हो गई। क्षेत्र में लगी आग के भयानक रूप को देखते विभाग के कर्मचारियों के आग बुझाने के प्रयास नाकाफी नजर आ रहे हैं। केदारनाथ वन प्रभाग के डीएफओ धीरज पांडे ने बताया कि पिछले दिन क्षेत्र के कुछ शरारती तत्वों ने यह आग लगाई है। उन्होंने बताया कि सोमवार देर शाम जाकर आग पर काफी काबू पा लिया गया था, लेकिन फिर देर रात्रि जाकर अचानक पूरे क्षेत्र में आग फैल गई। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में आग बुझाने के लिए विभाग की टीम ग्रामीणों की मदद से काम कर रही है और जल्द ही आग पर नियंत्रण पा लिया जाएगा।

पंकज सिंह महर

 
देहरादून, जागरण संवाददाता: जंगलों को दावाग्नि से बचाने के वन महकमे के दावों की हवा निकलने लगी है। इस बार जैसा मौसम का मिजाज है, उससे तो आने वाले दिनों में वन महकमे की मुश्किलें कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे। आलम यह है कि पारा चढ़ने के साथ ही सूबे में जंगल धू-धू कर जलने लगे हैं। इंद्रदेव की बेरुखी यूं ही बनी रही तो वनाग्नि की रोकथाम के लिए विभाग को नाकों चने चबाने पड़ेंगे। सूबे में 34650.444 वर्ग किमी क्षेत्र में जंगल हैं, जिन्हें सुरक्षा के मद्देनजर 13 वृत्त, 44 प्रभाग, 284 रेंज व 1503 बीटों में बांटा गया है। भारी-भरकम विभागीय अमले के बावजूद हर वर्ष फायर सीजन शुरू होते ही सूबे के जंगलों में आग भड़कना आम बात है और इस बार तो हालात खासे चिंताजनक हैं। पूरी सर्दी बिन बरसात गुजर गई और गर्मियों में मौसम साथ देगा, इसकी भी संभावना फिलहाल तो नजर नहीं आ रही। विभाग भी मानता है कि मौसम के साथ न देने से इस मर्तबा चुनौतियां अधिक होंगी। हालांकि, दावाग्नि से निबटने को कंट्रोल बर्निग, फायर लाइनों का निर्माण व सफाई, फॉरेस्ट फायर ड्रिल, प्रभाग, जिला, ब्लाक व ग्राम स्तर पर समितियों का पुनर्गठन, क्रू-स्टेशनों का निर्माण, आग बुझाने में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पर्याप्त उपलब्धता, दैनिक श्रमिकों की नियुक्तिआदि कार्य जोर-शोर से चलाए जाने के साथ ही संचार तंत्र को दुरुस्त किए जाने के दावे किए थे। विभाग का कहना था कि जंगलों में गश्त तेज करने के साथ ही हर रेंज को संचार सुविधा से अपडेट किया जा रहा है। गढ़वाल मंडल के चमोली, जोशीमठ, केदारनाथ, पौड़ी, लैंसडौन, थलीसैण, मसूरी, कालसी, कालागढ़ आदि वन प्रभागों के साथ ही कुमांऊ मंडल के अधिकतर हिस्सों में दावाग्नि भड़क रही है। इन दिनों बहुमूल्य वन संपदा और न जाने कितने वन्य जीव-जंतु इसकी भेंट चढ़ गए होंगे। हालांकि, वन महकमा इसे सामान्य क्रम का हिस्सा मान रहा है। इस परिदृश्य के बीच इतना तय है कि आने वाले दिनों में भी मौसम की बेरुखी जारी रही तो दावाग्नि पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा। हालांकि, विभाग हमेशा ही यह लकीर पीटता है कि जंगलों को आग से बचाना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।



पंकज सिंह महर


जंगलों में आग लगना पर्यावरण के लिहाज से ठीक नहीं है, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और आजकल गेहूं की कटाई के बाद खेत भी खाली होते है, लोग घास-फूस, कांटे इकट्ठे करके उसे भी खेतों में जला रहे हैं, अच्छा यह होता कि इस कूड़े को वे लोग कहीं पर इकट्ठा कर लेते तो अच्छी खाद बन जाती, इसके प्रति जनता को समझाने और बताने की जरुरत है।

बांज, बुरांस, उतीस, देवदार आदि इको फेन्डली पेडों के घने जंगल जहां से शुरु होते हैं, उसे आग से बचाने के लिये वन विभाग एक काम कर सकता है कि जहां से डेंस फारेस्ट शुरु होता है, उसकी परिधि में एक मीटर चौड़ाई और आधे मीटर गहराई की खाई खोद दी जाय और साल में एक बार उसकी साफ सफाई भी करा दे। इससे होगा ये कि जब आग यहां तक पहुचेगी तो इससे आगे नहीं बढ़ पायेगी, बरसात के दिनों में इस खाई में पानी भी भर जायेगा, इतनी छोटी खाई वन्य जीवों के लिये भी घातक नहीं होगी।