• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Gopeshwar: Historical City - गोपेश्वर: एक ऎतिहासिक नगर

Started by पंकज सिंह महर, May 14, 2008, 11:39:58 AM

पंकज सिंह महर

गोपेश्वर का इतिहास गोपीनाथमन्दिर से निकट से जुड़ा है, जिसके इर्द-गिर्द यह शहर बसा है। मन्दिर परिसर में पाये गये एक लोहे के त्रिशूल पर खुदे लेख वर्तमान 6-7वीं सदी के हैं। चार लेख संस्कृत की नागरी लिपि में हैं, जिनमें स्कंदनाग, विष्णुनाग तथा गणपतनाग जैसे शासकों का वर्णन है। वर्ष 1191 से एक अन्य लेख में नेपाल के सामान्य वंश के शासक अशोक माल्ला का वर्णन है। प्राचीन काल में शासकों द्बारा अपनी प्रभुता की घोषणा करने का एक सामान्य तरीका होता था विजय के प्रतीक के रूप में एक त्रिशूल गाड़ देना। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण, जो वर्ष 1970 से ही मंदिर की देखभाल कर रहा है, के अनुसार मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासन के दौरान 9-11वीं सदीं के मध्य हुआ।

      मूलरूप से प्राचीन काल में यह गांव मन्दिर से 280 मीटर दूर था तथा उसे रानीहाट या कश्मीरहाट कहते थे। जैसा कि नाम से पता चलता है, यह एक बाजार था जो निपुण मूर्तिकारों के लिये प्रसिद्ब था, वे मुलायम पत्थरों से धार्मिक मूर्तियां गढ़ते थे और केदारनाथ-बद्रीनाथ जाने वाले पैदल तीर्थयात्रियों को बेचते थे। तीर्थ यात्रा के पथ पर गोपेश्वर बद्रीनाथ एवं केदारनाथ से समान दूरी पर था और इसीलिये तीर्थ यात्रियों का प्रिय था। शहर की मान्यता का दूसरा कारण यह था कि जो कोई भी तीर्थ यात्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिरों तक नही पहुंच पाता था, वह यहां गोपीनाथ मन्दिर में पूजा कर अपनी तीर्थ यात्रा पूर्ण कर लेता था। यह एक ऐसा क्षेत्र था, जहां साधु-संत जगह की शांति एवं सुंदरता से अभिभूत होकर यहां पूजा एवं तप के लिये रूक जाते थे।

पंकज सिंह महर



Gopinath Temple is an ancient temple dedicated to Lord Shiva, located at Gopeshwar, in Uttaranchal (India). The temple stands out in its architectural proficiency; it is topped by a magnificent dome and the 30 sq ft sanctum sanctorum, which is accessible by 24 doors. The site is located 10 km north-east of Chamoli.

The remains of broken idols found around the temple testify the existence of several more temples in ancient times. There is a trident about 5 m high, which dates back to the 12th century, in the courtyard of the temple made of eight different metals. It boasts the inscriptions attributed to Anekmalla, the king of Nepal who reigned in the 13th century. Four short inscriptions written in Devanagri, which dates back to a later period, are yet to be deciphered, baring one.

Legend is that the trident got fixed in this spot, when Lord Shiva threw it at Lord Kama to kill him. The metal of the trident is not weathered by the elements and this is a wonder.

पंकज सिंह महर



पहले मन्दिर का प्रशासन रावल के अधीन होता था जो केरल से आये थे (आज भी बद्रीनाथ और केदारनाथ में यह प्रथा प्रचलित है)। वर्ष 1971 में अन्तिम रावल की मृत्यु के बाद इस परंपरा का अंत हो गया। मन्दिर के पुजारी भी केरल वासी ही होते थे जो आज भी कायम है। मूलरूप से मन्दिर में रावल एवं कर्मचारी ही रहते थे तथा गांव वासी केवल पूजा के लिये यहां आते थे। मन्दिर के आस-पास के 64 गांव मन्दिर के अधीन थे, जहां की आय से मन्दिर की देख-भाल की जाती थी। सदियों पहले एक भूकंप में रानीहाट या कश्मीरहाट गांव ध्वस्त हो गया और तब लोगों ने अपने घर मन्दिर के समीप बसा लिये, जिसके इर्द-गिर्द गांव बस गया।



पंकज सिंह महर



गढ़वाल के शेष भागों की तरह गोपश्वर भी कत्यूरी वंश द्वारा शासित था जो जोशीमठ से शासन करते थे। बाद में वे कुमाऊं जा बसे, जहां वे चंद वंश द्वारा पराजित हुए। गढ़वाल के पंवार वंश की स्थापना कनक पाल ने चांदपुर गढ़ी में की और उसके 37वें वंशज अजय पाल ने वर्ष 1506-1519 के बीच श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश का नाम पाल वंश हुआ, जो बाद में 16वीं सदी के दौरान शाह वंश में बदल गया तथा वर्ष 1803 तक गढ़वाल पर शासन करता रहा। इस वर्ष नेपाल के गोरखों ने गढ़वाल पर आक्रमण कर अमर सिंह थापा को वहां का शासक घोषित कर दिया। एटकिंसन के हिमालयन गजेटियर, वोल्यूम III भाग I वर्ष 1882 के अनुसार, अमर सिंह थापा द्बारा गोपीनाथ मन्दिर की मरम्मत करायी गयी। वर्ष 1814 में गोरखों का सम्पर्क अंग्रेज शासकों से हुआ, क्योंकि उनकी सीमाएं एक-दूसरे से मिलती थीं। सीमावर्ती कठिनाइयों के कारण अंग्रेजों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया।
      अप्रैल 1815 में गोरखों को गढ़वाल से खदेड़ दिया गया, इसे अंग्रेजी जिले के रूप में मिला लिया गया तथा पूर्वी एवं पश्चिमी गढ़वाल में बांटकर पूर्वी गढ़वाल को अंग्रेजों के अधीन रखकर इसका नाम ब्रिटिश गढ़वाल रखा गया। वर्ष 1947 में भारत की स्वाधीनता तक गोपेश्वर ब्रिटिश गढ़वाल का ही एक भाग था।

     



पंकज सिंह महर



गोपेश्वर का ऐतिहासिक महत्व एक अन्य कारण से भी है। वर्ष 1960 में चमोली जिले की स्थापना हुई तथा गोपेश्वर कई जन-आंदोलनों का केंद्र बन गया। इसकी शुरूआत स्थानीय युवाओं द्वारा मल्ला नागपुर श्रम संविधा समिति की स्थापना से की गयी। महात्मा गांधी, विनोबा भावे तथा जयप्रकाश नारायण से गहन रूप से प्रभावित होकर इन स्थानीय युवाओं ने श्रम सहयोगिता के उद्देश्य से उस समुदाय में सामाजिक समानता लाने पर जोर दिया, जिसकी गहरी जड़ें जाति-विभेद में थीं। वर्ष 1963-64 में संगठन के सदस्यों द्वारा गोपीनाथ मंदिर से बस पड़ाव तक की सड़क का निर्माण किया गया। इसके एक सदस्य्य चंडी प्रसाद भट्ट दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के संस्थापक सदस्य बन गये, जो संगठन गोपेश्वर एवं चमोली में सामाजिक एवं पर्यावरण जागरूकता को जगाने में समर्थ हुआ तथा महिलाओं को भी जन-आंदोलन में लाने में कामयाब हुआ। यह कई सामाजिक आंदोलनों जैसे शराब बंदी तथा चिपको आंदोलन आदि में अग्रणी रहा। गोपेश्वर में इस मंडल के कारण ही चिपको आंदोलन का प्रथम बीज बोया गया जो बाद में उत्तराखंड में फैला तथा इसके कई सूत्रधार बने। चिपको आंदोलन के नायकों में से एक चंडी प्रसाद भट्ट, को एशिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान रमन मैग्सेसे एवार्ड से विभूषित किया गया।
जिले की स्थापना काल से ही अलकनंदा नदी के किनारे बसा छोटा शहर चमोली ही जिला मुख्यालय रहा है। 1970 के दशक में कार्यालय गोपेश्वर ले जाया गया।





पंकज सिंह महर

स्कंद पुराण के केदार खंड में गोपेश्वर को गोस्थल कहा गया है, माना जाता है कि गोपीनाथ मंदिर का स्वयंभू शिवलिंग अनंत काल से वहां है। उस समय यह स्थान एक घने जंगल से घिरा था, जिसका इस्तेमाल केवल चरवाहे मवेशियों को चराने के लिये किया करते थे। एक विशेष गाय प्रत्येक दिन शिवलिंग पर अपना दूध अर्पण कर जाती। चरवाहा चकित थे कि यह गाय दूध क्यों नहीं देती है। एक दिन उसने उसका पीछा कर देखा कि वह अपना दूध भगवान शिव को स्वेच्छा से अर्पित करती थी। यही कारण था कि इस स्थान को गोस्थल कहा गया जो बाद में बदलकर गोपीनाथ के नाम पर गोपेश्वर हो गया।

पंकज सिंह महर



यही वह जगह भी है जहां तप में लीन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, क्योंकि उसने उनके तप में बाधा डाली थी। कामदेव को देवताओं ने भगवान शिव का तप भंग करने के लिये भेजा था, क्योंकि वे जानते थे कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही दुर्दान्त तारकासुर का वध कर सकता था। भगवान शिव तब से ही समाधिस्थ थे, जब से उनकी पत्नी सती ने अपने पिता के हवन कुंड कूदकर अपनी जान दे दी थी। देवी-देवताओं की इच्छा थी कि वे पार्वती से विवाह कर एक पुत्र उत्पन्न करें। कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव की पास के वैतरणी कुंड में एक मछली के रूप में आराधना की, जिसे रति कुंड भी कहा जाता है। भगवान शिव ने उससे प्रसन्न होकर उसके पति को जीवनदान दे दिया।

पंकज सिंह महर

गोपीनाथ मंदिर से संबद्ध एक अन्य रहस्य यह है कि मंदिर के ढांचे का निर्माण राजा मारूत द्वारा कराया गया। उन्होंने सैकड़ों कारीगरों को मंदिर निर्माण में लगा दिया। परंतु प्रत्येक दिन जो भी निर्मित किया जाता वह जमीन में धंस जाता और वे फिर से कार्य प्रारंभ करते। यह सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा तथा राजा चिंतित हो उठा। उसके उद्देश्य की दृढ़ता की जांच के लिये भगवान शिव ने राजा के सपने में प्रकट होकर कहा कि मंदिर का निर्माण तभी संभव होगा, जब वह अपने सबसे बड़े पुत्र एवं उत्तराधिकारी को मंदिर की नींव में जिंदा गाड़ देगा। राजा ने वैसा ही किया। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया तथा मंदिर का निर्माण हो पाया। मंदिर के गर्भ-गृह में स्थापित मूर्तियों में एक प्रतिमा राजा मारूत के पुत्र की भी है और उसकी भी पूजा होती है।

पंकज सिंह महर



सदियों तक गोपेश्वर की संस्कृति पर मूलरूप से गोपीनाथ मंदिर की गतिविधियों का प्रभाव है। कहा जाता है कि प्राचीन युग में यह स्थान साधुओं एवं मुनियों की तपोस्थली रही थी। मंदिर निर्माण के बाद 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा नियुक्त केरल के नंबूद्रि ब्राह्मण रावल ही वास्तव में इस स्थान के शासक रहे थे। एक इतिहासकार डॉ भगवती प्रसाद पुरोहित ने अपनी कृति रूद्रमहाल्या, गोपेश्वर, वर्ष 2005 में बताया है कि यह वह समय था, जब शैवों एवं वैष्णवों में अपनी प्रभुता के लिये द्वंद हुआ था तथा बौद्घ तिब्बतियों से भी खतरा था। इसलिये एक सहमति द्वारा दोनों पंथों के देवों की पूजा एक ही मंदिर में करने पर समझौता हुआ और इसका उदाहरण गोपीनाथ मंदिर है। यह आदि शंकराचार्य ही थे, जिन्होंने यहां सात्विक हिन्दूत्व की स्थापना की तथा कत्यूरी वंश के साथ उनके प्रयासों से ही बौद्ध धर्म से खतरा दूर हो सका (कत्यूरी वंश, शिव एवं विष्णु का अनुगामी तथा गढ़वाल के सर्वोत्तम मंदिर का निर्माता था)।

       आज गोपेश्वर शहरी तथा ग्रामीण परिवेश का एक उत्सुक मेल है जो आस-पास के कई गांवों को शहर में मिला लेने का नतीजा ही है। प्रमुख सड़क से कुछ दूर जाने पर ही आप ग्रामीण परिवेश में महिलाओं को खेतों में काम करते या मवेशी चराते देख सकते हैं।





हेम पन्त

Pankaj Da!! Gopeshwar ke aitihaasik mahatwa par prakash daalne ke liye aapka bahut-2 dhanyawaad...+1 karma bhi