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Folk Stories - किस्से, कहानिया, लोक कथाये

Started by Risky Pathak, June 10, 2008, 01:37:01 PM

Risky Pathak



बागेश्वर नगर मै सरयू नदी के पास एक बहुत लंबा चौडा मैदान दिखाई देगा| लोक-कथाओ के अनुसार ये सास-ब्वारी गड़ के नाम से मशहूर है| ऐसा कहा जाता है की ये खेत पहले सास और ब्वारी के पास था| आषअड़ के महीने में गोंडाई  के समय में दोनों ने ये निश्चय किया की आज शाम ढलने से पहले हम इस पूरे खेत की गोंडाई खत्म कर देंगे| तब दोनों ने लगन से और तेजी से काम करने के लिए खेत के बीच में पूरी का एक छापर कलेवे के तौर पर रख दिया| और निश्चय किया की जो बीच में पहले पहुचेगा वो ही सबसे पहले खायेगा| दोनों ने काम करना शुरू कर दिया| दोनों तेजी से काम कर रही थी| दोपहर हो गयी थी, पर अब भी कलेवा बहुत दूर था| फ़िर शाम होने को आ गयी| दोनों अपने काम में मग्न, भूख प्यास से व्याकुल थे, पर मेहनत की धुन उन्हें जल्दी जल्दी काम करने के लिए उत्साहित कर रही थी| रात होने को आई और दोनों अपनी मंजिल के निकट थे| थोडी देर में पूरी गोंडाई खत्म, पर इस के साथ ही उनकी साँसों ने भी उनका साथ छोड़ दिया|

Anubhav / अनुभव उपाध्याय


Risky Pathak

Hassi Mjaak Ke Kisse ke liye Hasya Ghatnao Waala Topic Bnaya Hai Daa... [:D]


Risky Pathak


कभी किसी पहाड़ में रहने वाले को ये नही कहना चाहिए "मील कभे बाघ ने देख राख"(मैंने कभी बाघ नही देख रखा है|)

क्यूंकि ऐसा कहा जाता है, ऐसा सुनकर बाघ कहता है "आज बति सतु दिन, त्येर गोठक देण बल्द लिज्हान उन तब देखले मीके "(आज से सातवे दिन तेरे गोठ का दाहिना बैल ले जाने आऊंगा, तब देख लेगा मुझे |)

हेम पन्त

अल्मोडा कुमाऊं का सबसे जागरुक शहर माना जाता है...
वहां के लोगों के 'स्मार्टनेस' के कई किस्से हैं. मुझे इनमें कोई हकीकत नजर नहीं आती लेकिन गैर अल्मोडिया लोग इन्हें खूब प्रयोग करते हैं..

१. अल्मोडा के लोग दोस्तों और रिश्तेदारों से यह कहते हैं- तुमार घर ऊंला त कि खिलाला? हमार घर आला त कि ल्याला? (आपके घर आयेंगे तो क्या खिलाओगे? हमारे घर आओगे तो क्या लाओगे?)

२. जानवरों में भी यह स्मार्टनेस है- एक बार अल्मोडिया बैल और गैर अल्मोडिया बैल में कम्प्टीशन ठन गया. कौन कितना ज्यादा पानी पी सकता है. २ बडे बर्तनों में पानी भर कर बैलों के सामने रख दिया गया. दोनों ने पानी पीना शुरु किया. १० मिनट के बाद दूसरे बैल ने गर्द्न उठा दी. देखा अल्मोडिया बैल पानी में मुंह डाल कर पानी सुड्क रहा है. उसने फिर पानी पीना शुरु कर दिया.

आधे घन्टे बाद अल्मोडा वाला बैल हटा तो दूसरा बैल पानी पी-पी कर मर चुका था. असल में अल्मोडा वाले बैल ने बर्तन में मुंह डुबा के रखा और पानी पीने का बहाना बनाता रहा. दूसरा बिचारा आधे घन्टे तक पानी पीकर भगवान को प्यारा हो गया.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


By D N Badola JI.


चल तुमेडी बाटे बाट मैं क्या जानू बुडिये की बात



रात्रि मैं भोजन के पश्चात निद्रा रानी के आव्हान के लिए कहानी सुनना बच्चों की दिन चर्या का एक आवश्यकीय अंग होता है. हम भी बचपन मैं रोज कहानी सुनते थे कहानी सुनते सुनते सो जाना एक साधारण बात थी.

एक दिन की बात है की रात्रि मैं हमारी दादी ने एक कहानी सुनाई 'चल तुमेडी बाटे बाट मैं क्या जानू बुडिये की बात'  दादी ने बताया की एक गाँव मैं एक शेर लगा था वह दिन दहाड़े आकर आदमियों का शिकार करता  था गाँव के लोगो  ने शेर से फरियाद की की वह एक बार मैं एक ही  आदमी को शिकार बनाए  जंगल का राजा शेर राजी हो गया क्योंकि उसे बिना मेहनत के शिकार जो मिल रहा था. तब से बारी बारी लोग शेर का शिकार बनने लगे एक दफा एक चतुर बुडिया की बारी आइ वह शेर का निवाला नहीं बनना चाहती  थी अतः उसने स्वयं को 
एक तुमडी (A hollow gourd)मैं बंद कर लिया तथा गाँव वालों से कहा कि उसे घुरया दें तुमडी घुरीते घुरीते जा रही थी कि शेर कि उस पर नज़र पड़ गयी. उसने तुमडी  को रोका और कहा की मेरा शिकार कहाँ हैं बुडिया बोली  चल तुमेडी बाटे बाट मैं क्या जानू बुडिये की बात इस प्रकार बुडिया बच गई उसने चतुराई से अपनी जान बचा ली

दूसरी कहानी के अनुसार जब शेर नहीं माना तो बुडिया ने शेर को समझाया कि वह अपने नाती के पास जा रही है अभी वह दुबली पतली है नाती के पास जाकर लोटते वक्त काफ़ी मोटी हो जाउंगी तब मुझे खाना शेर राजी हो गया और चतुर बुडिया ने अपनी जान बच्चा ली कहानी सुनते सुनते मैं कब सो गया मुझे पता नहीं. (D.N.Barola)

हेम पन्त


पहाङ में "सिन्टालु/ सिन्टोला" पक्षी बहुतायत में पाया जाता है, इसे अन्य नामों से भी जाना जाता है.
सिन्टालु पर आधारित एक किस्सा है... जो इस प्रकार है...

सिन्टालु/ सिन्टोला पक्षी गन्दगी खाता है लेकिन इस कारण ग्लानि से भरा रहता है... वह रोज शाम को निश्चय करता है कि अगले दिन से वह मल (गन्दगी) नहीं खायेगा. लेकिन सुबह भूख लगने पर वह यह कहने पर मजबूर हो जाता है कि :
"-- नै खूं ...त कि खूं" अर्थात -- नहीं खाऊं तो क्या खाऊं

-- की जगह पर एक आपत्तिजनक शब्द है.

यह कहावत उन लोगों पर लागू होती है जो लाख कोशिश करने पर भी गन्दी आदतें नहीं छोड पाते.





पंकज सिंह महर

"तीर या तुक्का" मुहावरे की यह कहानी उत्तराखण्ड में तुक्का गुरु, तुक्का बामण, तुक्का लागी ज्योतिष भै के नाम से प्रचलित है।

एक बार एक पंडित जी अपने गांव में अपनी पंडिताइन के साथ रहते थे और थोड़ी- बहुत पंडिताई कर अपना जीवन गुजर-बसर करते थे। लेकिन वे अपनी आमदनी से खुश नहीं थे और पैसों के लिये परेशान रहते थे, एक बार वे परेशान होकर रास्ते पर जा रहे थे, तो रास्ते में ही गांव का किशनू मिल गया और उसने पंडित जी से पूछा कि" पंडितज्य़ू, मेरा बैल कहीं खो गया है, आप गन्थ-पूछ कर दो कि बैल कहां होगा?" पंडित जी पहले से ही भुनभुनाये थे, उन्होंने गुस्से में कहा कि "अरे कहां जायेगा, तेरा बैल, होगा किसी धान के खेत में" किशनू पास के धान के खेत में गया तो उसे अपना बैल मिल गया, तो शाम को वह पंडित जी के लिये अनाज आदि लेकर गया और उन्हें धन्यवाद दिया। पंडिताइन ने अपने स्त्रियोचित गुण के अनुसार पूरे गांव में बात फैला दी कि हमारे पंडित जी पर अबतार हो गया है और कांप कर भूत, भविष्य और वर्तमान सब बता रहे हैं। एक दिन किसी का घोड़ा खो गया तो वह दौड़ता-दौड़ता पंडित जी के पास आया और उनसे अपने घोड़े के लिये पूछ कर देने का अनुरोध किया, तो पंडित जी ने कहा कि अभी मैं पूछ नहीं करुंगा, तू दिन में आना। अब पंडित जी बड़े परेशान हो गये और खुद घोड़े को ढूंढने चल पड़े, गांव के पधान के बाड़े में उन्हें घोड़ा घास चरते हुये दिख गया तो बाड़े का गेट बंद कर वह घर आ गये और उन्होंने घर आकर आसन जमाया और घोड़े वाले को बुलाकर चावल के दाने हाथ में लेकर कहा कि " तेरा घोड़ा पधान के बाड़े में घास चर रहा है, जा ले आ।" घोड़े के मिलने पर वह खुश हो गया और पंडित जी को दक्षिणा दे गया। धीरे-धीरे पंडित जी की ख्याति बड़ती गयी और राजा के कान में भी यह बात पड़ी। एक दिन राजा की बेटी का नौलखा हार खो गया, तो राजा ने पंडित जी को बुला भेजा और कहा कि पंडित जी मैने आपकी ख्याति सुनी है, कल तक मेरी बेटी का हार ढूंढ कर दो, अगर नहीं ढूंढ पाये तो तुम्हें मौत की सजा दी जायेगी। पंडित जी की हालत खराब हो गयी, वे राजमहल में अपने कमरे में आ गये, पर उन्हें नींद नहीं आयी और वे नींद को बुलाने लगे "आ नीनू-आ नीनू, भोल तेरी मौत" अर्थात नींद तू आज आ जा, कल तो मेरी मौत हो जायेगी, फिर कैसे आयेगी। इसे राजमहल में झाडू लगानी वाली नीनू नाम की दासी ने सुना तो वह आकर पंडित जी के पैरों में गिर पड़ी कि पंडित जी मुझे बचा लो, मैं हार आपको दे देती हूं। पंडित जी ने वह हार महल में एक घड़े में रख दिया और दूसरे दिन हाथ में चावल के दाने लेकर पूछ कि और बताया कि महल के सातवें खम्भे के पास जो घड़ा है, उसमें ही हार है। सेवकों ने हार निकाल लिया, इससे राजा खुश हो गया और पंडित जी को दरबार में बुलाया और कहा कि" पंडित जी आप तो बड़े ग्यानी हो, मैं आपको जागीर दूंगा और अपना राज ज्योतिषी भी बनाऊंगा, लेकिन उससे पहले आपको यह बताना होगा कि मेरी मुटठी में क्या है?" अब पंडित जी परेशान कि अभी तक तो भाग्य साथ दे रहा था, अब क्या करुं, परेशान पंडित जी अब हे-राम, हे राम करने लगे और परेशानी में उनके मुंह से हे राम की जगह ही-रा, ही-रा निकलने लगा। राजा को अब विश्वास हो गया कि पंडित जी वास्तव में जानकार हैं, उसने पंडित जी को अपना राज ज्योतिषी बना लिया और बहुत जागीर भी भेंट कर दी। इसे कहते हैं तुक्का लागी-ज्योतिष भै।

हेम पन्त

This story is shared with us by our esteemed guest writer Mr. D.N. Barola ji

जंवाई (दामाद) जी चले सौरास (ससुराल) को.

ब्या (शादी) के बाद पहली दफा सौरास (ससुराल) जाना हर दुल्हे का हसीन सपना होता है.  दुल्हे राजा जंवाई या दामाद के रूप मैं जब पहली बार ससुराल जाते हैं तो उनके घर मैं उन्हें अनेकानेक सलाह दी जाती हैं. पुराने ज़माने मैं  पक्का भोजन एक बड़ी बात होती थी. ससुराल मैं  जंवाई जी का स्वागत लगड़ (पूरी) दौड़ लगड़ (कचौरी), बड़ा, सिंगल, पूवा, हलवा , खीर, लड्डू  आदि पकवानों से किया जाता था. ऐसे मैं दुल्हे राजा की राल न टपक जाये अतः इजा (माता)  व बौज्यू (पिता) की तरफ से ख़ास हिदायतें दी जाती थी. खाना कम खाना है. लालच मत करना नहीं तो ससुराल वाले पेटू समझेंगे आदि आदि. क्योंकि दुल्हा काफी कम उम्र का होता था.
हमारी कहानी   के नायक जंवाई जी ससुराल पहुंचे. उनका स्वागत नाना प्रकार के लजीज पकवानों से किया गया. जंवाई जी की लार टपक रही थी परन्तु इजा की बात बार बार स्मरण हो आती थी. अतः खाना खाते वक्त बार बार ना नकुर करते रहे.नतीजतन जंवाई जी ने बहुत ही कम खाना खाया और पानी का पूरा लोटा गटक कर भोजन समाप्ति की घोषणा कर बैठे.
रात्रि को जब सोये तो नींद नहीं आई. भूखे पेट  सोना वह भी ससुराल मैं. जंवाई जी अपने हाथों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे थे. अचानक उन्हें छत पर एक मटकी लटकी हुई दिखाई दी. उन्होंने मटकी के अन्दर हाथ डाला तो उसमें शहद सा पदार्थ मिला. जंवाई जी खुश.बस फिर क्या था. उन्होंने शहद चाटना शुरू कर दिया. नीद भी जोर की लगी थी. अतः उन्होंने मटकी के नीचे एक छोटा सा छेद  कर डाला. उस छेद से बूंद बूंद शहद निकलने लगा. जंवाई जी लेटे लेटे शहद की बूदों का आनंद लेने लगे. इस बीच उन्हें भूख  से कुछ राहत मिली तो उन्हें निद्रा देवी ने आ घेरा. वह टुप्प सो गए .रात भर शहद की बूंदे उनके चेहरे पर पड़ती रहीं तथा बदन की तरफ भी बहती रहीं, परन्तु जंवाई जी तो घोड़े बेच सो चुके थे. प्रातः जब नीद खुली तो उन्हें अपने चेहरे व बदन पर चिपचिपा लगा. उन्हें रात की बात याद आ गई. खताड़ी (लिहाफ) के एक कोने से उन्होंने रुई निकाली और अपने चेहरे व बदन को साफ़ करने लगे. परन्तु यह क्या रुई से शहद साफ करते समय उनके चेहरे व बदन पर रुई चिपक गई तथा उनका चेहरा विभीत्स दिखने लगा. परन्तु कमरे मैं आरषी (शीशा)  न होने के कारण उन्हें यह बात पता नहीं चली.
सुबह सास जी जब जंवाई  जी को चाय देने के लिए आई तो उन्हें एक सफ़ेद रुई के चेहरे वाला भयानक स्नोमैन दिखाई दिया. वह चिल्लाई और बेहोस हो गईं. जंवाई जी  भी डर के मारे कुंवे की तरफ नहाने को दौड़े, परन्तु उनके साले, साली व  ससुर ने उन्हें घेर लिया. उनकी पिटाई की नौबत आने को ही थी कि जंवाई जी  चिल्लाये - मैं तुम्हारा जंवाई हूँ. वस्तुस्थिति मालूम होने पर उन्हें स्नान करवाया गया. परन्तु ससुराल मैं  जंवाई राजा की जो फजीहत हुई वह कभी न  भूल पाए. गाँव वाले तो इस किस्से को सुन कर चटखारे लेते हुए कई  दिन तक हंसी के मारे  लोट पोट  होते रहे.
(D.N.Barola)