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Folk Stories - किस्से, कहानिया, लोक कथाये

Started by Risky Pathak, June 10, 2008, 01:37:01 PM

Risky Pathak


इस टोपिक मे हम ऐसे किस्से, कहानिया शेयर करेंगे जिन्हें हम बचपन मे सुनते आए है| ऐसी कथाये जिन्हें हम आमा, बड़बाज्यु , इजा, बाबू, आदि से सुनते थे| चाहे पक्षियों की बोली का किस्सा या रीति रिवाज़ से जुड़ी गाथा या किसी स्थान के नामकरण की कथा आदि|

Risky Pathak

न्योली नामक एक पक्षी की बोली सुनाई देती है
"नीहो...........", "नीहो........ "

Risky Pathak

Quote from: Himanshu Pathak on June 10, 2008, 01:42:31 PM
न्योली नामक एक पक्षी की बोली सुनाई देती है
"नीहो...........", "नीहो........ "


Is Pakshi ki Khaani

बहुत वर्ष पहले १ सास और ब्वारी १ गाँव मे रहती थी| सोरास मे रहते रहते बहुत समय हो गया था| उसे अपने मैत की याद आने लगी थी| तो उसने १ दिन निश्चित किया कि वों आज अपने मैत जायेगी| उसने इस बारे मे अपनी सास को बताया| सास को यह सुनकर गुस्सा आ गया कि उसकी बहु चली जायेगी तो उसके घर का पूरा काम कौन करेगा| तो उसने कहा ठीक है घर का सारा काम करके चले जाना| उस दिन सास ने ब्वारी को १० गद्हाव लकाड़ लाने को कहा, १० जाव पत्याल स्वेरने को कहा,    गोठ का सारा प्वर निकालने को कहा|   continuee..... 

Risky Pathak

continued..

अब ब्वारी सास का सारा बताया काम करने लगी| काम करते करते शाम होने को आई| ब्वारी को यह चिंता सताने लगी कि भो शनिवार है और कल वों मायके नही जा सकती| उसने दिन(सूर्य) से कहा "ब्याव नीहो नीहो,  मीके मैत जान दे"| और दिन रुक गया, सूरज जहा था वही अडिग रहा| ब्वारी ने सारा काम किया और तैयार होकर मैत के लिए निकल बड़ी| काफ़ी उकाव उल्हार के बाद मैत पहुँच गयी| मैत मे जैसे ही डेली पार कर अन्दर जाने लगी(वों ये भूल गयी दिन को जाने के लिए भी बोलना है), १ सौंप आया और उसको डस दिया| उसकी मृत्यु हो गई और वों न्योली नामक पक्षी बन गयी| वोही आज भी नीहो नीहो कहती है|                 

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एक और पक्षी है जिसकी बोली ऐसी सुनाई देती है "कि करू पोथी, उदुके उदुक"


इसकी कथा इस प्रकार से है कि १ सास और ब्वारी जंगल मे काफो टीपने गए थे| जब भरपूर काफो टीप लिए, तब सासू ब्वारी ने
उन्हें १ डब्बे मे डाल दिया और डब्बे को ब्वारी ने पकड़ लिया| घर पहुचने पर जब डब्बा खोला गया तो देखा कि काफल बहुत कम हो गए है| सासू ने कहा ब्वारी ये डब्बा तेरे पास था मतलब तुने इसमे से काफल निकाल के कहा लिए(असल मे काफल सुख गए थे तो उनका रस निकल गया था और वों कम दिखायी देने लगे थे )| ब्वारी ने मना किया पर सास को विश्वास नही हुआ और उसने ब्वारी को इतना मारा कि वों मर गयी | थोडी देर बाद बारिश आ गयी और काफलो के डब्बे मे भी पानी पडा| पानी पड़ने की वजह से काफल जितने पहले थे उतने ही दिखायी देने लगे| तब सास को पश्चाताप होने लगा| और इसी दुःख के कारण वों भी मर गई| यही  सास बाद मे पक्षी बनी जो कहता है "कि करू पोथी, उदुके उदुक".. मतलब "अब  क्या करू, जितने रखे थे उतने ही थे और मेने बिना बात के तेरी हत्या कर दी"|   
               

Risky Pathak

1 Baal Katha jo humaare Hem Pant Jee ke dwaaraa:

http://www.creativeuttarakhand.com/cu/kids/chal_tumri.html


चल तुमडी बाटै-बाट

एक गांव में रामी नाम की बुढिया रहती थी, उसकी बेटी का विवाह दूर एक गांव में हुआ था जहाँ जाने के लिये जंगल का रास्ता पडता था. रामी का बहुत मन हो रहा था कि वह अपनी बिटिया से मिल कर आये.

एक दिन सुबह रामी ने धान के च्यूडे, सियल तथा पुए बनाकर एक पोटली में बांधे और बेटी से मिलने निकल पडी. चलते-चलते उसे शाम हो गयी, जंगल से गुजरते हुए उसे खूंखार पशुओं की आवाज सुनायी देने लगी.

अचानक ही एक काला मोटा भालू उसके सामने आ गया. पर रामी ने हिम्मत नही हारी, उसने हाथ जोडकर कहा –

बिटिया के घर जाउंगी,
दूध मलाई खाउंगी,
मोटी होकर आउंगी,
तब तुम मुझको खा लेना.

भालू ने उसकी बात मान ली. आगे बडने पर रामी बुढिया को बाघ,सियार तथा अन्य जंगली जानवर मिले जो उसे खाना चाहते थे. लेकिन उनसे भी यही बात कह कर रामी जैसे-तैसे बच कर अपनी बेटी के घर पहुंची.

माँ और बेटी ने ढेर सारी बातें की. बुढिया ने गांव-पडोस के सभी लोगों के हालचाल बेटी को बताये. कई दिन बेटी के घर बिताने के बाद बुढिया अब अपने घर वापस जाने की सोचने लगी.  वापसी की तैयारी करते हुए रामी चिन्ता में पड गयी. उसे जंगली जानवरों की याद आ गयी जो उसे रास्ते में फिर से मिलने वाले थे. और इस बार बुढिया को लग रहा था कि वो उनसे बच नही पायेगी.

अन्ततः रामी ने सारी बात अपनी बेटी को बता दी. लेकिन उसकी बेटी भी अत्यन्त चतुर थी. उसने अपनी ससुर से कुछ जादूगरी की कलाएं भी सीखी थी. बेटी ने लौकी की एक बडी सी तुमडी (सूखी हुई खोखली लौकी)  बनाई, उपहारस्वरूप कुछ चीजें पोटली में बांधी और अपनी माँ के कानों में चुपके से कुछ कहा.

तुमडी रास्ते पर लुढकने लगी. जंगल में पहुचने पर रामी का सामना सबसे पहले बाघ से हुआ. बाघ बोला - तुमडी क्या तुमने उस बुढिया को देखा जो इसी रास्ते अपनी बिटिया के घर से मोटी होकर लौटने वाली थी?

तुमडी के अन्दर से ही रामी बोली -

चल तुमडी बाटै-बाट,
मैं कि जानु बुढिया कि बात.

इसी तरह सभी जानवरों ने तुमडी से पूछा, हर बार यही जवाब मिलने पर जानवरों को गुस्सा आ गया और उन्होने तुमडी को तोड दिया. रामी को देखकर उनमें उसे खाने की होड लग गयी और वो आपस में ही लडने लगे. मौका देख कर रामी एक पेड पर जा कर बैठ गयी.

जानवर नीचे बैठकर उसके नीचे आने का इन्तजार करने लगे. रामी को अपनी बेटी की बतायी हुई बात याद आ गयी वो जोर से आवाज लगा कर बोली- "मेरे नीचे गिरने पर जो सबसे पहले मुझ पर झपटेगा वो ही मुझे खायेगा". सभी जानवर टकटकी लगा कर उपर देखने लगे. बुढिया ने पोटली से मिर्च निकाल कर उनकी आखों में झोंक दी. जानवर तडप कर इधर-उधर भाग गये और रामी पेड से उतर कर अपने घर चली गयी. रामी की समझदारी ने उसकी जान बचा ली.

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विपत्ति आने पर घबराना नही चाहिये. सोच समझ कर मुकाबला करने पर बडी से बडी समस्या का समाधान मिल जाता है.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Good going Himanshu.. Ji.

I will also contribute here later.

Quote from: Himanshu Pathak on June 10, 2008, 01:37:01 PM

इस टोपिक मे हम ऐसे किस्से, कहानिया शेयर करेंगे जिन्हें हम बचपन मे सुनते आए है| ऐसी कथाये जिन्हें हम आमा, बड़बाज्यु , इजा, बाबू, आदि से सुनते थे| चाहे पक्षियों की बोली का किस्सा या रीति रिवाज़ से जुड़ी गाथा या किसी स्थान के नामकरण की कथा आदि|



Risky Pathak

Isi Prakaar 1 Pakshi.... kehta hai..
"Kaafal Paako.... Meel naa Chakho...."

Story of this bird from http://www.creativeuttarakhand.com/cu/kids/ghughuti.html

"काफल पाको, मैंल नि चाखो"

एक पहाडी थी, जिस पर एक घना जंगल था. उस पहाडी के समीप वाले गाँव में एक औरत अपने बेटे के साथ रहती थी. उनके पास धन की कमी होने के कारण वह जंगल के फल खाकर ही अपना जीवन निर्वाह करते थे.

वह औरत बडा ही कठिन परिश्रम करती थी, लेकिन किसी पर भी यकीन नही करती थी. एक दिन वह जंगल से रसीले काफल के फल तोडकर लाई.  उन काफलों को जंगली पक्षियों से बचाने के लिये अपने बेटे से उन काफलों से भरी टोकरी की देखभाल करने के लिये कहा और खुद खेतों में काम करने चली गयी.  रसीले काफल देखकर बच्चे का मन काफल खाने को ललचाया, लेकिन अपनी माँ के डर से उसने एक भी दाना नही खाया.

वह शंकालु औरत जब शाम को खेतों से थकी हुई घर पहुँची तो काफल धूप से थोडा सूख गये थे, जिससे उनकी मात्रा कम लग रही थी. यह देख कर औरत को गुस्सा आ गया, उसको लगा कि बच्चे ने टोकरी में से कुछ काफल खा लिये हैं. उसने गुस्से में एक बडा पत्थर बेटे की तरफ फेंका जो बच्चे के सिर पर लगा और बच्चा वहीं मर गया.

वो फल बाहर ही पडे रहे, औरत दूसरे दिन फिर जंगल गयी. जब वह वापस आयी तो काफल बारिश में भीग कर फूल गये थे, और टोकरी भरी हुयी दिखने लगी. तब उस औरत को अपनी गलती का अहसास हुआ. अपनी नासमझी के कारण उसने अपना प्यारा सा बेटा मार दिया था.

कहते हैं कि वह बच्चा "घुघुती" पक्षी बन कर अमर हो गया.   इन घुघुती पक्षियों के झुण्ड अब भी गाँव के पास ये आवाज लगाते हुये सुने जाते हैं

"काफल पाको, मैंल नि चाखो"

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी काम बिना सोचे समझे नही करना चाहिये.

Dinesh Bijalwan

ye kaffu pakshi ke bare main bhi suna hai.  Saayad ghughuti aur kaffu ek hi chirya ke naam hain ya unme koi fark hain.  Koi jaankar kirpya batayega kya?  Mere jaankari ke hisaab se kaffu ghuguti se thora bara hota hai.