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PATAL BHUBANESHWAR CAVE & GANGOLI HAAT MAHA KALI TEMPLE IN PITHORAGARAH, UK

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 09, 2007, 11:34:54 AM


:ninja:

By the blessings of Maa Kalika I was fortunate enough to have her Darshan one more time during my last visit to India. And the trip to Paataal Bhuvneshwar was another blessing.
Though I've visited the place couple of times in the past, but I always get lost in the aura the splendid beauty. As usual experience was totally divine and mesmerizing!
"Maa Kalika aap logoon ka kalyaan kare"

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Bilkul sahi kaha aapne Sir aise hi hamari dharti ko Devbhumi nahi kahte yahan vaastav main Devtaon ka vaas hai.

Quote from: highlander23235 on July 14, 2008, 07:20:38 PM
By the blessings of Maa Kalika I was fortunate enough to have her Darshan one more time during my last visit to India. And the trip to Paataal Bhuvneshwar was another blessing.
Though I've visited the place couple of times in the past, but I always get lost in the aura the splendid beauty. As usual experience was totally divine and mesmerizing!
"Maa Kalika aap logoon ka kalyaan kare"


पंकज सिंह महर

पाताल भुवनेश्वर की अलौकिक यात्रा

उत्तराखण्ड की पावन भूमि आदिकाल से ही मानव सभ्यता का गढ रही है. मनीषीयों, विद्वानों, साधु-सन्तों, विचारकों और तपस्वियों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है.  वेद पुराणों में उत्तराखण्ड का व्यापक उल्लेख मिलता है. उत्तराखण्ड के लगभग प्रत्येक गाँव का अपना देवता (कुलदेवता या ग्रामदेवता) होता है. मुख्यतः यह देवी देवता शिव, भगवती के रूप अथवा लोककथाओं से सम्बन्धित चरित्र होते हैं. यह क्षेत्र कई तरह के चमत्कारों से भरा हुआ है, जिन्हें देखकर सामान्य मनुष्य को परमपिता परमेश्वर की प्रभुसत्ता पर विश्वास करना ही पडता है. पाताल भुवनेश्वर का दर्शन भी एक अदभुत अनुभव का मौका देता है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह स्थान पाताल अर्थात धरातल के नीचे स्थित है. पिथौरागड जिले की गंगोलीहाट तहसील से कुछ ही दूरी पर स्थित है पाताल भुवनेश्वर .

स्कन्दपुरान में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहाँ आते हैं. स्कन्दपुरान में ही यह भी वर्णन है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा रितुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रविष्ट हुए तो उन्होने इस गुफा के भीतर महादेव शिव सहित 33 करोड देवताओं के साक्षात दर्शन किये. कलयुग में आज से लगभग 1000 साल पहले आदिगुरू शंकराचार्य ने एक शिवलिंग यहां स्थापित किया, जो अब भी विद्यमान है. पाताल भुवनेश्वर गुफा का प्रवेश द्वार बहुत संकरा है, सीढियों द्वारा लगभग सरक कर नीचे उतरना पडता है. लेकिन सीढियां उतरते ही बडे कमरे के बराबर खुली जगह आती है जहाँ से गुफा के भीतर की यात्रा शुरू होती है. एक गाइड को साथ रखना उपयोगी रहता है जो वहाँ दिखने वाले विभिन्न पाषाण खण्डों की महत्ता तथा उनसे जुडी हुई पौराणिक कथाएं बताता है. सर्वप्रथम शेषनाग की प्रतिमा दिखती है, जो पूरी धरती को अपने फन पर संभाले हुए है.  पूरी गुफा में जहाँ तक भी यात्री जाते हैं, एक उभरी हुयी संरचना पर चलते हैं जो इसी शेषनाग की रीढ मानी जाती है. इसी शेषनाग के आकार के पास ही वह स्थान है जहाँ राजा परीक्षित के पुत्र ने सर्पदंश से अपने पिता के मरने के बाद पूरे सर्पवंश के विनाश के लिये यज्ञ किया. लेकिन एक सांप पूजा के फूलों के बीच छुपा था जो जिन्दा बच गया. यही सांप "तक्षक" के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

थोडा सा आगे बढने पर एक हंस की प्रतिमा है जिसकी गर्दन पीछे की ओर मुडी है.     पौराणिक कथाओं के अनुसार इस हंस को ब्रह्मा जी ने अम्रत की रखवाली की जिम्मेदारी दी थी लेकिन लोभ में आकर यह उसे पीने को आतुर हुआ. ब्रह्मा जी के श्राप के फलस्वरूप इसकी गर्दन पीछे की ओर मुड गयी. इसके पास ही कई भारी शिला स्तंभ दिखाई देते हैं, माना जाता है कि यह एरावत हाथी (जो देवताओं को समुद्र मन्थन में प्राप्त हुआ था) की हजार टांगे हैं. एक और आश्चर्य वह चार प्रस्तर खण्ड हैं जो चार युगों अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शातें हैं. इनमें पहले तीन आकारों में कोई परिवर्तन नही होता. लेकिन माना जाता है कि कलियुग को दर्शाने वाली शिला का आकार धीरे-धीरे बड रहा है, और कलियुग का अन्त उस दिन हो जायेगा जब यह शिला बडते-बडते अपने ऊपर की छत को छू जायेगी.

गुफा के अन्दर ही बद्रीनाथ, केदारनाथ सहित चारों धामों के प्रतीक उपस्थित हैं. मान्यता है कि पाताल भुवनेश्वर के दर्शन से ही चार धाम के दर्शन के पुण्य की प्राप्ति हो जाती है.  इसके अतिरिक्त गुफा के भीतर कई अन्य प्राक्रतिक शिलाखण्ड हैं. जैसे द्युतक्रीडा में रत पाण्डव, आकाशगंगा, शिव जी की जटाएं, कालभैरव की जिह्वा और कल्पव्रक्ष आदि. पाताल भुवनेश्वर गुफा के दर्शन की यादें कई सालों तक मस्तिष्क में एक अमिट छाप छोडती हैं.  गुफा के  नजदीक का इलाका देवदार के लम्बे-लम्बे पेडो से घिरा है. जहां से एक सुरम्य घाटी का सौन्दर्य मन मोह लेता है. पाताल भुवनेश्वर के दर्शन करने के बाद चौकोडी के
सुन्दर चाय बागानों या गंगोलीहाट के प्रसिद्ध कालिका मन्दिर के दर्शन भी एक ही दिन में किये जा सकते हैं.


सौजन्य- क्रियेटिव उत्तराखण्ड डाट काम

हेम पन्त

पाताल भुवनेश्वर व उसके आस-पास की कुछ बेहतरीन फोटो इस लिंक पर उपलब्ध हैं

http://sss.vn.ua/india/uttarakhand/patal/indexen.htm

पंकज सिंह महर

अगर अध्यात्म के साकार दर्शन करने हैं, तो हिमालय की छवि ही काफी है। सफेद बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों की शांति आपकी आत्मा को छू लेगी। हिमालय के ऐसे ही एक हिमनद पर मिले एक तीर्थयात्री का कहना था कि एक बार हिमालय आइए, यह आपको बार-बार बुलाएगा।
यह गलत नहीं है। हिमालय के पर्वतों पर छाई चुप्पी अपने में अनेक रहस्य छुपाए है। इसके रहस्यों को खोजने के लिए इसकी विशालता सभी को आमंत्रित करती है। हिमालय की गोद में आपको अनेक गुफाएं मिलेंगी, जिन गुफाओं ने बीते समय की कई कहानियां खुद में समेट रखा है। ऐसी ही एक गुफा का नाम है पाताल भुवनेश्वर।
हिंदू धर्म के आदिदेव शंकर को सर्मपित यह रहस्यमयी गुफा महान हिमालय की श्र्ृंखला में स्थित है। पिथौरागढ़ जनपद में मुख्यालय से लगभग 99 किमी. की दूरी पर गंगोलीहाट नामक एक जगह है। यहीं पर पाताल भुवनेश्वर गुफा स्थित है।
गुफा के प्रवेश द्वार के आस-पास मंदिर बना दिया गया है। गुफा का दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु पहले यहां मंदिर में दर्शन करते हैं। इस गुफा का आभास ही मन में श्रद्धा की भावना जगाता है। गुफा में स्थित आदिदेव के दर्शन के बाद ही इस जगह पर आना सार्थक लगता है। इस गुफा का प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि इसमें खड़े होकर अंदर प्रवेश नहीं किया जा सकता। लेकिन वास्तव में अंदर जाने में कोई परेशानी नहीं होती है। प्रवेश द्वार में घुसने के बाद चिकनी ढलान वाला बेहद छोटा रास्ता आता है। श्रद्धालुओं के लिए आसानी हो, इसके लिए इस रास्ते पर रस्सियां लगा दी गई हैं। प्राकृतिक रूप से लगी चट्टानों पर ही पैर जमा-जमा कर आपको नीचे उतरना होगा। नीचे यह रास्ता एक बेहद विस्तृत कमरे जैसे स्थान में खुलता है। यहां से शुरू होती है पाताल भुवनेश्वर की गुफा। यहां गुफा की छत कहीं बहुत नीची है और कहीं बहुत ऊंची। ऊपर लटक रही चट्टानों से न जाने कहां से पानी गिरता रहता है।
इस कमरे जैसे स्थान से आगे जाने के लिए कई संकरे रास्ते हैं, जो अलग-अलग विस्तृत स्थानों पर खुलते हैं। इन्हीं स्थानों में से एक में तांबे से मढ़ा शिवलिंग स्थापित है। इसकी ऊंचाई जमीन से बहुत कम है। जिस तरह यह कोने में स्थापित है, आंखों के सामने पद्‌मासन की मुद्रा में इस मूर्ति के आगे बैठे तपस्वी की कल्पना साकार हो उठती है। यह गुफा इतना शांतिदायक और आध्यात्मिक आभास देती है कि अच्छे से अच्छा गृहस्थ भी यहां बैठकर तपस्या की सोचने लगता है।
इस स्थान से आगे गुफा में एक ऊंचे स्थान पर तीन छोटी-छोटी आकृतियां हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे शंकर-पार्वती और गणेशजी की अनगढ़ मूर्तियां हैं। अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस गुफा में इन्हें स्थापित किया था और इसकी आराधना की थी। इसी तरह गुफा में एक आकृति है, जिसके बारे में पुजारी का कहना है कि वह असंख्य पत्तियों वाला ब्रह्‌माजी का कमल है। गुफा में एक भयंकर आकृति भी है, जिसको भैरव मार्ग कहते हैं।
इस गुफा की खोज को लेकर बहुत-सी कथाएं प्रचलित हैं। एक किंवदंती के अनुसार, राजा नल अपने शौकिया खेल चौपड़ में सब हार गए। दुखी होकर वे हिमालय में अपने दोस्त के साथ तपस्या करने गए। वहां उन्हें एक अलौकिक हिरन दिखाई दिया। उसको प्राप्त करने के लिए राजा ने उस स्थान के क्षेत्रपाल की तपस्या की। क्षेत्रपाल ने प्रकट होकर राजा से कहा कि दरअसल वह हिरन तो शंकर भगवान ही हैं, जो इस क्षेत्र की एक गुफा में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के साथ रहते हैं। अपनी तपस्या से उन्होंने गुफा के साथ-साथ चारों धाम के भी दर्शन किए। लेकिन यह रहस्य उन्होंने अपनी रानी को बता दिया। इसलिए उनकी मृत्यु हो गई। उनकी रानी ने इस गुफा के बारे में पता लगाया और इसके बारे में वेद व्यास को बताया। इसीलिए इस गुफा का वर्णन पुराणों में भी मिलता है।
इसी गुफा के पास एक गांव है चिटगल। काफी समय पूर्व पाराशर गोत्र के गोभन पमत नामक एक ब्राह्‌मण इस गांव में निवास करते थे। कहा जाता है कि उनके पास एक सुंदर गाय थी। जब वह जंगल में चरने जाती थी, तो वृद्ध भुवनेश्वर जो गुफा से कुछ ही दूरी पर है, वहां स्थित शिवलिंग के ऊपर अपना सारा दूध निचोड़ आती थी। ब्राह्‌मणी रोज हैरान रहती थी कि आखिर दूध कहां चला जाता है। एक दिन ब्राह्‌मणी ने स्वयं ही गाय का पीछा किया, तो यह दृश्य देखकर हैरान रह गई। उसे बेहद क्रोध आया। उसने दरांती से उसी वक्त शिवलिंग पर वार किया। शिवलिंग से दूध की धारा फूट पड़ी। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर ब्राह्‌मणी अचेत हो गई। होश आने पर वह किसी तरह घर पहुंची, पर घर पहुंचते ही उसकी मृत्यु हो गई।
काफी दिनों तक इस स्थल की ओर फिर किसी का ध्यान नहीं गया। बाद में पुराणों का अध्ययन करके जगद्‌गुरु शंकराचार्य ने इस गुफा को खोजा और शिव-शक्ति को तांबे से नवाजा। उन्होंने इसका राज चंद्र वासियों के राजा को बताया। चंद्र वासियों ने यहां पर सीढ़ियां बनवाईं। अब इस गुफा में दर्शन हेतु कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था है। काशी से आए पुजारियों के वंशज यहां पूजा का कार्य तथा गुफा का मार्गदर्शन करते हैं। गुफा कमेटी के प्रबंधक दान सिंह भंडारी बताते हैं, 'गुफा के भीतर विमान कलाकृतियां, जैसे नौ लाख तारे, तैंतीस कोटि देवता, गरुड़, चारों युग, भीम की गदा, ऐरावत हाथी के पांव, कामधेनु के थन से टपकता दूध, भगवान शिव की जटाएं आदि पर्यटकों व श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।'

पंकज सिंह महर

आजादी से पूर्व गंगोलीहाट में चंद और कत्यूरी राजाओं का शासन रहा। उस समय महाकाली की अत्यधिक मान्यता थी। राजाओं की श्रद्धा और आस्था का प्रमाण इस बात से मिलता है कि मड़कोट से मंदिर तक सीढ़ी और खडंजा मार्ग बना हुआ है। शासकों ने मंदिर की पूजा व्यवस्था भी तय की। इसके लिए महाराष्ट से रावल उपजाति के लोगों को पुजारी पद पर बिठाने के लिए यहां लाया गया। अगरौन गांव के पंतों को पुरोहत नियुक्त किया गया। मंदिर में भोग, हवन व पूजा के लिए विभिन्न गांवों को तिल, चावल, बेलपत्री आदि लाने की जिम्मेदारी सौंपी गईं। कोलकाता की काली के मंदिर में भी इस शक्तिस्थल का उल्लेख है।
सेना के कुमाऊं रेजीमेंट की इस मंदिर पर विशेष श्रद्धा है। 1971 में भारत-पाक युद्ध में इसी देवी की स्तुति करने पर जवानों की रक्षा हुई। हर वर्ष कुमाऊं रेजीमेंट की तरफ से इस मंदिर में विशेष पूजा दी जाती है। आज भी युद्ध के समय कुमाऊं रेजीमेंट के जवान मां काली जै-जै के उद्‌घोष के साथ आगे बढ़ते हैं।
गंगोलीहाट में आश्विन और चैत्र नवरात्र की अष्टमी को विशेष मेले लगते हैं। इसके अलावा समय-समय पर यहां शतचंडी और सहत्रचंडी के कार्यक्रम भी होते हैं। प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर में पूजा के लिए पहुंचते हैं। यहां पर पशुबलि की प्रथा है। इसके अलावा रोज देवी के मंदिर में भोग लगाया जाता है।

पंकज सिंह महर

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर और गंगोलीहाट नगर से करीब 500 मीटर की दूरी पर देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित महाकाली मंदिर के बारे में स्कंधपुराण के मानसखंड में विस्तार से जानकारी दी गई है। जब देवता शुंभ, निशुंभ, रक्तबीज राक्षसों से हार गए, तब उन्होंने शैल पर्वत पर जाकर मां काली की आराधना की। मां काली जाहनवी जलप्रपात से प्रकट हुई। उन्होंने राक्षसों का संहार किया। राक्षसों को मारने के लिए देवी ने कई रुप रखे। उसी के अनुरूप यहां पर चामुंडा, अंबिका, वैष्णवी, क्षमा, भवानी, शीतला, भद्रकाली, त्रिपुरासुंदरी के नाम से कई अन्य स्थानों पर भी मंदिर बनाए गए। इन मंदिरों में मूर्ति पूजा का विधान नहीं है। सभी मंदिरों में यंत्र के रुप में शक्तियां स्थापित की गईं हैं।
कहा जाता है कि छठी शताब्दि में इस क्षेत्र में आसुरी शक्तियों का अत्याचार बढ़ गया। महाकाली ने ज्वालामुखी की तरह रौद्र रूप धारण कर इन शक्तियों का विनाश किया। संहार के बाद भी देवी का रौद्र रूप शांत न होने के कारण क्षेत्र में हाहाकार मचने लगा, तभी उत्तराखंड की यात्रा पर आए आदिगुरु शंकराचार्य देवी की स्तुति कर योगसाधना, तप के बल पर रौद्र रूप को शांत करा दिया। उसी समय यहां पर देवी को शक्तिपीठ के रूप में स्थापित किया गया। शंकराचार्य के यहां आने से पूर्व महाकाली के मंदिर में नरबलि दी जाती थी। उसके बाद से ही पशुबलि का विधान शुरु हो पाया। स्थानीय सिमलकोट गांव के मेहता उपजाति के लोगों को देवी के मंदिर में बलि दी जाती थी।
आजादी से पूर्व गंगोलीहाट में चंद और कत्यूरी राजाओं का शासन रहा। उस समय महाकाली की अत्यधिक मान्यता थी। राजाओं की श्रद्धा और आस्था का प्रमाण इस बात से मिलता है कि मड़कोट से मंदिर तक सीढ़ी और खडंजा मार्ग बना हुआ है। शासकों ने मंदिर की पूजा व्यवस्था भी तय की। इसके लिए महाराष्ट से रावल उपजाति के लोगों को पुजारी पद पर बिठाने के लिए यहां लाया गया। अगरौन गांव के पंतों को पुरोहत नियुक्त किया गया। मंदिर में भोग, हवन व पूजा के लिए विभिन्न गांवों को तिल, चावल, बेलपत्री आदि लाने की जिम्मेदारी सौंपी गईं। कोलकाता की काली के मंदिर में भी इस शक्तिस्थल का उल्लेख है।

पंकज सिंह महर

पाताल भुवनेश्वर गुफा के अंदर का एक दृश्य


पंकज सिंह महर

पाताल भुवनेश्वर गुफा के भीतर शिव जी की जटायें