• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

PATAL BHUBANESHWAR CAVE & GANGOLI HAAT MAHA KALI TEMPLE IN PITHORAGARAH, UK

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 09, 2007, 11:34:54 AM

विनोद सिंह गढ़िया

Devlok Patal Bhubaneswar. Part 1 of 4

Patal Bhubaneswar is 14 km to the north of Gangolihat and 91 km from Pithoragarh and is located 1,350 mts. above sea level. The way to the temple is through a narrow tunnel. The main passage opens into several small caves which have in them stone carvings of many local gods and goddesses and can move the religiously inclined.

Devlok Patal Bhubaneswar. Part 2 of 4

Devlok Patal Bhubaneswar. Part 3 of 4

Devlok Patal Bhubaneswar. Part 4 of 4




विनोद सिंह गढ़िया

* हाट कालिका मंदिर*

पूरे कुमाऊं में हाट कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर की कहानी भी उसकी ख्याति के अनुरूप है। पांच हजार साल पूर्व लिखे गए स्कंद पुराण के मानसखंड में दारुकावन (गंगोलीहाट) स्थित देवी का विस्तार से वर्णन है। छठी सदी के अंत में भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले जगत गुरु शंकराचार्य  महाराज नेकूर्मांचल (कुमाऊं) भ्रमण के दौरान हाट कालिका की पुनर्स्थापना की थी।



कहा जाता है कि छठी सदी में गंगोली (गंगोलीहाट का प्राचीन नाम) क्षेत्र में असुरों का आतंक था। तब मां महाकाली ने रौद्र रूप धारण कर आसुरी शक्तियों का विनाश किया लेकिन माता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। क्षेत्र में हाहाकार मच गया। इलाका जनविहीन होने लगा। इसी दौर में कूर्मांचल के भ्रमण पर निकले आदि गुरु शंकराचार्य महाराज ने जागेश्वर धाम पहुंचने पर गंगोली में किसी देवी का प्रकोप होने की बात सुनी। शंकराचार्य के मन में विचार आया कि देवी इस तरह का तांडव नहीं मचा सकती। यह किसी आसुरी शक्ति का काम है। लोगों को राहत दिलाने के उद्देश्य से वह गंगोलीहाट को रवाना हो गए।बताया जाता है कि जगतगुरु जब मंदिर के 20 मीटर पास में पहुंचे तो वह जड़वत हो गए। लाख चाहने के बाद भी उनके कदम आगे नहीं बढ़ पाए। शंकराचार्य को देवी शक्ति का आभास हो गया। वह देवी से क्षमा याचना करते हुए पुरातन मंदिर तक पहुंचे। पूजा, अर्चना के बाद मंत्र शक्ति के बल पर महाकाली के रौद्र रूप को शांत कर शक्ति के रूप में कीलित कर दिया और गंगोली क्षेत्र में सुख, शांति व्याप्त हो गई। मंदिर के पुजारी रिटायर्ड शिक्षाधिकारी किशन सिंह रावल बुजुर्गों से सुनी बातें बताते हुए कहते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य ने क्षेत्र में चामुंडा, वैष्णवी, अंबिका, छिन्नमस्ता, शीतला, त्रिपुरासुंदरी, कोकिला (कोटगाड़ी), भुवनेश्वरी नाम से शक्ति स्थलों की स्थापना की। इन सभी मंदिरों की क्षेत्र में ही नहीं दूर-दूर तक ख्याति है। नवरात्रियों में पूजा के लिए देशभर से भक्तजन पहुंचते हैं।

विनोद सिंह गढ़िया

** मंदिर निर्माण के लिए भी मां ने कराया शक्ति का आभास **

हाट कालिका के वर्तमान मंदिर के निर्माण में भी महाकाली ने अपनी शक्ति का आभास कराया था। 19वीं सदी के प्रारंभ में हाट कालिका के तत्कालीन पुरोहित पं. रुद्र दत्त पंत प्रयागराज कुंभ स्नान के लिए गए हुए थे। वह जिस ठिकाने पर रुके थे, वहीं पर श्री लक्ष्मण जंगम नाम के एक साधु भी टिके हुए थे। जंगम बाबा ने पुरोहित पंत से परिचय प्राप्त करने के बाद बताया कि मां ने उनके साथ उत्तराखंड जाने का आदेश दिया है। जंगम रुद्र दत्त पंत के साथ महाकाली मंदिर पहुंच गए। उन्हें मंदिर के जीर्णोद्घार के लिए आसपास कहीं भी पत्थर नहीं मिला। बाबा परेशान हो उठे। बताया जाता है कि रात में महाकाली स्वप्न में जंगम बाबा को एक स्थान पर ले गई। सुबह होने पर उस स्थान पर खुदाई की गई तो हरे रंग के पत्थरों की प्लेट निकलने लगी। मंदिर निर्माण का काम पूरा होते ही पत्थर की खदान भी बंद हो गई।


** हाट कालिका में नर बलि का भी रहा है विधान **

सदियों से प्रचलित कहावत के अनुसार शंकराचार्य के पदार्पण से पहले हाट कालिका के मंदिर में नर बलि होती थी। उसके बाद पशु बलि की प्रथा चली। इसके लिए बाकायदा एक गांव नियत था। इस गांव के लोगों को मौत उपजाति से जाना जाता था। आज भी इन लोगों का गांव सिमलकोट मां महाकाली के क्रीड़ांगन चौड़िक नामक मैदान के समीप स्थित है। अब यह लोग मेहता उपजाति से जाने जाते हैं। इनके कई परिवार पिथौरागढ़ और अन्यत्र स्थानों में बसे हैं। आज भी चैत्र और आश्विन की नवरात्रि की अष्टमी को मेहता उपजाति के लोग रात्रि में एक बकरे और एक भैंसे की बलि देते हैं।


** कुमाऊं रेजीमेंट हाट कालिका पर न्योछावर क्यों **

कुमाऊं रेजीमेंट हाट कालिका पर न्योछावर है।  रेजीमेंट की अगाध श्रद्धा के पीछे की कहानी भी दिलचस्प और मां की शक्ति की झलक दिखलाती है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंगाल की खाड़ी में भारतीय सेना का एक जहाज डूबने लगा। तमाम कोशिशें भी जहाज में घुस रहे पानी को नहीं रोक पाई। सैन्य अधिकारियों ने बीच समुद्र में जहाज का डूबना निश्चित मानते हुए सैनिकों से अपने-अपने ईष्टों का स्मरण करने को कहा। तमाम तरह से देवी, देवताओं के जयकारे लगने लगे। ज्योंहि कुमाऊं के सैनिकों ने हाट कालिका के जयकारे लगाए तो जहाज आश्चर्य ढंग से किनारे लग गया। तब से कुमाऊं रेजीमेंट मां पर न्योछावर है। मंदिर में अधिकांश निर्माण रेजीमेंट ने ही किए हैं। कहा जाए कि रेजीमेंट का हाट कालिका से अटूट नाता है तो गलत नहीं होगा।

विनोद सिंह गढ़िया

                 बल्कलाख्यो महादेव प्रकाशयति भूतलो
                 ना गमिष्यन्ति मनुजास्तावत पातलमंडले
                 सत्क्रियां देवदेवस्य बल्कलाख्य: करिष्यति
                 संदाप्रभति मर्व्याना गुहा गाया भविष्यति।



पाताल भुवनेश्वर की विश्व प्रसिद्ध गुफा शिवशक्ति का एक अद्वितीय स्थल है। स्कंदपुराण के मानस खंड के 501वें अध्याय में वल्कल (पेड़ की छाल से बने वस्त्र) धारण करने वाले महापुरुष द्वारा गुफा को खोजने की भविष्यवाणी की गई थी। उसे सत्य सिद्ध करते हुए छठी शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस गुफा को खोजा था। करीब पांच हजार साल पुराने धर्मग्रंथ स्कंद पुराण के मानस खंड के एक श्लोक (ऊपर दिया गया है) में इस बात का उल्लेख है।
पाताल नाम से ही पाताललोक का विम्ब दिमाग में उभरने लगता है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल अंतर्गत पिथौरागढ़ में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा के रहस्यों को महर्षि व्यास ने 5000 साल पहले ही खोल दिया था। पुराण में इस गुफा का निर्माण देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा किए जाने का उल्लेख है। छठी शताब्दी में जागेश्वर धाम के दर्शनों के बाद सरयू और रामगंगा नदियों के बीच स्थित गंगोली (गंगोलीहाट) पहुंचे आदिगुरु शंकराचार्य महाराज अपने तपबल से देवदार बनी में स्थित गुफा के दर्शनों को जा पहुंचे।
गुफा में सीधे नीचे की ओर उतरना पड़ता है। पत्थरों की प्राचीन समय में बनी 10 मीटर लंबी सीढ़ियां उतरने के बाद एक मैदाननुमा हिस्से में असंख्य हाथियों के पैर बने हुए हैं। गुफा के भीतर बना पानी का नौला, भगवान शंकर की जटाएं, गरुड़ की आकृति, कालभैरव की जीभ दर्शनीय है। 300 मीटर लंबी यह गुफा पाताल को जाती हुई सी प्रतीत होती है, पाताल नाम के पीछे यही कारण रहा होगा।

श्रोत - अमर उजाला