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Kunjapuri in Tehri - सिद्धपीठ माँ कुन्जापुरी: पूरी करती है सबकी मनोकामना

Started by सन्दीप काला, June 27, 2008, 04:52:55 PM

सन्दीप काला

कुंजापुरी पूरी करती है सबकी मनोकामना

यूं तो उत्तराखण्ड देवभूमि है किन्तु टिहरी जनपद में उतुंग पर्वत श्रृंखलाओं पर विराजमान सिद्धपीठें अनादि काल से ही अध्यात्मिक ऊर्जा के अपार स्रोत तथा धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र रहे है। इन्हीं सिद्धपीठों में एक है कुंजापुरी सिद्धपीठ, जो 6500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।




सन्दीप काला

स्कन्दपुराण के अनुसार राजा दक्ष की पुत्री, सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। त्रेता युग में असुरों के परास्त होने के बाद दक्ष को सभी देवताओं का प्रजापति चुना गया। उन्होंने इसके उपलक्ष में कनखल में यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने, हालांकि, भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि भगवान शिव ने दक्ष के प्रजापति बनने का विरोध किया था। भगवान शिव और सती ने कैलाश पर्वत, जो भगवान शिव का वास-स्थान है, से सभी देवताओं को गुजरते देखा और यह जाना कि उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। जब सती ने अपने पति के इस अपमान के बारे में सुना तो वे यज्ञ-स्थल पर गईं और हवन कुंड में अपनी बलि दे दी। जब तक शिव वहां पहुंचते तब तक वे बलि हो चुकी थीं।

भगवान शिव ने क्रोध में आकर तांडव किया और अपनी जटाओं से गण को छोड़ा तथा उसे दक्ष का सर काट कर लाने तथा सभी देवताओं को मार-पीट कर भगाने का आदेश दिया। पश्चातापी देवताओं ने भगवान शिव से क्षमा याचना की और उनसे दक्ष को यज्ञ पूरा करने देने की विनती की। लेकिन, दक्ष की गर्दन तो पहले ही काट दी गई थी। इसलिए, एक भेड़े का गर्दन काटकर दक्ष के शरीर पर रख दिया गया ताकि वे यज्ञ पूरा कर सकें।

भगवान शिव ने हवन कुंड से सती के शरीर को बाहर निकाला तथा शोकमग्न और क्रोधित होकर वर्षों तक इसे अपने कंधों पर ढोते विचरण करते रहें। इस असामान्य घटना पर विचार-विमर्श करने सभी देवतागण एकत्रित हुए क्योंकि वे जानते थे कि क्रोध में भगवान शिव समूची दुनिया को नष्ट कर सकते हैं। आखिरकार, यह निर्णय लिया गया कि भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र का उपयोग करेंगे। भगवान शिव के जाने बगैर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 टुकड़ों में विभक्त कर दिया। धरती पर जहां कहीं भी सती के शरीर का टुकड़ा गिरा, वे स्थान सिद्ध पीठों या शक्ति पीठों (ज्ञान या शक्ति के केन्द्र) के रूप में जाने गए। उदाहरण के लिए नैना देवी वहां हैं, जहां उनकी आंखें गिरी थीं, ज्वाल्पा देवी वहां हैं, जहां उनकी जिह्वा गिरी थी, सुरकंडा देवी वहां हैं, जहां उनकी गर्दन गिरी थी और चंदबदनी देवी वहां हैं, जहां उनके शरीर का नीचला हिस्सा गिरा था।

उनके शरीर के ऊपरी भाग, यानि कुंजा उस स्थान पर गिरा जो आज कुंजापुरी के नाम से जाना जाता है।

सन्दीप काला

मंदिर के अन्दर वह स्थान जहां कुंजा गिरी थी


सन्दीप काला

कुंजापुरी मेला

वर्ष 1972 से प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के पहले नवरात्रों के दौरान कुंजापुरी मंदिर में कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले का आयोजन किया जाता है।

यह इस क्षेत्र के सबसे बड़े पर्यटक आकर्षण केन्द्रों में से एक है। इसमें पड़ोसी क्षेत्रों के साथ-साथ दुनियाभर के लगभग 50,000 दर्शक भाग लेते हैं। यह मेला पर्यटन एवं विकास को बढ़ावा देने की दोहरी भूमिका निभाता है। कई प्रकार की अंतसांस्कृतिक प्रदर्शनियां और संगीत एवं नृत्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें देशभर के कलाकार हिस्सा लेते हैं। सरकार भी विकास के एक साधन के तौर पर इस मेले का उपयोग करती है तथा स्थानीय किसानों को फसलों और खेती की तकनीकों के बारे में जानकारी देने के लिए इस अवसर का उपयोग करती है।



शारदीय नवरात्र पर नौ दिन तक मंदिर परिक्षेत्र में आयोजित होने वाली दुर्गापूजा के साथ-साथ इस सिद्धपीठ के नाम से नरेन्द्रनगर में नौ दिन तक चलने वाले श्री कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले में धार्मिक, सांस्कृतिक व अन्य कई गतिविधियों के कारण विगत बत्तीस वर्षो से अनवरत स्थानीय ग्रामीण, पर्यटकों व आस्थावान लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। सिद्धपीठ कुंजापुरी की योगशक्ति के रूप में प्रचलित कथा के अनुसार पार्वती पूर्व जन्म में सती के नाम से जानी गयी। केदारखण्ड में वर्णित व्याख्यान के अनुसार शोककुल भगवान शिव देवी सती के अस्थि पंजर को लेकर धर्म पर्वत पर पहुंचे तो सती के कुंज भाग के इस स्थल पर गिरने से कुंजापुरी का प्रादुर्भाव हुआ। श्री कुंजापुरी देवी सती का ही एक अंग रूप में देवी रूप धारण करना है। विष्णु भगवान के सुदर्शन चक्र से देवी सती की निर्जीव देह के कुंज भाग का लोक कल्याणार्थ इस क्षेत्र में कट कर गिरना ही कुंजापुरी सिद्धपीठ का प्रादुर्भाव है। हिमालय की मनोरम पर्वतीय श्रृंखलाओं के मध्य स्थित इस सिद्धपीठ से विश्व विख्यात धामों बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री के पर्वत शिखरों के दर्शनों के साथ-साथ नंदादेवी, चौखम्बा, त्रिशूल पर्वत आदि मनोरम स्थल यहां से दिखाई देते है। दूसरी ओर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला तपोवन के बीच पतित पावनी गंगा की इठलाती जलधारा का मनोहारी दृश्य यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। सूर्योदय व सूर्यास्त के मनोहारी दृश्य सिद्धपीठ कुंजापुरी से अत्यंत नयनाभिराम लगते है।





सन्दीप काला

कुंजापुरी सिद्धपीठ नरेन्द्र नगर से 13 किलोमीटर स्थित है ।

सन्दीप काला

सिध्दपीठ माँ कुन्जापुरी का मन्दिर, मेन रोड से



पंकज सिंह महर

कुंजापुरी माता, तेरी जै बोला.....।

बहुत धन्यवाद काला जी, आपने इस शक्ति पीठ के दर्शन कराये।

पंकज सिंह महर