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Various Dynasities In Uttarakhand - उत्तराखंड के विभिन्न भागो मे राजाओ का शासन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 05, 2008, 03:42:53 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि मानव जाती का। यहाँ कई शिलालेख, ताम्रपत्र व प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। जिससे गढ़वाल की प्राचीनता का पता चलता है। गोपेश्नर में शिव-मंदिर में एक शिला पर लिखे गये लेख से ज्ञात होता है कि कई सौ वर्ष से यात्रियों का आवागमन इस क्षेत्र में होता आ रहा है। मार्कण्डेय पुराण, शिव पुराण, मेघदूत व रघुवंश महाकाव्य में यहाँ की सभ्यता व संस्कृति का वर्णन हुआ है। बौधकाल, मौर्यकाल व अशोक के समय के ताम्रपत्र भी यहाँ मिले हैं। इस भूमी का प्राचीन ग्रन्थों में देवभूमि या स्वर्गद्वार के रूप में वर्णन किया गया है। पवित्र गंगा हरिद्वार में मैदान को छूती है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों में वर्णित यही मायापुर है। गंगा यहाँ भौतिक जगत में उतरती है। इससे पहले वह सुर-नदी देवभूमि में विचरण करती है। इस भूमी में हर रूप शिव भी वास करते हैं, तो हरि रूप में बद्रीनारायण भी। माँ गंगा का यह उदगम क्षेत्र उस देव संस्कृति का वास्तविक क्रिड़ा क्षेत्र रहा है जो पौराणिक आख्याओं के रूप में आज भी धर्म-परायण जनता के मानस में विश्वास एवं आस्था के रूप में जीवित हैं। उत्तराखंड की प्राचीन जातियों में किरात, यक्ष, गंधर्व, नाग, खस, नाथ आदी जातियों का विशेष उल्लेख मिलता है। आर्यों की एक श्रेणी गढ़वाल में आई थी जो खस (खसिया) कहलाई। यहाँ की कोल भील, जो जातियाँ थी कालांतर में स्वतंत्रता प्राप्ति के बात हरिजन कहलाई। देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यात्री के रूप में बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आये उनमें से कई लोग यहाँ बस गये और उत्तराखंड को अपना स्थायी निवास बना दिया। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी यहाँ रहने लगे। मुख्य रूप से इस क्षेत्र में ब्राह्मण एवं क्षत्रीय जाति के लोगों का निवास अधिक है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हरिद्वार, उधमसिंह नगर एवं कुछ अन्य क्षेत्रों को मिलाने से अन्य जाती के लोगों में अब बढोत्री हो गई है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धरातल पर यदि कहीं समाजवाद दिखाई देता है तो वह इस क्षेत्र में देखने को मिलता है इसलिए यहाँ की संस्कृति संसार की श्रेष्ठ संस्कृतियों में मानी जाती है। सातवीं सदी के गढ़वाल का एतिहासिक विवरण प्राप्त है। 688 ई0 के आसपास चाँदपुर, गढ़ी (वर्तमान चमोली जिले में कर्णप्रयाग से 13 मील पूर्व ) में राजा भानुप्रताप का राज्य था। उसकी दो कन्यायें थी। प्रथम कन्या का विवाह कुमाऊं के राजकुमार राजपाल से हुआ तथा छोटी का विवाह धारा नगरी के राजकुमार कनकपाल से हुआ इसी का वंश आगे बढा।

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महाराजा कनकपाल का समय

महाराजा कनकपाल का समय - कनकपाल ने 756 ई0 तक चाँदपुर गढ़ी में राज किया। कनकपाल की 37 वीं पीढ़ी में महाराजा अजयपाल का जन्म हुआ। इस लम्बे अंतराल में कोई शक्तिशाली राजा नहीं हुआ। गढ़वाल छोटे-छोटे ठाकुरी गढ़ों में बंटा था, जो आपस में लड़ते रहते थे। कुमाऊं के कत्यूरी शासक भी आक्रमण करते रहते थे। कत्यूरियों मे ज्योतिष्पुर (वर्तमान जोशीमठ) तक अधिकार कर लिया था।

महाराजा अजयपाल का समय - राजा कनकपाल की 37 वीं पीढ़ी में 1500 ई0 के महाराजा अजयपाल नाम के प्रतापी राजा हुए। गढ़वाल राज्य की स्थापना का महान श्रेय इन्ही को है। इन्होने 52 छोटे-छोटे ठाकुरी गढ़ों को जीतकर एक शक्तिशाली गढ़वाल का अर्थ है, गढ़­­ = किला, वाल = वाला अर्थात किलों का समुह। कुमाऊं के राजा कीर्तिचन्द व कत्यूरियों के आक्रमण से त्रस्त होकर महाराजा अजयपाल ने 1508 ई0 के आसपास अपनी राजधानी चाँदपुर गढ़ी से देवलगढ़ तथा 1512 ई0 में देवलगढ़ से श्रीनगर में स्थापित की। इनके शासनकाल में गढ़वाल की सामाजिक, राजनैतिक व धार्मिक उन्नति हुई।

शाह की उपाधिः महाराजा अजयपाल की तीसरी पीढ़ी में बलभद्र हुए। ये दिल्ली के शंहशाह अकबर के समकालीन थे, कहते हैं कि एक बार नजीबाबाद के निकट शिकार खेलते समय बलभद्र ने शेर के आक्रमण से दिल्ली के शंहशाह की रक्षा की। इसलिए उन्हे शाह की उपाधि प्राप्त हुई, तबसे 1948 तक गढ़वाल के राजाओं के साथ शाह की उपाधि जुड़ी रही।

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गढ़वाल का विभाजनः

गढ़वाल का विभाजनः -1803 में महाराजा प्रद्दुम्न शाह संपूर्ण गढ़वाल के अंतिम नरेश थे जिनकी राजधानी श्रीनगर थी। गोरखों के आक्रमण और संधि-प्रस्ताव के आधार पर प्रति वर्ष 25000 /- रूपये कर के रूप में गोरखों को देने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई थी। इसी अवसर का लाभ उठाकर गोरखों ने दूसरी बार गढ़वाल पर आक्रमण किया और पूरे गढ़वाल को तहस-नहस कर डाला। राजा प्रद्दुम्न शाह देहरादून के खुड़ब़ड़ा के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और गढ़वाल में गोरखों का शासन हो गया। इसके साथ ही गढ़वाल दो भागों में विभाजित हो गया।

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गढ़वाल रियासत

गढ़वाल रियासत (टिहरी गढ़वाल)- महाराजा प्रद्दुम्न शाह की मृत्यू के बाद इनके 20 वर्षिय पुत्र सुदर्शन शाह इनके उत्तराधिकारी बने। सुदर्शन शाह ने बड़े संघर्ष और ब्रिटिश शासन की सहयाता से, जनरल जिलेस्पी और जनरल फ्रेजर के युद्ध संचालन के बल पर गढ़वाल को गोरखों की अधीनता से मुक्त करवाया। इस सहयाता के बदले अंग्रेजों ने अलकनंदा व मंदाकिनी के पूर्व दिशा का सम्पूर्ण भाग ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया, जिससे यह क्षेत्र ब्रिटिश गढ़वाल कहलाने लगा और पौड़ी इसकी राजधानी बनी।

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टिहरी गढ़वाल

टिहरी गढ़वाल- महाराजा सुदर्शन शाह ने भगिरथी और भिलंगना के सगंम पर अपनी राजधानी बसाई, जिसका नाम टिहरी रखा। राजा सुदर्शन शाह के पश्चात क्रमशः भवानी शाह ( 1859-72), प्रताप शाह (1872-87), कीर्ति शाह (1892-1913), नरेन्द्र शाह (1916-46) टिहरी रीयासत की राजगद्दी पर बैठे। महाराजा प्रताप शाह तथा कीर्ति शाह की मृत्यु के समय उत्तराधिकारियों के नबालिग होने के कारण तत्कालीन राजमाताओं ने क्रमशः राजमाता गुलेरिया तथा राजमाता नैपालिया ने अंग्रेज रिजेडेन्टों की देख-रेख में (1887-92) तथा (1913-1916) तक शासन का भार संभाला। रियासत के अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह के समय सन् 1949 में रियासत भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गई।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय


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गौचर को प्रकृति ने एक बड़ा समतल क्षेत्र प्रदान किया है जो उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में सर्वाधिक बड़ा खुले स्थानों में से एक है तथा इस मैदान का इसके इतिहास में प्रमुख भूमिका है। इस मैदान ने एक हवाई पट्टी का कार्य किया है तथा भूत में कई गणमान्य लोगों का यहां आगमन हुआ था। क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यापार मेला इसी स्थान पर आयोजित होता है। यह समतल भूमि गढ़वाल के पंवार राजाओं की संपत्ति थी और उन्होंने कभी इसे बद्रीनाथ मंदिर को दान कर दिया था। यह अब भी बद्रीनाथ मंदिर की संपदा है तथा कृषि एवं अन्य कार्यों के लिये इसका उपयोग नहीं हो सकता। (गौचर का नया हवाई अड्डा कृषि-भूमि पर ही है तथा इस कारण भी कि हवाई अड्डा तथा प्रशासनिक भवनों के लिये और अधिक बड़ी जगह की आवश्यकता थी।)
वर्ष 1920 के दशक में गौचर को तब पहचान मिली जब तत्कालीन वायसराय की पत्नी लेडी विलिंगडन हवाई मार्ग से वहां आई। फिर वर्ष 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू बद्रीनाथ की व्यक्तिगत यात्रा करते हुए अपनी बहन विजया लक्ष्मी पंडित के साथ हवाई मार्ग से ही वहां आये उस समय हवा के बहाव को जानने के लिये गाय के सुखे गोबर को खेत में जलाकर पता लगाया जाता था।

वर्ष 1943 से ही गौचर उत्तराखंड के सबसे बड़े व्यापार मेलों में से एक का मेजबान रह चुका है। गढ़वाल हिमालय क्षेत्र की सीमा पर रहने वाले चमोली जिले के भोटिया लोगों को, ऊनी कपड़े एवं वस्तुएं बनाना तथा ऊन बनाने एवं रंगने में परंपरागत निपुणता हासिल थी। वर्ष 1962 से पहले भारत तथा पूर्व-तिब्बत के बीच सीमा-पार व्यापार होता था तथा ऊन-आधारित कुटीर उद्योग में भोटिया लोगों की प्रमुख आय का श्रोत ऊन का आयात ही होता था। वर्ष 1962 के बाद भारत-चीन युद्ध के कारण व्यापार रूक गया। गौचर मेला, भोटिया लोगों के लिये बड़े बाजार की तरह था जहां वे ऊन सहित अपना सामान तथा वेश-कीमती जवाहिरात तथा हींग यहां बेचते तथा दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं जैसे कपड़े एवं नमक आदि खरीद कर वापस चले जाते थे। यह मेला मात्र एक स्थानीय मेला ही नहीं था वरन सुदूर बिजनौर तथा कोटद्वार से आकर भी लोग बृहत व्यापार में हिस्सा लेते।

बड़े स्तर पर लगभग वर्ष 1000 से वर्ष 1803 तक गौचर, शेष गढ़वाल की तरह ही पाल वंश द्वारा शासित रहा था जो बाद में शाह वंश हो गया। वर्ष 1803 में यहां एक विनाशकारी भूकंप में लगभग एक-तिहाई आबादी मारी गयी और इस स्थिति का लाभ उठाकर गोरखों ने गढ़वाल की ओर कूच कर दिया। उस समय वहां के राजा प्रद्युम्न शाह थे तथा परस्पर युद्ध में उन्होंने अपने प्राण तथा राज्य दोनों गंवाये।

शेष गढ़वाल के साथ गौचर भी वर्ष 1803 से वर्ष 1815 के बीच गोरखों के अधीन रहा। वर्ष 1815 में अंग्रेजों की सहायता से राजा सुदर्शन शाह ने गोरखों को परास्त कर अपना राज्य वापस ले लिया तथा अंग्रेजों ने अलकनंदा एवं मंदाकिनी का पूर्वी-भाग राजधानी श्रीनगर सहित ब्रिटीश गढ़वाल में मिला लिया। प्रारंभ में, यह क्षेत्र देहरादून तथा सहारनपुर से प्रशासित होता रहा परंतु बाद में अंग्रेजों ने यहां पौड़ी नाम से एक नया जिला बनाया। आज चमोली एवं गौचर पौड़ी का तहसील है। फरवरी 24, 1960 को चमोली तहसील को स्वाधीन भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में एक नया जिला बना दिया गया। वर्ष 1994 में गौचर में एक नगर पंचायत बनी।

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KINGS OF PITHORAGARH

Under the Pals

After its conquest by the Rajwar of Ukko Bhartpal in the year 1364, Pithoragarh was for the whole of the remaining 14th century by the three generation of Pals and the kingdom extended from Pithoragarh to Askot.


[edit] Chand Dynasty
According to a tamrapatra dating back to 1420 the Pal dynasty was uprooted by the Brahm dynasty of Nepal but subsequently following the death of Gyan Chand in a conflict with Kshetra Pal, the Pal supremacy was restored. It is believed that Bhartichand, an ancestor of Gyan Chand, had replaced Bums, the ruler of Pithoragarh, after defeating them in 1445. In 16th century the Chand dynasty again took control over Pithoragarh town and in 1790 built a new fort on the hill where the present Girls Inter College is situated.


[edit] Under British
Subsequently under British domination, Pithoragarh remained a tehsil under Almora district until 1960 when it was elevated to a district. Under the British there was an army cantonment, Church, Mission school. Christianity was developed in this region.


[edit] Modern Pithoragarh
Pithoragarh district was previously the part of Almora district of Uttarakhand. Pithoragarh was created as a separate district in 1960. In 1997 a new district of Champawat was carved out by reorganizing its boundaries.

मेहता जी,
काफ़ी बढ़िया जानकारी लाये हैं आप इस बार भी... अपने इतिहास की तो बहुत ही मामूली जानकारी थी हमें.... अब जाकर कई बातें मालूम हुईं.


बहुत बहुत धन्यवाद.. लगे रहो मेहता भाई... :D

वीरेन्द्र

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कत्यूरी शासक

द्वाराहाट के इतिहास में गुप्त वंश का खासा योगदान रहा। गुप्त लोग महान निर्माता थे और उनके संरक्षण में कला और वास्तुकला की खूब प्रगति हुई। उन्होंने इस क्षेत्र में निर्माण कार्यों को अंजाम देने के लिए सबसे अच्छे कारीगरों को आमंत्रित करके और यहां पर कई सारे मंदिरों और खूबसूरत इमारतों का निर्माण कराया। उनका मुख्य पेशा कृषि कार्य था और शिव उनके देवता थे। कुनिंदाऔं के विपरीत गुप्त शासक विष्णु, गणेश, शक्ति और काली की पूजा करते थे।

गुप्त शासकों के बाद चंद वंश या कत्यूरी वंश ने शासन किया। कत्यूरी खस जनजाति का हिस्सा थे जो पहले सहस्त्रावदी ईसापूर्व में केंद्रीय एशिया से भारत आकर पूरे कुमायूं, गढ़वाल, और असम के खासिया पहा़ड़ियों में बस गए थे।

कत्यूरी शासक शक्तिशाली, महत्वाकांक्षी और संगठित थे। उन्होंने द्वाराहाट को 16वी सहस्त्राब्‍िदी में राजधानी बनाया और इस क्षेत्र में एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था की नींव डाली। उन्होंने कई विभागों की स्थापना की जिनके प्रधान पूरे क्षेत्र में कत्यूरी आधिपत्य को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे। इन प्रमुखों को भंडारी या अधिकारी या नेगी आदि कहा जाता था, जो उनकी शक्ति के आधार पर तय किया जाता था।

चंद शासकों ने कभी भी स्थायी सेना का निर्माण नहीं किया। इसके बदले वे आंतरिक और बाह्य आक्रमण के दौरान अपने वसालों पर निर्भर किया करते थे। राज्य में शांति कायम थी और इसकी वजह से व्यापार और वाणिज्य का काफी विकास हुआ। इसी समय कुमायूं भाषा का विकास हुआ और इस भाषा में साहित्य लिखा जाने लगा।

चंदवशी शासको को नेपाल के गोरखाओं ने उखाड़ फैंका। गोरखाओं ने 1790 में इस क्षेत्र पर हमला किया। वे वास्तव में लुटेरे थे और उन्होंने यहां के प्रशासन को बेहद निर्दयतापूर्वक संचालित किया। वे किसी भी तरह से विद्रोह को दबाने में रुचि रखते थे। यह संभवतः द्वाराहाट के इतिहास का सबसे काला समय था।

गोरखाओं का शासन अधिक समय तक नहीं चला। 1814 में इस क्षेत्र पर प्रभुत्व के लिए ब्रिटिश और गोरखा सैनिकों के बीच जमकर लड़ाई हुई। यद्यपि गोरखाओं ने पूरी शक्ति के साथ लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः ब्रिटिश सेना ने उन्हें शिकस्त दी और देश के अन्य हिस्सों की तरह द्वाराहाट भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया।