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Various Dynasities In Uttarakhand - उत्तराखंड के विभिन्न भागो मे राजाओ का शासन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 05, 2008, 03:42:53 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भारतीय स्वाधीनता से पहले कुमाऊं के शेष भाग की तरह लोहाघाट भी कई रजवाड़े वंशों द्वारा शासित रहा है। 6ठी सदी से पहले यहां कुनिनदों ने शासन किया। उसके बाद खासों तथा नंदों एवं मौर्यों का शासन हुआ। माना जाता है कि बिंदुसार के शासन काल में खासों ने विद्रोह कर दिया था जिसे उसके पुत्र सम्राट अशोक ने दबाया। इस काल में कुमाऊं में कई छोटे-मोटे सरदारों तथा राजाओं का शासन था।
यह 6ठी से 12वीं सदी के दौरान संभव हो पाया कि एक वंश शक्तिशाली बना और इस समय अधिकांश समय यहां कत्यूरियों का शासन रहा।

परंतु इस दौरान भी चंद शासकों ने चंपावत पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया। उस समय चंपावत के निकट होने के कारण लोहाघाट एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र था।

12वीं सदी में चंद वंश को प्रधानता मिली, जब उन्होंने अपना अधिकार विस्तृत कर अधिकांश कुमाऊं पर शासन किया और वर्ष 1790 तक शासन करते रहे। अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिये उन्होंने कई छोटे-मोटे प्रमुखों को पराजित किया तथा पड़ोसी राज्यों से युद्ध भी किया। इस वंश के शासन काल में एकमात्र विराम तब आया जब गढ़वाल के पंवार राजा प्रद्युम्न शाह, कुमाऊं का राजा बना यहां जो प्रद्युम्न चंद के नाम से जाना लगा। वर्ष 1790 में स्थानीय रूप से गोरखियोल कहे जाने वाले गोरखों ने कुमाऊं पर कब्जा कर लिया और चंदों के शासन का अंत कर दिया। वास्तव में प्रथम गोरखा आक्रमण लोहाघाट पर ही हुआ।

गोरखों का शोषण भरा शासन वर्ष 1815 में समाप्त हो गया जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें परास्त कर कुमाऊं पर अधिकार कर लिया। द हिमालयन गजेटियर (वॉल्युम III, भाग I, वर्ष 1882) में ई टी एटकिंस ने लिखा है कि वर्ष 1881 में लोहाघाट की आबादी 64 महिलाओं सहित कुल 154 ही थी। वह यह भी बताता है कि लोहाघाट सैनिकों की छावनी भी रहा था पर उसे पहुंच, की समस्या के कारण हटा दिया गया।

तिब्बत के प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर होने के कारण लोहाघाट का प्रमुख व्यापारिक शहर होना सुनिश्चित हुआ। तिब्बत से भारत, पहाड़ी रास्तों को पार करने में निपुण भोटिया लोग प्रमुख व्यापारी थे जो लोहाघाट के बाजार में ऊन भेड़/बकरी, बोरेक्स एवं नमक बेचने के लिये आते तथा तिब्बत के लिये मोटे कपड़े, चीनी (खासकर गुड़) मसाले एवं तंबाकू खरीदकर ले जाते। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण यह व्यापारिक कार्य एकाएक ठप्प पड़ गया और फलस्वरूप दोनों देशों के बीच व्यापारिक दृष्टि से लोहाघाट का महत्व कम हो गया।

लोहाघाट का इतिहास स्वामी विवेकानंद से भी संबद्घ है, जिन्हें पास ही मायावती में एक अद्वैत आश्रम की स्थापना करने का श्रेय जाता है। यहां वे कई बार आये तथा वर्ष 1901 में दो सप्ताह से अधिक दिनों तक रूके। उन्होंने इस क्षेत्र के बारे में कहा, "यही वह जगह है, जिसका सपना मैं बचपन से देखा करता था। मैने बार-बार सदैव यहां रहने का प्रयास किया पर इसके लिये उपयुक्त समय नहीं मिल सका तथा कार्य व्यस्तता के कारण मुझे इस धार्मिक स्थान से दूर जाना पड़ा। मैं अंतर्मन से प्रार्थना एवं आशा करता हूं और विश्वस्त भी हूं कि मेरे अंतिम दिन यही बीतेंगे। पृथ्वी के सभी स्थानों में हमारी जाति की सर्वोत्तम यादें इन्हीं पर्वतों से संबद्ध हैं।"

अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन से भारत के स्वाधीन होने पर कुमाऊं, उत्तर प्रदेश का एक भाग बना। वर्ष 1972 में अल्मोड़ा जिला का चंपावत तहसील पिथौरागढ़ में शासन किया गया तथा सितंबर 15, 1997 को चंपावत जिला को स्वतंत्र पहचान मिली और लोहाघाट इसका एक हिस्सा बना। वर्ष 2000 में लोहाघाट वर्तमान नये राज्य उत्तराखंड का भाग बना जो तब उत्तरांचल कहलाता था।

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कुमाऊं के चंद शासकों की प्रथम राजधानी, चंपावत, संस्कृति एवं कला की धनी विरासत का एक प्राचीन शहर है। 10वीं से 18वीं सदी के बीच यहाँ उदित धार्मिक विश्वासों तथा सांस्कृतिक विचारों का अब भी कुमाऊं में पालन किया जाता है। यहां का बालेश्वर मंदिर बीते युगों के गौरव का झलक दिखाता है तथा चंपावत की यात्रा अतीत की आकर्षक झलकियों को देखने के समान है।


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कत्यूरीवंश

आज के उत्तराखंड के संपूर्ण क्षेत्र में शासन करने का प्रथम श्रेय कत्यूर वंश को जाता है।


कत्यूर घाटी में अपनी राजधानी कार्तिकेयपुर अब बैजनाथ से नाम प्राप्त करने वाले कत्यूरियों ने इस क्षेत्र में 8वीं सदी के प्रारंभ में अपना प्रभूत्व कायम किया। 10वीं सदी के अंत होते होते इस साम्राज्य में वंश के झगड़े के कारण दरार पड़नी शुरु हो गयी। 13वीं सदी तक यह बिखराव पूर्ण हो गया यद्यपि कत्यूरी वंश के वंशज कहीं-कहीं शासन करते रहे और अंत में 16वीं सदी तक चंद राजाओं ने इसे समाप्त कर दिया।



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चंद वंश
8वीं सदी में अपने राज्य के विजित होने के बाद झांसी से भागकर कुमाऊं में चंदों का आना माना जाता है। पुराने चंदेल वंश के एक राजकुमार सोमचंद को ज्योतिषियों ने उत्तर की ओर जाने को कहा तथा उसने काली कुमाऊं के शासक कत्यूर वंश की एक राजकुमारी से विवाह कर लिया। वहां उसने चंपावत में भाटी किलेबंदी के बीच अपने सिंहासन की स्थापना की।


वर्तमान 809 ईस्वी में यह छोटा राज्य नष्ट हो गया तथा कभी प्रभावशाली रहे खासों ने कश्मीर से आसाम तक की सम्पूर्ण भूमि पर पुनः अपना अधिकार स्थापित कर लिया। सदियों के बीत जाने के बाद चंदों ने तराई से वापस आकर फिर अपना राज्य प्राप्त कर लिया, जहां वे पीढ़ियों तक रहे। वर्ष 1560 में चंदों ने 8वीं सदी का अपना घर-बार छोड़ दिया और अल्मोड़ा में अपनी नयी राजधानी बनायी, जो उनके विकसित हो रहे राज्य के अनुकूल था।


वर्ष 1790 में इस वंश का अंत हो गया जब विरलारवादी गोरखों ने अल्मोड़ा पर कब्जा कर लिया और इस प्रकार एक हजार वर्ष के चंद वंश का अंत हो गया।

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उत्तरखंड के कई स्थानों पर पाषाण कालीन अवशेष वामपत्र सिक्के प्रस्तर लेख के अनुसार कुणीन्द  जाति उत्तराखंड पर शासन करने वाली शक्ति थी, महाभारत में भी इस तथ्य का उल्लेख है|

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दूसरी सदी इसा पूर्व में व्यास गंगा और यमुना में फैले कुणीन्द सिक्के इस बात की पुष्टि  करते है|
कुणीन्द जाति के शासको  को कुषाण कहा jata है|

इसके बाद शको ने कुषाणों को हरा कर उत्तराखंड पर अधिकार कर दिया|

Quote from: Himanshu Pathak on July 07, 2008, 12:58:16 PM
उत्तरखंड के कई स्थानों पर पाषाण कालीन अवशेष वामपत्र सिक्के प्रस्तर लेख के अनुसार कुणीन्द  जाति उत्तराखंड पर शासन करने वाली शक्ति थी, महाभारत में भी इस तथ्य का उल्लेख है|

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During the initial period of 5th century, "Naag Dynasty" overpowered "Shak Rajvansh".

In the end of 6th Century, "Maukhari Rajvansh" of "Kannouj" defeated "Naag Dynasty" and started their kingdom.
After that King "Harshvardhan" married to a Princess of Uttarkhand origin.

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७वी सदी में चीनी यात्री hyun tsang ने यहा की यात्रा की| इस प्रकार के उतार चढ़आव  सत्ता परिवर्तन होते हुए कार्तिकेय पुर राज वंश का उदय हुआ| इस वंश का राज ७००A.D. से १०५०A.D. तक चला| कार्तिकेय पुर जोशीमठ चमोली में शासक के उपरांत राजवंश अल्मोडा की कत्यूर घाटी बैजनाथ(बागेश्वर) ले आए| यही राजवंश कत्युरी राजवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ|

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In Kumaun after Katyuri kingdom, "Chand Vansh" emerged as the next ruling power.

First king of "Chand Vansh" was "Raja Som Chandra". He was married to daughter of "Katyuri Raja Baichel Dev".

Between 10th century to 14th century, both "Katyuri" and "Chand" were struggling to hold whole Kumaun kingdom in their hand.
Atlast "Chand" won who made their capital at Champawat.
Naintal, Almora, Pithoragarh, Bageshwar etc were under "Chand Raj Vansh".

Risky Pathak

In 1563A.D. King "Baldev Kalyan Chand" transfered hi capital to Almora.
In 1790 Gorakha's captured kumaun. There after in 1803 Goarkhas attacked garhwal and killed king "Pradhyumn Shah". Inthis way whole Uttrakhand came under Gorkhahs.