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Spiritual Places of Uttarakhand - विभिन्न स्थानों से जुड़ी धार्मिक मान्यतायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 12, 2008, 01:25:39 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


दोस्तों,

उत्तराखंड के देव भूमि का क्या कहना जहाँ की पग-२ पर देवी - देवताओ के मन्दिर है ! यह वही देव भूमि है जहाँ पर भगवान् शिव ने महासती पार्वती माता से शादी की थी ! यह वही देव भूमि है जहाँ पर भगवान् विष्णु ने कछुवे का अवतार लिया था !

हम इस थ्रेड मे उत्तराखंड के उन दुर्लब धार्मिक जगहों के वर्णन करंगे जिनका जी बहुत से पुरानो मे भी वर्णन है और इनसे जुड़ी कई धार्मिक / पौराणिक प्रचलित है ! जैसे बागेश्वर शहर का नाम बागेश्वर क्यो पड़ा ! इसके पीछे भी धार्मिक कहानी है !  एसे कही जगह है जिनकी हम यहाँ पर जानकारी देंगे !

एम् एस मेहता
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उत्तरकाशी से जुड़ी पौराणिक मान्यता

काशी शब्द का उद्भव कास शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ होता है चमकना। काशी को शिव एवं पार्वती द्वारा सृजित 'मूल भूमि' माना जाता है जिस पर प्रारंभ में वे खड़े हुए थे। यही वह भूमि है, जो भागीरथी, वरूणा एवं असी नदियों के संगम पर स्थित है। वरूणा एवं असी के मिलन स्थल होने से इसे वाराणसी कहा जाता है इसी कारण काशी को तपोभूमि (तप की भूमि) कहा जाता है एक स्थल जिसके कंपन से भी ज्ञान तथा शिक्षा में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है।
अनंत काल से ही इस जगह को पवित्र माना गया है। स्कंद पुराणानुसार यह पवित्र भूमि पांच कोस विस्तृत था तथा उतनी ही लंबा, जो लंबाई, चौड़ाई में 12 मील थी।

भारत में गुप्त काशी, गया काशी, दक्खिन काशी, शिव काशी जैसे कई अन्य काशी भी हैं, पर यह केवल पूर्व काशी (बनारस या वाराणसी) एवं उत्तरकाशी ही है जहां विश्वनाथ मंदिर अवस्थित है। माना जाता है कि कलयुग में जब संसार का पाप मानवता को परास्त करने की धमकी देगा तो भगवान शिव मानव कल्याण के लिये वाराणसी से हटकर उत्तरकाशी पहुंच जायेगें। यही कारण है कि उत्तरकाशी में वे सभी मंदिर एवं घाट स्थित है जो वाराणसी में स्थित है। इनमें विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, भैरव मंदिर (भैरव को भगवान शिव का रक्षक माना जाता है और भगवान शिव की पूजा से पहले इसे प्रसन्न करना आवश्यक होता है), मणिकर्णिका घाट एवं केदारघाट आदि शामिल हैं।

उत्तरकाशी पौराणिक वैधता से ओत-प्रोत है। महाभारत के एक वर्णनानुसार महान मुनि जड़ भारथ ने उत्तरकाशी में तप किया था। यह भी कहा जाता है कि महाभारत के एक प्रणेता अर्जुन की मुठभेड़ शिकारी रूप में भगवान शिव से यहां हुआ था। महाभारत के उपायन पर्व में उत्तरकाशी के मूलवासियों जैसे किरातों, उत्तर कुरूओं, खासों, टंगनासों, कुनिनदासों एवं प्रतंगनासों का वर्णन है।

यह भी कहा जाता है कि उत्तरकाशी के चामला की चौड़ी में परशुराम ने तप किया था। भगवान विष्णु के 24वें अवतार परशुराम को अस्त्र का देवता एवं परशु धारण करने के कारण योद्धा संत के रूप में भी जाना जाता है। वे सात मुनियों में से एक हैं जो चिरंजीवी हैं।

कहा जाता है कि परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि मुनि के आदेश पर अपनी माता रेणुका का सिर काट दिया था। उनकी आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर जमदग्नि मुनि ने उन्हें एक वरदान दिया। परशुराम ने अपनी माता के लिये पुनर्जीवन मांगा एवं वे जीवित हो गयीं। फिर भी वे मातृ हत्या के दोषी थे एवं पिता ने उन्हें उत्तरकाशी जाकर प्रायश्चित करने को कहा। तब से उत्तरकाशी उनकी तपोस्थली बना।

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बड़कोट की पौराणिकता


बड़कोट की पौराणिकता से संबंधित दो भिन्न विचार धाराएं स्थानीय रूप से प्रचलित हैं। एक का मत है कि महाभारत युग में बड़कोट राजा सहस्रबाहु के राज्य की राजधानी थी। हजार बाहुओं के समान शक्ति रखने वाला सहस्रबाहु अपना दरबार एक सपाट भूमि पर लगाता था (वर्तमान बड़कोट गांव में) और बड़कोट शहर का नाम इसी से हुआ है बड़ा दरबार अर्थात बड़कोट। माना जाता है कि पांडवों ने वन पर्व के दौरान गंधमर्दन पर्वत पर जाते समय सहस्रबाहु का आतिथ्य स्वीकार किया गया था। यहां के कई कुंडों एवं मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा हुआ, ऐसा माना जाता है।
एक अन्य मत का दृढ़ विश्वास है कि बड़कोट मूल रूप से जमदग्नि मुनि और उनके पुत्र परशुराम की भूमि रही थी। कहा जाता है वास्तव में सहस्रबाहु दक्षिण में शासन करता था और चार धामों की यात्रा के लिये ही वह उत्तर आया था। उसका विवाह जमदग्नि मुनि की पत्नी रेणुका की बहन बेनुका से हुआ था।

स्वयं भगवान विष्णु के एक अवतार जमदग्नि मुनि के चौथे पुत्र परशुराम को भगवान राम ने 21 बार क्षत्रियों के विनाश करने के लिये पश्चाताप करने की सलाह दी। इसलिये वे हिमालय के उत्तर आ गये और अपना शेष जीवन उस क्षेत्र में तप एवं पूजा करते बिताया, जो अब बड़कोट है। इस क्षेत्र के मंदिरों एवं कुंडों का श्रेय उन्हें ही जाता है इस मतानुसार इस क्षेत्र में 21 कुंडों का निर्माण उनके द्वारा हुआ।

यह मत यह बताता है कि पांडव स्वर्ग जाते हुए स्वर्गारोहिणी यात्रा के दौरान यहां आये थे जो इस बात से प्रमाणित होता है कि यहां के लोगों की कल्पना में पांडवों, कौरवों एवं महाभारत का बड़ा महत्त्व है। वास्तव में, ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने अपने शास्त्रास्त्र उसी जगह गाड़ दिए थे, जहां अब शहर को नया बनाया जा रहा है। गड़े शास्त्रास्त्रों की अनुमानित छोटी जगह को घेरने के बाद ही बस-पड़ाव की योजना बनायी गयी।

यह तथ्य मौजूद है कि रवाँई एवं बड़कोट के लोग अपनी वंश परंपरा पांडवों (महाभारत के नायक पांच भाई, जिन्होंने एक ही स्त्री द्रोपदी से विवाह रचाया था) से जोड़ते हैं उस क्षेत्र के गांवों में मूल रूप से निर्वाहित प्राचीन परंपराओं में से एक है बहुपतित्व की प्रथा जिसमें कई पतियों को रखने का रिवाज है।

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सहस्रबाहू कुंड  : बड़कोट गांव में

महत्व

इस कुंड का निर्माण त्रेता युग में राजा सहस्रबाहू द्वारा हुआ माना जाता है। प्राकृतिक जल-स्रोत करीब करीब 24' x 24' वर्गाकार है जिसके ऊपर पत्थर की दीवार की सीढ़ी है जो पानी की धारा तक पहुंचते-पहुंचते और संकरी हो जाती है। जल स्रोत काफी गहरा है। मान्य परंपरा है कि समुदाय द्वारा कुंड की सफाई एवं प्रसाद वितरण के बाद वर्षा अदृश्य होती है।





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RELIGIOUS IMPORTANCE OF GANGOTRAI

ऋगवेद में गंगा का वर्णन कहीं-कहीं ही मिलता है पर पुराणों में गंगा से संबंधित कहानियां अपने-आप आ गयी। कहा जाता है कि एक प्रफुल्लित सुंदरी युवती का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ। इस खास जन्म के बारे में दो विचार हैं। एक की मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु का चरण धोया और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया। दूसरे का संबंध भगवान शिव से है जिन्होंने संगीत के दुरूपयोग से पीड़ित राग-रागिनी का उद्धार किया। जब भगवान शिव ने नारद मुनि ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जो ब्रह्मा ने उसे अपने कमंडल में भर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वह ब्रह्मा के संरक्षण में स्वर्ग में रहने लगी।

ऐसी किंबदन्ती है कि पृथ्वी पर गंगा का अवतरण राजा भागीरथ के कठिन तप से हुआ, जो सूर्यवंशी राजा तथा भगवान राम के पूर्वज थे। मंदिर के बगल में एक भागीरथ शिला (एक पत्थर का टुकड़ा) है जहां भागीरथ ने भगवान शिव की आराधना की थी। कहा जाता है कि जब राजा सगर ने अपना 100वां अश्वमेघ यज्ञ किया (जिसमें यज्ञ करने वाले राजा द्वारा एक घोड़ा निर्बाध वापस आ जाता है तो वह सारा क्षेत्र यज्ञ करने वाले का हो जाता है) तो इन्द्रदेव ने अपना राज्य छिन जाने के भय से भयभीत होकर उस घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम के पास छिपा दिया। राजा सगर के 60,000 पुत्रों ने घोड़े की खोज करते हुए तप में लीन कपिल मुनि को परेशान एवं अपमानित किया। क्षुब्ध होकर कपिल मुनि ने आग्नेय दृष्टि से तत्क्षण सभी को जलाकर भस्म कर दिया। क्षमा याचना किये जाने पर मुनि ने बताया कि राजा सगर के पुत्रों की आत्मा को तभी मुक्ति मिलेगी जब गंगाजल उनका स्पर्श करेगा। सगर के कई वंशजों द्वारा आराधना करने पर भी गंगा ने अवतरित होना अस्वीकार कर दिया।

अंत में राजा सगर के वंशज राजा भागीरथ ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये 5500 वर्षों तक घोर तप किया। उनकी भक्ति से खुश होकर देवी गंगा ने पृथ्वी पर आकर उनके शापित पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति देना स्वीकार कर लिया। देवी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के वेग से भारी विनाश की संभावना थी और इसलिये भगवान शिव को राजी किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में बांध लें। (गंगोत्री का अर्थ होता है गंगा उतरी अर्थात गंगा नीचे उतर आई इसलिये यह शहर का नाम गंगोत्री पड़ा।

भागीरथ ने तब गंगा को उस जगह जाने का रास्ता बताया जहां उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी और इस प्रकार उनकी आत्मा को मुक्ति मिली। परंतु एक और दुर्घटना के बाद ही यह हुआ। गंगा ने जाह्नु मुनि के आश्रम को पानी में डुबा दिया। मुनि क्रोध में पूरी गंगा को ही पी गये पर भागीरथ के आग्रह पर उन्होंने अपने कान से गंगा को बाहर निकाल दिया। इसलिये ही गंगा को जाह्नवी भी कहा जाता है।

बर्फीली नदी गंगोत्री के मुहाने पर, शिवलिंग चोटी के आधार स्थल पर गंगा पृथ्वी पर उतरी जहां से उसने 2,480 किलोमीटर गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक की यात्रा शुरू की। इस विशाल नदी के उद्गम स्थल पर इसका नाम भागीरथी है जो उस महान तपस्वी भागीरथ के नाम पर है जिन के आग्रह पर गंगा स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर आयी। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलने पर इसका नाम गंगा हो गया।

माना जाता है कि महाकाव्य महाभारत के नायक पांडवों ने कुरूक्षेत्र में अपने सगे संबंधियों की मृत्यु पर प्रायश्चित करने के लिये देव यज्ञ गंगोत्री में ही किया था।

गंगा को प्रायः शिव की जटाओं में रहने के कारण भी आदर पाती है।
एक दूसरी किंबदन्ती यह है कि गंगा मानव रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुई और उन्होंने पांडवों के पूर्वज राजा शान्तनु से विवाह किया जहां उन्होंने सात बच्चों को जन्म देकर बिना कोई कारण बताये नदी में बहा दिया। राजा शांतनु के हस्तक्षेप करने पर आठवें पुत्र भीष्म को रहने दिया गया। पर तब गंगा उन्हें छोड़कर चली गयी। महाकाव्य महाभारत में भीष्म ने प्रमुख भूमिका निभायी।

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गंगोत्री मंदिर

हिन्दुओं के कैलेंडर के महत्वपूर्ण दिन अक्षय तृतीया को साधारणतः अप्रैल के अंत में शुरू होता है, जब भगवती गंगा की डोली गंगोत्री वापस आती है। 20 किलोमीटर दूर नीचे के मार्कण्डेय मंदिर के मुखवा गांव से जो गंगा का जाड़े का घर है। प्रत्येक पूजन एवं परंपराओं के साथ सदियों से डोली के साथ एक जुलुस होता है। मंदिर, हर वर्ष दीवाली पर बंद होता है तब डोली को साज-सज्जा एवं अर्चना के साथ मुखवा भेजी जाती है जो गंगोत्री के पुजारियों के घर होता है।

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भागीरथ शिला IN GANGOTRI

गंगोत्री के प्रमुख मंदिर परिसर में एक छोटा मंदिर है जिसमें राजा भागीरथ की मूर्ति एवं एक पत्थर की शिला है जिसपर बैठकर उन्होंने तप किया था। कहा जाता है कि जो कोई भी एक पुत्र की आकांक्षा से सच्चे मन से यहां प्रार्थना करता है उस पुरूष-महिला की प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है।

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GANGOTRI

डूबा शिवलिंग

कहावत है कि नदी में डूबा शिवलिंग ठीक उसी जगह है जहां भगवान ने बैठकर अपनी जटाओं में गंगा के वेग को समेटा था। जाड़ों में पानी कम होने पर इसे देखा जा सकता है।

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शक्ति मंदिर  - UTTARKASHI.

एक ही परिसर में विश्वनाथ मंदिर के ठीक विपरित शक्ति मंदिर देवी पार्वती के अवतार में, शक्ति की देवी को समर्पित है।

इस मंदिर के गौरव स्थल पर, 8 मीटर ऊंचा एक त्रिशूल है जो 1 मीटर व्यास का है (जैसा एटकिंसन ने सुख का मंदिर के त्रिशूल को बताया है) जिसे शक्ति स्तंभ भी कहते हैं। त्रिशुल का प्रत्येक कांटा 2 मीटर लंबा है।
इस पर सामान्य सहमति है कि उत्तराखण्ड में यह सबसे पुराना अवशेष है।

त्रिशूल के खंभे गाटे सजी चुनियों से ढंका हुआ है जो भक्तों की मन्नत का प्रतीक है।

स्तंभ के आधार पर (यहां पूजित देवी-देवता) भगवान शिव, देवी पार्वती एवं उनके पुत्र गणेश तथा कार्तिकेय की प्रस्तर प्रतिमा है।

शक्ति स्तंभ से संबद्ध कई रहस्य तथा किंवदन्तियां हैं। एक मतानुसार जब देवों तथा असुरों में युद्ध छिड़ा तो इस त्रिशूल को स्वर्ग से असूरों की हत्या के लिये भेजा गया। तब से यह पाताल में शेषनाग (वह पौराणिक नाग जिसने अपने मस्तक पर पृथ्वी धारण किया हुआ है) के मस्तक पर संतुलित है। यही कारण है कि छूने पर हिलता-डुलता है क्योंकि यह भूमि पर स्थिर नहीं है। यह भी कहा जाता है कि स्तंभ  धातु से बना है इसकी पहचान अब तक नहीं हो सकी है यद्यपि इसका भूमंडलीय आधार अष्टधातु का हजारों वर्ष पहले से है।

RELIGIOUS IMPORTANCE

शक्ति स्तंभ से संबद्ध एक अन्य किंवदन्ती यह है भगवान शिव ने विशाल त्रिशूल से वक्रासुर राक्षस का बध किया था और यह जो त्रिशूल आठ प्रमुख धातुओं से बना था।





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प्राचीन अन्नपूर्णा माता मंदिर - UTTARKASHI

भगवान शिव की पत्नी पार्वती को एक अन्य रूप अन्नदात्री देवी अन्नपूर्णा की यहां पूजा होती है। यहां सदियों से मूर्ति स्थापित है तथा मंदिर का निर्माण वर्तमान 8वीं सदी के आस-पास हुआ।