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Mussoorie: Queen Of Hills - पहाड़ों की रानी मसूरी

Started by पंकज सिंह महर, July 17, 2008, 03:10:18 PM

पंकज सिंह महर

"पर्वतों की रानी" के नाम से मशहूर मसूरी देश के सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है। दून घाटी की मनोरम वादियों में स्थित इस शहर की प्राकृतिक सुंदरता शायद शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। घोड़े के नाल के आकार की पर्वतश्रेणी पर बसा मसूरी छुट्टियां बिताने के लिए आदर्श पर्यटक स्थल है। लगभग 7 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मसूरी पिकनिक मनाने एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए बेहतर स्थान है। दूर-दूर तक फैले प्राकृतिक भू-भाग, बर्फ की चादर से ढकी पहाड़ियां, बर्फबारी और कल-कल की आवाज में जलप्रपात से गिरता निर्मल पानी, मसूरी के आकर्षण को खास बनाता हैं।
      वर्ष भर मसूरी में बादल छाए रहते हैं, लेकिन जब बदली छंटती है, तब दून घाटी की हरियाली देखते बनती है। यही नहीं, बर्फ से ढकी पहाड़ियों से परावर्तित होकर जब सूर्य की किरणें आंखों तक पहुंचती हैं, तब मन एक सुखद अहसास से भर जाता है।
       चलें फिर इस रमणीक शहर की ओर......................।





स्रोत- http://210.212.78.56/mussoorie

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Bhai yahan ka mausam kya kahna. Lekin waise mujhe jyda pasand nahi kyunki Market ke alawaa yahan kuch nahi hai :)

पंकज सिंह महर

आधुनिक मसूरी के विकास की नींव कैप्टन यंग ने रखी थी। आज हम मसूरी का जो स्वरूप देख रहे हैं, उसके पीछे कैप्टन यंग का बहुत बड़ा हाथ है। उमेर सिंह थापा के नेतृत्व में गोरखा सेनाओं द्वारा गढ़वाल पर अधिकार करने के फलस्वरूप 1803 में मसूरी अस्तित्व में आया।

मसूरी पहला हिल स्टेशन था, जहां स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था की गई। वेल्स बंदोबस्त के बाद 1842 के नियम 10 के तहत इस क्षेत्र के नियमन के लिए एक स्थानीय समिति का गठन किया गया। अंग्रेजों के आगमन के पहले मसूरी मुख्यतः चरवाहों का गढ़ था। यहां के मंसूर झाड़ी में उन चरवाहों के पशु चरते थे। इसी "मंसूर" झ़ाड़ी के नाम पर इस स्थान का नाम "मसूरी" पड़ा। मसूरी में पहला घर बनाने का श्रेय दून क्षेत्र के संयुक्त मजिस्ट्रेट एवं राजस्व अधीक्षक श्री शोर और सिरमुर राइफल्स के कैप्टन यंग को जाता है। गौरतलब है कि यह घर एक छोटी सी झोपड़ी था और इसे कैमल्स बैक पर शूटिंग बॉक्स के रूप में निर्मित किया गया था। बाद में कैप्टन यंग ने लंढौर के कमान्डेन्ट के रूप में "मुलिन्गर" नामक बहुत बड़ा आवास बनवाया।



पंकज सिंह महर

प्रारंभ में मसूरी का विकास अलग शहर के रूप में हुआ। मसूरी और लंढौर दोनों कुछ मूलभूत बातों में एक दूसरे से अलग थे। मसलन, लंढौर एक सैनिक क्षेत्र था, जबकि मसूरी का विकास एक असैनिक क्षेत्र के रूप में हुआ।
अनुकूल मौसम और रोमांचकारी खेलों के आकर्षण ने बहुत से ब्रिटिश नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित किया। दून घाटियों और यहां की पर्वत श्रेणियों की लोकप्रियता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1927 में लंढौर में सैनिकों के लिए स्वास्थ्य लाभ डिपो स्थापित की।

यह शहर बहुत तेजी से विकास करने लगा। 100 वर्षों के अंदर ही मैदानी भागों की गर्मी एवं धूल से परे यह शहर रोगग्रस्त अंग्रेजों का बड़ा गढ़ बन गया। इस तरह से यहां का जन-जीवन व्यस्त होने लगा।

1828 में लंढौर बाजार की स्थापना की प्रक्रिया शुरु हुई। 1829 में यहां पर दैनिक उपभोग के लिए जरूरी सामानों की बिक्री का व्यवसाय शुरु हुआ। यह व्यवसाय जिस भवन में प्रारंभ हुआ, आज उसमें डाकघर है। 1832 में यहां पर महा सर्वेक्षक के कार्यालय की स्थापना हुई। मसूरी में पहला विद्यालय 1834 में श्री मैकिनोन द्वारा स्थापित हुआ। 1836 में यहां पर क्राइस्ट चर्च की स्थापना हुई। इसकी स्थापना बंगाल इंजीनियर्स के रेनी टेलर ने करवाया था। हिमालयन क्लब की स्थापना 1841 में हुई।

मसूरी में पहला बैंक 1836 में स्थापित हुआ। इस बैंक का नाम था, उत्तर-पश्चिम बैंक। कुछ समय के लिए इसका उपयोग सरकारी बैंक के रूप में हुआ। यह मसूरी में रहने वाले सरकारी कर्मचारियों एवं उनके परिवार के लोगों की सुविधा के लिए पूंजी कोष के रूप में काम करता था।

बाद में मसूरी में कई और बैंक खुले। उनमें में दो महत्वपूर्ण बैंक बचत बैंक के रूप में काम करते थे। इन दोनों की स्थापना 1864 में हुई। 1891 में एलायंस बैंक, शिमला ने मसूरी में अपनी शाखा खोली।

हालांकि ये सारे बैंक सफल नहीं हुए और कुछ समय के बाद बंद हो गए। संभवतः पुराना मसूरी बैंकों के लिए आदर्श स्थान साबित नहीं हुआ।

सर जॉर्ज एवरेस्ट के उल्लेख के बिना मसूरी का इतिहास पूरा नहीं हो सकता। सर जॉर्ज एवरेस्ट भारत के पहले महा सर्वेक्षक थे। मसूरी को विश्व के मानचित्र पर स्थापित करने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। संसार की सबसे ऊंची चोटी "माउंट एवरेस्ट" का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।

कैमल बैक सेमिट्री यहां का सबसे पुराना कब्रिस्तान है। यहां की कुछ समाधियां काफी पुरानी हैं। अधिकांश पर अंकित तिथि मसूरी के प्रारंभ के समय की हैं। यहां पर मसूरी के निर्माणकर्ता, ब्रिटिश सेना के जनरल एवं उसके जवान, बच्चे, शिक्षक और बहुत सारे नेक इंसानों की समाधि है।

यहां पर ऑस्ट्रेलियाई मूल के उपन्यासकार जॉन लैंग की कब्र भी है। इनकी मृत्यु 1864 में हई थी। पहाड़ी विल्सन के नाम से मशहूर फ्रैडिक विल्सन की कब्र भी यहीं है। यही नहीं, यहां पर क्रिमियन युद्ध में भाग लेने वाले अल्फ्रेड हिंडमार्श को भी दफनाया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अन्य हिल स्टेशनों की तरह मसूरी भी पूरी तरह से अंग्रेजों की खोज है, क्योंकि इसका इतिहास सिर्फ 160 साल पुराना है।

यह बड़े ही विस्मय और क्षोभ की बात है कि ब्रिटिश काल में भारतीय लोग द मॉल पर नहीं जा सकते थे। दुखद बात यह कि द मॉल के सामने लगे क्लिप बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखा था- भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। हालांकि यह बात बीते समय की है, आज सब कुछ बदल चुका है।

पंकज सिंह महर

मनोरम प्राकृतिक छंटाओं के बीच स्थित मसूरी के मनमोहक नजारे पर्यटकों को दूर से ही लुभाते हैं। यहां के शांत और रमणीक वातावरण में सैलानियों का मन शीतलता से धुल जाता है। शायद यही वजह है कि पर्वतों की रानी के नाम से मशहूर इस हिल स्टेशन की खूबसूरती से रू-ब-रू होने की लालसा देशी-विदेशी हर पर्यटक के मन में होती है। यह कहना गलत न होगा कि शहर की भाग-दौड़ एवं तनाव भरी जिंदगी से राहत पाने में मसूरी एक टॉनिक की भूमिका निभा सकता है।
वैसे तो पर्यटकों के देखने लायक यहां पर बहुत से स्थल हैं, लेकिन इनमें प्रमुख हैं-

लाल टिब्बा: लंढौर क्षेत्र में स्थित लाल टिब्बा मसूरी का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। यह मसूरी के सबसे पहले बसे स्थानों में से एक है। सूर्यास्त के समय यहां से सब कुछ लाल दिखता है, इसलिए इस स्थान का नाम लाल टिब्बा पड़ा। ट्रैकिंग का आनंद लेने के लिए यह स्थान बहुत ही उपयुक्त है।



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गनहिल:
यह मसूरी का दूसरा सबसे ऊंचा प्वाइंट है। स्वतंत्रता पूर्व दोपहर के समय यहां पर बन्दूक से गोली छोड़ी जाती थी, ताकि लोग अपनी घड़ी का समय मिला सकें। इसी कारण इसका नाम गन हिल पड़ा।

यहां से मसूरी की प्राकृतिक सुंदरता को देखना बड़ा ही प्यारा लगता है। सच मानिए, इस स्थान से देखने पर ऐसा लगता है कि पल-पल मसूरी का रंग बदल रहा है। यह स्थान पिकनिक मनाने और रचनात्मक गतिविधियों के लिए काफी बेहतर है। हां, यह जरूर है कि गन हिल पर पहुंचने के लिए आपको 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ेगा। 

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कैम्प्टी जलप्रपात:

यमुनोत्री के रास्ते में 1370 मीटर की ऊंचाई पर कैम्प्टी जलप्रपात स्थित है। मसूरी से इसकी दूरी 15 किलोमीटर है। यह मसूरी घाटी का सबसे सुंदर जलप्रपात है।

ऊंचे-ऊंचे पर्वतों से घिरे इस जलप्रपात के मनभावन नजारे लोगों का दिल जीत लेते हैं। यहां की शीतलता में नहाकर पर्यटकों का मन तरोताजा हो जाता है। खासतौर से गर्मी के मौसम में कैम्प्टी जलप्रपात में स्नान करने का अनुभव आप जिंदगी भर नहीं भुला पाएंगे।

कैम्प्टी जलप्रपात के निकट कैम्प्टी झील है। लोग यहां पर अपने परिवार एवं मित्रों के साथ समय बिताने के लिए आते हैं। यहां उपलब्ध नौकायन और टॉय ट्रेन की सुविधा बच्चों को खासा लुभाती है। यही नहीं, यह स्थल पिकनिक मनाने के इच्छुक लोगों में बहुत ही लोकप्रिय है।
 



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