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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



This is the poem composed by Narendra Singh Negi during the Uttarakhand State Struggle.

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द्वी दिनू की हौरि छ अब खैरि मुट्ट बोटीकि रख
तेरि हिकमत आजमाणू बैरि
मुट्ट बोटीक रख।

घणा डाळों बीच छिर्की आलु ये मुल्क बी
सेक्कि पाळै द्वी घड़ी छि हौरि,
मुट्ट बोटीक रख

सच्चू छै तू सच्चु तेरू ब्रह्म लड़ै सच्ची तेरी
झूठा द्यब्तौकि किलकार्यूंन ना डैरि
मुट्ट बोटीक रख।
हर्चणा छन गौं-मुठ्यार रीत-रिवाज बोलि भासा
यू बचाण ही पछ्याण अब तेरि
मुट्ट बोटीक रख।

सन् इक्यावन बिचि ठगौणा छिन ये त्वे सुपिन्या दिखैकी
ऐंसू भी आला चुनौमा फेरि
मुट्ट बोटीक रख।

गर्जणा बादल चमकणी चाल बर्खा हवेकि राली
ह्वेकि राली डांड़ि-कांठी हैरि
मुट्ट बोटीक रख।

mohan singh bhainsora

         "अच्चा लगता है"

कोई देखले  यूँ ही
मुस्कराके तो अच्छा लगता है,
कोई पूछले हाल रुक्के तुम्हारा तो अच्छा लगता है.

बस की भीड़-भाड़ में जब कोई किसी बहन बेटी को सताता है,
हिचकोलों का बहाना कर उन पर चढा आता है, और
बस मैं बैठे सभी अंधों पर मुस्कराता है,
तभी कोई बंकुरा निकल के आता हैं,
दो मार उसे नीचे की राह बताता है,
तो, अच्छा लगता है.

लाठी लिए सड़क पार करने को
कोई बूढा जब-जब आगे जा तब-तब पीछे आता है,
इधर-उधर से आंधी बन दौड़ रहे यम वाहनों को रोकने को विफल हाथ उठाता है,
तभी वो निकल के आती है,
बीच सड़क खड़ी हो, स्वर्नाद कर,
गाडियां रूकवाती है,
बैंत पकड़ बाबा की सड़क पार करा चुपके से,
निकल जाती है
तो, अच्चा लगता है.

तपती दोपहरी में,
पटरी पर गिरे बूढे  को तमाशदीनों के बीच से उठा,
और मुंह से निकलती झाग को मिटा,
उसे अस्पतान पहुंचता है,
तो अच्चा लगता है.

सचमुच कहाँ है वह व्यवहार , इन्सान का इंसानियत से प्यार,
वो दोस्ती, वो त्याग, वो आत्मीयता, 
अपने देश के लिए वो सोच
बस जब कहीं तेरे शहर मैं नजर आता है,
तो, सचमुच अच्चा लगता है,
है न अच्चा लगता है.

मोहन सिंह भैंसोरा बिस्ट
सेक्टर-९/८८६ राम कृष्णा पुरम,
न्यू दिल्ली-22

अरुण/Sajwan

सुखिगी गदना पहाड़ सुखिगी
द्याखा यून्की कानी हालत हुइंचा
बांझी pungri आज bhatyani
जरा सूना तुम्थई dhai लगाणी

ऐजावा बोडी की लाटों
तै परदेश मा कुछ नि धर्युचा
आज अपर चली गिनी भैर
पर्देश्युं कु राज हुयुंच

गंगा जी भी आज,
अपरा मैत्युं थई bhatyani
गोमुख बटी dagdyon
Dhai च लगानी

"मैती म्यरा आज,
सोरस्या ह्वेई गैनि
अपरी व्यथा कैम सुनान
Aprai birana ह्वेई गैनि .

अरुण/Sajwan

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here is an intresting link related to Poems, Artcles and stories written by Uttarakhandi peoples.

http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहती धन-दौलत न कोई गहना
आकर पास बैठ, दो बोल मीठे सुनाना
अब न बनाना फिर से कोई बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें बुलाते हैं
कभी खेले-कूदे अब क्यों भूले कहते हैं
जरा अपना बचपन का स्कूल देखते जाना
अपने बचपन के दिनों को याद करना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-घर छोड़ अब तू परदेश जा बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का भी यही कहना है
अपने परदेशी नाती-पूतों को देखना है
आकर घर हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब लोगों का मन कम लगता है
गाँव में रहकर उन्हीं शहर का सपना दिखता है
उजडे घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे हैं
कब सुध लोगे देख आसमां पुकार रहे हैं
आकर अपनी आखों से हाल देखते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के बूढे बुजुर्ग याद करते रहते हैं
सभी नाते रिश्तेदार भी पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर परदेशी बने हुए हो
आकर सुबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

कविता रावत
भोपाल

jagmohan singh jayara

"रक्षा बंधन और बहिना"

बाँध दो बहिना बड़े प्यार से,
आज मुझे तुम राखी,
भाई बहिन के प्यार का प्रतीक,
क्या है दुनिया में बाकी.

बचपन बीता तुम संग बहिना,
खाया खूब हँसाया,
बाँध दो बहिना राखी मुझको,
आज रक्षा बंधन है आया.

कर कामना राजी ख़ुशी की,
आज ख़ुशी है छाई,
लग रहा है स्वर्ग से सुन्दर,
मेरे घर प्यारी बहिना आई.

बांधी राखी आज बहिना ने,
रक्षा कवच है राखी,
भाई बहिन के प्यार का प्रतीक,
क्या है दुनिया में बाकी.

रक्षा करे तेरी माँ चन्द्रबदनी,
तू है मेरी प्यारी बहना,
कहता है कवि "जिग्यांसू"
बहिन तुम सदा सुखी रहना.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
5.8.2009       


jagmohan singh jayara

"जै मुल्क"

बग्दु बथौं छोयों कू पांणी, जै मुल्क यू सब्बि धाणी,
बिंगा मन्ख्यौं टक्क लगैक, तुमन अजौं तक नि जाणी,
बतौंणु छौं सुणा हे चुचौं....
छबीलो कुमाऊँ अर् रंगीलो गढ़वाळ....
जख छन फूलू की घाटी, पांणी का भरयां ताल.

चौक अर् सैलि सगोड़ी, राम्दी छन भैन्सि गौड़ी,
दूध घ्यू की कनि रसाण, छांछ छोल्दा परेड़ा रौड़ी,
बिंगा मन्ख्यौं टक्क लगैक ,बतौंणु छौं सुणा हे चुचौं....
छबीलो कुमाऊँ अर् रंगीलो गढ़वाळ....
जख खिल्दा छन फूल, बुरांश अर् गुर्याळ.

प्यारी-प्यारी हिंवाळि काँठी, मुंड मा जन सफ़ेद ठान्टी,
चौखम्बा अर्  त्रिशूली,  नन्दा घूंटी अर् पन्चाचूली,
बिंगा मन्ख्यौं टक्क लगैक ,बतौंणु छौं सुणा हे चुचौं....
छबीलो कुमाऊँ अर् रंगीलो गढ़वाळ....
हरा भरा डांडा जख भारी भारी भ्याळ.

शिव जी कू जख वास, चार धाम छन खास,
गंगा यमुना बग्दि जख, देवतों कू जख निवास,
बिंगा मन्ख्यौं टक्क लगैक ,बतौंणु छौं सुणा हे चुचौं....
छबीलो कुमाऊँ अर् रंगीलो गढ़वाळ....
बाग़ रीक्क मरदा जख, धारु धारू फाळ.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
7.8.2009       


पंकज सिंह महर

देवभूमिक नसीब

देव भूमि उत्तराखण्डो, यू कनू नसीब चा,
अपार सम्पदा होण का बाद भी वा गरीब चा॥
गंगा जी का मैत भी हुयू, पाणी कू अकाल चा।
खेती-बाड़ी होणा का बाद भी, इखौ मनखी बण्यू फिक्वाल चा॥
साक्षात विराजमान च जै धरती मा, हिमाल राज।
बुखौ मनखी बण्यूच, निर्दय निठूर आज॥
देवभूमि उत्तराखण्डोक, यू कनू नसीब चा।
अपरा सम्पदा होण का बाद भी वा गरीब चा॥

प्रधान से लेकर नेता तक, सब योजना खाण छन।
गौं के विकास वु कागाजू मा बणणा छन॥
एक दिन वे कागज तै भी फेंक देणान आग मा।
केवल खारु ही खारु आणु च, जनता का भाग मा॥
देवभूमि उत्तराखण्डो यू कनू नसीब चा,
अपरा सम्पदा होण का बाद बी, वा गरीब चा॥

जड़ी-बुट्यू का मु क मा, रोगों की मार चा।
डाक्टरु कू बणायू आसपताल अपडू घार चा॥
वै आसपतालू मा कम, डाक्टरू का घौरमा ज्यादा मिनी छन।
स्कूल-कालेज भी इख राम भरोसा चनी छन॥
देवभूमि उत्तराखण्डो यू कनू नसीब चा।
अपरा सम्पदा होण का बाद बी, वा गरीब चा॥

सभी नौजवाओऊ की लगाई च रट, कि हमन भैर परदेश जाण।
जब तुमी भैर परदेश चली जैला त, इख विकास की लहर कैन लाण?
अर परदेशी गढ़्वोई भी, न समझणन इखै की खैरी।
अब वुन अपणा नौना भी बणेयेन शैरी॥
देवभूमि उत्तराखण्डी यू कनू नसीब चा।
अपरा सम्पदा होण का बाद बी, वा गरीब चा॥

कवि- श्री प्रदीप रावत, सिकन्दरपुर, गुड़गांव। पर्वत पीयूष से साभार टंकित।

हेम पन्त

उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति पर बहुत सटीक कविता लिखी है प्रदीप जी ने.....

jagmohan singh jayara

 "लील गया पहाड़"

पहाड़ को गुस्सा क्योँ आता है?
गुस्से में सब कुछ लील जाता है,
जैसे पिथौरागढ़ के,
ला, पनलिया तोक और रुनीतोला तोक के,
बेसुध सोते लोगों पर टूटा पहाड़,
क्या कसूर था उनका?
यही कि वे पहाड़ से प्रेम करते थे,
और अपनी आजीविका चलाते थे,
सुन्दर होते हुए भी, क्योँ बना काल,
पहाड़, क्या वे आपसे नफरत करते थे?

बादल ही तो फटा था,
क्रोधित होकर पहाड़ तेरे ऊपर,
रोक लेता,
और बचा देता उन लोगों को,
जो रहते थे तेरी गोद में,
सदियौं से जीने कि आस में.

उन्हें क्या पता,
लेकिन जो जा रहे हैं,
वहां पर राहत कार्य के लिए,
देखेंगे मौत का मंजर,
छायाकार ऊतारंगे तस्वीरें,
लोगों को दिखाने के लिए,
पत्रकार भेजेंगे आँखों देखी रिपोर्ट,
देखो, पहाड़ ने कैसे लील दिया,
बेरहम होकर अपनों को.

बद्रीविशाल ऐसा कभी न हो,
जो घटित हुआ,
ला, पनलिया तोक और रुनीतोला तोक के,
हँसते-खाते-खेलते-सीधे-साधे,
पर्वतजनों के साथ सुबह ८.८.०९ को,
जो पहाड़ से प्यार करते थे,
कवि "जिज्ञासू" कि तरह

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
10.8.2009