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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

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इस सुन्दर और सम्वेदनशील कविता के लिए साधुवाद.

jagmohan singh jayara

"अपणी संस्कृति त्यागिक"

तिबारि कू खम्ब तोड़ी,
वे पहाड़ से मुख मोड़ी,
लग्यां छौं हम बाट,
खोजणा छौं दूर देश मा,
बौळ्या की तरौं,
अपणी संस्कृति त्यागिक,
आयाश जिंदगी का ठाट.

लिप्सा भलि नि होन्दि,
साक्यौं पुराणी संस्कृति हमारी,
सबसी प्यारी छ,
करा मान सम्मान,
वीं धरती अर् पहाड़ कू,
ज्व जन्मभूमि हमारी छ.

परदेशी लोगु का दगड़ा,
जिंदगी जीणु आसान निछ,
अपणी संस्कृति छोड़ा,
बणि जावा मोळ माटु,
ऊंका दगड़ा,
लगदु यू ही छ.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
20.8.2009 दूरभास:9868795187

हेम पन्त

डा. डी. एन. भट्ट एक संवेदनशील व उत्साही नाट्य अभिनेता व निर्देशक हैं. भट्ट जी उत्तराखंड की अग्रणी नाट्य संस्था "शैलनट" से काफी लम्बे समय से जुड़े हैं और "ठुल छलिया"(हिन्दी व कुमांउनी) तथा "बाकर हरे गो"(कुमांउनी) जैसे सफल नाटकों का सफल निर्देशन व अभिनय कर चुके हैं. इसके अतिरिक्त भट्ट जी दर्जनों नाट्य कार्यशालाओं के सफल आयोजन में भी शामिल रहे हैं. डा. डी. एन. भट्ट द्वारा रचित एक सुन्दर कविता-

पहाड़.....
आपके लिये जिन्दगी की तरह
समस्या हो सकते हैं
मेरे लिये दुनियां है
सपनों की.

सोचो...
कितना मजेदार होता होगा
सुनसान पगडण्डी पर
दो उंगलियों के बीच
सिगरेट दबाकर
छल्लेदार धुआं उड़ाते हुए घूमना
जीन्स और टी-शर्ट पहनकर
नाचना
बारिश में मस्त होकर भीगना
किसी दोस्त के साथ
झरनों और चिड़ियों का गीत सुनना
हाथों में जाम लेकर
बातें करना
आज की, कल की
या साथ गुजारे किसी पल की.....

मगर मां कहती है कि
तुम ये सब नहीं कर सकती
क्योंकि
तुम लड़की हो........

jagmohan singh jayara


          "पहाड़"

पहाड़, याने मुसबतों का भंडार,
उनके लिए, जो ऐसा सोचते हैं,
क्या है उस पहाड़ में?
ऐसा भी बोलते हैं,
लेकिन! फिर भी जाते हैं,
घूमने, अपनी गाड़ी लेकर,
पहाड़ पर प्रदूषण फैलाने.

पहाड़ में पहाड़ियों के,
प्राण बसते हैं,
देवभूमि से दूर रहने पर भी,
जन्मभूमि को याद करते हैं.
क्योँ न करें?
पहाडों की गोद में,
बचपन बिताया,
वहां के अध्यापकों ने,
लिखाया पढाया.
ऊंचे पहाड़ों को निहार कर,
बड़ा बनने का संकल्प लिया,
फिर पहाड़ वासियौं ने,
देश और विश्व स्तर पर,
पहाड़ का नाम रोशन किया.

पहाड़ पर प्रकृति का भंडार है,
गाद,गदेरे,जीवनदायिनी नदियाँ,
डांडी, हिंवालि काँठी,बुरांश,देवदार,
पहाडों के सृंगार हैं.

फ्योंली,पय्याँ,आरू,घिंगारू,
जब फूलते हैं पहाड़ पर,
लगता है क्या सृंगार किया है,
पहाड़ों की सुरम्य वादियौं ने,
हरी भरी डांडयौं ने,
देखकर मन मोहित जाता है,
और कहता है,
पहाड़, हमारी जन्मभूमि,
देवताओं की प्रिय भूमि,
अतीत में वीर भडों ने चूमी,
धन्य हैं हम, जो है हमारी,
प्राणो से प्यारी,
पवित्र उत्तराखंड भूमि.

कहता कवि "जिज्ञासु"
पहाड़, प्रेरणा के पहाड़ हैं,
मुसीबतों के नहीं,
जो देते हैं हमको,
नहीं मिल सकता है,
और कहीं.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
२४.८.२००९, दूरभास:9868795187
 



Manoj Sharma

यूँ तो हमारे उत्तराखंड के लोगों ने बहुत परिश्रम और लगन से बहुत कुछ हासिल कर लिया है लेकिन अभी भी कुछ भाई बंधू मेरे कविता के पात्र बने हुए हैं.



गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है


सर्टिफिकेट लिए हाथ में शहरों को चल देते हैं
मेहनत मजदूरी किये  बिना किस्मत को दोष देते हैं
दिल मई लिए अरमान, देखकर दूसरों के येश्व आराम
अपने दिलों को भी मचला देते हैं
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

हिंदी पूरी आती नहीं,अंग्रेजी का ज्ञान नहीं
इंटरव्यूं उन्होने  सुना नहीं नौकरी के लिए फिर भी बेकरार हैं
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

बड़ी नौकरी मिलती नहीं, छोटी वो करते नहीं
मेहनत करने से कतराते हैं, आदत अपनी या बताते हैं.
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

दो पैंसे कमाकर चार बताकर चलते हैं
माँ बाप को झूठा सहारा, दोस्ती पर मेहरबान रहते हैं
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

साल में एक बार जब वे घर को जाते हैं
जूते, कपडे और अटेची सब उधार ले जाते हैं
शहरों के झूठे ठाट बाट, जाकर लोगों को सुनाते हैं
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

माँ बाप भी खुश होते हैं, सुपुत्र हमारे आयेंगे
लोगों से लिया जो कर्जा हमने, उसे वो देकर जायेंगे
पर ये कुपुत्र उनकी भी, जेब खली कर देते हैं
गाँव के बेरोजगार अधिकतर एसे होते है

मनोज शर्मा द्विवेदी
ग्राम अमेत्ता
पोस्ट ऑफिस भेरंग्खाल
अल्मोडा (पट्टी पल्ला साल्ट)
उत्तराखंड
देहली : वेस्ट विनोद नगर, देहली 110092

jagmohan singh jayara

   "पहाड़ में रोजगार"

कोई भी उत्तराखंडी कभी, नहीं रह सकता है बेरोजगार,
सिर्फ, समझ की कमी है हमारी, जो है जीवन का आधार.

आपको लग रहा होगा अटपटा, सोच करती है कमाल,
क्या कमी है उत्तराखंड में, जहाँ है कुमायूं और गढ़वाल.

अगर, बाहर के व्यक्ति वहां, काम करके हो रहे मालामाल,
तुम हो नौकरी की तलाश में, चाहे हो जाएँ अपने फटे हाल.

लिखना पढना ज्ञान के लिए, हर इंसान के लिए है जरूरी,
दूर करो अज्ञान के परदे को, सोचो, फिर क्या है मजबूरी?

पहाड़ पर पर्यटक हर साल, लाखों की संख्या में घूमने आते,
पहाड़ के पारंपरिक उत्पादों को बेचकर, उनसे पैसा क्योँ नहीं कमाते?

पहाड़ पर जब आता है पर्यटक, बहुराष्टीय कम्पनी के उत्पाद खाता पीता,
पहाड़ की वादियों में फाइव स्टार संस्कृति पर, पैसा लुटाकर लौटता रीता.

लुप्त होते पहाड़ के कुटीर उत्पादों का, तकनीकी ज्ञान लेकर उद्योग लगाओ,
कर्महीन नहीं, ईमानदार और मेहनती बनो, जीवनयापन के लिए पैसा कमाओ.

नौकरी कभी नहीं होती भली, क्योँ कसिस भरा जीवन अपनाओ,
कहता है कवि "जिज्ञासु" आपको, स्वरोजगार करो और कमाओ.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू" (दूरभास:9868795187)
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
२५.८.२००९,  


Manoj Sharma

उत्तराखंड की देव् भूमि, हमको लगती है प्यारी 
भारतवर्ष की पृष्ठभूमि पर, इसकी  छवि है  निराली 

चहुँ दिशि में मंदिर-मंदिर, बसते हैं देव सारे
कुमाऊ हो या गढ़वाल, दुःख हरते हैं सारे

पहाडी की चोटी पर बैठती माता, पैरों में पवित्र  नदियाँ
पूरब, पश्चिम, उत्तर, और दक्षिण में खिलती  है वादिया

उत्तराखंडी की परिभाषा परिश्रमी और इमानदारी
बौडरों पर जवानों को देश रक्षा है प्यारी

देव पूजा और जागर, हमारी संस्कृति के हैं प्रतीक
सब मिलनसार होते हैं और विचारों मैं हैं नैतिक

इस देवभूम पर जन्म लिया अपना सौभाग्य समझता हूँ
इसलिए हर उत्तराखंडी को अपना भाई समझता हूँ.......अपना भाई समझता हूँ..........


(सर्वाधिकार सुरक्षित, उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि, लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है

मनोज शर्मा द्विवेदी
ग्राम अमेता, पोस्ट  ऑफिस भेरंग्खाल,
जिला अल्मोडा , पट्टी पल्ला  सल्ट
देहली  : वेस्ट विनोद नगर, 9868592151

jagmohan singh jayara

 
  "कुमायूँ की बाल मिठाई"

खीम सिंह धन सिंह द्वी,
ठेट पहाड़ी भाई,
मिठाईयौं मा प्यारी ऊंतैं,
पहाड़ की बाल मिठाई.

खीम सिंह एक दिन बोन्न बैठि,
भुला, उत्तरैणी मेळा जौला,
गुमानी दिदा की दुकान मा,
प्यारी बाल मिठाई खौला.

द्वी भाई जब पौन्छिन,
उत्तरैणी का मेळा,
गुमानी दिदा वख बेचण लग्युं,
बाल मिठाई अर् केळा.

खीम सिंह अर् धन सिंह न,
गुमानी दिदा तैं, सेवा सौंळि लगाई,
गुमानी न बोलि,
आवा भुला खीम सिंह धन सिंह,
खावा बाल मिठाई.

देशी घ्यू मा बणै मैन,
ऐन्सु या बाल मिठाई.
तुम जरूर ऐला उत्तरैणी मेळा,
मेरा ज्यू न बताई.

खीम सिंह धन सिंह मेळा घूमिन,
देखिन ढोल, दमौं अर् झोड़ा,
गुमानी दिदा की दुकान बिटि ल्हेन,
"जिज्ञासु" का खातिर,
प्यारी बाल मिठाई थोड़ा.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू" (दूरभास:9868795187)
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
२६.८.२००९,   


jagmohan singh jayara

"अंग्रेजी का आकर्षण"

एक पुत्र पिता के पास,
भागता हुआ आया,
झट से अपना अंक पत्र,
उनके हाथ में थमाया.

पिता ने अंक पत्र देखा,
तुंरत पुत्र को बताया,
दुःख की बात है बेटा,
सबसे ज्यादा अंक हिंदी में लाया.

पुत्र पिता से से बोला,
इसमें दुःख की क्या बात है,
हमारा देश आज़ाद करने में,
हिंदी का बड़ा हाथ है.

रहा होगा, आज नहीं,
अब तो अंग्रेजी का बोलबाला है,
नेता, अफसर, प्रधानमंत्री,
कोई भी हिंदी में बोलने वाला है.

पुत्र बोला, पापा भूल गए,
बाजपेई जी तो हिंदी में बोलते थे,
बोलते हुए एक एक शब्द को,
पहले ह्रदय में तोलते थे.

बोलते होंगे, लेकिन तू अंग्रेजी में,
हिंदी से कम अंक है लाया,
लगवा देता अंग्रेजी का ट्यूशन,
तूने मुझे नहीं बताया.

देख बेटा, अंग्रेजी के अच्छे ज्ञान के बिना,
तू एक सम्मानित व्यक्ति नहीं बन पायेगा,
मान ले मेरी बात, नहीं तो २१वीं सदी में,
तू सबसे पीछे रह जायेगा.

Copyright@Jagmohan Singh Jayara"Zigyansu"......25.8.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187

jagmohan singh jayara


    "चोटी पर चढ़कर"

पहाड़ की चोटी पर चढ़कर,
मन में एक ख्याल आया,
क्योँ न छू लूँ आकाश को,
हाथ को ऊपर उठाया.

आकाश की अनंत ऊँचाई,
लेकिन मन की है चाहत,
छू न सका तो क्या हुआ,
चंचल मन नहीं हुआ आहत.

पहाड़ी का मन पहाड़ पर,
प्रफुल्ल हो सर्वदा मंडराए,
क्या अनुभूति होती पहाड़ पर,
यथार्थ पर्वतवासी ही बताए.

पहाड़ प्रकृति को समेटे,
जब बहुरंगी रूप दिखाए,
देखता जब कोई दर्शक,
मोहित हो सब कुछ भूल जाए.

पहाड़ की चोटी पर चढ़कर,
तभी तो मन में ख्याल आया,
कवि "जिज्ञासु" की ये अनूभूति,
आपको विस्तार से बताया.

Copyright@Jagmohan Singh Jayara"Zigyansu"......28.8.09
E-Mail: j_jayara@yahoo.com, (M)9868795187