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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
February 6 at 4:56am ·

गों

जे गों मां डगमग खोटियूं न धरि छा कदम
डरदि झिझकदि नापी छा बाटा घाटा कुंगलि खुटियूं
जख का धारा पन्देरों झसकदि भरि छे पाणि गागरी
आज
आज वे गों मां अपड़ी जड़ इतगा गैरि ह्वेकि पसरीन कि तोंकी जद मां एगिन
गों का घाटा बाटा साळ पन्देरा गोण्डा गुज्यारा तक
पुंगड़ी धार चाल खाळ सब
अर चाहे हम रेन्दा दिल्ली बम्बे पर
"गों" हिंसोल किंगरी का कांडों की चार
बस अळजे अळजे खिचणे लग्युं रान्द

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
January 11 ·

आज गरम् टोपली गरम कोट अर गरम सुलार
तब भी जाडू होणू हाय बेसुमार
रोज रोज फोन मां दयखणा टिम्प रेचर
आज कुछ बढ़ी कि ब्याल्ये की चा।। र
स्यूं सगत रजै मां बि बथों वार पार

तें रजै मां त कब्बि नि ह्व़े छो यन
जें पर छा रुंवाली का ढीन्ढ़l हजार

बिना जुतों की क्वंगळी खुट्टी
अर पाल़ा मां धचाक

न गात ढंगा कपड़ा लत्ता
न ढंगो दसा ण
क्न्क्वे बचे हवला सचि
ब्व़े बुबों न अपणा छ् वरों का पराण

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिन की आवाज

जिन के गीतों को गुनगुनाता है ये पहाड़
जिन की आवाज से हमको है कितना प्यार

तुम ही तो हो मेरे पहाड़ तुम ही हो मेरे घरबार
तुम ही ने तो संजोया यंहा मेरे दिल पर गीतों की बहार

रहता नहीं तो वहां तो रहता है इस दिल में मेरे
धक धक करती है सांस मेरी इस पर भी है मेहरबानी तेरी

सुन के जो ढल ना जाये आँख से पानी निकल ना जाये
पलकों पर सजा रखा जिसने बड़े नाजों से पहाड़ संभल रखा

कितना भी कह दूँ तेरे लिये उतना ही काम पडेगा ऐ रबा
ना तू मुझ से जुदा ना मै रह सकूंगा कभी तुझ से जुदा

जुड़ी है तेरी सांसें सांसों से कुछ इस तरह मुझ से
जैसे अल्हड़ नदी निकलती हो पत्थरों को सहलाते हुये

कहना बस इतना तेरी बहार यूँ ही फिजाओं पर लहराये
आपकी जादुई आवाज संगीत गीतों में यूँ ही ढलती चली जाये

जिन के गीतों को गुनगुनाता है ये पहाड़
जिन की आवाज से हमको है कितना प्यार

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये अपना उत्तराखंड

ये अपना उत्तराखंड
इस का एक एक कण
खंड खंड में ना हो विभाजित कभी
चले अब सदा हम मिलकर संग
ये अपना उत्तराखंड
इस का एक एक कण

चले और बढे ,बढ़ते चलते
यूँ ही फलता फूलता रहे
अपना ये स्वर्ग उपवन
भारत का उत्तरी क्षेत्र का बन
ये अपना उत्तराखंड
इस का एक एक कण

देवों की भूमि है
ये ऋषियों की गाथा
हर जरे जरे में बिखरे पड़े हैं
यंहा इसके वैदिक संस्कृति अंग
ये अपना उत्तराखंड
इस का एक एक कण

आओ इस माटी को
अपने माथे पर सजाओ
प्रण लो खुद से अब
अंदर छिपी अपने वो लौ तुम जलाऊ
अपने उत्तराखंड के लिये
इस के एक एक कण के लिये

गंगा की तरह तुम निर्मल हो जाओ
हिमाला के शीर्ष की चमक बन जाओ
हरे भरे वनों के तुम रक्षक बनकर
विश्व में जड़ चेतना का इसे नया संदेश बना दो
ये अपना उत्तराखंड
इस का एक एक कण

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
February 21 at 5:47am ·

हे अ देक

हे अ देक
तूटी ना अब तेरु मेरु साथ
दे दे मेरा इन हाथों मा तेरु हाथ
ऐजा ऐजा सरला चल मेरु साथ
घुमी जोंला सतपुली का कौथिग आच

मया लगों देरा औ मया लगों देरा
माया लगे की बिसरी ना जा
ये मेरा गेल्या जख बी तू मीथै ले जा

हे अ देक
तेर चूड़ी बी कैन लगी अब
मै से छूची देक अब तेरी सब बात
तेर मा बिन्दुली देकि मिन अब
वो मेरा लुक्यां सात सुपिन्या कु राज

मया लगों देरा औ मया लगों देरा
माया लगै की ना छोड़ी जै
ये गेल्या मेर जीकोडी थे ना तोड़ी जै

हे अ देक
कैर में पे तू थोडु बिस्वास
सुखी तै रखलूं इन सौं खानु छों आच
जब तक राला ये गद्निया पाँतेदरा पाड़ा
में रुलों सखी तेरु स्वामी बानी की बस तेरु साथ

मया लगों देरा औ मया लगों देरा
माया लगै की ना इन यकुली कै जा
देक देकलु हेरलु बाटू तेरु तू परती की ऐजा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये पहड़ी पहाड़ा कु तू

ये पहड़ी पहाड़ा कु तू
कख जाणू रे तू आच सुबेर -२
उठि उठि की कया पौडी गे ते फिकर
कख जाणू रे कै घारा कै सैरा कु तू

कटुम्दरी की फिकर च भैजी
ब्याली रति सबी का सबी भूकी सैगेनी
एक दाना अन्ना कु निच दार पाकी
पुट्गी की भूक की लगी च बस आग

भरण पोषण की चिंता खैनी दीदा
ये पहाड़ा को पहड़ी की जीकोडी ते खुरचानि
जानू मी भैर सबैर सबैर ये फिकर
रति मिल अपरू बान अन्न कख भत्ते लान

अब नि बची कुच बी मेरु घोर भैजी
ना पुंगड़ी ना बैल गौड ना बकरा मेंडरी
ध्याड़ी की बी नीच कूच बी ब्य्वस्था
जणू मि अपरू बाण अपरा उकाल छोड़ी की

ये पहड़ी पहाड़ा कु तू
कख जाणू रे तू आच सुबेर -२
उठि उठि की कया पौडी गे ते फिकर
कख जाणू रे कै घारा कै सैरा कु तू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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उत्तराखंड ग्वाया लगाणू। _______________________

बोला हर दा यू क्या च हूँणू यू उत्तराखंड क्यां कु रुणू , कैले क्वी येका आंशू नि फुंजणु कैले क्वी ये नि बुथाणू , 14 साल कु ह्वे गे उत्तराखंड कैले यू आज भी ग्वाया लगाणू। कोच येकी ब्वे, कख च येकू बुबा, कले च यू भूका कु चिल्लाणू, हर पाँच साल मा उन द्वि-द्वी आन्दा तुम, फिर कले च यू आज भी छोरा – छपिरा सी जिंदगी बिताणू। कोच उ, जु येकू आँखा घुराणू, अनाथ सी समझी येतै लत्याणू, तुम बुना की सब ठीक ठाक चलणू, फिर कले नीच यू अपणा, हाथ खुट्टा हिलाणू। बोला हर दा कुछ त बोला, 14 साल बाद भी कले च यू, ग्वाया लगाणू।। अतुल गुसाईं (सर्वाधिकार सुरक्षित)