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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

 Garhwali Songs (Translated) by Payas Pokhara

गीत (अनुवादित)
****************

इ ब्यठुला
इ जनना
कै भि चीजि की
खत-पत खत्ता फोळ
नि करदा
न बेकार करदा
न बरबाद करदा
बिटोळणा रंदि
समळणा रंदि
ढकणा रंदि
बंधणा रंदि
ह्वै साक जख तक
आस विसवास तक
कभि तुलपाणा रंदि
कभि टंक्यांणा रंदि
कभि घम्याणा रंदि
कभि हवा बतास
कभि छट्यांणा रंदि
कभि बिराणा रंदि
कभि त्वड़णा रंदि
कभि ज्वड़णा रंदि
कतगै दां
अपणै घारम
खालि डब्बा
जमा करणा रंदि
कभि कागज पत्तर
कभि धोति कत्तर
उलटणा पुलटणा
अर गुलटणा रंदि
सुबेरा की कल्यौ रोटि
रुमक दां म्वड़खी बणै
चपाणा रंदि
खाणा रंदि अर
बासी भुज्जि
ठंडा तवा म
गरम करणा रंदि
गरम चुला दगड़
खांदा म्याळों थैं
लिपणा रंदि अर
लिपणा रंदि
सबुथैं खवै पिवैकि
तब फिर अपणि
थकुलि सजैकि
द्यखणा रंदि
चिर्यां लारा-लत्ता
टुट्यूं बटन
झिल्लु बटनकाज
दुबणाणा रंदि
टंगणा रंदि
सिलणा रंदि
सूखू अचार
सीला पापड़
मट्यरु लगीं दाळ
सड़्यूं आरु आम
कबस्यूं साग
या फिर
दुख दिंदरा रिस्ता
बटोळणि रंदि
समळणि रंदि
ढकणि रंदि
बंधणि रंदि
गाळ-गाळ आण तक
आस विसवास तक
बस यखमै तक
जै दिन वा तुम जनै
मुक फरकै द्याळि
वा घड़ि आखिरी ह्वालि
अर वा रात
ज्यूरा की ह्वालि ।

© पयाश पोखड़ा 24072019.

Bhishma Kukreti

Garhwali Humorous Poem by payas Pohara
पैलि--
बल हिल मा चांदि को बटना ।
बल दिल मा च तुमरि रटना ।।
अब--
बल 'हिल' मा 'टाॅप' को ढकणा ।
बल द्वि बूंद हमल भि त चखणा ।।

© पयाश पोखड़ा 20072019.

Bhishma Kukreti

Free Style Garhwali verses by Payas Pokhara
एक मुक्तक
**********

अब नि दिखेंदा वो स्वागबंती मोर संगाड़ ।
उजड़्यूं सि दिखेणु च घुरपळ्यूं को सुहाग ।
द्वार-द्वरिंडो फर संगुळौं की नथुलि-हंसुळि ।
अर हल्ल हलकणि छन ताळौं की बुलाक ।

© पयाश पोखड़ा 14072019.

Bhishma Kukreti

Garhwali Ghazal by Vimal Sajwan

"गजल"
कबरि बटी देखणूँ छौ त्वे
पर तु कखि हौरि देखणी छैई
कबरि बटी देखणूँ छौ त्वे
पर तु कखि हौरि देखणी छैई
जनि तिन मे जनै देखि त
तू बी शरमै गयें त मी बी शरमै गयौं

कन बिजोग पोड़ि अचक्याळ
झणि कैन बोलि उबरि
कन बिजोग पोड़ि अचक्याळ
झणि कैन बोलि उबरि
हम दुयूँन एक हैका देखि त
तू बी शरमै गयें त मी बी शरमै गयौं

त्वेपै अचणचकि माया ऐग्या
घड़ि द्वी घड़ि मा
त्वेपै अचणचकि माया ऐग्या
घड़ि द्वी घड़ि मा
कैल बोलि कि ह्वेग्या अबेर त
तू बी शरमै गयें त मी बी शरमै गयौं

देखणा रयाँ हम एक हैंका
वेमति बेशुद ह्वेकि
देखणा रयाँ हम एक हैंका
वेमति बेशुद ह्वेकि
कैल बोलि योच माया कु बुखार
तू बी शरमै गयें त मी बी शरमै गयौं

Copyright@ विमल सजवाण

Bhishma Kukreti

जापानी चोका विधा मा एक रचना..."चूल्लू जीवन"
-
First Modern Garhwali Poem in Japanese choka Style 9division of Waka jaapnese style)
[/color]
-
By Akhilesh Alkhaniya [/b][/font]

चोका दरअसल एक जापानी कविता विधा छ। जथगा नौ "हाइकू" विधन कमै उथगा ई चोका बी एक जंणी मंणी विधा छ। चोका थोड़ा भौत हाइकू से मेल त खांदी छ पण हाइकू मा कुल आप ३ पंगत मा रचना कै सकदा मने हाइकू कुल मिलै तै तिन लैनै होंदी जबकि चोका मा पंगतै क्वी सिमा नी होंदी, कथगा बी चरणो मा चोका लिखे सकदे। चोका कथगा बी लंबी ह्वे सकदे, यू रचनाकार पै निर्भर करदू वू कथगा बड़ी कबिता लेख सकदो। मेन बात य छ हाइकू मा पैली लैन ५ अक्षरै, दूसरी लैन ७ अक्षरै अर तीसरी लैन ५ अक्षरै होंदी(५-७-५)। पण चोका मा पैली लैन मा ५ वर्ण दूसरी मा ७ वर्ण तीसरी मा ५ वर्ण अर अंतिम जू द्वि लैन होली वू ७-७ वर्णै होली(५-७-५-७-५-७-७)। चोका कथगा बी लंबी ह्वे सकदे बशर्त छ पिछनै दांकी द्वि लैन सात-सात वर्णै होंयि चयेणीन। चोका मा कोसिस यन होंयि चयेंणी की हरेक लैन स्वतंत्र हो, एक हैंकी लैन पे निर्भर नी हो। चोका जब वाचन हो त उच्च स्वर मा हो। "गढ़वळि" मा हमतै चोका प्रयोग कंयू ई चयेणू।
★★★चूल्लू जीवन★★★
चूल्लू जीवन
तचाणा रावा ये तै
शरेलौ माटू
सुख दुखा लखड़ा
खैर्या अंगरा
निरासपंतौ खारु
उमरै झौळ
बगतौ भांडू भोरी
मिनतै रूसै
स्यांणि छ मट्टातेल
बिपदा धुंवा
खोपै अंसधरिन
चूल्लू नी मूंझा
हार नी माना तुम
पकाणा रावा
चूल्लू जगाणा रावा
समै लगलू
रूसैन बंणण छ
सबादन औंण छ
"रचना- अखिलेश अलखनियाँ"
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Bhishma Kukreti

गढ़वाली चोका, छिपड़ु दादा

छिपड़ु दादा
By Jaipal Singh Rawat [/b][/font]
*****
छिपड़ु दादा
दिल्ली मै रैंदु छाई
मन खुद्याई
भौत दिनु का बाद
ओ घार गाई
तैड़ु खैणणै छाई
पर बना ओ
खैंणण मै नि आई
गींठि थै धै लगाई
हे! गींठी गींठि
यु तैड़ु कख गाई
ओ भाजि ग्यायी
कि कखि मोरि ग्यायी
न ओत बल
एअरफोर्स मंगा
भर्ति ह्वेग्याई
छिपड़ु दादा
सूंणी दंग रैग्यायी
अरे बल ओ
धरती मूड़ छायी
असमानम
कनकै पौंछिग्यायी
बल भैजी ह्या
जन छोड़ि गे छायी
पहाड़ आज
उन्नि थुड़ै रैग्याई
जन उबरि
तुम छोड़िग्या छाई
हमुल बि त
कुछ उन्नत्ति काई
तुमबि तब
मेरीs सैं बौंल़ौं फर
सींप फुँजदs छाई ।



जयपाल सिंह रावत
Copyright@ Jaipal Singh Rawat Delhi
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Bhishma Kukreti

ल जरा नै प्रयोग [संस्कृत अर गढवलि कु]


Sanskrit-Garhwali Hybrid Humorous Poetry

By Virendra Juyal

-   
हास्य रचना-
"कबरि लमडदौ झणि"
"कस्तूरी तिलकं ललाट पटले ।"
ल्यो रै भुला ! कचमोलि
जरा गिलासुंद एक तुराक धैरि ले ।।
"वक्षस्थले कौस्तुभम।"
छुछा ! टक्क जईं चा टिचरि फरि
ल्यो रै चम्म चम्म ।
भिजौ गौलि अखण्यों रम्म रम्म ।।
"नासाग्रे गजमौक्तिकं कर तले ।"
ठुंगार भि ल्यो चखणा मा
ह्वै जैलि तब बल्ले बल्ले ।।
"वेणु: करे कंकणम ।"
जो लुकांदु चा मेरि बांठा कि
वे थै धर्दु मि अंठम् ।।
"सवगि हरि चन्दनेन सुलपितम ।"
जो नि पींदु क्वी फैदा नि
वेकि भि धुँआरोलि हूण
एक दिन चितम् ।।
"कण्ठे च मुक्तावली ।"
अपडा रुप्यों कि नि प्येण चैंद
हां बल सवदि हूंद फ्री वलि ।।
"गोपस्त्री परिवेष्ठितो विजयते।"
जो बिना मंग्या पिलै दींद
कैर दीण चैंद वे खुणि
दस दौ नमस्ते ।।
"गोपाल चूडामणि: ।"
खूभ आनंद कारा,
सुसगरा भ्वारा,
ज्यूँदा छंवा जब तलक
खूभ कारा खैंचातणि ।
हैंसि खेलि रावा हे मनख्यों !
बिना पियां क भि
ई जिंदगी बटि
गडम !
कबरि लमडंदौ झणि ।।
😀😄🙏🏻🙏🏻जै जुयाल✍🏻 जै गढवाल🙏🏻🙏🏻 😄😀
✍🏻लिख्वार-
©® ✍🏻वीरेंद्र जुयाल उपरि
फरसाडी पलतीर क्लब
दिनांक- 07-12-2019.
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Bhishma Kukreti

गढवली मा  हाइकु
Garhwali Haiku

By Sunil Bhatt   


१ "हाइकु"
शब्दौं बुज्युनु
दिलै मा घात काद
हाइकु होंदु

२ "जून"

दाजी सजला
आसमान मा जून
पीणु होलु क्वी

३. "सौण"

सरगौ गुस्सा
मिंडखौं का जागर
सौणा कु मैना

४."बात ना चित्त"

मैह्मान अयुँ
फोन मा मिस्याँ सौब
खातिरदारी

५."जेल फुल"

संत बणी जा
पर बाबा नी बणी
जेल भ्वरेगीं

६."टैम नी"

टैम निकाल
खैर खबर पूछ
फोन पर खुद्यो

७."३७०"

दीमक छौ वु
तीन सौ सत्तर त
मुंडरू खत्म

८."काम तमाम"

बत्थौं सरकै
दिवारौं का कंदूड़
काम तमाम

९."रिश्ते आनलाइन"

रिश्ता बच्याँ छीं
दोस्तों बी क्वी कमी नी
आनलाइन

स्वरचित/**सुनील भट्ट**
13/12/19
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Bhishma Kukreti

Snow Fall : a Garhwali Poem

By - अश्विनी गौड़

मखमलि
ह्यूं चद्दर,
डाळी बोटळयूं
की गाति,
बांज बुरांशि का बणों
लकदक फूल पाति,
खाली
गारा का र्यळा नी यि!
हिवाळि कांठि,
शंभो भोले थाति या
साक्षात कैलाश घाटी।
------अश्विनी गौड़ --

Bhishma Kukreti

गढ़वळि मा कुछेक दोहा अर्ध सम मात्रिक छंद)

By:  अखिलेश अलखनियाँ

१-रोज रोज चुगली करी
जिकुड़ा पोड़ी गेड़।
घैडि पापै वेन भरी
रान्दू सबसे बेड़।
२-भोग खै धिते देबता
छै वा गौं की बात।
मनखी गौं छोड़ी चली
भुक्की सुखणी गात।
३-ऊंच नीच करदा किलै
दगड़ि नि खांदा भात।
बजै ढ़ोल देबी नचै
तब नी पूछी जात।
४-मोर खपी राज बंणी
क्य क्य नी छै आस
अजूं बी खाड़ खडणा
त कख गै वू विकास।
"रचना- अखिलेश अलखनियाँ"