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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

बड़ा बाघ) (Dangerous Tiger

By Sudhir Bartwal

छ्व्टा मा सूणी छो कि
जु ग्वोरुं तैं मारदु
सु ग्वर्या बाघ होन्दु।
अर
जु मनख्यों तैं मारदु
सु मनख्या बाघ होन्दु।
पर
अब पता चलि कि
जौन चूसलिन हमारी आस,
हमारा संस्कार।
हमारी दया,लाड, त्याग
अर हमारा बोट्यां रीति -रिवाज।
सि यूं से बि बड़ा बाघ होन्दा ।

c@सुधीर बर्त्वाल
Satirical Garhwali Poem from Nagpur Chamoli Garhwal, Satirical Garhwali Poem from Uttarakhand, Garhwali Poem from Himalaya , North India

Bhishma Kukreti

 A Satirical Garhwali Poem

By Dharmendra  Negi


दिन ढलकण से क्य होण
समौ बदलण से क्य होण
खैरि खैकि मिलण गफ्फा
सुदि डबखण से क्य होण
छोड़ खटुलि बिटौ खंतुड़ि
हौड़ फरकण से क्य होण
पुंगड़्यूं कूरि रौदेड़ु जम्यूं
द्यो बरखण से क्य होण
जिठणा दगड़ि नचै होणी
छौं बरजण से क्य होण
जिकुड़िम छन पित्त पक्यां
मुल मुलकण से क्य होण
च्वट्टा पोड़ण लगिगैनि जब
तब खळकण से क्य होण
पढ़ै - लिखै नौफर चुकपट
जुल्फि झटगण से क्य होण
गंगा जी का जौ ह्वेगेनि जु
वूं तैं जग्वळण से क्य होण
पैलि त निचन्त रै तु 'धरम'
अब भटगण से क्य होण
सर्वाधिकार सुरक्षित :-
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणी


Bhishma Kukreti

-----'जखोली'-----

A Garhwali Poem
By Ashwini  Gaur
-

ना तुमारु दिल्ली जन,
न देरादूण जन घिचपिच च,
हमारु स्वाणू जखोली त,
लस्या-बांगर का बीच च।
वासुदेव की थाति
बांगर जथ,
बजीरा तरफ
नगेला गीत छिन।
भद्वाणों की वीर नरसिंह,
जात, मेला-थौलो
रीत छिन।
माधो सिग भंडारी
जन्म भूमि या,
इंद्रमणि बडोनीऽ
कर्मभूमि च।
जख मयाळा मनख्यूं
मीठी बोली,
यन स्वाणी थाति
हमारू जखोली ।
यन स्वाणी थाति हमारू जखोली-------अश्विनी गौड,


Bhishma Kukreti

 भाग्य भाग्य  की बात
कविता - धर्मेन्द्र नेगी

(Satirical  Garhwali Poem on Luck and Bad Luck )

कैऽका भागम दिन- रात काम लिख्यूं छ
कैऽका जोगम बस तपणूं घाम लिख्यूं छ
क्वी भग्यान पोड़ि- पोड़ी खटुला तोड़णू
कैऽका नसीबम लड़णू लाम लिख्यूं छ
जून-गैंणा पाणै करणा छन लोग स्याणि
हमन जिकुड़ि पर तुमारू नाम लिख्यूं छ
बिन मतलब खोटि हैंसि बि नि हैंसदा वु
मुखड़ि पर वूंको अपणुं दाम लिख्यूं छ
भलु कैरी बि सदानि बुरै मिलि बिचरा तैं
वेका नसीबम त होणूं बदनाम लिख्यूं छ
ख्वाटा करम कैरि जाणा छन चकड़ेत
'धरम' तेरा जोगम इलज़ाम लिख्यूं छ
सर्वाधिकार सुरक्षित :-@धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ
(गढ़वाली व्यंग्य कविता , भाग्य व दुर्भाग्य पर व्यंग्य करती गढ़वाली कविता )



Bhishma Kukreti

   गिचू खोलण चैंद

- By रमेश हितैषी, Ramesh Hitaishi


कुछ त ब्वाला क्या च हुणु,
भलु बुरू बिंगण चैंद,
सपन ह्वेक लाटु नि हुणु,
अपणु फर्ज निभाण चैंद।
ऊँल कंदुड़ रुवाकु बुजू मर्यूं,
सुविचारुकि धै लगांण चैंद,
कबि त काली रात खुललि,
निरास कबि नि हूण चैंद।
मनकि मऩ मा नि रखणी चैंद,
भैर बोलि दीण चैंद।
तुम चै मानो न मानो,
कुछ न कुछ सिखै दींद।
उ अलग बात च कि,
उंका मनमा टीस रैंद,
चुप रईक कुछ नि हूणु,
कैकू त गिचू खुल्यू चैंद।
सर्वाधिकार@ सुरक्षित
Garhwali Awakening Poem ,
Inspiring Poem

Bhishma Kukreti

मूर्धन्य गजलकार पयास पोखड़ा की गढ़वाली गजलें
*******
दुख्यरा दिल का दुखदौं थैं जो कच्वार क्वी ।
इना दुख-दिंदरौं थैं भि जरा प्यार कार क्वी ।।
दुन्यां का दगड़ हिटणा को ढब ऐ ग्याई अब ।
फेर निठुरा-निरसौं का बाना किलै म्वार क्वी ।।
इ सांस भि छन बस द्वि-चार दिना की खंदेर ।
अंगुळि-अंगुळ्यूंम अपणि गणत त कार क्वी ।।
अपणा-अपणा समौ अर बगत की बात छन ।
सर्या राज पाट त हमारो च अर सरकार क्वी ।।
आज भि मेरि पुंगड़ियूं की हथकड़ि पैरि छन ।
कोच वो जो वकील,दलील,अपील कार क्वी ।।
उल्यरु-उलखणि सि छन तेरि गज़ल 'पयाश' ।
गीत वैका सि शेर हैंका सि अर लिख्वार क्वी ।।
© पयाश पोखड़ा 24/12/2019.


Bhishma Kukreti

नै सालम पैलि कविता
Flower Blooming in Garhwal
Garhwali Poetry by : Payas Pokhara

*****************
कोंपळा, कुटमणा अर बौर अयां छन ।
मौल्यार ल्हेकि दगड़्या घौर अयां छन ।।
हैंस्दा फूल,खिल्दा पात डाळि फौक्यूं मा ।
फ्यूंलड़ि का दगड़ा-दगड़ि हौर अयां छन ।।
ब्यौलि सि च प्योंलि,ब्योला च जन बुरांस ।
झांझि खशबू मा नशा का दौर अयां छन ।।
रंगमत ह्वैकि यो बसंत तुमथैं धै लगाणु चा ।
बल वो अपणा गौंमा बिरणा घौर अयां छन ।।
सकिना,ग्वीराळ,पयां थैं भि नचण दे जरा ।
पिंग्ळा छितराज दुन्यां की सौर अयां छन ।।
फुलु-फुलु मा भि छुवीं लगणि च फुलु की ।
छुयांळ फूल त 'पयाश' की डौर अयां छन ।।
© पयाश पोखड़ा 07012020
Garhwali Poem , Garhwali Folk Song




Bhishma Kukreti

-----------------×खारु...खारु×-------------
A Garhwali Poem about Wildfire
By Akhilesh Alkhaniya
-
हे बोंण देवी
यू आज तेरु क्य सौ-सिंगार छ
न फूल न पाती, न डाळि न बोटी
न हर्यांण न पिंगल्याण
चर्री तरफ़ा छ त
बस खारु खारु अर बस खारु।
कख छन वू च्वींच्यांट करदा
पौन पंछी, पोथला चखुला
बंणू दनकदा ग्वर्ड काखण
डुकरतली मचौन्दा रिक्क बाग़
सौब फुकेन अर बच्यूं खुच्यूं छ
बस खारु खारु अर बस खारु।
बिगर मनख्यों बंणू कैन लगै बंणांग
तख त क्वी बी नी छा
मनखी त उद्द पैली रौडीगे छा
रैगे छां बच्यां जू बोंण ज्यू प्रांण
स्यू बी फुकेन, अर अब बची तख
बस खारु खारु अर बस खारु।
कख गैन वू अणमोल
जड़ला बूटला, दवै दारु फूल पाती
न्यूरौंदी छै जू सौब रोग ब्याद
ह्वेगेन सौब बंणाग जुक्ता
अब क्य न्यूरला घौ जब बच्यू छ तख
बस खारु खारु अर बस खारु।
छौ जख साफ़ हव्वा पांणी
सुद्ध छै तखै सब्बी धांणि
अब छ चर्री तरफा धुंवारोळी धुंवारोळी
बगत मा बी नी ऐ लोळि बरखा पांणी
जू कुबगत तख उडणू रायी वू छ
बस खारु खारु अर बस खारु।
कख छन वू
जौंतै तिन सैंती पाली पोसी
घास, लखडू, पांणी जौंतै पिलै
हे बंण देवी तिन वूं ज्यू प्रांण दे
अर वू त्वेतै छोड़ी चली गेनी
बस खारु खारु अर बस खारु।
किलै नी फुकेन वू
जू त्वे बचै नी सकेन
जौन तेरी केर बाड नी कै सकी
जौं पै छौ तेरु भारी सारू
सू छन सुनिंद सेंया अर त्वे दे गेन
बस खारु खारु अर बस खारु।
"रचना- अखिलेश अलखनियाँ"


Bhishma Kukreti

 एक गढवली रचना
-
A Garhwali Poem
By Sunil Bhatt

-
ऐजा म्येरा युँ ख्यालौं बुथै जा,
खाली प्वटकी यी बिज्याँ छन।
खैरी खैकी‌ छक्वै पटै की,
आँखीं द्वी मेरी स्हियाँ छन।
छंटै जा यूँ रात्यौं मा ऐकी,
सुबेर म्येरा भी बांठै की ।
समझै जा औ म्यरा दिनौं तैं,
बखैंयाँ मा ऐ जू रूस्याँ छन।।
आँख्यौं कु पाणी चुरै गेनी,
झप्प बुझै आँख्यौं उज्यालु।
जिकुड़ी का फांगौं माटु मा,
म्यरा सुपन्या कुछ दबैयाँ छन।।
दिल का कन्दुड़ौं झुल्ला कुचै जा,
चुभ्दी चस्स दुन्या की बात।
अपड़ा मोबैल भी यख लुखौन,
भै तमाशु द्यख्णौ छ्वड़्याँ छन।।
ऐजा म्येरा युँ ख्यालौं बुथै जा,
खाली प्वटकी यी बिज्याँ छन।
खैरी खैकी‌ छक्वै पटै की,
आँखीं द्वी मेरी स्हियाँ छन।।
Copyright@ Sunil Bhatt
स्वरचित/**सुनील भट्ट**

१६/०१/२०२०


Bhishma Kukreti

 तब मि छुट्टु छौ
When I was child
Experience based Garhwali Poem  on Caste discrimination (untouched ability)
-
By: Mahesha Nand
-

अजण्दम् सुद्दि हिट्दु छौ।
घस्स इना, घस्स उना
सुद्दि जै-कै फर भिड़े जाँदु छौ।
भक्कळ छौ कि सकुळु छौ
मि अजाण छौ।
मि भरि गाळि खाँदु छौ।
गाळि दींदा छा वु
जु नि घिंणादा छा
गौळा-ग्वींडों मा
हग्याँ देखी, मुत्याँ देखी,
रयाड़ कि रयाड़ देखी,
अणबर्तीं अपड़ि गत देखी।
वु भरि टिमणादा छा,
मे देखी,
बाठा अबठा सट्गि जाँदा छा
म्यारा छैल देखी।
मि भरि खकळांदु छौ
वे नळखा देखी-
जै कS गिच्चा फर
माखा भिमणादा राँदा छा।
चर्री सड़्यांण्म् लाल कीड़ा गिबजांणा रांदा छा।
वीं बितेक क्वी बि
न नळ्खु छळ्याँदु छौ,
न चर्यू किचील सुर्दु छौ।
जु नळखम् खड़ु रांदु छौ
वु एक लंखै छौं बरजुणु रांदु छौ
मे देखी।
भिटग्दि रूड़्यूम्
तिसळु मि वे नळ्खौ पेच जन्नि घुमांदु छौ
भरि किकलाट मचि जाँदु छौ
गळ्म-गळा, फिंगरम्-फिंगरा
हकर्वळा मचि जांदु छौ
मे देखी।
मि तिसळ्वी सुट्ट अपड़ा ड्यार सट्गि जाँदु छौ
जब मि छुट्टु छौ।
Copyright@ Mahesha Nand
Garhwali Experience poem on Caste discrimination ( Un-touchability) ; Garhwali Experience poem on Caste discrimination from Pauri Garhwal ; Garhwali Experience poem on Caste discrimination from Uttarakhand ; Garhwali Experience poem on Caste discrimination from Himalaya ;  जातिप्रथा व छुवाछूत संबंधी गढ़वाली कविता