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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

गज़ल

BY : पयाश पोखड़ा
Garhwali Ghazal by Payas Pokhara
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छाळा फुफरा नि दिखांदु अब जाण-पच्छ्याण मा ।
लुणी लसाक सि द्याख लोगु का ब्वन-बच्याण मा ।।
मेरि चुलखंदि कि छुवीं अब गौं-गळ्या मा चलिगीं ।
बरसू बीतला मीथैं ईं दिवलि का छेद बुज्याण मा ।।
आंख्यूं की डिमडळ्यूं मा कबरि तक रैलु अटक्युं ।
उमर बीति जालि हमरि सैन-सक्ति अजमाण मा ।।
किलै रुणा छवा तुम ए बगत का मिज़ाज देखिक ।
बगत थैं जरसि बगत नि लगदो बगत बदलाण मा ।।
अब कै खुणै कुछ नि बरज़दा हमर गांवा का लोग ।
मुंड-मुंडीत छाया कभि जंद्यौ ट्वप्ला बदलाण मा ।।
अाज कत्गा तरक्की कै ग्याई यो एटमी जमनो ।
भौत मज़ा आणु च लोगु थैं ढुंगौंल कच्याण मा ।।
कनमेसिक उलखणि सि सुभौ च त्यारु "पयाश"।
पैनि धार ख्वींडे ग्याइ मुरक्या बांज लच्छ्याण मा ।।
© पयाश पोखड़ा 27022020.

Bhishma Kukreti

मन्ख्यात च खतरा मा

असलियत बताती ,  झुलसाती गढवाली कविता

Humanity in danger
A Garhwali poem
कवि:  रमाकांत ध्यानी
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कखि?
यंत्र,
कखि?
मंत्र,
कखि?
तंत्र,
खतरा म।
कखि?
धर्म,
कखि?
कर्म,
कखि?
राष्ट्र,
खतरा म।
कखि?
जात,
कखि?
गोत्र,
कखि?
भ्यात,
खतरा म।
इन ब्वना छन,
सब्या बुद्धिजीवी.....
मि मूढ़ मनखी,
इदगा!
स्वचणु छौं....
य त,
मि खतरा म,
य!
मेरी मन्ख्यात खतरा म।।
*©*रमाकान्त ध्यानी"आरके"*
*ग्राम-गोम,नैनीडांडा।*

Bhishma Kukreti

गज़ल
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गढवाली गजल
गजलकार :पयास पोखडा
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भटुळ्युं थैं आगिम् डळ्दा द्यखणा छन वो ।
मुंजईं जिकुड़्यूं थैं जळ्दा द्यखणा छन वो ।।

ह्यूं बणिगै खुद अर एड़पट्ट ह्वैगिन पराज ।
घामम् कळ्यज़ि थैं गळ्दा द्यखणा छन वो ।।

सुपिन्या उकळि लग्यान अंग्वाळ ब्वटणा को ।
रस्ता-बाटों स्वीणों थैं चळ्दा द्यखणा छन वो ।।

हैंसदा फूलु का कुटमणा भि निमिड़ि गैं आज ।
बगैर हवा का डाळि थैं हळ्दा द्यखणा छन वो ।।

घर-गौं छोड़ि अपणो झणि कब घर बौड़ ह्वालु ।
द्वि बूढ-बुढ्यौं थैं पुटगि पळ्दा द्यखणा छन वो ।।

बस भोळ की आस मा अभितलक बच्युं चा ।
ये बिसवास थैं माटम् रळ्दा द्यखणा छन वो ।।

झूट ब्वलदंरों देखिक रौंस लगणि च "पयाश"।
सीदु-सच्चु आदिम थैं टळ्दा द्यखणा छन वो ।।

© पयाश पोखड़ा 21112019.

Bhishma Kukreti

स्थानीय भाषाओं के बोलने वालों में  कमी  क्यों ?

कवि :जय पाल सिंह रावत 'छिपड़ दा'

छंद :गढ़वाली कविता मनहरण घनाक्षरी में

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काँठौं की कविता सूणो,चांठौं का गितु भी सूंणो,
साहित्यिक म्याल़ा हूंणो, अपणी भाषा बींगो।
कतगा लोग यखमा,दिखणा फेसबुक मा,
ब्वलण प्वनूं चा ऊं मा, तुमी बताओ लोगो।
किलै हरचणी भाषा,कैपर करण आसा,
हूंण नि चैंदि निराशा,ये सुख तैकी भोगो।
हर्यां भर्यां छिन डांडा,किलै उपजणा कांडा,
गणेश गरीब ब्वाडा,चकबन्दी उरेग्यो।।
सर्वाधिकार@ जय पल रावत

Bhishma Kukreti

धार -खाळ

:शिवदयाल शैलज
Garhwali poem by Shiv Dayal Shailaj

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"जो बरखि नि साका ; वो बसगाळ हुयां छौं !
क्यऽ पुछणै हाल ? हम त धार-खाळ हुयां छौं !!

विकासै -बादल ; सरकरि - सरग मा हेरणा !
धार-खाळूं सूखी ; चाळ -खाळ हुयां छौं !!

जब स्वीणूं द्यखणम् ;आँख्यू बरगबांज कै !
तबित् अपड़ि निंदि क अफि ;ढंगरचाळ हुयां छौं !!

भयात मा झगड़ा अर खिर्तूम -खिर्तू देखी !
सैणा मा रैकि बि ;उंदार - उकाळ हुयां छौं !!

कबि त हमरि एकता का गीत लगदा छा !
नै जमना मा अगास - पताळ हुयां छौं !!

ब्याळि तलक त् हम बिना ;गफ्फा नि घुटेयू !
आज हम तुमर ;जिया को जंजाळ हुयां छौं !!

ये मुल्का हालूंम् कनिकै रैण सूणिल्या ?
हम त भैऽ क् सौं ; भीटा मा कि फाळ हुयां छौं !!
शिवदयाल शैलज

Bhishma Kukreti

नचदरा वीऽ थकुलेर बि वीऽ छन
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त्रासदी , व्यंगात्मक व बिडम्बनात्मक , गढवाली कविता
कवि : धर्मेन्द्र नेगी
Irony , Tragedy and satire in a l Garhwali Poem
By: Dharmendra Negi

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जगरि बि वीऽ भौंणेर बि वीऽ छन
नचदरा वीऽ थकुलेर बि वीऽ छन
हम त घुण्ड- मुण्ड नवैइ कि बैठ्यां
द्यबता , नवर्या, पुछेर बि वीऽ छन
जन वु सुणाणान हम वीऽ सुणणा
गितार बि वीऽ ढौळेर बि वीऽ छन
आन - ईमान यख बिकणूं कौड़्यूंम
ब्यचदरा वीऽ सौदेर बि वीऽ छन
संस्कृति बचाणौं उरेणान कौथिग
उर्यन्दरा वीऽ कौथिगेर बि वीऽ छन
एक - हैंकाऽ कन्दूड़ भोरणान वु
सुणदरा वीऽ चुगलेर बि वीऽ छन
बड़ा समाज सुधारक बण्यांन जु
दरोळ्या-भंगुल्या-जुंयेर बि वीऽ छन
बावन व्यंजन पक्यांन 'धरम' तख
रस्वाळ बि वीऽ खन्देर बि वीऽ छन
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ


Bhishma Kukreti

आस म सांस
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प्रेरणादायक गढ़वाली कविता

कवि –डा वीरेंद्र बर्त्वाल

An inspirational Garhwali Poetry
By 'Dr. Virendra Bartwal

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लग्यूं छौं उकाल़ि कबि त सम्यार आलो
कबि त जमली बिज्वाड़ अर फुलार आलो
यूं सुखा गदनों मा कबि त छलार आलो
कबि त होला म्यरा बि द्यबता दैंणा
कबि त म्यरा हिस्सा कु डड्वार आलो।
लग्यूं छौं उकालि कबि त सम्यार आलो
कबि त भर्यलु पोटगु अर डकार आलो
कबि त वूंका गौं बिटि रैबार आलो
कबि त जालि खैरी अर उलार आलो।
-@डा.वीरेंद्र बर्त्वाल
देव प्रयाग , 2020

Bhishma Kukreti

प्रतीकात्मक , श्रृंगारिक गढवाली गजलें

गढवाली गजलकार :पयास पोखड़ा(विभूति जोशी )

Symbolic, Allegorical, Garhwali Love Ghazals 
By :Payas Pokhra

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सूरज को आणु जाणु, लग्यु धंधा चा ।
रोज त्यारु याद आणु, लग्यु धंधा चा ।।
रोज-रोज क्वी म्यारु संगुळु बजै जांद ।
हवा को हमथैं ठगाणु, लग्यु धंधा चा ।।
लंगलंगि डाळ्यु मा लुकाचोरि खेलि ।
हैंसदा फूल थैं लुकाणु लग्यु धंधा चा ।।
सर्या राति बिज्यामा यखुलि-यखुलि ।
जून दगड़ भि बच्याणु, लग्यु धंधा चा ।।
जणदु छौं, जो ग्याइ वो नि बौड़ कभी ।
त्वैखुणै आंखा बिछाणु, लग्यु धंधा चा ।।
कंदुड़ भि सुदि-सुदि बयाणा रंदि म्यारा ।
देळिम तक आणु-जाणु, लग्यु धंधा चा ।।
एक घड़ि भि तू नि बिसरे सके "पयाश" ।
सुपिन्यों मा आणु-जाणु, लग्यु धंधा चा ।।
© पयाश पोखड़ा 04032020.

Bhishma Kukreti

खुसुर फुसुर
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बचपन का आनन्द पर एक गढवाली कविता

कवि :जगदम्बा चमोला

Garhwali Poem Memorising Pleasurful Childhood
By Jgdamba Chamola

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क्वे भी गम को लेश नि छौ
बस सारो सुख छौ अपड़ा दम पर
ल्वोण त्यौल की चिंता छै ना,
सामाजिक बन्धन छौ हम पर
ना भोळ भविष्ये खोज खबर
ना रोग सोग छौ कुछ भी हम पर
हर्ष उलार छौ संग्ति खत्यों, जब
बचपन छौ हर कदम कदम पर
यन नीं दुख नी रैन ह्वला, पर
नजर नि रौन्दि छै कै भी गम पर
दुख भी च्योत च्यत्यण कनकै छौ
टक त रौन्दि छै बग्वळ्या बम पर
धूळो माटो सबकुछ छौ पर
यथ्या मा भी जचणां रौन्द छा
खुशी यथ्या छै स्यंया मा भी
बचपन मा हम हसणा रौन्द छा
आज त सब कुछ सबूं मूं पर
सब दीन हीन तौहीन बण्यां छिन
यन लगणूं जन बचपन सब्वा
अंगरेज्वा आधीन धर्यां छिन
Copyright@ Jagdamba Chamola ----2020


Bhishma Kukreti

मौत दरवाजा खड़खड़ा रही है !
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बहुत ही संवेदनशील गढवाली गजल
गजलकार :पयास पोखड़ा
A very sensitive Garhwali Ghazal on Death Arrival
By ; Payas Pokhra

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ज़िदंगि भितर हि भितर क्य बड़बड़ाणि चा ।
अरे ! बल मौत भैर संगुळु खड़खड़ाणि चा ।।
यख त लोग घंडाघोड़ टिपणा खुणै चलगीं ।
बरखा का दगड़ा चाल भि कड़कड़ाणि चा ।।
बांजि पुंगड़ि्यूं मा गारि-मगरि ठुंगदा-ठुंगदा ।
ख्वींडी चूंच ल्हेकि घुघुति फड़फड़ाणि चा ।।
कोंपळा न कुटमणा न कभि बौर हि दिखेनी ।
ऐंसू फसल भि सूखा पात सि पड़पड़ाणि चा ।।
क्वी भांडु रीतु नि रै, बगत-बगत की बात चा ।
अर जिंदगि की पंदेरी यखुली तड़तड़ाणि चा ।।
अपणा बिरणों थैं अब धै-धाद त लगा "पयाश"।
हाथ जोड़िक बुलाणी जिंदगि गड़गड़ाणि चा ।।
© पयाश पोखड़ा 05032020.