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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

एक जुट रावा एक मुट रावा

प्रेरक गढवाली कविता : कमल जखमोला
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एक जुट रावा एक मुट रावा
भारी संकट की घड़ी अईं च्
कोरोना वायरस की बल
देश दुनिया तबाही मचाईं च्
तेजी से फैल्दु यु पैई मनखि देह
रक्तबीज सी पैदा ह्वै जांदु हजारों हजार
चैना वुहान बिटि चलि की
फैलिगै आज सर्रा दुनिया संसार
एक जुट रावा एक मुट रावा........
इटली ईरान, स्पेन फ्रांस, अमेरिका
इंग्लैंड भारत,मच्यूं चौछड़ी हाहाकार
दवै दारू नी येकी अभि कुई भी
कत्गा मनखि गैनी स्वर्ग सिधार
एक जुट रावा एक मुट रावा..........
बात मजाक की नी,मजाक मा नी लैनी
खुद मैफूज रेनी,मैफूज रख्यां परिवार
अजाण मा गल्ती भारी तुम नी के देनी
बच्यूं रौल़ा,खूब मनौला कौतिग त्यौहार
एक जुट रावा एक मुट रावा........
देश मुल़ुक गौं गौल़ा अईं मुसीबत
सूणा भै बन्दों जरा रयां होश्यार
इने उने फालतू नी आण जाणू
पोंछि जाल़ु निथर यु हमर घार
एक जुट रावा एक मुट रावा..........
वायरस बड़ु खतरनाक च् यू
झणी कब कख केर द्याओ मार
साफ सफै रख्यां भित्तर भैर
साबुण पाणींन हथ धूणां रयां बार बार
एक जुट रावा एक मुट रावा...........
सावधानी बरतला पूरी हम
पैई जोल़ा ईं मुसीबत से पार
घबराण नी,बस कुछ ही दिनों की बात
जीत जोल़ा,ह्वेल़ि दुनिया मा जै जैकार
एक जुट रावा एक मुट रावा.......
.........कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

ललूडी सपूत' :माधो सिंह भंडारी
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कविता –अश्विनी गौड़ , रुद्रप्रयाग

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गढवाल थाती जन्मी वीर भड़ भारी,
राजा महीपतिशाह, सेनापति माधो सिंग भंडारी,
पिता भड़ सोणबाण कालो भंडारी,
वंश मा सपूत हवैन माधोसिंग भंडारी।
गढवाल मा तपोवन,
देरादूण नजीलो,
दिल्ली कुमौं सिरमोर्या राजौ,
आंख्यूं मा छो सेरो।
राजा महीपतिशाह ब्वोदू,
जीतलो भड़ जैकू,
तपोवन साटयूं सेरा,
सैरू हवोलू तैकू।
वीर भड़ सबि राजौन,
अपडा न्यूत्याल्यां,
दिल्ली मुगल पठान,
कुमौं, कालू-कत्यूरा।
गढवाल राजधानी श्रीनगर,
लगि लडै भारी,
दुश्मन मारी तपोवन जीती,
काळो भंडारी ।
नीती माणा घाटी,
दुश्मन तिब्बती औंदा
भड़ माधोभंडारी तब,
अग्वडि रौंदा।
सीमा गढवाल की,
तुमुन बढैन,
हिमालै डांडीकांठयू,
वौडा धर्यैन।
ज्वालापुर-हरिद्वार,
दुर्ग चिंणैंन,
सिरमोर्या डांडीकांठयू तक,
सीमा बढैन।
श्रीनगर नजीकू,
भूमी, मलेथा रौंतेलों,
बगदि गंगा बोडै तुमुन,
मलेथा का सेरों।
लाल वंश ल्वे बगै,
कूल मलेथा ल्यैन,
इतिहास मा यन,
वीर माधोसिंग हवैन।
बण मा जस 'सिंह' यख,
वीर भड़ भारी,
'ललूडी' सपूत,
माधोसिंग भंडारी ।
------सर्वाधिकार----अश्विनी गौड ----------दानकोट रूद्रप्रयाग।।।।


Bhishma Kukreti

विया आप्टिवा....(भ्यूंल़)
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गढवाली कविता – कमल जखमोला
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कोलेज जब गुरजी पढ़ांद
सचि डाल़ टुक्कु ब्वै मेरी
हथ्थ दथुड़ि ले याद आंद
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी.....
हमsरा मुख की लाली
मौल़ि गै होलि भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी...
फाइबर, फोडर,फ्यूल
ज्यू बुल्दु बोलूं सर जी 'भ्यूंल'
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी.....
मांजी छिंडरणी ह्वेलि
बबाजी सोंटल़ुं बंधणा होला बिठ़कि
दगड्यों दगsड गाड़ लिजाणी भुलि
ढंड्यूं नौना लगाणा होला डुबकि
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी....
स्योल़ु निकल़णा जांदा हम
अब जाण रेटिफिकेशन
वा गंद तब पीड़ा दींदि छै
वैs आज याद करदु मन
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी.....
बटे गै होला ज्यूड़ा,
गौsड़ि लेंदि ह्वै गै होलि
बल्दोंsक मुखsक म्वाला
बुबाजीsन चंगेरी बणे दे होलि
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी.....
घर लए गै होल़ा स्यौल़ु केड़ा
चुल्ल् जगोणा बरसात
रामलीला जांण मिन्न
बैसाख जाण पल्ला गौं की बरात
कतगा प्यारी
भ्यूंलsक डाल़ी,डाल़ी हमारी....
माजी शैंपू बणणू
जै लगांदि बोलि सिरस्यूल
कतगा कामsक ग्रेविया आप्टिवा..
..... न् न् न हमरु भ्यूंल
कतगा प्यारी
भ्यूंलsकि डाल़ी,डाल़ी हमारी.....
.....कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

चला कोरोना तै हरोला
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Inspiring Garhwali Poem by: अश्विनी गौड़
प्रेरक  गढवाली कविता
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तु तखि रौ
मैं यखि छूं
नाता रिश्ता
माया पिरेम
बाद मा सुखिळा
दिनों मा निभौला
चल दगड्या
कुछ दिनों टुप्प-टप्प
अपडाअपडा भितरै रौला
चला ईं जंग मा,
सरकारों साथ निभौला,
कोरोना तै हरोला
चला कोरोना तै हरोला
@अश्विनी गौड़

Bhishma Kukreti

प्रेरक गढवाली कविता

कवि- धर्मेन्द्र नेगी

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रिकि उकाळ हिटदि -हिटदि कटि जान्द
दुखैऽ कुयड़ि दिखदि - दिखदि छंटि जान्द
किताब जिन्दगी की पुरणि ह्वे जान्द जब
क्वी पन्ना तब पढ़दि - पढ़दि फटि जान्द
नाता - रिश्तों मा सौदाबाजि कख छै भलि
भरोसु हो जु त दिल को सौदा पटि जान्द
हर घड़ि बगत तैं दोष देणों भलु नि होन्दू
झणि कब कैको बगत घड़िम पलटि जान्द
सुख घड़ेकि बि रुकदु नी छ यख पौंणु सी
दुख कुबगत्या मैमान सि ऐकी डटि जान्द
भरोसु करण त कैफर कनुकै करण यख
काम निकलदैऽ य दुन्या त झट नटि जान्द
पढ़्यूं मनखि घुरच्यूळम बि अलग दिखेन्द
चार आखर त पिंजड़ौ तोता बि रटि जान्द
अति मिठा मा कीड़ा पड़ि जन्दन रै 'धरम'
अति घचपच न रिश्तोंऽ मिठास घटि जान्द
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

Bhishma Kukreti

कोरोना

: मनोज भट्ट 'गढ़वळि'
Garhwali Poem on Corona Virus
Poem by Manoj Bhatt Garhwali

÷÷÷÷÷
गाड़ी मा बैठिकि घर - घर ऐगे कोरोना ।
जाज मा कखैन कख पौंचि ग्ये कोरोना ।।
हत्थ बटिन गिच्चों घsळ घुळे ग्ये कोरोना ।
जिकुड़ी प्याट फेफड़ों तैं चूसी ग्ये कोरोना ।।
छंsद रौ रिश्तेदार धारमा धैरि ग्ये कोरोना ।
बैठ्यां-बैठ्यां हुक्का पाणी वर्जित कै ग्ये कोरोना ।।
जिंदयूं मरदु दां ऐसास करै ग्ये कोरोना ।
प्रकृति निसाब ह्वे जेल खाना कै ग्ये कोरोना ।।
बाळा - बुढ्यों खास घिगोड़ी ल्हिगे कोरोना ।
पण पौंन-पंछी पशुओं दया दीखै ग्ये कोरोना ।।
महामारी रूप धैरी घटाघट ल्वे पे ग्ये कोरोना ।
बेबस दुन्या हुईं तमासु दीखै ग्ये कोरोना ।।
दमळया शरीलों चिमड़ाट सि छै ग्ये कोरोना ।
बसंत फूलों बज्रपात कै झुलसै ग्ये कोरोना ।।
© मनोज भट्ट 'गढ़वळि'


Bhishma Kukreti

"""""""""""""""नौरता"""""""""""""""""

गढवाली कविता - शिवदयाल "शैलज"

दुन्यांमा बल ;
चुक्कापट हि रै जांदी !
जो शब्द की ज्योती ;
ये लोक मा नि जगमगांदी !!
दुन्या -शब्दकोष ;
रीतो हि रै जांदू;
जो वैमा "माँ" शब्द नि हून्दू !!
वो ब्रह्म जैन !
सब्बि देहधारियूं देह रची ;
सैरी सृष्टि रचिकै ;
अफी अलोप ह्वैग्या ;
वेद ब्वाद निराकार ह्वैग्या !!
पर वो अपणी जगा मा ;
रूप बदली कै ;
माँ "रूपम् साकार ह्वैग्या !!
वो माँ !
जैंका खुचिली मा अष्ट सिद्धि ;
नौ निधि खेलदीं !
वीर संतान से कोख खाली नी ;
क्वा शक्ति ज्वा ;
अपणी खुचिली मा पाळी नी ?
वीं खुचिली मा प्रेम का ;
सात समोदर हिलोर मरदीं !
वींकी आँख्यूं बटि ;
ममता का सौण भादौ ब्वगदीं !
वो माँ को हमरी समणी ;
भगवानै एक रूप छ !!
पर यीं सृष्टि चलाणू कु ;
बढाणू कु अर सजाणू कु!
दगड़ै दगिड़ी -
जो ईं दुन्यामा अत्याचार ;
अनाचार कन वळी ;
दानवी शक्तियूं को ;
निरबिजू कना कु !
मातृ शक्ति को मान बढाणू कु ;
नारी चेतना जगाणू कु ;
माँ तै जगतमाता का ;
थान मा थरपणा कु ;
शैलपुत्री बटि सिद्धि दात्री तक ;
नौ रूपों मा अपणी ;झलक दिखाणा कु !
यूं नौ मातृकाओं कु आवाहन कु;
कुदरत की शक्तियूं को दरसन कु ;
वूंकी लीला को बखान ;कन्ना खुणि शैद ;
सब्या लोग -पूजा -पाठ अर वरत लेकी ।
लगांदीं
नौरता मंडांण !!

Bhishma Kukreti

भरवस नि त्वाड़ो

कवि कमल जखमोला


कुछ दिखौ झूटमूट करणाकी ही ठाणी ल्यावा।
राज़ी खुशी पूछी,हालचाल आज जाणी ल्यावा।।
किलै आणीं जाणीं बंद हुईं,बग़त बीती गै भौत।
बैठा ज़रा चौक मा घडैक,हुक्का पाणी प्यावा।।
गौं गौल़ौं का हाल,खेती कमै की कारा बात।
गोर बख़र,गोठ खेत कुछ ज्ञान बाणीं द्यावा।।
टपटपि चा को गिलास दग्ड़ि,कुछ लटपटि छुईं।
अटपटी छोड़ि, दै डखुल़ा,घी माणी की लगावा।।
यखुली बैठी बिल़मांद ही नी यू पापी ज्यू पराण।
छठी छमै ऐकी ध्वार,झिल्ली खटुली ताणी जावा।।
छुइयों मा ही बणिं जोला हम थुड़ा ज्वान बाल़ु।
मिन तो ठाणि याल,ज़रा तुम भी ठाणीं ल्यावा।।
कखन पैछणंण हमरा बालबच्चोंन् नाता रिश्तेदार।
हूंदू हमर् भी दुख सुख को साथी,न तरसाणी द्यावा।।
जम़ना मा कख च् ग़ैरों को कुई भर्वसु कबि 'कमल'।
अप्रों तै ग़ैर नी कारा,अब तो तौं तुम पैछाणीं ल्यावा।।
........कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

कवि जगमोहन रावत का परिचय

Bhishma Kukreti

प्रेरक गढवाली कविता

सुनील सिंधवाल "रोशन"

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कैगा आंख्युं पाणिं न सुख्यां पहाड़ मा।
ज्युकुड़ि तीश बिराणिंना ह्वयीं पहाड़ मा।

सैवा सौंलि करि सुबैरि सुबैरि,
काका बौडूं भै बंदों खैर खबर।
चौंका पात करि सुबैरि सुबैरि,
काम धंधौं सब‌ अपणिं डौखर।
अपणों की शुद्धि बुद्धि सदानिं पहाड़ मा।
ज्युकुड़ि तीश बिराणिं ना------

बानि बानि बिरादरी गौं गौंमा,
सुरालि लगै छ्वटा बड़ों दग्ड़ि।
कारजात भ्वौज म्वार गौं गौंमा,
सुख दुःख रीति-रिवाज दग्ड़ि।
रीति रिवाजों बक्लि खांड मैरा पहाड़ मा।
ज्युकुड़ि तीश बिराणिं ना------

दीदी भुली धै लगौंदा रिश्ता लगै,
बौलु मिल बांटि छ्वींयुं छ्वीयुंमा।
पैतु बांध्यों अपणिं छौंदाड़ि लगै,
म्यौला ख्यौला धार गाड दग्ड़िमा।
म्यौलूं त्यौहारों नुमैइश लगीं रैदि पहाड़ मा।
ज्युकुड़ि तीश बिराणिं ना-------

त्यौहारों तैं धियांणि आंदि‌ मैतुमा,
रौनक रैंदी पैरी हांसुलि ध्गुलिमा।
म्यौंलु उरियौं च ख्वौला ख्वौलौंमा,
शरणार्थी बैज्दा चूड़ी घूमि घरोंमा।
विलैति मंख्युंतैं भी अपणुंपन लग्दु पहाड़ मा।
ज्युकुड़ि तीश बिराणिं ना---------


सुनील सिंधवाल "रोशन"।