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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

उखैक   फिकर- एक गढ़वाली कविता



कवि - डी. डी. सुंदरियाल

इन त नी च कि
वूं थे वखे फिकर नी च

नेतओं कि फिकर च
कै गोऊँ कथ्गा बामण
कथ्गा जजमान
कति भोट म्यारा कति भोट  त्यारा

चुनओ जित्णइ फिकर
भाषण पर भाषण
ससतू करी द्यूंला राशण
अंधेरा रौलों, कूणा-कुमचेर
बिजली का खम्बा-तार पोंछये दिउंला
(उज्यले गारंटी हमारी नी च )

जीप घुमइकी, धुलु उड़े कि
सट्गि गईं डेरादून( लखनों) दिल्ली
पाँच साल माँ एक सवाल पुछी
वो भी बंगालै जूट इंडस्ट्री बारा
लाटु गम्फू काका न पूछि
"ब्यटा, गढ़वाला नक्शा म कखम च बंगाल"
अरे काका के कु गढ़वाल , के कु बंगाल,
नेताजी का ह्वै गिनी पूरा पाँच साल
ये गवैइ कि रीत ही ई च
इन त नी च कि
वूं थे वखे फिकर नी च
Copyright@ D.D Sundariyal, Chandigarh


Bhishma Kukreti

*********अजुकि बात हुईं च आज लोग क्य बुना छन********

                           कवि -डॉ नरेन्द्र गौनियाल

अजुकि बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
ठुला मास्टर जि दारू पेकि,नाळी मा पड्यां छन.

खेती-पाती चौपट,पुंगड़ी-पटळी बांजि पडीं छन.
खुटों मा खुटा धरी,दिनरात सीरियल दिखेणा छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
ब्याल़कि घसकटा ब्वारि,आज नेता बण्या छन.

यूंकि देखो क्य मत मरीं,बेशरम बण्या छन.
नौकरी-ठाठ-बाट वल़ा,बीपीएल बण्या छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
अमीरों तै राहत,गरीबा कागज वखी फस्यां छन.

महंगाई कि मार,जनता लगीं सार,नेता सियाँ छन.
कतगै दा घचोरिकी बि निरभै,कूण सियाँ छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
टिटपुन्ज्य बि अब त सबि,लाटसाब बण्या छन.

कूड़ी-पुंगड़ी बांजी,मन्खी लापता हुयां छन.
घर गौं मा सुंगर-बांदर,चौकिदरी कना छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
बांजा खत्तों मा बल,अब त रिसौर्ट बणणा छन.

घिनुड़ी-घुघूती हर्चिगीं,अबाबील उड़णा छन.
घर-घर मा भितर जैकि,घोसला बणाणा छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
सीधों कि कुगत अर, बदमाश आनंद कना छन.

          डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

दर्शन सिंह बिष्ट (जन्म १९६०)की कविता



[भीष्म कुकरेती की गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला से ]



विकास

आंगनवाडी म् ज्यादतर

वूं कि घरवळि मौज म्

बी.पी.एल कार्ड वेकू

जैका चार नौना फ़ौज म्

विकलांग पेंसन वेकी

जु रात कर्दा चोरी

पार्टी इमानदार लुंड

जु दिन- रात गप्पी म्र्दु कोरी

खच्चर बतिया सचिव -साब की कौफिम

ग्राम सभा की सुख - सुविधा प्रधान जीक चौकी म

सर्वाधिकार @ दर्शन सिंह बिष्ट


गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

********मेरि मांजी********(पलायन कि पीड़ --एक गढ़वाली गीत-कविता)


           कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

[गढवाली गीत, गढ़वाली कविता, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी कविता, हिमालयी गीत , हिमालयी कविता ]

तेरा हाल देखि मांजी, मेरि गैळी उबाई.
टप-टप मेरि आंख्यों,पाणि ऐ ग्याई.

कनि छै ब्वे तू यखुली,यखुली-यखुली.
ससुराल चलि गैनी,सबि दीदी-भुली

चलि गैना परदेश,मेरा भाई-भौज.
तू छै ब्वे अफु रूणी,बैठ्याँ हम मौज.

पुंगड़ी-पटळी सबि,फुंड राख बांजी.
यकुलो जीवन कसिकै ,रैलि तू मांजी.

लाचार छौं मेरि मांजी,मि जि क्य करदु.
यख-वख कख-कख,मन मि धरदु.

मन त करद मांजी, मि बैठूं तेरो पास.
मेरि बाटी ह्वैगे न्यारी,कनि पड़ी फांस.

फागुणा का मैना मांजी,पुंगड़ी मा रैली.
डाल़ा फ्वड़दा तेरा हाथों,पड़ी जालि छैळी.

मौल्यारा का बगत बि,निंद त्वे नि आली.
हाथ-खुटी दुखाली तेरि, पिंडळी पिड़ाली.

हाथ-खुटी तिड़ी होलि,कसी कै हिटाली.
तेरि नांगी खुट्यूं मांजी,गारी बिनाली.

गौं-गल्यो कि दीदी-भूल्यो,मेरि ब्वे बि देख्यां.
लखडु-पाणि कि बि कुछ, तुम मदद करि दियां.

गाँव का दीबा-भूम्यां,तुम दैणा हुयाँ.
मेरो घर-गौं मा सबि,राजी-ख़ुशी रैंया

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित (narendragauniyal@gmail.com )

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Bhishma Kukreti

********गढ़वाली छिटगा *********


कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

    ***बोर्ड इम्तहान***


सळ इनैं
सळ फुनैं
भैर-भितर
दौडा-दौड़
पटासुल्कणि
अर
छित्यकी
धारा एक सौ चवालीस.

***पुलिस***


कठबांस
मांकी-धीकी
आंसू गैस
तैड़ गोली
अर
मैना-मैना
च्या पाणि.


***पाणि विभाग****


फ्री टोंटी
यकुल्य़ा बाण
ब्लीचिंग पौडर
अर 
माछयों कु सुरा.


***सरकारि अस्पताळ***


भैर बंगला
भितर कंगला
सफ़ेद गोळी
अर
सफ़ेद गुबारा.


***दारू***


पीणु-पिलाणु
लड़णु-झगडणु
बकणु-बहकणु
लटगिणु-फरकिणु
निकमी गाळी
गन्दी नाळी
अर
खीसा खाली.

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उन्नति
( लीलानन्द रतूड़ी
पैलि छायो अमोल जमानो
मुलक मा नेता कुल द्वी-चार
आज ह्‌वै ग्याई शिक्षित जमानो
नेता ह्‌वै गैन गौं-गुठ्‌यार।

Bhishma Kukreti

*******तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन********
                   कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

मि चांदु कि तू खुश रहे सदनि इनी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

हवामहल बि त्वे नि दिखै कबी.
भूखो-प्यासो बि त्वे नि रखो कबी.
मि चांदु तेरि हर हसरत हो पूरी इनी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

गिच गफा अर मुंड ढकणो एक कूड़ी बि हो.
बदन पर लैरी-लती बि हो इनि भलि-भली.
मि त चांदु कि तू नूर,सदनि इनि नूर ही रहे.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

कबी दुःख नि दे,न कबी सताई त्वे.
न कबी कर्म से न मर्म से, दुखाई त्वे.
हर दिन हर घड़ी तेरो ख्याल करे.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

मितै रैंद सदनि तेरि अंसधरी कि फिकर.
मितै रैंद सदनि तेरि भावना कि कदर.
इनि चांदु सदनि मि मेरि सरि जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

मेरो सुख बि घटद,त्वे दुखी देखिकी.
मेरो दुःख बि घटद,त्वे सुखी देखिकी.
इनि चांदु मि मेरि कटे भली जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

तन कि रीत य सदनि रहे इनी.
मन कि प्रीत य सदनि रहे इनी.
इनी चांदु मि मेरि सुखी जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित   

Bhishma Kukreti

ऊखै  फिकर... २ एक गढवाली कविता



कवि -डी डी सुंदरियाल "शैलज

फिकर त कवि-गीतारू भि छ
सब बुनान गढ़वालि लिखा
गढ़वालि सीखा, गढ़वालि बोला
(निथर हमरु लिख्युं कैन बिंगण)
पर वूंका नोन्याल गढ़वालि नि जणदा
अपणई दादि-दादा नि पछेणदा।

गढ़वालि सभा सोसेटि जगा-जगा
बस्ग्यली च्यूँ सि जमी छन
गढ़वाली गीत, कविता, ड्रामा त क्या
लोग फिल्म तक बणाना छन
पर दगड़ी-2 बांबे-दिल्ली कूड़ा
भि चिणआणi छन
गढ़वाल रीतु करि सर्या दून्याम फैलाण
य क्वी कम बात त नी च

इन त नी च कि

वूं तै ऊखै फिक्रर नी च।



डी डी सुंदरियाल "शैलज" , 49 शिवालिक विहार, जीरकपुर (पीबी)
9501150981


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Pardeep Rawat ये पहाड़ ये पर्वत मेरी रुहु रुहु में बसते है
इनकी कठोर पतरिली डगर पर ही मेरी ज़िन्दगी के रस्ते है
मै इनकी छोटी पर चढ़कर चाँद और आसमान को छूना चाहता हूँ
मै इन स्वर्ग समान घाटियों में ऐसा गीत गुनगुनाना चाहता हूँ
जो हर हमेशा इन वार्फिली वादियों में गुंज्यमान रहे
मेरी कलम और मेरी इस आवाज़ की पहचान रहे
ये पहाड़ ये पर्वत मेरी रुहु रुहु में बसते है
इनकी कठोर पतरिली डगर पर ही मेरी ज़िन्दगी के रस्ते है

इन पहाड़ो की जो ये बारिश है ये मेरे चित को भावभिबोर करती है
ये पत्तों पर पड़कर जब जमीन पर गिरती है तो संगीत की लय में शोर करती है
यही लय मुझमे एक नयी उमंग भरती है
मेरी स्याई में नया रंग भरती है
और कहती है काट तू टहनी बना अपनी कलम
लिख अपनी मन की पीड़ा निभा अपना धर्म
ये पहाड़ ये पर्वत मेरी रुहु रुहु में बसते है
इनकी कठोर पतरिली डगर पर ही मेरी ज़िन्दगी के रस्ते है

प्रदीप सिंह रावत " खुदेड"

Bhishma Kukreti

गढ़वाली कविता--सरकरि पैसा भुस्स
        कवि - डॉ नरेन्द्र गौनियाल

इलाका मा
विकास योजना
हर मद मा
लाखों-करोड़ों रूप्या
बाटों मा
माटु छलकाओ
सीमेंट-गारा लपोड़ो 
कखिम
यात्री शेड
कखिम
टंकी
कखिम
पंचैतघर
कखिम
मूत्रालय
कखिम 
कुछ
कखिम
कुछ बि ना
कागजों मा
सब कुछ
काम-काज
कुछ हो नि हो
नेताजी कि
गाड़ी ऐ जांद
तिमंजिला कूड़ी
बणी जांद
गौं का लोग
दारू पेकि खुश
सरकारी पैसा भुस्स.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित . narendragauniyal@gmail.com