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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

ढ़वाली कविता--सरकरि रूप्या बुसे जन्दिन
        कवि- डॉ नरेन्द्र गौनियाल

सरकरि योजना
हर गौं मा
सड़क पौंछाण
बड़ी इस्कीम
बड़ो विभाग
बड़ो बजट

इन्जीनेर का बदल
चपड़सि
सर्वे कैरि दींद
सड़क तै
उकाळ -उन्दार
भ्यटा-पाखों
जख मर्जी
धैरि दींद

सियूँ विभाग
कंट्री ठेकेदार
सुद्दी माटु छल्कैकि
स्याल़ा कि सि कूडि
बणे दींद
मकड़ा कि सि मुतीं
हळकि बरखा बि
सड़क तै
बोगाई दींद
योजना फेल
गौं का लोग
खिसये जन्दिन
सरकरि रूप्या
बुसे जन्दिन. 

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित.

Bhishma Kukreti

ब्याळि स्वीणा मा बाघ द्याख मिन



[भीष्म कुकरेती कि गढ़वळि पद्य, गढ़वाली कविताएँ, गढ़वाली गीत, गढ़वाली संगीत, उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी कविताएँ लेखमाला से ]



मदन डुकलाण कि आधुनिक कविता

घाम मा बळु सी तपद द्याख मिन

नयारी छाल वो तिसाला द्याख मिन

द्वार मोर ढेकि दियां सींदी बगत

ब्याळि स्वीणा मा बाघ द्याख मिन

घुमणु गै छौ गौं , गर्मी मा पण

चौछ्वड़ी बणौ मा आग द्याख मिन

भैरा का सुकिला छन जो

वूंकी जिकुड़ी मा दाग द्याख मिन

हरची गेन सुर अर ताल बैठिगे

दुन्या को बिग द्यूं राग द्याख मिन



सर्वाधिकार @ मदन डुकलाण देहरादून 


भीष्म कुकरेती कि गढ़वळि पद्य, गढ़वाली कविताएँ, गढ़वाली गीत, गढ़वाली संगीत, उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी कविताएँ लेखमाला जारी ...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Santosh Joshi
‎,,,उत्तराखन्ड में आयी आपदा दो शब्द,,,,
,,कैसे लौट जाऊँ में आज अपने गाँव में,,

कैसे लोट जाऊँ में आज अपने गाँव में.
कुछ भी तो नहीं रहा आज मेरे गाँव में.
खेलता था जिसके साँथ वो साँथी छूठ गया.
ऐसा कहर बरपा कि वो मुझसे रूठ गया.
उठ रहा है धूंवाँ किसी चिता की आग का.
बाँशुरी के स्वर लगे हैं फुफार नाग का.
उत्तराखन्ड के बच्चे बूढ़े आज गम की छाव में
कैसे लौट जाऊँ में आज अपने गाँव में

माँ तो माँ हे भगवान तुमने बच्चा भी नहीं छोड़ा है.
आज उत्तराखन्ड के पन्नों में काला पन्ना जोड़ा है.
ऊठने लगा है भरोसा अब तेरे न्याय से.
कितने बैकसूर मारे गये आज तेरे द्वार से.
पूरा उत्तराखन्ड डूब गया आज गम की छाव में.
कैसे लौट जाऊँ में आज अपने गाँव में

खेलते थे खुसी-खुसी लोग मेरे गाँव में.
छायी हुयी है उदाशी आज मेरे गाँव में.
उठने लगे हैं फफोले मैहन्दी के पाँव में
कैसे लौट जाऊँ में आज अपने गाँव में

जितने भी हादसे में मारे गये
भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे........सन्तोष जोशी

Bhishma Kukreti

******छी भुला दारू नि पीणि *******

        कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

दारू कि बाढ़
माफिया कु जाळ
कख छा जाणा
किलै छा फंसणा
मुल्क देश मा
दारू कि
बड़ी खपत
नना-ठुला पर
लगी चपत

जनम से
म्वरण तक
दारू ही दारू
नौनु हूण मा दारू
सूली भितर मा दारू
जन्मदिन मा दारू
मुंडन मा दारू
पास मा दारू
फेल मा दारू
नौकरी मा दारू
ब्यो मा दारू
नाती हूण मा दारू
देब स्थान मा दारू
तिथाण मा दारू
भैर दारू
भितर दारू
सुख मा दारू
दुःख मा दारू

दारू से ही
नेता जि कि जीत
दारू से ही
दुनिया कि रीत 
दारू से ही चलद
कर्ज मा डूबीं
हमरि सरकार 
  बुद्धि भ्रष्ट
हुयूं खंद्वार
चेति जा
समझी जा
य जिंदगी
कुछ दिन च जीणि
त छी भुला
दारू नि पीणि.

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल सर्वाधिकार सुरक्षित ..narendragauniyal@gmail.com

Dinesh Bijalwan

बुद्ध
बुधौ अंगुलिमाल आज बि अंगुलिमाल छ,
बस इत्गा ही बद्लेनी की आन्ग्ल्यों की माला नि छ ,
आन्ग्ल्यों को फैसन नि अच्कालू , अब वो सड्डा मनखी को बुंगचु
बनोदु ,
अब नि रंदू लुकुयों बणु माँ,
अब नि खेल्दो वो धाद यकुला ब्य्कुला की
अब वो पचारी की औंद,
अर कर देंद चित हज़ार पन्द्र सौ द्याख्दा देखदी , वू बस्तियों माँ जख सब्बी तथागत होंन को दावा करदान ,
तथागत सिर्प नौ बदली सकदा छा, अंगुलिमाल तै नि ,
वो ता सदानी यन्नी रै, वें सदनी अपना जुग का तथागत लम्पसार करयेंन,
क्वी बी वैका सामनी टिकी ही नि ,
सुकरात, गांधी , लूथर किंग - क्वी बी नि ,
सच सदनी मर्ण का बाद चिल्लाणी , पकड़ा अंगुलिमाल तै , पर कने ?

वू त हर मनखी का भित्तर कई भावो माँ बँटी तै रंदु ,
लालंच, इर्षा , तिर्श्ना , वासना --- जणी क्त्गा रूपु माँ , धर्म को मुखोटू लगे की जाणे कथ्गा जुगु तक ,
जाणे कथा तथाग्तु की मवासी घाम लगाना छन और लगाना राला .

Mahi Mehta

 कितनी क्रिएटिव हो गयी हूँ मैं फेसबुक में आकर .......एक कुमाऊंनी कविता :))
ओ ! ईजा मी कतु क्रिएटिव है गयु
मील बने  हाली ग्रुप चार
जके मन आ एड कर दिन्युं
फोटो ले खींच दिन्युं दुई चार
मैं कतु क्रिएटिव है गयुं

रोज एक नोट लिख्ननियुं
आपण रचना में सबुके टैग कर दिन्युं
उनरी वाल हैक कर दिन्युं
ओ ! ईजा मैं कतु क्रिएटिव है गयुं

पैली दिभर आराम कर छी
अब चिंतन - मनन कर नियुं
बौद्धिक वर्ग कै मित्र बने बेर
मी कतु बुद्धिमान है गयुं

मेड ले मेरी खुश हरे
मेमसैप कमप्यूटर में घुस रे
मनमौजी काम करण लाग रे
मी ले वैक लापरवाही इग्नोर कर नियु
ओ! ईजा मी कतु क्रिएटिव है गयुं

फ़ालतू चैटिंग मीके भल नी लागन
चुपचाप ऑफलाइन है बेर
सबकी वाल मे नजर धर नियुं
आपुके एलीट दिखिनियुं
ओ ! ईजा मैं कतु क्रिएटिव है गयुं

आपण पुराण शौक रिवाइव कर नियुं
साड़ी पेरण भूल गेछी
अब फिर साड़ी पैरनियुं
सबुके प्रोफाइल पिक बदलणक
बिमारी लगैनियुं
ओ! ईजा मी कतु क्रिएटिव है गयुं

कुमाऊंनी बलाण में पैली  कतु अटकछी मैं
' लोहनी ज्यूक ' कृपा ले अब कविता
लिखण कोशिश कर नियुं
अब तो मिके चश्म ले लाग गो
मी कतु  इन्टेलैक्चुवल दिखिनियुं
ओ! ईजा मै कतु क्रिएटिव है गयुं

-- मूल कविता ' फेसबुकी गयुं ' लोहनी जी की लिखी हुई है , उसी से प्रेरित होकर  मैंने  यह कविता लिखने की कोशिश की है ...' श्री भारत लोहनी जी का आभार ||

Parashar Gaur

सौगात

सौगात
कई सालो के बाद
गया था भारत - सोचा
कुछ रेस्ट करूंगा
मिलकर पुराने मित्रो से
पुरानी यादे ताजा करूंगा !

उन दिनों वहा
शादियों का था मौसम
बातावरण सुवाहने थे
ऐसे में हमको शादियों में सम्मलित होने
इनविटेशनो पे इनविटेशनो आ रहे थे !

एक शादी में तो हमको
विषेशरूप से था बुलवाया गया
ये है विदेश से .......
इनका विशेष ख्याल रखा जाया
एसा सब से कहा गया !

दोस्तों .............
वो शादी येसी हुई
जिसमे सब कुछ गडबडा गया
हम - हम ना रहे .......
हमारा थोबडा तक बिगड़ गया !

जैसे पहुंचे वहा
बोले सब आओ आओ
अम्मा बहुत दिनों के बाद आये हो
शादी का लुफ्त उठाओ !

पाच बजे से पहले तक
मिल रहे है थे एक दूजे से गले
कुसल छेम पूछ पूछ कर
नहीं वो थकते थे
है कितनी चिंता उनको उनकी
येसा प्रेम जता ते थे

जैसे ही सूरज ढला
बाराती बोले.......
अरे .., कहा है दुल्हे का बाप
पूछो उससे कहा है इंतजाम
कहा है .... बोत्तले !

बैठक में था खाने-पिने का
आयोज़म ......
रंग-बिरंगी बोत्तालो के साथ
था रखा तरह तरह के ब्यंजन !

ढकन उखड़े ...
बोत्तले खुली
पैग पर पैग चले
मुर्गी की टाँगे हिल्ली !

एक दो पैग तक तो
सब ठीक थे ....
दो चार के बाद तो
कोइ आडा , तो कोइ तिरछे हो रहे थे

कि, तभी ...
जाने बातो बातो में क्या बात होई
बाक युद्ध होते होते
हात्ता पाई सुरों हो गयी
देखते देखते ....
बैठक बन गयी अखाडा
किसीने किसी कि तोडी बहे
तो किसीने किसीका जबडा उखाडा !

पैंट पतलून और कुरते कि
हालत देखते बनती थी
किसीका कालर गायब
तो किसी कि बाहा फट्टी थी !

कही चावल बिखरा था
तो कही बिखरी थी दही
ऐसे में कुर्ता कुर्ता न रहा
पतलून पतलून न रही !

थे सराबी छुम रहे थे सब
चडा नासा था गाडा.....
एक हाथ से थामे गिलास
तो दुसरे से पकडे नाडा !

खैर .................
जैसे तैसे बरात चली
होते होते मोहला- गली-गली !
पहुँचते ही दुल्हन के घर
फिर शराबी फ़ैल पड़े
मार मार के भडके
एक दुसरे पर टूट पड़े !

हाथ जोड़ दुहाले का बोला बाप
अर्र रे .. ये क्या हो रहा है
कुछ तो शर्म करो
क्यूँ हमारी इज्ज़त का तुम
सर आम फलूदा बना रहे हो !

रुको रुको ये भाई ....
हम बदनाम होजायेगे
रुके बात हमारी मान जाइए
तभी एक शराबी बोला
.".अछा.............. "
ये बात है तो हमें
एक पावा दो हम चोप होजायेगे !

किसी तरह मामला सुलझा
सब सुस्ता ये
पाणिग्राहन के समय
कोइ सज्जन हमें अंदर ले आये !

बैठे थे चुपचाप सभी
कि अचानक ..
एक आवाज़ आई तभी
" कोई हमें छेड रहा है "
बाराती कोइ शरारत कर रहा है !

इतना कहना था कि ...
दुल्हन्वाले बारातियो पर टूट पड़े
जिस को जो मिल्ला वो
उसी पर पिल पड़े
हम भी लपेट में आये
घुसे लात भाया ...
खूब बरसे- खूब खाये !

मै -- बोला भाई
ज़रा छमा करो
हम विदेश से आये है
तिनिक रहम करो !

मारके घुसा हमें दबोच लीया
मचाके शोर कहने लगा ..
किथी जिसने शरारत
पकड लिया... पद लिया !

हमें दे कितनी सफाई
पर वो एक न माने
जो भी आता हमें
धुन के जाते !

किसी तरह हम
बच बच्चा के वहा से निकले थे
मुह पर हाथ लगाया तो
ओंठ फटा , दो दांत गायब थे
भारतीय शादी का लुफ्त
गए थे किसी तरह झूटे
टूटे दांतों कि सौगात लेकर
भया वाह से लौटे !   copy right reserves @ parashargaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चन्द्रशेखर करगेती


एक दिन जरुर आयेगा......

हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.
......
जिस मिट्टी में हम जन्मे हैं
खुशबू उसकी तन मन में है
वो मिट्टी कोई क्यों बेचेगा
नक्शों की लकीरें खेंचेगा
हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.

सीमाओं में जकडे हैं क्यों हम ?
सरहद है क्यों आँखें हैं नम ?
क्यों जंगल खोदे जाते हैं ?
ये खेत क्यों रौंदे जाते हैं ?
क्यों मिट जाते हैं गाँव यहाँ ?
क्यों छिन जाता है ठांव यहां ?
क्यों सूखती जाती हैं नदियाँ ?
फाइलों में जकड़ी हैं सदियाँ ?
हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.

सत्ता का चेहरा कैसा है ?
सुविधाओं के मुह पर ताला है
पहचान ही खतरा हो जैसे
जीते हैं गुलामों के जैसे
कुछ भी बांकी कुछ शेष नहीं
उपदेश नहीं परिवेश नहीं
सन्देश यही सन्देश यही
आदेश नहीं निर्देश नहीं
हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.

खाली सूनी हैं आँखें क्यों ?
घुटती लुटती हैं साँसें क्यों ?
क्यों खून कोई पी जाता है ?
पैसे की धौंस जमाता है ?
क्यों जान की कीमत कुछ भी नहीं
ईमान की नीयत कुछ भी नहीं
वो साजिश कर क्यों खेलेंगे
हम कब तक दर्द को झेलेंगे
हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.

कोई भूखा न सोने पायेगा
बेवख्त न मारा जाएगा
कोई खाली हाथ न रोयेगा
कोई छत के बिना न सोयेगा
कोई पानी बिना ना तरसेगा
हर घर पर सावन बरसेगा
वो दिन एक दिन तो आएगा
हर दिल ये मिलकर गायेगा
हम जीतेंगे हर जंग ये धरती अपनी होगी
है लाल लहू का रंग ये धरती अपनी होगी.

(खटीमा कांड के शहीदों को समर्पित....पाणिनी आनन्द की कविता...दोस्त रोहित जोशी की वाळ से साभार उधार)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Santosh Joshi आज अपना ही गाँव क्यों.
बैगाना नजर आता है.
हरियाली हुआ करती थी कभी यहाँ.
आज बंजर नजर आता है.
किल्कारियाँ गुजती थी इस आगन में.
आज सब विरान नजर आता है.
आज अपना ही गाँव क्यों---------------

कहाँ गई वो अम्मा.
जो कोने में बैठा करती थी.
बच्चों की सैतानी में.
उनको डांठा करती थी.

कहाँ गई वो दराती.
जो कभी घास काटा करती थी
कहाँ गया वो चूला.
जहाँ कभी आग चला करती थी.

कहाँ गई वो बगिया.
जो कभी गुलजार हुआ करती थी.
कहाँ गया वो खूटा.
जहाँ कभी गाय बंधा करती थी.

कहाँ गई वो रात.
दादी कहानी सुनाया करती थी.
परियों की नगरी में.
हमें ले जाया करती थी.

अपने ही गाँव में.
रोना मुझे आता है.
आज अपना गाँव क्यों बैगाना नजर आता है........सन्तोष जोशी.
Like ·  · August 30 at 10:24am

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Vivek Joshi बेरोजगारी के दिनों में लिखी मेरी कविता ...

मैं एक अच्छा धावक हूँ , जानता हूँ
इस बार भी रेस में हूँ , कई के साथ ,
लेकिन ये क्या ?  वे तो  दौड़ पड़े , बगैर रेफरी की सीटी हुए ,
मैं निश्चल खड़ा  रेफरी की तरफ निहारता , सीटी का इंतजार करता,
अरे ! वे आधी दौड़ पार भी कर चुके हैं ,
सोचता हूँ अगर अभी भी दौड़ा , तो पार कर लूँगा उन्हें ,जीत लूँगा ये रेस
लेकिन मेरे पांव में पड़ी हैं बेड़ियाँ ,
ईमानदारी की , सच्चाई की और संस्कारों की .....
                           विवेक .....
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