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Would You Return To UK - विस्थापित पहाड़ी क्या उत्तराखंड वापस लौटना चाहिगे?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 07, 2008, 12:48:36 PM

विस्थापित पहाड़ी क्या उत्तराखंड वापस लौटना चाहिगे ? Wud U like to Return UK ?

Yes
52 (91.2%)
No
3 (5.3%)
never
2 (3.5%)

Total Members Voted: 57

Voting closes: February 07, 2106, 11:58:15 AM

Mahi Mehta

I think many people would like to return back to pahaad provided Govt does development there. At present i don't see any body would like to return under such Circumstances.

Devbhoomi,Uttarakhand

Quote from: Raje Singh Karakoti on August 11, 2012, 07:36:53 AM
Quote from: Devbhoomi,Uttarakhand on August 11, 2012, 07:02:37 AM
हाहाहा हर कोई यही कहता है कि हर  किसी को लौटना चाहिए लेकिन लौटता कोई नहीं है जितने भी यहाँ पर ये सब कहानियां लिख रहे है सबसे पहले हमें लौटना पड़ेगा,तभी हम दूसरों को कह सकता है ! के खुद तो हम अपनी जन्म भूमि छोड़ चुके हैं दूसरों को नसीहत दे रहे हैं कि वापस अपने देवभूमि उत्तराखंड लोट जाओ !

एक पुरानी कहावत के अनुसार " जिनके घर शीशे के होते हैं उन्हें दुसरो पर पत्थर नहीं मारने नहीं चाहिए"
आप खुद तो अपना देश छोड़ कर परदेश मैं पड़े हैं और ऊपर से दुसरो को नसीहत दे रहे हैं
अरे दो वक़्त की रोटी तो यहाँ पर भी है फिर क्या रखा है परदेश मैं ??




राजे सिंह जी बहुत खूब परदेश मैं रहने के लिए उस लायक होना भी चाहिए जहाँ तक मेरी बात है मैं आज भी उसी गाँव  में रहता हो  जान आज भी बिजली और सड़क नहीं है और में वहीं रहूँगा लेकिन वो कहावत आपको भी लागु होती है,एक और पुरानी कहावत है जिनके मुहं काले होते  हैं वो दूसरों को मुहं धोने की नसीहत नहीं देते है

जय हिंद जय उत्तराखंड

Devbhoomi,Uttarakhand

Quote from: Raje Singh Karakoti on August 11, 2012, 07:36:53 AM
Quote from: Devbhoomi,Uttarakhand on August 11, 2012, 07:02:37 AM
हाहाहा हर कोई यही कहता है कि हर  किसी को लौटना चाहिए लेकिन लौटता कोई नहीं है जितने भी यहाँ पर ये सब कहानियां लिख रहे है सबसे पहले हमें लौटना पड़ेगा,तभी हम दूसरों को कह सकता है ! के खुद तो हम अपनी जन्म भूमि छोड़ चुके हैं दूसरों को नसीहत दे रहे हैं कि वापस अपने देवभूमि उत्तराखंड लोट जाओ !

एक पुरानी कहावत के अनुसार " जिनके घर शीशे के होते हैं उन्हें दुसरो पर पत्थर नहीं मारने नहीं चाहिए"
आप खुद तो अपना देश छोड़ कर परदेश मैं पड़े हैं और ऊपर से दुसरो को नसीहत दे रहे हैं
अरे दो वक़्त की रोटी तो यहाँ पर भी है फिर क्या रखा है परदेश मैं ??




राजे सिंह जी जहां ताल दो रोटी का सवाल है,वो दो रोटी तो आपको उत्तराखंड में कहीं भी मिल जाएगी तो दिल्ली में क्या रखा है ! परदेश में लोग नौकरी करने जाते हैं न की अपनी देवभूमि को छोड़कर चले जाते हैं जैसे की आप की तरह ,जो कहवत अपने सुने वो आप पर ही लागू होती हैं ,उन लोगों पर लागू होती है!

जो हमेशा के लिए उत्तराखंड को छोड़कर चले गए हैं,ना की उन पर जो देश-परदेश में नौकरी करते हैं ,हम तो देश - परदेश नौकरी करते हैं,लेकिन रहते  हम उसी देवभूमि उत्तराखंड में  हैं जहां हमने जन्म लिया है !

कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो की उत्तराखंड को छोड़कर भारत के दुसरे राज्यों में बसे हुए हैं, दो वक्त की रोटी तो उनक उत्तराखंड में भी मिल जायगी तो क्या रखा है भारत के दुसरे राज्य में, राजे सिंह जी अपने ये कहावत भी सुनी होगी कि-
"जो घास-फूस कि झोपड़ी में रहते हैं वो दूसरों के घरो के सामने सिगरेट नहीं पिया करते हैं" !

जय हिंद जय उत्तराखंड

Devbhoomi,Uttarakhand

दोस्तों नौकरी हम चाहे कहीं भी करें लेकिन हमें अपना उत्तराखंड नहीं छोड़ना चाहिए जहाँ तक मेरी बात है मेरा पूरा परिवार उत्तराखंड में ही रहता है और उसी गाँव में रहते हैं जहां मेरा पुस्तैनी गाँव हैं और में वहीं रहूँगा चाहे नौकरी कहीं भी करूँ !

लेकिन यहाँ पर लोगों को टोपिक के हिसाब से लिखना चाहिए,किसी भी अस्राह्नीय टिपण्णी करना उचित नहीं है ! हम कहीं भी रहें लेकिन हमें उत्तराखंड को नहीं छोड़ना चाहिए! चाहे हम देश -में हो या परदेश हों ! दो वक्त की रोटी तो कहीं भी मिल जाती है !

Thul Nantin


जिन लोगों को पहाड़ से बाहर रहते हुए ७-८ साल से ज्यादा हो चुका है , उनका वापस लौटना बहुत बहुत मुश्किल है |
१) पहाड़ी समाज बहुत बदल चुका है मोबाइल व केबल टीवी आने के बाद. पहले लोग सीधे व सच्चे हुआ करते थे अब बाहरी लोगो के  ज्यादा आने के बाद अधिकतर लोग बदल चुके हैं. पैसे का बोलबाला अन्य शहरों की तरह पहाड़ में भी हो चुका है..
२) राजनीति छोटे छोटे गावों , मुहल्लों में घुस चुकी है.
३) शहरों की अधिकतर बुरी बुरी आदतें import कर ली गयी हैं .
And these two things when inflict immature and simple people, cause much more damage.
Apart from this
कभी मौका लगे तो ३-४ महीने की छुट्टी ले के पहाड़ पर रहिये.तब पता चलेगा कितना सामाजिक पतन हो चुका है | हफ्ते २ दिन के लिए पहाड़ जा कर जयादातर चीज़ें दिखाई नहीं देती. developement issue is secondary, अगर कोई  undeveloped से समझौता कर भी ले तो it will take real guts to go back.

Feeling really sad.
कोई लौटा दे मेरा वो पुराना undeveloped पहाड़ |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Thank u you daju detailed views.

I think on more reason now people would not like to return pahad i.e. increasing cloud burst cases.

Quote from: Thul Nantin on September 16, 2012, 04:01:02 PM

जिन लोगों को पहाड़ से बाहर रहते हुए ७-८ साल से ज्यादा हो चुका है , उनका वापस लौटना बहुत बहुत मुश्किल है |
१) पहाड़ी समाज बहुत बदल चुका है मोबाइल व केबल टीवी आने के बाद. पहले लोग सीधे व सच्चे हुआ करते थे अब बाहरी लोगो के  ज्यादा आने के बाद अधिकतर लोग बदल चुके हैं. पैसे का बोलबाला अन्य शहरों की तरह पहाड़ में भी हो चुका है..
२) राजनीति छोटे छोटे गावों , मुहल्लों में घुस चुकी है.
३) शहरों की अधिकतर बुरी बुरी आदतें import कर ली गयी हैं .
And these two things when inflict immature and simple people, cause much more damage.
Apart from this
कभी मौका लगे तो ३-४ महीने की छुट्टी ले के पहाड़ पर रहिये.तब पता चलेगा कितना सामाजिक पतन हो चुका है | हफ्ते २ दिन के लिए पहाड़ जा कर जयादातर चीज़ें दिखाई नहीं देती. developement issue is secondary, अगर कोई  undeveloped से समझौता कर भी ले तो it will take real guts to go back.

Feeling really sad.
कोई लौटा दे मेरा वो पुराना undeveloped पहाड़ |

Thul Nantin

Thank you Mehtaji.
As you'd be knowing I am a new member to this forum. when I came across it, it was a delight to find a forum of Uttarakhandis. I read many threads here and was a good experience.
But what I feel now is that the enthusiasm of most of the members is waning. It is only you, because of who this forum is still alive and thats commendable. I may be wrong but it was my observation. लगता है सब भाई अब बिजी  हो गए हैं. :)

अन्नू रावत (9871264699)

                                             उत्तराखंड ही मेरे लिए सर्वश्रेष्ट है

                                                      " पहाड़ी भाइयों तैं चार पंक्ति"

                                                  मैंने जन्म लिया , पर्वतो की बीच घाटी में,
                                                       और आ गया तब मैदान की तलहटी में,
                                                          पड़ा लिखा नौकरी करने लगा,
                                                       रोटी मिलने लगी, घर भूलने लगा,
                                                          मैं ही क्या, सब भूल जाते हैं,
                                        तब जबकि वह सितारों की दुनिया में बसने लगते हैं,
                                मैं भूल गया उस जन्मस्थली को, दुग्धपान कराने वाली जननी को,
                                                      भावाभिव्यक्ति से क्या मैं, लौट रहा हूँ,
                                            या अनायास ही अपनी खामियों को व्यक्त कर रहा हूँ,
                                                          कुछ भी हो यह मेरा वर्चस्व है,
                                                 मुझे मालूम है की जन्मस्थली ही सर्वस्व है.

MANOJ BANGARI RAWAT


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड के इस गांव में कोई लड़की नहीं बनती दुल्‍हन - पिथौरागढ़ नामिक

बेटी बचाओ के नारे और विज्ञापन आम हैं। लेकिन पिथौरागढ़ के नामिक जैसे दुर्गम गांवों में न तो ऐसे नारे पहुंचते हैं न वहां से बेटियां बाहर निकल पाती हैं।

माता-पिता अब बेटी नहीं चाहते
वर्तमान में नामिक गांव के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि वहां के लोगों को बेटी ब्याहने को दूल्हा खोजना मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि न चाहते हुए भी माता-पिता अब बेटी नहीं चाहते।

तिब्बत के नजदीक और अपने जिला मुख्यालय से दूर पिथौरागढ़ का नामिक गांव मुसीबतों का दूसरा नाम है। यहां रहने वाले 118 परिवार गांव इसलिए नहीं छोड़ सकते क्योंकि पुरखों ने तिनका-तिनका जोड़ इसे बनाया था।

इसके अलावा माली हालत भी गांव छोड़ने की इजाजत नहीं देती। पूर्व प्रधान भगत राम बताते है कि अब हालात बदल रहे हैं, क्योंकि मुसीबत जवान बेटियों पर आने लगी है। गांव में 100 में से करीब 40 लड़कियां ऐसी हैं, जिनकी उम्र शादी की हो चुकी है।

डोली केवल इसलिए नहीं सज पा रही, क्योंकि गांव सड़क से 27 किमी दूर है। माता-पिता लाख कोशिशों के बावजूद ठीकठाक दामाद नहीं खोज पा रहे। दूसरी दिक्कत बेटियों की कम पढ़ाई-लिखाई है।

योजनाओं का भी कोई वास्ता नहीं
गांव के अध्यापक भगवान सिंह जमियाल बताते हैं कि हाईस्कूल के बाद लड़कियां पढ़ नहीं पाती। 100 में से केवल चार लड़कियां हैं जो गांव से बाहर पढ़ाई कर रही हैं।


यही वह लड़कियां भी हैं जो हाईस्कूल से आगे पढ़ पाई, इसमें रामसिंह और लाल सिंह की बेटी मंजू और दीपा प्राइवेट बीए कर रही हैं, जबकि लक्ष्मण सिंह और प्रवीण सिंह की बेटी पूनम और देवकी इंटर की पढ़ाई कर रही हैं।

ऐसे में अब गांव छोड़ने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि इस गांव तक सरकार की ओर से चलाई जा रही बेटी बचाने की तमाम योजनाओं का भी कोई वास्ता नहीं है।