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How To Stop Migration From Uttarakhand? - उत्तराखंड से विस्थापन कैसे रोके?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 10, 2007, 08:56:26 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I think.. now tough to stop migration.


पलायन का मन बना रहे ग्रामीण
Nov 09, 10:35 pm
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जाका, डीडीहाट : डीडीहाट क्षेत्र के अधिकांश गांवों में इन दिनों जंगली सुअरों और बंदरों का आतंक छाया हुआ है। ग्रामीणों का दिन बंदरों को भगाने तथा रात सुअरों को खदड़ने में बीत रही है। खेतों में फसलों और पेड़ों में फलों से हाथ धो रहे परेशान ग्रामीण गांव छोड़ने का मन बना रहे हैं।

डीडीहाट तहसील के हाट, थर्प, चौबाटी, भालूउडियार, गर्खा, सिंगाली, अस्कोट, तल्लाबगड़, कूटा जमतड़ी मुनस्यारी के तल्ला जोहार के भैंस्कोट, बांसबगड़ क दर्जनों गांवों में बंदरों और सुअरों का आतंक बना हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार दिन भर बंदरों की फौज गांवों में डेरा डाले हुए रहती है। बंदर घरों के अंदर घुस कर सामान ले जा रहे हैं। इस मौसम में इस क्षेत्र में संतरा, माल्टा, नींबू आदि तैयार फल बंदरों द्वारा उजाड़ दिये गये हैं।

बाराकोट गांव निवासी उन्नत काश्तकार दिनेश जोशी ने बताया कि बंदरों के आतंक के चलते कच्चे संतरे और माल्टा पेड़ों से तोड़ने पड़े हैं। इसके अलावा बीते दिनों खेतों में तैयार सोयाबीन बंदरों ने नष्ट कर दी थी। ऐसी हालत में क्षेत्र में कृषि और बागवानी को अलाभकारी बताते हुए इससे तौबा करने का निर्णय लिया है।

वहीं रात को सुअरों का आतंक रहता है। सुअरों द्वारा खेतों में तैयार अरबी साफ कर दी गई है। झुंडों में आने वाले सुअर रात को ही खेतों का हुलिया बिगाड़ रहे हैं। काश्तकारों द्वारा इसकी शिकायत प्रशासन और वन विभाग से किये जाने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाये जाने से ग्रामीण गांव छोड़ने का मन बना चुके हैं।

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विभागीय नियमावली में उलझे ग्रामीण

जंगली सूअर से निजात दिलाने की संबंध में वन विभाग का कहना है कि सुअरों से निजात पाने के लिये नाप खेतों में नुकसान करने वाले सुअरों को मारने के आदेश हैं, जिसके लिये ग्राम प्रधान द्वारा प्रमाणित आवेदन वन विभाग को सौंपा जायेगा। ग्रामीणों द्वारा तय शिकारी को विभाग अनुमति देगा। साथ ही शर्त भी रखी गई है कि सुअर नाप खेत में ही मारा जाना चाहिए। व्यावहारिक रुप से यह संभव नहीं है। जिस कारण उक्त आदेश जारी होने के बाद आज तक एक भी सुअर नहीं मारा जा सका है।

Dainik Jagran.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यूं ही नहीं हो रहा पहाड़ से पलायन
Story Update : Monday, December 12, 2011     1:37 AM
     

[/t][/t] देहरादून। पहाड़ के उजड़ते गांव से हर पहाड़वासी और नेता चिंतित हैं। लेकिन पहाड़ से पलायन के लिए सरकारी नीतियाें के अलावा प्रदेश के नेता विधायक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। कारण कि नेता-विधायक पहाड़ से पलायन कर मैदान में अपना ठिकाना बना रहे हैं। रविवार को आयोजित गोष्ठी में पहाड़ से हो रहे पलायन पर विस्तार से चरचा की गई। गोष्ठी में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने इससे इत्तेफाक रखा। साथ ही इस स्थिति को बदलने के लिए सभी दलों को मिलकर काम करने की आवश्यकता जताई।
विश्व पहाड़ दिवस पर केडीएमआईपीई मिनी सभागार में 'पहाड़ के उजड़ते गांवों का सवाल, विकास की चुनौतियां तथा संभावनाओं पर उत्तराखंड के मुख्य राजनीतिक दलों का दृष्टिकोण' विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। उत्तराखंड रक्षा मोर्चा के अध्यक्ष टीपीएस रावत ने कहा कि भ्रष्टाचार चरम पर हैं। प्रदेश में 70-80 प्रतिशत तक कमीशनखोरी हो गई है। एक दिन में 12 शिलान्यास तो हो जाता है लेकिन ग्राउंड वर्क के नाम पर कुछ नहीं होता। विधायक ओमगोपाल रावत ने कहा कि पहाड़वासी योजनाओं का लाभ सही ढंग से नहीं उठाते। जिसकी वजह से पहाड़ से पलायन बढ़ रहा है और पहाड़ की स्थिति नहीं बदल पा रही है। उत्तराखंड जनवादी पार्टी अध्यक्ष मुन्ना सिंह चौहान ने उत्तराखंड की ताकत जंगल, जमीन, पर्यावरण, जल संसाधन को केंद्रित कर नीतियां बनाने की आवश्यकता जताई। पर्वतीय क्षेत्रों के हर उत्पाद के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस लागू कर बहुत हद तक तस्वीर बदली जा सकती है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर भंडारी ने कहा कि प्रदेश की भौगोलिक विशिष्टताओं एवं स्थानीय जरूरतों के अनुसार नीति बनाई जानी चाहिए। उत्तराखंड कांग्रेस कमेटी प्रवक्ता सुरेंद्र आर्य ने कहा कि राज्य बनने के बाद प्रदेश की स्थिति बहुत बदली है। लेकिन नीतियों को सही ढंग से लागू कर और बेहतर स्थिति की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। सलाहकार खादी एवं ग्रामोद्योग प्रेम बड़ाकोटी ने कहा कि प्रदेश की स्थिति को और बेहतर करने के लिए सभी राजनीतिक दलों को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। इस मौके पर उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी अध्यक्ष पीसी तिवारी, एचएम व्यास, प्रो एमसी सती, डॉ. रचना नौटियाल समेत अन्य उपस्थित थे।
(Source - Amar Ujala)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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घुघूती बासुती
ये फिर नयी तस्वीर है ...वही हल चलाने को मजबूर महिला

       
       
  • Kailash Chandra, Uttam Singh Rana, Shailu Dhyani and 7 others like this.

    •       
    • Shailu Dhyani किसी ने सच ही कहा है की  "" की पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी पहाड़ के काम नहीं आता ""........जहा पुरुष को हल लगाना चाहिए था वहा पुरुष रोजगार की तलाश में घर से बाहर निकल गया है. और मज़बूरी वश उसका काम एक स्त्री को करना पड़ रहा है, ये है हमारी पहाड़ की मा, बेटी, ब्वारी इनके जज्बे को सलाम ........धन्य है पहाड़ की नारी ..........about an hour ago · Like · 7
    • Tribhuwan Rana Swami Ombharti I think i had been saw same girl poughing fields.where it's!about an hour ago via mobile · Like
    • Hem Joshi pahad ki cheli le,, kabhe ni khayo du rota sukhale..............................48 minutes ago · Like
    • Jaydev Gaur He pahad ki nari bipta tyuk bhari34 minutes ago via mobile · Like

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तमाम मूल मुद्दे लापता हो गये ?
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kochiyar library kochiyarlibrary@gmail.com
Mar 16 (4 days ago)
to sudrawat, bhupendrakunwar, vikash.bisht143, rawatdiscovery, satendra.rawat., dhad1987, dhad.uttarakha., royalgarhwal, sbdeepak54, rajpalrawat.555, ranjeet.rawat20, pankaj_dhyani1., pkumar_3208, tprasad89, harish_patwal2., me, ms.mahi007, pyarauttrakhan., hijoshi77, pallavi.dhyani, rpdhasmana, laxmidass47, madhwalmk, rrawatbrijraj, bishtmsb
तमाम मूल मुद्दे लापता हो गये ?

सदस्य[/color], [/color]म्यर उत्तराखंड[/color], [/color]धुमाकोट/नैनीडांडा[/color] [/color] तथा इंटरनेट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रुप


उत्तराखंड के चुनाव हो गए हैं.  नतीजे भी आ गए हैं. कांग्रेस की सरकार बन रही है.  नए मुख्य मंत्री ने शपथ भी ले ली है.  पर तनाव का वातावरण अभी बना हुआ है.  दबाव पर दबाव आते जा रहे हैं.  केन्द्र और देश बजट पर बहस कर रहा है.  अमर उजाला खबर देता है.
[/color]दुनिया में उच्च विकास दर के साथ चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के बावजूद अभी भी भारत की गिनती निर्धनतम देशों में की जा रही है। यह स्थिति तब है जब चीन के बाद भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर दुनिया में सबसे अधिक है। लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में जी20 देशों में भारत निचले पायदान पर बना हुआ है। 

एक तरफ बजट का दबाव है तो दूसरी तरफ राजनीति का.  अमर उजाला उत्तराखंड की स्थिति के बारे में खबर देता है.
[/color]इधर[/color], कांग्रेस हाईकमान से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद रावत समर्थक[/font][/color]विधायक अज्ञात स्थान को चले गए हैं। अब वे रावत पर कांग्रेस से अलग रास्ते[/color]पर चलने का दबाव बनाने में जुटे हैं। सूत्रों के मुताबिक रावत समर्थकों ने[/color]अलग पार्टी का नाम [/color]'उत्तराखंड कांग्रेस[/font][/color]' सुझाया है। देशभर में जिस तरह से[/font][/color]क्षेत्रीय दल लगातार विस्तार कर रहे हैं उसी से रावत समर्थक भी अलग पार्टी[/color]बनाने की सोचने लगे हैं।[/color]     
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वीर अर्जुन ने राजनैतिक मुद्दे न उठा कर समाचार दिया है कि उत्तराखंड सरकार मुख्यालयों में लोकल नेटवर्क को उपग्रेड करेगी.  इस का अर्थ यह होगा कि वह एक तरह से प्लानिंग की तरफ ध्यान देगी.  मुख्य मंत्री ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग विभाग खोलने की घोषणा की.  दैनिक जागरण से की गयी भेंट में मुख्य मंत्री ने कहा कि उन्होंने अपने पिताजी से  बस एक बात सीखी है कि दबाव में कोई भी काम मत करो और सोच अच्छी रखो तो सब काम अच्छे होते हैं।  केंद्र व राज्य, दोनों जगह कांग्रेस सरकार है, अब उम्मीद करें कि कई उलझे मामलों का समाधान हो सकेगा। केंद्र हमें हमारा हक देता है। बस यह हमारा विवेक है कि हम कैसे केंद्र की योजनाओं और केंद्र की मदद का लाभ उठा सकते हैं। कांग्रेस उत्तराखंड में सत्ता में आई है तो औद्योगिक घरानों में फिर विश्वास जगेगा।

मेल
Date: Thu, Mar 15, 2012 at 8:53 AM[/font]  [/color]पलायन तो रिलीफ वर्क है स्थाई हल नहीं ने कोशिश की थी कि सरकार प्रवासी उत्तराखंडियों को अपने प्रमुख रिसोर्स के रूप में ले. इस सिलसिले में इसी लिए उक्त मेल ने न्यूयार्क के मातबर सिंह नेगी की टिप्पणी को चर्चा में लाने की कोशिश की. पर जो कुछ उन्हें करना है वह तो वही लोग करेंगे जो विदेशों में रह रहे हैं. पर लगता है कि है कि उनका केन्द्र बिंदु भी राजनीतिक है.  खेल से ज्यादा खिलाडी पर ध्यान है.  आज कल ग्लोबल सन्दर्भ में प्रवासियों पर चर्चा की जा रही है.  पुस्तकें छप रही हैं उदाहरण के लिए हम एक पुस्तक की समीक्षा का नीचे दिए गए अंश का अवलोकन कर सकते हैं:
[/color]The extraordinary success of The Age of Migration lies in its presentation of the first comprehensive analysis of international migration as a global process. Successive editions have provided overall accounts of migration patterns across time and space, and have examined ways that migration is shaped by, and in turn affects, the structure of the international system. [/color]

पुस्तकहैThe Age of Migration, Third Edition: International Population Movements in the Modern World जिसकेलेखकहैंStephen Castles  और  Mark J. Miller. The Guilford Press द्वारा  इसकाचौथासस्करण  २००९मेंप्रकाशितकियागयाथा. कोचियार लाइब्रेरी की मेलों में गोपियो को महत्व दिया गया है.  यह प्रवासी भारतीयों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन है और उसी के अनुरोध पर भारत सरकार प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन करती है.   

इस मेल का समापन करने कि लिए [/color]इस राज्य बनने का मतलब ही क्या रहा[/color]?  [/font]नामक शीर्षक से  छपे नैनीताल समाचार के संपादकीय से नीचे दी गयी टिप्पणी उद्धृत की जा रही है जिसे   [/color]राजीव लोचन साह   ने  [/color]अंक: [/color]07 || 15 नवंबर से [/font][/color]30 नवंबर [/font][/color]2011 के लिए लिखा था
[/color] [/color]फिलहाल सभी राजनैतिक दलों की गतिविधियाँ आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान[/color]में रख कर ही चल रही हैं। जाहिर है कि सत्तारूढ़ दल लोक लुभावन घोषणायें कर[/color]वोटरों को मोहने की कोशिश कर रहा है और विपक्षी दल सत्ताधारियों को असफल[/color]साबित करने की। खंडूरी सरकार ने लोकायुक्त विधेयक पारित कर फिलहाल एक पहल[/color]तो ली है[/color], लेकिन उससे भाजपा द्वारा अब तक किये गये सारे पाप धुल जायेंगे[/font][/color], इसकी कोई गारंटी नहीं। चिन्ताजनक यह है कि इस चुनावी शोरगुल में उत्तराखंड[/font][/color]के तमाम मूल मुद्दे लापता हो गये हैं। गैरसैंण राजधानी की बात तो अब बढ़[/color]चढ़ कर डींगे हाँकने वाला मीडिया भी नहीं उठाता। न ही दूरस्थ गाँवों में[/color]जानवरों द्वारा उजाड़ दी जा रही कृषि[/color], चौपट हो रही स्वास्थ्य और शिक्षा[/font][/color]व्यवस्था तथा परिणामस्वरूप वहाँ से तेजी से हो रहे पलायन के बारे में कोई[/color]आवाज उठ रही है। पहाड़ अपने वर्तमान रूप में भी बचा न रह सका तो इस राज्य[/color]बनने का मतलब ही क्या रहा [/color]?
.राम प्रसाद

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




Bipin Chandra Joshi16 hours ago On your profile ·
यह पहाड़ की वास्तविकता है | पहाड़ से नौजवान पुरुष रोजी -रोटी की तलाश में पलायन कर चुके हैं |घरों में रह गए है सिर्फ बुजुर्ग . बच्चे और महिलाएं | इस स्थिति में हल जोतना महिलाओं की मज़बूरी बन गई है | कही कही पर तो हमारी माँ बहने खुद भी बैल बनने को तैयार है  यह वही पहाड़ है ,जहाँ एक ज़माने में महिलाएं हल लगाना तो दूर , हल के हत्थे पर भी हाथ नहीं लगाती थीं |अहा ! क्या बात है ? | " अभी दो , आज दो , उत्तराखंड राज्य दो " कहने वाले लोग कहाँ होगें आज ?| —

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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उत्तराखंड में  बेरोजगारों की संख्या साढे छह लाख से भी अधिक

देहरादून।। उत्तराखंड में बेरोजगारों की संख्या साढे छह लाख से भी अधिक है। राज्य विधानसभा में शुक्रवार को चंदन रामदास के एक सवाल के जवाब में रोजगार मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल ने बताया कि राज्य के विभिन्न जिलों के रोजगार कार्यालयों से प्राप्त सूचना के आधार पर बेरोजगारों की संख्या छह लाख 66 हजार 677 है, जिसमें से छह लाख 15 हजार 632 शिक्षित हैं।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष मार्च महीने तक विभिन्न रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत किए गए बेरोजगारों की संख्या के आधार पर राज्य में कुल 69 हजार 588 विभिन्न व्यवसायिक कोर्स मैं प्रशिक्षित हैं।
http://navbharattimes.indiatimes.com

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे
श्री लखेड़ा जी ! आपकी चिंता वाजिब है | आज पहाड़ के गावों की स्थिति सोचनीय है | पलायन के चलते ज्यादातर गाँव युवा विहीन होते जा रहे हैं |पलायन के कारण ज्यादातर गाँव बंजर होने की स्थिति में पहुँच गए हैं | अधिकांश गावों में अब सिर्फ बुजुर्ग , बच्चे और महिलाऐं ही रह गई हैं |यह सिलसिला दिन प्रति दिन तेज हो रहा है |यह स्थिति निश्चित ही दुःख दायी है |
करीब पांच दशकों के लम्बे जनांदोलन और ४५ लोगों की शहादत के बाद ९ नवम्बर २००० को अलग उत्तराखंड राज्य तो बन गया |लेकिन यहाँ के नेताओं की सत्ता लोलुप सियासत ने अलग राज्य गठन के औचित्य पर ही प्रश्नचिंह लगा दिया है |पहाड़ के लोगों ने अगल उत्तराखंड राज्य इसलिए मागा था कि उत्तर प्रदेश में जो नियम - कायदे और कानून बनते हैं या विकास योजनाएं बनाई जाती हैं , उनके केंद्र में पहाड़ नहीं , मैदान होता है | चूँकि पहाड़ और मैदानी इलाके की भौगोलिक हालत जुदा हैं |मैदान को केंद्र में रख कर बनाई गई योजनाएं पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं | लिहाजा अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोग पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप नियम - कानून और योजनायें बनाकर पहाड़ का विकास कर सकें | लेकिन इस अलग राज्य के बनने के साढ़े ग्यारह सालों के बाद यहाँ उत्तर प्रदेश की जगह उत्तराखंड हो जाने के अलावा और कुछ भी नहीं बदला |
अब तक इस राज्य की स्थाई राजधानी का मुद्दा ठंडे बस्ते में है |उत्तर प्रदेश के साथ परिसम्पतियों के बटवारे के मामले नहीं निपटे हैं |राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की दिशा और दशा में कोई बदलाव नहीं आया है |नए राज्य में मूलभूत बुनियादी सुविधाएँ बढ़ने के बजाय घट गई हैं |बेरोजगारी और पलायन बढ़ा है |जल ,जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों में पहाड़ के लोगों की हिस्सेदारी घटी है |पहाड़ में कृषि भूमि की बिक्री का सिलसिला तेज हुआ है |हाँ , नये राज्य में नेताओं और अफसरों की फौज जरुर बढ़ गई है |मानो यह राज्य बना ही नेता और अफसरों के लिए है |राज्य बनने से पहले यहाँ २२ विधायक थे | अब ७०+१ =७१ हो गए हैं |तब एक -दो मंत्री या उप मंत्री बनते थे | अब मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्री मंडल है |भा.ज.पा. के राज में दायित्वधारी और कांग्रेस के राज में सैकड़ों दर्जा मंत्री जमकर सत्ता का लुत्फ़ उठा रहे हैं | छोटे बाबू बड़े सहाब बन गए है | अलग राज्य के मुद्दे दफन हो गए हैं | सबका एक ही लक्ष्य है -सत्ता की मलाई और पैसा |यह राज्य भा,ज.पा.और कांग्रेस के लिए सियासी प्रयोगशाला और उनके नेताओं के लिए खुला चारागाह बन कर रह गया है |
अस्सी फीसदी पहाडी इलाके के विकास के निमित्त मांगे गए इस राज्य की सियासत के केंद्र में न पहाड़ हैं और न यहाँ रहने वाले लोग |यह राज्य मुख्यमंत्री की कुर्सी के जंग का मैदान बन कर रह गया है |नेताओं और अफसरों की जुगलबंदी जमकर लुत्फ़ उठा रही है |अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ के भीतर जमीनों के बिकने की प्रक्रिया और तेज हो गई | जमीनों के दलाल रातों - रात मालामाल होते चले गए और हो रहे हैं |इस राज्य में आज लोकतंत्र के सभी स्तंभों में इन जमीन दलालों की सबसे मजबूत पैंठ है | इन्हें सियासी दलों के बड़े नेताओं का संरक्षण हासिल है | जमीन लाबी पूरे राज्य की सियासत को संचालित कर रही है | जमीनों के बिकने का सिलसिला दिन प्रति दिन तेज होता जा रहा है | नतीजन आज पहाड़ का समूचा सामाजिक , सांस्कृतिक वातावरण विकृत हो गया है |पहाड़ और यहाँ के निवासियों की अस्मिता खतरे में है | पहाड़ में सभी प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं | प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट हो रही है |पहाड़ के स्थापत्य और कलात्मक एतिहासिक वस्तुवों और वन्य उपज की जमकर तस्करी हो रही है | लेकिन सवाल यह है कि ऐसे हालातों का जनक कौन लोग हैं |जाहिर है -पहाड़ के सियासी हालत इस सबके लिए जिम्मेदार हैं |सियासत नहीं चाहती कि पहाड़ में ऐसे हालत बनें कि यहाँ के लोगों को पलायन के लिए मजबूर नहीं होना पड़े |पहाड़ में बेहतर जीवन यापन की क्षीण होती सम्भावनाओं के मद्देनजर लोग अलाभकारी कृषि भूमि को बेचने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं |जमीन के दलालों की बन आई है |साथ में उनके आका नेता और अफसरों की भी |

पहाड़ की दुर्दशा को लेकर कई दशकों से दुबले हुए जा रहे हैं कतिपय प्रगतिशील विचारधारा के झंडावरदारों की जुवान इन मुद्दों पर खामोश है ?| जल , जंगल और जमीन के बहाने अपनी सियासी रोटियां सकने वालों से पूछा जाना चाहिए कि आज पहाड़ की इन तीनों प्राकृतिक संसाधनों की असली हालत क्या है ?| इसके वावजूद --"-तदुक नि लगा उदेख , घुनन मुनई नि टेक ,जेंता एक दिन तो आलो , उ दिन य दुनी में


Rajen

पहाडो से पलायन रोकने के लिए सरकार को जरूरी कदम जल्द से जल्द उठाने ही होंगे.