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Stone Pelting: Devidhura Fair - देवीधूरा की बग्वाल: आधुनिक युग में पाषाण युद्ध

Started by हेम पन्त, August 13, 2008, 11:58:56 AM

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Entrance gate of Maa Devi temple, a natural stone gate, inside so many caves, where devotees are offering their prayers to Maa Devi, Devi Dhura, Uttrakhand
by BHUPENDRA SINGH 




Devbhoomi,Uttarakhand

           देवीधूरा में आज होगा पत्थर युद्ध बग्वाल

देवीधुरा में रक्षाबंधन के दिन गुरुवार को पत्थर युद्ध बग्वाल का अद्भुत नजारा देखने को मिलेगा। वैज्ञानिक युग में पाषाण युद्ध को देखने के लिए एक दिन पहले से ही भीड़ उमड़नी शुरू हो गई। डेढ़ लाख से भी अधिक श्रद्धालुओं व मेलार्थियों के पहुंचने का अनुमान है।

प्रशासन ने एक दिन पूर्व मेले की आयोजक संस्था जिला पंचायत व मंदिर कमेटी के साथ विभिन्न व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया। इधर मंदिर परिसर का खोलीखाड़ दुबचौड़ मैदान पत्थर युद्ध के लिए पूरी तरह सजा दिया गया है।

बग्वाल में शामिल होने वाले चार खाम, सात थोकों के रणबांकुरों ने मां बाराही धाम में अपने मुखिया के नेतृत्व में विशेष पूजा अर्चना की। उन्होंने पत्थरों से बचाव के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाले छत्रों को सुसज्जित किया।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले यहां के लोग बग्वाल में शामिल होने के लिए घर पहुंच गए हैं। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन बग्वाल युद्ध नरबलि के विकल्प के लिए खेला जाता है। मां बाराही की प्रसन्नता के लिए क्षेत्रवासी आज भी सदियों पुरानी परम्परा का निर्वहन कर रहे है।



Sabhar Dainik Jagran

Hisalu

200 years ago, Bagwal tradition was present in many other places apart from Devidhura..

Please read attached file


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता मां बाराही का तेज   
लोहाघाट। सृष्टि से पूर्व संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न थी। प्रजापति ने बराह बनकर उसका दोनों दांतों से उद्धार किया। भगवान विष्णु के अवतार बराह के शरीर से मां बाराही की उत्पत्ति हुई तथा इसी स्थान में मां ने अपने दिव्य और तेज स्वरूप को स्थापित किया। यही मां बाराही देवीधुरा में तीन विशाल शिलाखंडों के मध्य विराजमान हो गई। मां में वज्र के समान तेज था कि उन्हें खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता। उन्हें वज्र बाराही कहा जाने लगा। मां की इस मूर्ति को वर्षभर तांबे की पिटारी में रखा जाता है, जहां वर्ष में एक बार भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा के दिन पुरोहित और पुजारी आंखों में काली पट्टी बांधकर उन्हें बाहर निकालते हैं। दूध से स्नान कराकर नए परिधान और आभूषण पहनाकर मां वज्र बाराही अपने भक्त मुचकंद ऋषि को स्वयं दर्शन देने डोले के रूप में जाती हैं।
कुमाऊं के हृदय में बसे बाराहीधाम देवीधुरा में मां वज्र बाराही की अपनी अलौकिक एवं विशिष्ट मान्यताएं रही हैं। मां के दरबार में वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है। यहां आने पर भक्ति में शक्ति एवं ईश्वरीय सत्ता से साक्षात्कार होता है। चैत्रीय और अश्विन नवरातों में यहां भक्ति और शक्ति का संगम होता है। लोहाघाट से 45 किमी दूर पश्चिम दिशा में स्थित वज्र बाराही के मंदिर से पूर्व पूर्णागिरि एवं मां अखिलतारिणी के दर्शन करने के बाद यहां पहुंचने पर व्यक्ति की यात्रा पूरी होती है। स्कंद पुराण के मानस खंड सहित बराह पुराण, मत्स्य पुराण में मां वज्र बाराही का विशेष उल्लेख किया गया है। यहां गब्यूरी में शक्ति पीठ के रूप में विराजमान मां के दर्शन वही कर सकता है, जिसको मां का बुलावा होता है।

बराह रूपिणी देवी, दष्ट्रोघृत वसुन्धराम।
शुभदां नील बसनां, बाराही तां नमाम्यहम।

(Amar Ujala)

हेम पन्त