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उत्तराखण्ड के क्रांतिवीर-स्व० श्री विपिन चन्द्र त्रिपाठी/ Vipin Chandra Tripathi

Started by पंकज सिंह महर, August 14, 2008, 01:30:02 PM

पंकज सिंह महर

साथियो,

     स्व० श्री विपिन चन्द्र त्रिपाठी जी के नाम से हम सभी परिचित हैं, वे उत्तराखण्ड के क्रांतिवीर, समाजवादी चिन्तक और इस राज्य के कुशल शिल्पी थे। उनका राजनीतिक और सामाजिक इतिहास काफी संघर्षमयी था, अपने विचारों के प्रति वे घोर आग्रही थे। समाज के हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखते ही बनती थे, वे इन मामलों में बहुत हठी थे, उन्होंने इन सरोकारों के सामने तमाम राजनीतिक प्रलोभन भी ठुकराये थे।
     इस टोपिक के माध्यम से हम उन्हे श्रद्धांजलि देते हुये उनके जीवन से सभी को परिचित करायेंगे।



हेम पन्त

मेरी जानकारी के अनुसार विपिन त्रिपाठी जी 1975 में इमरजेंसी के समय सबसे अधिक समय तक (लगभग २२ महीने) जेल में रहने वाले व्यक्ति हैं. जेल से निकलने के बाद लगभग सभी नेताओं ने जनता पार्टी की सरकार बनने पर पद व कुर्सियां पाने के लिये भरसक कोशिशें की. लेकिन त्रिपाठी जी ने पद की चाह न रखते हुए अपने द्वाराहाट इलाके में मूलभूत सुविधाएं जुटाने के लिये सरकार पर दवाब बनाने के लिये संघर्ष का रास्ता चुना. उनके प्रयासों से ही द्वाराहाट में स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पालीटेक्निक व कुमाऊं इन्जिनीयरिंग कालेज की स्थापना हुई.

विपिन त्रिपाठी जी के जीवन पर श्री चारू तिवारी जी ने "विपिन त्रिपाठी और उनका समय" नाम से एक पुस्तक भी लिखी है.

पंकज सिंह महर



23 फरवरी, १९४५ को अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के दौला गांव में जन्मे विपिन त्रिपाठी जी आम जनता में "विपिन दा" के नाम से प्रसिद्ध थे। पृथक राज्य आन्दोलन के वे अकेले ऎसे विकास प्रमुख रहे हैं, जिनके द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को उत्तराखण्ड विरोधी नीतियों के खिलाफ दिये गये त्याग पत्र को शासन ने स्वीकार कर लिया था।
     २२ वर्ष की युवावस्था से विभिन्न आन्दोलनों की अगुवाई करने वाले जुझारु व संघर्षशील त्रिपाठी का जीवन लम्बे राजनैतिक संघर्ष का इतिहास रहा है। डा० लोहिया के विचारों से प्रेरित होकर १९६७ से ही ये समाजवादी आन्दोलनों में शामिल हो गये थे। भूमिहीनों को जमीन दिलाने की लड़ाई से लेकर पहाड़ को नशे व जंगलों को वन माफियाओं से बचाने के लिये ये हमेशा संघर्ष करते रहे। १९७०में तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त का घेराव करते हुये इनको पहली बार गिरफ्तार किया गया।
      आपातकाल में २४ जुलाई, १९७४ को प्रेस एक्ट की विभिन्न धाराओं में इनकी प्रेस व अखबार "द्रोणांचल प्रहरी" सील कर शासन ने इन्हें गिरफ्तार कर अल्मोड़ा जेल भेज दिया। अल्मोड़ा, बरेली, आगरा और लखनऊ जेल में दो वर्ष बिताने के बाद २२ अप्रेल, १९७६ को उन्हें रिहा कर दिया गया। द्वाराहाट में डिग्री कालेज, पालीटेक्निक कालेज और इंजीनियरिंग कालेज खुलवाने के लिये इन्होंने संघर्ष किया और इन्हें खुलवा कर माने। इन संस्थानों की स्थापना करवा कर उन्होंने साबित कर दिया कि जनता के सरोंकारों की रक्षा और जनता की सेवा करने के लिये किसी पद की आवश्यकता नहीं होती है।
    १९८३-८४ में शराब विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करते हुये पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मार्च १९८९ में वन अधिनियम का विरोध करते हुये विकास कार्य में बाधक पेड़ काटने के आरोप में भी गिरफ्तार होने पर इन्हें ४० दिन की जेल काटनी पड़ी। ईमानदारी और स्वच्छ छवि एवं स्पष्ट वक्ता के रुप में उनकी अलग पहचान बनी २० साल तक उक्रांद के शीर्ष पदों पर रहते हुये २००२ में वे पार्टी के अध्यक्ष बने और २००२ के विधान सभा चुनाव में वह द्वाराहाट विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुये। ३० अगस्त, २००४ को काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया।

पंकज सिंह महर

Quote from: H.Pant on August 14, 2008, 01:45:16 PM
मेरी जानकारी के अनुसार विपिन त्रिपाठी जी 1977 में इमरजेंसी के समय सबसे अधिक समय तक जेल में रहने वाले व्यक्ति हैं. जेल से निकलने के बाद लगभग सभी नेताओं ने जनता पार्टी की सरकार बनने पर पद व कुर्सियां पाने के लिये भरसक कोशिशें की. लेकिन त्रिपाठी जी ने पद की चाह न रखते हुए अपने द्वाराहाट इलाके में मूलभूत सुविधाएं जुटाने के लिये सरकार पर दवाब बनाने के लिये संघर्ष का रास्ता चुना. उनके प्रयासों से ही द्वाराहाट में स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पालीटेक्निक व कुमाऊं इन्जिनीयरिंग कालेज की स्थापना हुई.

विपिन त्रिपाठी जी के जीवन पर श्री चारू तिवारी जी ने "विपिन त्रिपाठी और उनका समय" नाम से एक पुस्तक भी लिखी है.


हेम दा,
    १९७५ के आपातकाल में पूरे उत्तर प्रदेश में उन्हें ही सर्वाधिक दो साल का सश्रम कारावास दिया गया था।

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड विधान सभा में स्व० त्रिपाठी जी के भाषण बहुत ओजस्वी होते थे, उनके भाषणों में उत्तराखण्ड का दर्द झलकता था। उत्तराखण्ड की पीड़ा को वे हमेशा उठाया करते थे। कई बार मुद्दों को उठाने के लिये नियमों की तकनीकी परेशानी होने पर वे कहते थे कि इन नियमों को बदल दिया जाय।
     सभी सरकारी नीतियों को उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में बनाने की वे हमेशा वकालत करते थे। सरकारी मशीनरी में व्याप्त भष्ट्राचार से वह बहुत दुःखी रहते थे। वे कहा करते थे कि हर योजना में कमीशन लिया जाता है, कम से कम विधायक निधि से होने वाले कामों में तो कमीशन न लिया जाय।
     द्वाराहाट इंजीनियरिंग कालेज में तत्कालीन प्राचार्य पर उन्होंने सवाल खड़े किये और सदन में कहा कि "मेरे द्वारा प्राचार्य पर लगाये गये आरोपों की पुष्टि किसी भी एजेंसी से करा ली जाय। यदि मेरे आरोप गलत निकलते हैं तो मैं विधान सभा की सदस्यता से त्याग पत्र दे दूंगा और भविष्य में कभी चुनाव नहीं लडूंगा।" किसी सदन में ऎसा कह पाना आज के राजनीतिग्यों के लिये बहुत कठिन है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय


पंकज सिंह महर

त्रिपाठी जी मात्र उत्तराखण्ड के हे नेता नहीं थे, वे मजदूरों के हितों के प्रति भी बहुत चिंतित रहते थे। उत्तरखण्ड विधान सभा में वे लोक लेखा समिति के सदस्य थे और समिति के अध्ययन भ्रमण पर वे एक बार पूना गये थे। उन्हें वहां से ट्रेन पकड़नी थी और ट्रेन लेट थी, इसी स्टेशन पर कुली और रेलवे के कुछ कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर आन्दोलन कर रहे थे। तो त्रिपाठी जी ने अपना परिचय देते हुये उनकी समस्याओं को सुना और उनकी मांगों को जायज बताकर उन्हें समर्थन दिया तथा वहां पर उन्हें सम्बोधित भी किया, मेरे ख्याल से वह पहले ऎसे उत्तराखण्डी होंगे, जिनकी जिन्दाबाद के नारे पूना में भी लगे।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bipin Chandra Tripathi

Bipin Chandra Tripathi was the chief of the Uttarakhand Kranti Dal, a political party recognised in the Indian state of Uttarakhand.

पंकज सिंह महर

त्रिपाठी जी का संस्मरण चारु दा द्वारा प्रकाशित "जननायक" पुस्तक से

"मुझे रह-रह कर जेल से छूटने पर रानीखेत से द्वाराहाट को जाते समय शुभचिन्तकों द्वारा अपने पैंसोम की भाड़े की टैक्सी में क्रांतिकारी बन कर बैठने के अहम के अंतिम क्षणों में जम्बू-गंदरैणी बेचने वाले लिद्दड़-बिद्दड़ उस भोटिया भाई के शब्द डंक की तरह चोट मार रहे हैं-"भुला! आदमी ने अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिये। तुमने अभी किया ही क्या है, जो तुम टैक्सी के बगैर द्वाराहाट नहीं जा सकते।" उसके ये शब्द मुझे इतनी गहराई तक चोट कर गये कि मैं थोड़ी देर के लिये धम्म से जमीन पर बैठ गया, मेरी घिग्घी बंध गई। होश आने पर टैक्सी का प्रस्ताव रद्द करने के बाद २ बजे की बस से हम द्वाराहाट को चले। द्वाराहाट से २ कि०मी० पहले ही मेरी बस में होने की खबर के बाद जिंदाबाद के नारों के साथ जनता ने मुझे घेर लिया। मुझे याद आया कि ६ जुलाई, १९७५ को जब शाम ५ बजे मेरी दुकान से मुझे बंदी बनाकर मेन चौराहे पर खड़े ट्रक की ओर ले जाया जा रहा था। ५० गज की दूरी पर गोलाई में खड़े लोग यह सब देख रहे थे और इस तरह से देख रहे थे कि जैसे मैं कोई कत्ली मुल्जिम हूं और मेरे मन म्वं देखने वालों के प्रति एक हिकारत और नफरत की भावना ने घेर कर लिया।
       जिस वक्त मैं बस से नीचे उतरा, उस समय मुझे अपनी भारी भूल का अहसास हुआ और अपने से ही नफरत सी होने लगी कि ६ जुलाई, ७५ को मजबूर लोगों की वह दूरी उस आतंककारी व्यवस्था की देन थी, जिसने मेरे लोगों को भी मुझसे नहीं मिलने दिया और मैं उसे अपने प्रति अपने ही लोगों का छल समझ बैठा। ढोल-नगाड़े बजाते हुये घटगाड़ से जुलूस आगे को बढ़ा और मृत्युंजय के पास दोनों ओर खड़ी ईजाओं और दीदीयों द्वारा फूल और आंखत बरसाते हुये जो अकिंचन स्नेह और अपनत्व मुझे मिला, उससे लगा कि क्या यह स्नेह, यह प्यार, यह अपनापन रुपये पैसे से भी खरीदा जा सकता है।
      मैं सोचने लगा कि जितना अपनत्व हमें अपने इन लोगों से मिलता है, यदि उसका चौथाई हिस्सा भी बिना मिलावट के उन्हें लौटा दें तो फिर दशकों से भूख-प्यास और गरीबी में तड़फड़ाती इस छल-कपट से कोसों दूर निश्छल जनता को शायद आज के समाजसेवी नेताओं की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हितचिंतक सभा के प्रांगण में बांई ओर पोखर से सटी दीवार के ऊपर तीस फुट ऊंचा रंग-बिरंगी झंडियों से सजाया हुआ मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा (यद्यपि सत्ताधीशों की दरबारगिरी के लिये जनता के नाम पर इससे कहीं बड़े व हजारों की लागत के मंच बने हैं और बन रहे हैं) किसी प्रकार लोगों से मिलते-जुलते मैंने मंच पर पहुंच कर उनके प्रति कृतग्यता प्रकट करने की हठधर्मिता तो की, लेकिन फिर भी रह-रह कर उस भोटिया भाई के "भुला! अपनी औकात मत भूलना" शब्द चोट मारने लगे।

पंकज सिंह महर

श्रद्देय त्रिपाठी जी के साथ करीब से रहने का सौभाग्य मुझे भी मिला, जब वह उत्तराखण्ड विधान सभा में विधायक थे, तो अक्सर उनसे मेरी मुलाकात होती थी, कुछ सरकारी दौरों में भी मुझे उनके साथ जाने का मौका मिला, सदन में सदन की समितियों में जन भावना को प्रमुखता से रखते मैंने उन्हें स्वयं देखा। उनकी सच्चाई से सभी लोग भयभीत रहते थे, सही बात को प्रभावी ढंग से कहना, त्रिपाठी जी से सीखा जा सकता है। उत्तराखण्ड की छोटी-छोटी चीजों की उन्हें जनकारी थी। एक बार नैनीताल में जल निगम का निरीक्षण करने जब हम लोग गये तो अधिकारियों ने बताया कि फ्लैट के छोर पर जो नलकूप लगे हैं, वह झील का पानी नहीं खींचते हैं, तो त्रिपाठी जी ने कहा कि जहां पर यह मैदान है वहां पर भी झील ही थी, १९१० के आस-पास यहां पर नैना पीक से भू-स्खलन हुआ था, आज भी इसके नीचे झील है, तो अधिकारियों का मुंह देखने लायक था।
     उनकी एक और खात बात थी, वह वी०आई०पी० होने के बजाय बिपिन दा ही रहना चाह्ते थे। विधायक बनते ही जहां लोग नई और लग्जरी गाड़ी खरीद लेते हैं, वहीं त्रिपाठी जी देहरादून से द्वाराहाट या कहीं और का सफर बस से ही तय किया करते थे। एक बार मैंने कहा चाचा जी ( मैं उनको विधायक जी की जगह यही सम्बोधन देते थे और वे भी मुझे इसी रिश्ते का स्नेह देते थे) आपको रेलवे कूपन मिलते हैं आप हल्द्वानी तक ट्रेन से जाया करिये या टैक्सी से। तो उन्होंने कहा कि मैं वी०आई०पी० नहीं बनना चाहता। ट्रेन में सब सो जाते हैं और टैक्सी में २-३ आदमी ही जा पाते हैं, वहीं बस में ५०-६० लोगों से सम्पर्क होता है, उनकी समस्यायें पता चलतीं है, उनके विचार पता चलते हैं, ऎसा नहीं होता कि सिर्फ पढ़ा-लिखा आदमी ही विचारवान होता है। कभी-कभी अन्पढ़ भी ऎसी बात बताते हैं कि आई०ए०एस० भी वहां तक नहीं सोच पाते।
     तो इतने सरल और हर समय उत्तराखण्ड के विकास की सोच रखने वाले थे, त्रिपाठी जी। वासतव में उनके जाने से हमेने एक ऎसा नेता खो दिया, जिसकी हुंकार और दहाड़ गलत काम करने वालों को दुबकने के लिये मजबूर कर देती थी।
     उनकी मृत्यु के बाद सदन में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई थी, वैसा सन्नाटा मैंने सदन में सभी नहीं देखा, सभी गमगीन और अधिकांश उनकी चर्चा करते समय रो भी पड़े थे। श्री काशी सिंह ऎरी जी ने अपना भाषण रोते-रोते ही पूरा किया था, उन्होंने कहा कि त्रिपाठी जी की मृत्यु के बाद उनके बड़े और छोटे भाई को ढांढस बधाते हुये मैंने कहा कि "दाज्यू आप कह रहे होम मेरा छोटा भाई चला गया, मैं क्या करुं" और भुला तुम कह रहे हो कि मेरा ददा चला गया मैं क्या करुं, मेरा तो बड़ा और छोटा भाई ही चला गया, आप लोग बताओ, मैं क्या करुं"
       सदन में यह सब लिखते हुये भी मेरे आंखों में आंसुं थे और इन पंक्तियों को लिखते समय भी।