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Delicious Recepies Of Uttarakhand - उत्तराखंड के पकवान

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 15, 2007, 09:54:18 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

जितनी खुबसूरत उत्तराखंड की पहाड़ियाँ है उतना ही स्वादिष्ट होता है पहाड़ी खाना। आज पहाड़ी खाना में हम आप को भट्ट की चुड़कानी की रेसिपी बताते हैं। भट्ट का नाम आपने अगर पहली बार सुना है तो आपको बता दें कि इसे ब्लैक बीन भी कहते हैं। दोस्तों इस टोपिक के द्वारा हम उत्तराखंड के खाने की बिधि,तथा सामग्री के बारे मैं जानकारी उपलब्ध करायेंगे अगर आपके पास भी किसी बी पहाड़ी डिस की रिसिपी हो तो आप यहाँ पोस्ट करें !


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 PHAANU (garhwali cuisine)
by-Deepak joshi

Phanu is also made of dals (lentils) like chainsoo, but in this case the dals are soaked in water for about 4to 6 hours before its use. A different variety of dals like- Gahat, Arhar or green Mung can be used to prepare Phanu.
Ingredients
Gahat or Kulath (Horse gram) - 1 cup
Oil - 1/2 cup ( preferably mustard oil)
Garlic - 4 to 5 cloves
Ginger - 1/2 inch piece
Green chillies - 3 to 4
Jakhiya or Cummin seeds - 1 tsp
Asafoetida - a pinch
Dry coriander powder - 1/2 tsp
Turmeric powder - 1/4 tsp
Water - 3 cups
Salt - 2 tsp or to taste
Method:
1. Soak the Gahat daal in water overnight. If using Arhar daal, soak for 1-2hrs.
2. In the morning wash and rub the daal in running water so that it is free of seed covering (chilka). Then, grind it into a dry thick paste in a mixer or on a silbatta along with green chillies, garlic and ginger.
3. Place a tawa on a moderate flame. Put some oil and make thick pancakes ( like cutlets ) daal paste. Use only half of the paste for making the cakes.
4. Mix water with the remaining paste making it of pouring consistency. Heat oil in a pan and add jakhiya seeds and heeng. Now add Gahat paste, turmeric powder, dry coriander powder and salt.
5. Cover and cook for about 10 minutes on slow fire. Add the Gahat cakes to the gravy and continue simmer for another ten minutes. Thegravy should have pouring consistency. If thick add some more water and heat till it boils.
Garnish with pure ghee and choppedcoriander leaves . Serve with steamed riceLike ·  ·

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बिच्छू घास उत्तराखंड
बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica ) का कापलु या कापा : उत्तराखंड में बिच्छू घास [/color], कनाली का कापलु या कापा सर्दियों में बनाते हैं इस के दो कारण हैं पहला इसकी तासीर गर्म होती है जो सर्दियों में बेहद जरुरी होती है दूसरा सर्दियों में इस पौधे की पतियाँ काफी कोमल होती हैं जो खाने में लजीज होती है |


[/color]सामग्री : बिच्छू घास [/font][/size][/color], कनाली (Urtica Dioica ) , नमक , मिर्च ,गरम मसाला , हल्दी स्वाद अनुसार , अदरक ,लहसुन , चावल का मांड या बेसन का आटा , आमचूर के पते |

[/color]बनाने की विधि : सबसे पहले बिच्छू घास [/font][/size][/color], कनाली (Urtica Dioica ) के पतों को साफ़ धोकर बर्तन में उबालने के लिये रखिये | उबालने के बाद पतों को निकालकर उसे मिक्सी में पिस लीजिये व उबला हुआ पानी एक तरफ रखिये जो बाद में काम आयेगा | अब आपको मसालों का पेस्ट बनाना है जिसमें अदरक ,लहसुन , मिर्च व आमचूर के कुछ पते | अब आप कढ़ाई में तेल को गर्म करके मसालों का पेस्ट , मिर्च ,गरम मसाला , हल्दी स्वाद अनुसार हलकी आंच में भुनियें अब उसमें मिक्सी का पेस्ट निकालकर कढाई में डालें व नमक स्वाद अनुसार , 2 - 3 मिनट पकने के बाद , उसमें उबला बचा हुआ पानी व चावल का मांड या बेसन का आटा ( बेसन के आटे का पेस्ट ) मिला दीजिये 5 मिनट बाद गरमा गरम परोसें |

CA. Saroj A. Joshi

पिथोरागढ़ बिशेषकर  काली कुमाओं , पंचेश्वर साइड बनाये जाने वाले "लेट्वा"
का तरीका किसी को ज्ञात है तो बताये
ये मक्की के आटे, मट्ठा, घी से बनाया जाता है बिशेष बात ये है की इसमे डरुल की जगह बेलन (थेलवा) प्रयोग किया जाता है ...
एक डायलोग  बहुत फेमस है काली कुमाओं मैं
गजवा की मतारी गजेटि लौ
लेट्वा पकुनु सेटवा लौ
घी नाहन त तस्व्वो लौ  :),

Rajen

गजुवा कि मतारी गजेटि लौ
लेट्वा पकुनु सेतुवा सेटुवा  लौ
घी नाहन त तस्व्वो लौ.   ;D 8) ;D


Bhishma Kukreti

 उत्तराखंड के भोजन
                                                 डा. बलबीर सिंह रावत
भोजन, यानी खाने की वे वस्तुएं, जो स्वादिष्ट हों , पौष्टिक हों, आसानी से उपलब्ध हों, और आसानी से पचाई भी जा सकें। ज़रा सोचिये  की मानव जाति के पूर्वजों ने, प्रकृति में पैदा हुए  नाना प्रकार की बनस्पतिओं को चख कर, थल /जल के जानवरों, पक्षियों, से मांस, दूध, अंडे लेकर, उन्हें चखा होगा , उनके अच्छे बुरे , पौष्टिक/जहरीले असर को भुगता होगा और कई पीढ़ियों के अनुभव के बाद छांट कर चुना होगा की यह खाने लायक हैं और वह नहीं हैं . आग को बस में करने की कला सीखने के बाद तो मनुष्य के भोजन में आमूलचूल परिवर्तन आया होगा . जो वस्तुएं कच्ची हालत में अपाच्य थीं वे पकाने के बाद सुपाच्य हो जाती हैं, यह उस जमाने का एक युगपरिवर्तक आविष्कार था. आज हमारे लिए यह सब एक ऐसी साधारण सी बात है की इस पर कोइ सोचता भी नहीं।  मानव जाती के प्रसार के साथ साथ , उसकी यह भोजन के लिए उपयुक्त पदार्थों की ढूंढ उसके साथ साथ चलती रही क्योंकि जहां से ए दल,  पूरे परिवारों के साथ आगे बढे , उन्हे नईं बन्स्पतियो से, नईं जलवायु से अन्य प्रकार की भोजन सामगियाँ ढूंढनी पडीं .जब ये दल स्थाई रूप से कहीं बस गए तो इनके भोजन में उन स्थानीय वस्तुओं का अमिट प्रभाव रहा जो वहाँ पाई जाती थीं .तब खेती भी पूरी तरह प्राकृतिक आपदाओं से, परिवर्तनों से , ऒखे, या अतिब्रिष्टि से प्रभावित होती थी तो मानुष ने वनों में उपलब्ध खाद्य योग्य पदार्थों को भी पहिचाना और उनका उपयोग करना शुरू किया .
उत्तराखंड के सन्दर्भ में जब यहाँ के निवासियों के भोजन की बात आती है तो इसमें  बहुत विभिन्नताएं हैं।  इन विभिन्न्ताओं का कारण यहाँ के जलवायु में पैदा होने वाले खाद्य पदार्थ हैं। नदी घाटियों की नम और गर्म हवाएं, ऊंचे पर्वतों की ठंडी आबोहवा , हर दिशा के ढलानों की अपनी विशेषताएं  हैं जिनमे हजारों प्रजातियों की बनस्पतिया उगती हैं।  इन में से कई की खेती की जाती है और बहुत सारी जंगलों से ही प्राप्त हो जाती हैं, बस मौसम में बीन कर, तोड़ कर , खोद कर ले आओ।  उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भोवाली में स्थित नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज के क्षेत्रीय स्टेशन ने इस विषय पर शोध किया . उनके वैज्ञानिकों, मेहता , नेगी, और ओझा, ने पाया की कृषि क्षेत्र में कुल ९७ प्रजातियों की फसलें उगाई जाती हैं  जिनमे अनाज की ८ , मोटे अनाज की ६ ,दालों की १५, साग-सब्जियों की २८, तिलहनों की ११, फलों की १९ और मसालों की १० प्रजातियों की फसलें उगाई जाती हैं .
इस विविधता के भोज्य सामगियों की उपलब्धता में पौष्टिकता का संतुलन भी है। जहां अनाज (कार्बोहाइडरेट) की कुल १४ किस्में उगाई जाती हैं, वहीं दालों (प्रोटीन ) की १५, तिलहनों (वसा ) की ११,  फलों की १९ और साग सब्जियों( खनिज, विटामिन , ऐंटीऔक्सीडेंट) की २८ किस्में पैदा की जाती हैं।
इन खेती से उगाई जाने वाली भोज्य सामग्रियों के साथ साथ वनों में प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले और खाए जा सकने वाले फलों की ६७ किस्में है और साग सब्जी बनाने लायक फूलों, पत्तियों और कंद मूलों की २७ प्रजातियाँ हैं जिन्हें उत्तराखंड के निवासी सदियों से उपयोग में लाते रहे हैं।
उपरोक्त वैज्ञानिकों ने यह भी पाया की इतने सारे भोज्य पदार्थों की उपलब्धि ने ही यह संभव किया कि उत्तराखंड के लोग कुल १२५ से अधिक प्रकार की  भोजन बनाते हैं . अकेले रोटियों और नाना प्रकार के भातौं की संख्या २१ है, दालें १५ किस्म की बनती हैं,, ६ प्रकार के फाणे-चैसे, १९ प्रकार के मीठे भोजन,
११ प्रकार की विशेष सब्जियां, ८ प्रकार के झोल, १० प्रकार की चटनियां , ५ प्रकार के रायते, १० प्रकार की बड़ियाँ और पकोडियां बनाई जाती हैं
यह तो रहा एक संकलन, कि कितनी सामगियाँ उपलब्ध हैं और उनसे क्या क्या बन सकता है। यह सारी खोजें और विधियां हमारे पूर्वजों ने खोजी/स्थापित/प्रचलित कीं थीं, उन्होंने ने ही इतने सारे प्रकार के भोजन बनाने की रेसिपियाँ भी विकसित की थीं। जो अब प्रयोग में कम ही लाई जाती हैं। आज के सन्दर्भ में देखें तो अब न तो इतने किस्म के पदार्थ उगाये जा रहे हैं , न ही बनो में वह सब उपलब्ध है जो कभी था.७५ साल पाहिले हम स्कूल से घर आते हुए लिंगडे, खुन्तड़े तोड़ कर ले आते थे, सगोड़े के पुश्ते के बेडू के पेड़ से नए लगे कच्चे फलों की झुम्पिया तोड़ कर सब्जी के लिए ले सकते थे, अब यह सब कई कई कारणों से दुर्लभ होता जा रहा है.
शिक्षा और जीवन शैली का शहरीकरण होने के कारण खान पान भी बदल गया है. मंडुए के बाडी और कन्डली की धबड़ी को हमारे ही बच्चे छी छी  के नाम से पुकारते हैं, गाँवों में भी। माँ बाप भी लाचार . लेकिन  एक बार मैंने अपने ही बच्चों को अखबार दिखाया की मंडुए को कर्नाटक में रागी  कहते हैं, वहा से आये भारत के प्रधान मंत्री रोज रागी बाल्स  (बाडी के पिंड) खाते हैं,  और मंडुये का आटा, गेहूं के आटे से अधिक स्वास्थ्यवर्धक है. अब अखबार में लिखा था तो वे राजी हुए की वे भी काली रोटी में घी और भुने तिल,मूंगफली, हरे धनिये, लहसुन के हरे पत्ते और कलियाँ, हरी मिर्च, अदरख की नमकीन, चटपटी चटनी के साथ खाने लगे. दो दिनों बाद दूकान में गया, मंडुए का आटा माँगा, तो उत्तर मिला "अब अगले जाड़ों में ही मिलेगा". शहर की अन्य दुकानों में खोजा , महँगा पेट्रोल जलाया, तो एक दूकान में मिला,  बोला "मेरे यहाँ हर समय आपको मिलेगा " भाव जाड़ों में हर पहाडी पंसारी के यहाँ से चार रूपये अधिक.  कहने का अर्थ यह है की केवल प्रकृति ने ही इतनी पौष्टिक सामग्रियों को दुर्लभ नहीं बहाया है , हम मनुष्यों के लालच ने और दुर्लभ बना दिया है , मंडुये का आटा गेहूं के आटे से ६ रूपये महँगा? इसी मंडुये के बीज, कई विदेशों में रहने वाले कर्नाटकी परिवार, अंकुरित करके, उनका माल्ट बना कर शिशुओ का अन्न प्राशन भी कराते हैं, मेरे एक कर्नाटकी सहयोगी ने मुझे मंडुए का मीठा सत्तू भे ला कर दिया था। बहुत स्वादिष्ट था .       
आज की पढी लिखी गृहणियों को तो पहाडी व्यंजन बनाना नहीं आता।  जब इनकी माताएं बनाती थीं तो ये बालिकाएं पढाई में व्यस्त, पका पकाया खाना खाती थीं, बाद में कुछ बनाना सीखा तो बड़े बड़े होटलों के पसिद्ध श्येफों द्वारा लिखी गयी ( या उनकी लिखी किताबों की नक़ल मार कर, प्रवीण गृहणियों द्वारा लिखी रविवारीय स्तंभों में छपी) रेसिपियों को सामने रख कर।  अपनी कोइ पर्वतीय व्यंजनों को बनाने के अधिकृत, परिस्कृत, मानकीकृत रेसिपियां तो किसी ने अभी लिपि बद्ध करने की सोची भी भी नहीं होगी। फिर प्रवासियों के लिए पर्वतीय खाद्य सामग्रोयों की निरंतर उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है   .                                      उपरोक्त संस्थान  ने भी केवल संकलन के लिए शोध किया है. और न तो  वस्तुओं  के पर्वतीय ,प्रचलित नाम ही दिए हैं और नहीं उगने/उगाये जाने के स्थान का कोई  विवरण है. यह काम किसी अन्य अन्वेषक दल को  और अन्य संस्थानों  को भी करना चाहिये.  वैसे अगर विश्वविद्द्यालयों और महाविद्द्यालयों के वनस्पति शाश्त्र विभाग ऐसा अनुसंधान करें तो उनका उताराखंड में स्थापन सार्थक हो जायेगा. अभी अल्मोड़ा में जो हुनर विकास का नया पाक शाश्त्र केंद्र खुलने वाला है वहाँ  अगर एक अन्वेषण कोष्ठ भी खुले और यह कोष्ठ उन सारे १२५ व्यंजनों की ,जिनका संकलन उपरोक्त संथान ने किया है, की सारी पारंपरिक रेसिपियों का संकलन, आंकलन, परीक्षण और  मानकीकरण करके,  पुस्तक रूप में उपलब्ध करा दे तो यह इस प्रदेश की सरकार का उत्तराखंड की भोजन विरासत को लोकप्रिय बनाने की दिशा में एक अनूठा कदम होगा।
इसके साथ साथ अगर अब भी कोइ जानकार लोग, जिनके घरों में, जान पहिचान में , ऐसी प्रवीण महिलायें, और सामाजिक भोज बनाने वाले सरयूल परवारो के जानकार हैं,  तो उनसे उनकी रेसिपिया ले कर भी प्रकाशित की जा सकती है।  यहाँ पर एक चेतावनी भी मैं देना कहता हूँ , चूंकि अब पर्वतीय खाद्य सामग्रियों का चलन बढ़ रहा है, तो इनका व्यापारिक महत्व भी बढ़ रहा है. ऐसे में जो पर्वतीय भोज्य प्रसंस्करण और पाक शाश्त्र की  असली टेक्नौलोजी है, उसे ताक पर रख कर, कई नकलची भी उभर रहे हैं, जैसा मन में आया, जैसा भी उनकी समझ में आया वैसे ही ऊटपटांग बनाया और बेच दिया। ऐसे लोग   सब को धोखा दे कर  फलफूल रहे है। इस लिए राज्य सरकार का यह फर्ज है की वोह अपने समाज कल्याण विभाग में एक विरासत सरंक्षण उपविभाग खोले और इन विलुप्त होती विरासतों का मूल रूप  में संकलन करके, उच्च कोटि के शोध संस्थानों में इनका परीक्षण, मानकीकरण और प्रकाशन कराने की व्यवस्था करे . हमारे भोजनों में से काफी पदार्थ है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो सकते हैं, केवल दो उदाहरण काफी हैं, खूब फेंट कर बनाई गयी उड़द-भुजेले की मसालेदार बडियां और जिंजर हुए अरसे . और भी कई पदार्थ हैं कोइ इन्हें आगे तो बढायं। 

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Bhishma Kukreti

कंडाळि   धपड़ी /कापिलु   और अन्य उपयोग
( उत्तराखंड के भोज्य पदार्थ , गढ़वाल के भोज्य पदार्थ , कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, उधम सिंह नगर कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, पिथौरा गढ़ कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, द्वारहाट कुमाऊं के भोज्य पदार्थ,बागेश्वर कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, चम्पावत कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, अल्मोड़ा कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, नैनीताल कुमाऊं के भोज्य पदार्थ, पौड़ी  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, चमोली  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ,  रुद्रप्रयाग   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, टिहरी  गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, उत्तरकाशी   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, देहरादून   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ, लैंसडाउन   गढ़वाल के भोज्य पदार्थ लेख माला )

                                                       डा. बलबीर सिंह रावत
कंडली, ( Urtica dioica), बिच्छू घास , सिस्नु , सोई , एक तिरिस्क्रित पौधा, जिसकी ज़िंदा रहने की शक्ति और जिद  अति शक्तिशाली है.क्योंकि यह अपने में कई पौष्टिक तत्वों को जमा करने में सक्षम है, हर उस ठंडी आबोहवा में पैदा हो जाता है जहाँ थोडा बहुत नमी हमेशा रहती है. उत्तराखंड में इसकी बहुलता है, और इसे मनुष्य भी खाते हैं, दुधारू पशुओं को भी इसके मुलायन तनों को गहथ  झंगोरा, कौणी , मकई , गेहूं, जौ मंडुवे के आटे के साथ पका कर पींडा  बना कर देते है।
      कन्डालि में जस्ता, ताम्बा सिलिका, सेलेनियम , लौह  , केल्सियम, पोटेसियम, बोरोन, फोस्फोरस  खनिज, विटामिन ए , बी १ , बी २ , बी ३ , बी ५ , सी ,और के, होते हैं , तथा ओमेगा ३ और ६ के साथ साथ कई अन्य  पौष्टिक तत्व भी होते हैं .इसकी फोरमिक ऐसिड से युक्त, अत्यंत पीड़ा दायक , आसानी से चुभने वाले ,सुईदार रोओं से भरी पत्तियों और डंठलों की स्वसुरक्षा अस्त्र के और इसकी हर जगह उग पाने की खूबी के कारण, इसकी खेती नहीं की जाती।
धबड़ी ठेट पर्वतीय शब्द है, जिसका अर्थ होता  है  किसी भी हरी सब्जी में आलण डाल कर, भात के साथ , दाल के स्थान पर, खाया जाने वाला भोज्य पदार्थ . हर हरी सब्जी का अपना अलग स्वाद होता है तो, धबड़ी के लिए पालक, पहाड़ी पालक, राई और मेथी तो उगाऎ जाने वाली सब्जिया है, स्वतः उगने वालियों में से कंडली सबसे चहेती है. प्राय:  इसकी धबड़ी जाड़ों में ही बनती है, क्योंकि तब इसकी नईं कोंपलें बड़ी मुलायम और आसानी  से पकने वाली होती है. चूंकि इसके रोयें चुभते ही तेजी  से जलन पैदा करते हैं, तो इसे तोड़ने के लिए चिमटे और चाकू का, तथा हाथ में मोटे कपड़े का आवरण या दस्ताने का होना जरूरी होता है . केवल शीर्ष की मुलायम नईं कोंपलें ही लेनी चाहियें .एक बार के लिए जितना भात पकाया जता है उसी के हिसाब से कंडली की मात्रा ली जाती है , चार जनो के लिए ३५० ग्राम ताजी कंडली काफी रहती है  इसे खूब धो लेना चाहिए, क्योंकि  जहां से तोडी गयी है वहाँ की धूल और अन्य गन्दगी के कण इस पर जमा हो सकते हैं .
आलण के लिए प्रयोग में लाई जाए वाली वस्तुएं नाना प्रकार की होती हैं , जैसे गेहूँ/जौ का आटा, बेसन, गहथ भिगोये हुए झंगोरा, कौणी , चावलों को पीस कर बनाया गया द्रव्य इत्यादि. इनका  अलग अलग सब्जियों के साथ का जोड़ा होता है. कन्डली के लिए आटा ही उपयुक्त होता है,  इसके स्थान पर बेसन भी  लिया जा सकता है। .इन वस्तुओं की मात्रा, तैयार धबड़ी के ऐच्छिक गाढे पन पर निर्भर करता है , बहुत पतली या गाढी ठीक नहीं होती। घोल को पहिले से तैयार करके रखना ठीक रह्ता है। कढाई में सरसों का तेल गरम करके, कटे प्याज को गुलाबी भून के आंच हल्की कर देनी चाहिए। फिर हींग और मसाले और तुरंत कंडली  डाल कर और नमक मिर्च  मिला कर , थोड़ा चला कर ढँक कर पकने रखते है. १० मिनट बाद, आलण के घोल को डाल कर चलाते रहते हैं ताकि आलण ठीक से मिल जाय. अब इसे चलाते रहना चाहिए  जब तक पक न जाय . बस स्वादिष्ट और पौष्टिक धबड़ी तैयार है.

                                                                         कंडाळि के अन्य भोज्य प्रयोग
सूखी पत्तियों से कपिलु या धपडि:कंडाळी की पतियों और डंठल को सुखाकर रख दिया जाता है और फिर आवश्यकता अनुसार  गहथ आदि के फाणु बनाने के काम आता है।
पेस्टो:  कंडाळी की पत्तियों को मसाले , नमक , तेल, मूंगफली , चिलगोजा  में मिलाकर  पीस कर  पेस्ट बनाया जाता और किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ के साथ मिलाकर भोज्य बनाया जा सकता है।
सूप:कंडाळी की पत्तियों को पानी में उबाला जाता है फिर छाने पानी में घी , नमक , काली मिर्च व थोड़ा सा आटा  डालकर ग्राम करने से सूप भी बनाया जाता है।
ठंडा पेय: कंडाळी की पत्तियों को चीनी  की चासनी में मिलाकर छोड़ देते हैं जिससे चीनी में छोड़ देते हैं, फिर कंडाळी की पत्तियों को बाहर निकाल देते हैं। नीम्बू आदि मिलाकर पानी के साथ ठंडा पेय स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है।
बियर  : कंही कंही कंडाळी की पत्तियों की सहायता से बियर भी बनती है।

                                                                                कंडाळी  का औषधि उपयोग 

  कंडाळी का विभिन्न देशों में औषधीय उपयोग भी होता है . गढ़वाल कुमाऊं में शरीर के किसी भाग में सुन्नता हटाने के लिए शरीर पर कंडाळी स्पर्श से कंडाळी का उपयोग होता है। भूत भगाने के लिए भी कंडाळी स्पर्श किया जाता है। हैजा आदि की बिमारी ना हो इसके लिए सिंघाड पर कंडाळी /कांड भी बांधा जाता था  .
जर्मनी में गठिया के रोग उपचार में  कंडाळी उपयोग होती है।
यूरोप में कुछ लोग इसे कई अन्य औषधियों में प्रयोग करते थे.
कई देशों में , कहा जाता है कि कंडाळी को जेब में रखने से बिजली गिरनी का भय नही रहता है।

                                                           रेशा उपयोग
     यूरोप में कंडाळी के द्न्थल से रेशा निकाला जाता है। जर्मनी में एक कम्पनी  कंडाळी के रेशों का व्यापार भी करती है।
  कंडाळी की जड़ों से पीला रंग भी निर्मित होता है। पत्तियों से पीला और हरा मिश्रित रंग भी बनता था
ताम्र युग में कंडाळी रेशा उपयोग प्रचलित था .                                                               
                                                           
                                                         कंडाळी और भाषाओं , साहित्य में  अलंकार

कंडाळी का भाषा को अलंकृत करने में भी उपयोग होता है। गढवाली में कहते हैं , ज्यू बुल्याणु च त्वै तैं कंडाळीन  चूटि द्यूं। या तै तैं कंडाळीन चूटो
प्राचीन रोमन साहित्य में  कंडाळी के मुहावरे मिलते हैं। शेक्सपियर के कई नाटकों में  कंडाळी संम्बन्धित मुहावरे प्रयोग हुए हैं। जर्मनी में और हंगरी भाषा में कई मुहावरे कंडाळी समन्धित हैं
स्कॉट लैंड आदि जगहों में कंडाळी सम्बन्धित लोक गेट पाए जाते हैं
स्कैंडीवियायि लोक साहित्य में कंडाळी सम्बन्धी लोक कथाये मिलती हैं 

अत: कहा जा सकता है कि कंडाळी पौधा मनुष्य का सच्चा मित्र है

                                                   
                                                               
BSrawat         .       .,

Bhishma Kukreti

पत्यूड़
                                                              डा. बलबीर सिंह रावत
                        घर घर में बनाया जाने वाला पत्यूड़, खुद अपने नाम से ही अपना परिचय देता है : पत्तों से बनी हुई, स्वादिष्ट  पकौड़ी। पकौड़ी कई पदार्थों से बनाई जाती हैं , आलू की, प्याज की , पिसी हुई दालों की, और नाना प्रकार के पत्तों की। पत्तों की पकोदीयों से पत्यूड भिन्न हैं . जहा पकौड़ी के लिए मेथी इत्यादी के पत्ते काट कर बेसन में मिला कर पकौड़ी बनती है, वहीं पत्यूड़ बनाने के लिय साबुत, पूरे, या, अगर पत्ते बड़े हैं , या छोटे छोटे पयूद बनाने हैं तो बीच से  दो भागों में कटे पत्ते लेते हैं। पत्यूड़ बनाने की विधि अपने में अनूठी है. इसके लिए उपयुक्त वे मुलायम पत्ते होते है जो खाद्य हैं, जैसे गीन्ठी के, तैडू के और पिंजाड़ के। पिंजाड़ एक अपने आप, सगोडों ( किचेन गार्डेन) में  उगने वाला पौधा है जो जमीन पर ही रेंक कर बढ़ता है . इसकी खूबी यह है कि तलने पर इसके पत्ते फूल जाते हैं , छोटे छोटे गुब्बारों की तरह और बड़े ही कुरमुरे हो जाते है.
पत्यूड़  बनाने के लिए ताजे और  मुलायम पत्ते ही लिए जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह से धो कर ही उपयोग में लाते हैं। अलग से वेसन या गेहूं , मक्की , चावल का आटा लिया जा सकता है, अलग अलग या मिला कर। इस आटे में मन पसंद मसाले ,नमक , मिर्च, हल्दी और हींग मिला कर पानी डाल कर दपदपा घोल बनाया जाता है। इस घोल की,   पत्तों के दोनों तरफ, हल्की परत लगाई  जाती है और तब पत्तों को डेढ़ X तीन इंच के चौकोर आकार में मोड़ा जाता है . घोल का गाढापन ही गोंद का सा काम करता है तो पत्ते खुलते नहीं। इन की मोटाई चौथाई इंच से अधिक नहीं होनी चाहिये. इन लपेटे पत्तों को गरम तेल में, बादामी रंग होने तक  तलते हैं। पीली सरसों के तेल में तेल हुए पत्यूड्यों का स्वाद अपने में निराला होता है।
वैसे तो गरम गरम पत्यूड़े और चाय का आनन्द अनूठा होता है , लेकिन पत्यूडों को सेंडविच में, परांठों के साथ ,
साधारण रोटी में रोल बना कर  बच्चों के स्कूल के लंच बोक्स में या यात्रा के लिए रखे सूखे भोजन के साथ, सब्जी के स्थान में रख कर निराले स्वाद का आनंद लिया जा सकता है. एक बार बना कर देखिये।
dr.bsrawat28@gmail.com